मंगलवार, 26 अगस्त 2008

प्राचीनता और नवीनता का सfन्नवेश astrology, jyotish , rashifal,forecast, 2014



कादम्बनी´ पत्रिका की वर्तमान संपादिका के अनुसार `कोई भी स्वस्थ सनातन परंपरा पुराने अंधविश्वासों को आगे बढ़ाने और तर्क के खिलाफ उनको संरक्षण देने के जिद के बूते नहीं बनती। हमारे यहॉ बुद्ध , महावीर से लेकर गॉधी और जे पी तक के चिंतकों के विवादों , विश्लेषणों और खंडन-मंडन से सनातन धारा की गहराइयॉ छानी जाती रही हैं और कूड़ा-कचरा हटाकर उसके प्रवाह को बनाए रखा गया , उसकी पहचान यह है कि वे बंधन नहीं रचती , बंधनों से मुक्त करती है।´  इस आधार पर इस वैज्ञानिक युग में ज्योतिषशास्त्रवेत्ताओं , दार्शनिकों और समालोचकों का कर्तब्य होना चाहिए कि इस शास्त्र में अन्तर्निहित सत्य और असत्य की छानबीन करके उसे अलग-अलग करने का प्रयत्न करें।
`गत्यात्मक ज्योतिषिय अनुसंधान केन्द्र´ द्वारा ग्रहों के गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति को निकालने के सूत्र की खोज के बाद ज्योतिष आज एक वस्तुपरक विज्ञान बन चुका है। जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए दो वैज्ञानिक पद्धतियों `गत्यात्मक दशा पद्धति´ और `गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ का विकास किया गया है , जिसके द्वारा जातक अपने पूरे जीवन के उतार चढाव का लेखाचित्र प्राप्त कर सकते हैं। प्राचीनता और नवीनता का `गत्यात्मक ज्योतिष में सfन्नवेश `आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्वत:´ के आर्ष वाक्य के अनुदेश के सर्वथा अनुकूल है। नए रास्ते में चलनेवाले पहले व्यक्ति के लिए सारस्वत स्वीकृति सहज नहीं होती होने से कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता है। इसलिए महाकवि कालिदास ने कहा था—–
पुराणमित्येव न साधु सर्वं, न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्।
सन्त: परिक्ष्यान्यतरद् भजन्ते , मूढ़: पर प्रत्ययनेय बुfद्ध।।
`जो पुराना है , वह न तो सबका सब ठीक है और जो नया है , वह केवल नया होने के कारण अग्राह्य है।साधु बुfद्ध के लोग दोनों की परीक्षा करके ही स्वीकार अस्वीकार करते हैं। दूसरों के कहने पर तो मूढ़ ही राय बनाते हैं।´

1 टिप्पणी:

पंकज शुक्ल ने कहा…

ज्योतिष भारतीय परंपरा की सतत बहने वाली धारा है। इसके अनेकानेक प्रसंग और पहलू हैं। गत्यात्मक ज्योतिष का मुझे कोई सीधा अनुभव तो नहीं है, लेकिन ज्योतिष गणनाओं पर मेरी श्रद्धा है।

बाकी इस बारे में आप से मेल के ज़रिए संपर्क करने की कोशिश रहेगी।

सादर,