मंगलवार, 26 अगस्त 2008

फलित ज्योतिष की खामियॉ astrology, jyotish , rashifal, forecast, 2014

किसी अनजान व्यक्ति के भूत या वर्तमान को बतलानेवाले व्यक्ति ज्योतिषी ही नहीं , हस्तरेखा विशेषज्ञ , तांत्रिक , योगी और हिप्नोटाइज करनेवाले भी हो सकते हैं , किन्तु भविष्य की जानकारी देनेवाली एकमात्र विद्या फलित ज्योतिष ही है , जो इस विशाल ब्रह्मांड में विचरण करनेवाले ग्रहों के आधार पर मानवजीवन पर पड़नेवाले प्रभाव को स्पष्ट करती है। इसलिए भूत और वर्तमान को बतलानेवाले स्पष्टत: ज्योतिषी ही हैं , यह भ्रम न पालें। आजकल फलित ज्योतिष को विज्ञान नहीं स्वीकार किए जाने का मुख्य कारण इसकी कुछ कमजोरियॉ हैं—–
फलित ज्योतिष की सबसे बड़ी कमजोरी — ग्रहों की शाक्ति के मूल्यांकण के लिए प्रामाणिक सूत्र का अभाव होना। किसी व्यक्ति के विशेष संदर्भो की व्याख्या के लिए उसके राfशश या उसकी राfश में स्थित ग्रहों की शक्ति की जानकारी आवश्यक है , किन्तु इस विषय पर ज्योतिष के सभी विद्वान एकमत नहीं हैं। ग्रह की शक्ति के निर्धारण के लिए प्राचीन ग्रंथों में दस-बारह सूत्र दिए गए हैं। हर ज्योतिषी हर जन्मकुंडली के फल के अनुसार अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं।
बिल्कुल यही हाल ग्रहों के दशाकाल निर्धारण में भी है , यानि किस ग्रह का प्रभाव जीवन के किस अवधि पर पड़ेगा , इसके लिए विंशोत्तरी दशा पद्धति का उपयोग किया जाता है , किन्तु इसमें एक साथ ग्रह की चार दशाएं चलती हैं। हर ज्योतिषी हर जन्मकुंडली के फल को देखते हुए अलग-अलग दशाकाल को महत्वपूर्ण समझते हैं। दरअसल हमारे अनुभवी और ज्ञानी _षि-महर्षियों के बाद ज्योतिष-शास्त्र परंपरागत व्यवसाय के रुप में सिमट गया और सभी ज्योतिषियों के भविष्यकथन में अंतर फलित ज्योतिष का एक अवैज्ञानिक पहलू बनकर उभरा और अंधविश्वास में इसकी गिनती होने लगी।
वास्तव में भविष्य जानना सबके लिए आवश्यक है। भविष्य में उपस्थित होनेवाली सफलताओं की जानकारी जहॉ वर्तमान की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देती है , वहीं भविष्य में उपस्थित होनेवाली कठिनाइयों की जानकारी अतिआशावाद को कम कर निfश्चंति को कम कर अधिक जागरुक बनाती है।

प्राचीनता और नवीनता का सfन्नवेश astrology, jyotish , rashifal,forecast, 2014



कादम्बनी´ पत्रिका की वर्तमान संपादिका के अनुसार `कोई भी स्वस्थ सनातन परंपरा पुराने अंधविश्वासों को आगे बढ़ाने और तर्क के खिलाफ उनको संरक्षण देने के जिद के बूते नहीं बनती। हमारे यहॉ बुद्ध , महावीर से लेकर गॉधी और जे पी तक के चिंतकों के विवादों , विश्लेषणों और खंडन-मंडन से सनातन धारा की गहराइयॉ छानी जाती रही हैं और कूड़ा-कचरा हटाकर उसके प्रवाह को बनाए रखा गया , उसकी पहचान यह है कि वे बंधन नहीं रचती , बंधनों से मुक्त करती है।´  इस आधार पर इस वैज्ञानिक युग में ज्योतिषशास्त्रवेत्ताओं , दार्शनिकों और समालोचकों का कर्तब्य होना चाहिए कि इस शास्त्र में अन्तर्निहित सत्य और असत्य की छानबीन करके उसे अलग-अलग करने का प्रयत्न करें।
`गत्यात्मक ज्योतिषिय अनुसंधान केन्द्र´ द्वारा ग्रहों के गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति को निकालने के सूत्र की खोज के बाद ज्योतिष आज एक वस्तुपरक विज्ञान बन चुका है। जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए दो वैज्ञानिक पद्धतियों `गत्यात्मक दशा पद्धति´ और `गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ का विकास किया गया है , जिसके द्वारा जातक अपने पूरे जीवन के उतार चढाव का लेखाचित्र प्राप्त कर सकते हैं। प्राचीनता और नवीनता का `गत्यात्मक ज्योतिष में सfन्नवेश `आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्वत:´ के आर्ष वाक्य के अनुदेश के सर्वथा अनुकूल है। नए रास्ते में चलनेवाले पहले व्यक्ति के लिए सारस्वत स्वीकृति सहज नहीं होती होने से कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता है। इसलिए महाकवि कालिदास ने कहा था—–
पुराणमित्येव न साधु सर्वं, न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्।
सन्त: परिक्ष्यान्यतरद् भजन्ते , मूढ़: पर प्रत्ययनेय बुfद्ध।।
`जो पुराना है , वह न तो सबका सब ठीक है और जो नया है , वह केवल नया होने के कारण अग्राह्य है।साधु बुfद्ध के लोग दोनों की परीक्षा करके ही स्वीकार अस्वीकार करते हैं। दूसरों के कहने पर तो मूढ़ ही राय बनाते हैं।´

गत्यात्मक ज्योतिष : संक्षिप्त परिचय astrology, jyotish , rashifal,forecast, 2014



भारत के बहुत सारे लोगों को शायद इस बात का ज्ञान भी न हो कि विगत कुछ वर्षों में उनके अपने देश में ज्योतिष की एक नई शाखा का विकास हुआ है , जिसके आधार पर वैज्ञानिक ढंग से की जानेवाली सटीक तिथियुक्त भविष्यवाणी जिज्ञासु बुfद्धजीवी वर्ग के मध्य चर्चा का विषय बनीं हुई है। सबसे पहले दिल्ली से प्रकाfशत होनेवाली पत्रिका `बाबाजी´ के अंग्रजी और हिन्दी दोनो के ही 1994-1995-1996 के विभिन्न अंकों तथा ज्योतिष धाम के कई अंकों में `गत्यात्मक ज्योतिष´(GATYATMAK JYOTISH) को ज्योतिष के बुfद्धजीवी वर्ग के सम्मुख रखा गया था। जनसामान्य की जिज्ञासा को देखते हुए 1997 में दिल्ली के एक प्रकाशक `अजय बुक सर्विस´ के द्वारा इसपर आधारित पुस्तक `गत्यात्मक दशा पद्धति : ग्रहों का प्रभाव´(GATYATMAK DASHA PADDHATI) के पहले परिचय के रुप में पाठकों को पेश की गयी। इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखते हुए रॉची कॉलेज के भूतपूर्व प्राचार्य डॉ विश्वंभर नाथ पांडेयजी ने `गत्यात्मक दशा पद्धति की प्रशंसा की और उसके शीघ्र ही देश-विदेश में चर्चित होने की कामना करते हुए हमें जो आशीर्वचन दिया था , वह इस पुस्तक के प्रथम और द्वितीय संस्करण के प्रकाfशत होते ही पूर्ण होता दिखाई पड़ा। इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि शीघ्र ही 1999 में इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाfशत करवाना पड़ा।
पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात् हर जगह `गत्यात्मक ज्योतिष´ चर्चा का विषय बना रहा। कादfम्बनी पत्रिका के नवम्बर 1999 के अंक में श्री महेन्द्र महर्षि जी के द्वारा इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया। जैन टी वी के प्रिया गोल्ड यूचर प्रोग्राम में भी इस पद्धति की चर्चा-परिचर्चा हुई। दिल्ली के बहुत से समाचार पत्रों में भी इस पद्धति पर आधारित लेख प्रकाfशत होते रहें। रॉची दूरदशZन , रॉची द्वारा भी पिछले वर्ष श्री विद्यासागर महथा जी से इंटरव्यू लेते हुए इस सिद्धांत की जानकारी जनसामान्य को दी गयी।

ज्योतिष पर युग का प्रभाव astrology, jyotish , rashifal,forecast, 2014


पृथ्वी के स्वरुप , वायुमंडल , तापमान एवं इसमें स्थित पर्वतों , नदियों , चट्टानों , वनों सभी में कुछ न कुछ परिवर्तन देखा जा रहा है। मनुष्य में तो यह परिवर्तन अन्य प्राणियों की तुलना में और तेजी से हुआ है , इसलिए ही यह सर्वाधिक विकसित प्राणी है। पर्यावरण् के हजारों , लाखों वर्षों के इतिहास के अध्ययन में यह बात पाया गया है कि प्रकृति में होनेवाले परिवर्तन और वातावरण में होनेवाले परिवर्तन के अनुरुप जो जड़-चेतन अपने स्वरुप और स्वभाव में परिवर्तन ले आते हैं , उनका अस्तित्व बना रह जाता है। विपरीत स्थिति में उनका विनाश निfश्चत है।करोड़ों वर्ष पूर्व डायनासोर के विनाश का मुख्य कारण पर्यावरणवेत्ता यह बताते हैं कि वे पृथ्वी के तापमान के अनुसार अपना समायोजन नहीं कर सकें।

इस प्रकार सभी शास्त्रों और विभिन्न भाषाओं के साहित्य पर युग का प्रभाव पड़ते देखा गया है। नीतिशास्त्र युग के साथ परिवर्तित नीतियों की चर्चा करता है। राजनीतिशास्त्र में भी अलग युग और परिस्थिति में भिन्न भिन्न सरकारों केमहत्व की चर्चा की जाती है। औषधि-शास्त्र भी अपनी औषधियों में हमेशा परिवर्तन लाता रहा है। जमाने और आर्थिक स्थिति की भिन्नता के साथसाथ अलग प्रकार की पैथी लोकप्रिय होती रहीं। आर्थिक नीतियॉ भी समय और वातावरण के अनुरुप अपने आपको परिवर्तत करती रहीं। किन्तु आज हजारों वर्ष व्यतीत होने तथा ज्योतिष के क्षेत्र में हजारो लोगों के समर्पित होने के बावजूद ज्योतिष शास्त्र की जितनी भी पत्रिकाएँ आ रही हैं , वे पुराने श्लोकों , उनके अनुवादों और पुराने अनुभवों पर आधारित होती हैं। हजारो वर्ष पूर्व और अभी के लोगों की मानसिकता में जमीन आसमान का फर्क आया है। हर क्षेत्र में लोगों का दृfष्टकोण बदला है , तो क्या ज्योतिष के नियमों में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए ? जिस प्रकार हर विज्ञान के इतिहास का महत्व है , उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र के इतिहास का भी महत्व होना चाहिए , पर यदि हम हजारों वर्ष पूर्व के ग्रंथों के हिन्दी अनुवाद पढ़ते रहें , तो आज के युग के अनुसार सही भविष्यवाणी नहीं कर सकते। समाज और वातावरण के अनुसार अपने को न ढाल पाने से जब डायनासोर का अस्तित्व नहीं रहा , तो क्या ज्योतिष विज्ञान का रह पाएगा।