सोमवार, 30 मार्च 2009

धर्म के पालन में भी धर्म संकट ?????

जी हां , कभी कभी धर्म के पालन में भी धर्म संकट उठ खडा होता है। ऐसा तब होता है जब पुस्‍तकों में लिखे या परंपरागत तौर पर चलते आ रहे धर्म का हमारे अंदर के धर्म से टकराव होता है। अंदर का धर्म यदि स्‍वार्थ से लिप्‍त हो तो इच्‍छा के बावजूद भी हममें इतनी हिम्‍मत नहीं होती कि हम सार्वजनिक तौर पर परंपरागत रूप से चलते आ रहे धर्म का विरोध कर सकें , पर यदि हमारा आंतरिक धर्म परोपकार की भावना या किसी अच्‍छे उद्देश्‍य पर आधारित होता है, तो हमें नियमों के विपक्ष में उठ खडा होने की शक्ति मिल जाती है। ऐसी हालत में समाज के अन्‍य जनों के सहयोग से भी हम विरोध के स्‍वर को मजबूत कर पाते हैं। इससे कुछ परंपरावादी लोगों को अवश्‍य तकलीफ हो जाती है , पर हम लाचार होते हैं।

इस संदर्भ में मैं दो घटनाओं का उल्‍लेख करना चाहूंगी। पहली घटना मेरे जन्‍म के छह महीनें बाद मेरा मुंडन करवाने के वक्‍त की है । हमारे परिवार के सभी बच्‍चों का मुंडन बोकारो और रामगढ के मध्‍य दामोदर नदी के तट पर एक प्रसिद्ध धर्मस्‍थान रजरप्‍पा में स्थित मां छिन्‍नमस्तिका देवीकी पूजा के बाद ही की जाती आ रही है। पूजा के लिए एक बकरे की बलि देने की भी प्रथा है। मेरे मम्‍मी और पापा बलि प्रथा के घोर विरोधी , पर परिवार के दूसरे बच्‍चों के मामलों में तो दखलअंदाजी कर नहीं सकते थे , ईश्‍वर न करे , पर कोई अनहोनी हो गयी , तो कौन बर्दाश्‍त करेगा इनके सिद्धांतों को , इसलिए आंखे मूंदे अपने स्‍वभाव के विपरीत कार्य को होते देखते रहे। पर जैसे ही उनकी पहली संतान यानि मेरे मुंडन की बारी आयी , उन्‍होने ऐलान कर दिया कि वे देवी मां की पूजा फल, फूल और कपडे से करेंगे, पर इस कार्यक्रम में बकरे की बलि नहीं देंगे। घरवाले परेशान , नियम विरूद्ध काम करें और कोई विपत्ति आ जाए तो क्‍या होगा ? कितने दिनो तक घर का माहौल ही बिगडा रहा , पर मेरे मम्‍मी पापा को इस मामले में समझौता नहीं करना था , सो उन्‍होने नहीं किया । फिर मेरे दादाजी तो काफी हिम्‍मतवर थे ही , उनका सहयोग मिल गया। देवी देवता की कौन कहे , भूत प्रेत तक के नाम से वे नहीं डरते थे , उनकी हिम्‍मत का बखान किसी अगले पोस्‍ट में करूंगी । बाकी घरवाले भी विश्‍वास में आ गए और बिना बलि के ही मेरा मुंडन हो गया। क्‍या मुंडन के बाद सबकुछ सामान्‍य ही रहा , जानने के लिए मेरी अगली पोस्‍ट कल पढें।
दूसरी घटना तब की है , जब विवाह के पश्‍चात पहली बार अपने पति के साथ मै अपने गांव पहुंची थी। चूंकि हमारे गांव में नवविवाहिताओं को पति के साथ पूरे गांव के मंदिरों में जाकर देवताओं के दर्शन करने की प्रथा चल रही है , इसलिए हमलोगों को भी ले जाया गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्‍त स्‍वभाव होने के बावजूद सभी देवी देवताओं के आगे हाथ जोडने में तो हमें कोई दिक्‍कत नहीं है। मान लें , वो भगवान न भी हो , सामान्‍य व्‍यक्ति ही हो , धर्मशास्‍त्रों में उनके बारे में यूं ही बखान कर दिया गया हो , पर हमारे पूर्वज तो हैं , कुछ असाधारण गुणों से युक्‍त होने के कारण ही इतने दिनों से उनकी पूजा की जा रही है , हम भी कर लें तो कोई अनर्थ तो नहीं होगा। पर आगे एक सती मंदिर आया , इसमें हमारे ही अपने परिवार की एक सती की पूजा की जाती है , मैने तो बचपन से सती जी की इतनी कहानियां सुनी है , शादी विवाह या अन्‍य अवसरों पर उनके गाने भी गाए जाते हैं ,पति के मरने के बाद उनकी चिता पर बैठने के लिए बिना भय के उन्‍होने अपना पूरा श्रृंगार खुद किया था , पर कोई उन्‍हे शीशे की चूडियां लाकर नहीं दे सके थे , न जाने कितने दिन हो गए इस बात के ,पर इसी अफसोस में आजतक हमारे परिवार में शीशे की चूडियां तक नहीं पहनी जाती है। इतनी इज्‍जत के साथ उनकी पूजा होते देखा था , इसलिए सती प्रथा को दूर करने के राजा राम मोहन राय के अथक प्रयासों को पुस्‍तकों में पढने के बावजूद मेरे दिमाग में उक्‍त सती जी या अपने परिवार की गलत मानसिकता के लिए कोई सवाल न था। पर इन्‍होने तो यहां हाथ जोडने से साफ इंकार कर दिया ‘यहां हाथ जोडने का मतलब सती प्रथा को बढावा देना है’ उनकी इस बात से घर की बूढी महिलाएं परेशान , ये किसी को दुखी नहीं करना चाहते थे , पर परिस्थितियां ही ऐसी आ गयी थी। धर्म पालन में ऐसा ही धर्म संकट खडा हो जाता है कभी कभी।

8 टिप्‍पणियां:

आलोक सिंह ने कहा…

धर्म के नाम पर आडम्बर ज्यादा है . धर्म एक ही है प्रेम करिए और दया भावना रखिये .
(पाथर पूजै हरि मिलै तो मैं पुजूँ पहाड़)

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सच कहा है आपने .

Abhishek Mishra ने कहा…

Sakaratmak pahal se Dharm par aastha badhti hi hai.

हरि ने कहा…

आपको और आपके पतिदेव को नमन करता हूं।

kushsharman ने कहा…

धर्म का सामाजिक रिति रिवाज़ों से क्या लेना देना।
धर्म वास्तव में वो है जो हमें प्रेरित करे,सदैव और सब के लिये शुभ करने के लिये।

पानी का धर्म है,गीला करना।
आग का जलाना।
हवा का सुखाना।
मनुष्य का दया,प्रेम,करुणा और सत्य।

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी आज मै कहूंगा कि यह भी एक संयोग है, मै भी हमेशा ही ऎसी बातो का बिरोध करता हुं,
धन्यवाद

Prem Farrukhabadi ने कहा…

achchha laga.badhaai.

Dr.Bhawna ने कहा…

बहुत अच्छा लगा पढ़कर...