मंगलवार, 3 मार्च 2009

मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के रुप में झाड़-फूंक ( Astrology )

 (vidya sagar mahtha, petarbar, bokaro)गलती हर इंसान से होती है , किन्तु सही इंसान वही माना जाता है , जो बार-बार एक ही गलती न करे , वरन् एक बार की गयी गलतियों से सीख लेकर अपने व्यक्तित्व को सुधारने का प्रयास करता रहे। किन्तु कभी-कभी इसमें बड़ी-बड़ी बाधाएं आती हैं , इंसान की छोटी-मोटी गलतियों को तो समाज माफ कर देता है , किन्तु उससे यदि कोई बड़ी गलती हो जाती है , तो चाहे वह अपने जीवन को पश्चाताप की अग्नि में झोंक भी क्यों न दे, समाज उसे हेय दृष्टि से ही देखता है। इसके कारण उसका जीवन नरक समान ही हो जाता है। उसकी भविष्य में सामान्य जीवन जी पाने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। इस कारण उसे कभी आत्महत्या कर अपने जीवन का अंत करना होता है तो कभी विक्षिप्त होकर पूरी जिंदगी गुजारने को बाध्य होना पड़ता है।


इस समस्या को दूर करने के लिए ही हमारे ज्ञानी और गुणी लोगों के द्वारा झाड़-फूंक द्वारा इलाज किए जाने का स्वांग रचा जाता था। इस विधि के द्वारा जहॉ एक ओर शैतान के नाम पर व्यक्ति को मार-पीट और यातना देकर उसके किए की सजा भी दी जाती थी , ताकि भविष्य में वह कोई गलती करने का दुस्साहस न करे , वहीं दूसरी ओर समाज के लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि इसने जो गलती की , वह इसके द्वारा नहीं वरन् इसके शरीर में विद्यमान शैतान के द्वारा किया गया था , ताकि भविष्य में वह समाज के बुरी दृष्टि का शिकार न हो और उसका आत्मविश्वास बढ़ सके। लेकिन कालांतर में अंधविश्वास समझते हुए इसका वैज्ञानिक स्वरुप विलुप्त हो गया और समाज के निचले तबकों के लिए यह एक अभिशाप के रुप मौजूद हो गया और अभी तक इसका यही स्वरुप हम देख सकते हैं।

13 टिप्‍पणियां:

MARKANDEY RAI ने कहा…

bahut achhi jaankaari. isase awsad se bahar niklne me madad milegi. i really thankful to you.

सिटिजन ने कहा…

मनो वैज्ञानिक तरीके से भी इलाज करने के लिए इस तरह के प्रयोग एक स्वांग के रूप में नाटक के रूप में किए जाते थे मै इस बात से सहमत हूँ . यदि मनो वैज्ञानिक तरीके से इलाज किया जाता है तो मरीज जल्दी भी ठीक हो जाते है . काफी विचारणीय पोस्ट है . धन्यवाद.

हरि ने कहा…

बेहतर होता कि आप इसका वैज्ञानिक स्‍वरुप (यदि कुछ है) से भी अवगत करातीं।

आवारा प्रेमी ने कहा…

सही इंसान वही माना जाता है , जो बार-बार एक ही गलती न करे
अच्छी जानकारी है.

mehek ने कहा…

achhi jankari rahi,phir bhi hame e jhadpukh kabhi pasand nahi aayi.

राज भाटिय़ा ने कहा…

मेने कई बार ती वी पर देखा है, ओर जो मुझे गलत लगा,शायद ओर को भी गलत लगता होगा, लेकिन लोग फ़िर भी करवाते है, कब हम निकलेगे इन सब अंधविश्वासो से, पढे लिखे लोग भी कई अन्य तरीको से ऎसा करते है.
धन्यवाद एक सही बात को हम सब के बीच लाने के लिये

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

झाड़फूँक ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। लेकिन क्या अब भी इस की आवश्यकता है? और क्या अब यह लोगों को मूर्ख बनाने का धंधा मात्र नहीं रह गया है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

झाड़फूंक के इस पहलू की जानकारी नयी लगी.

Udan Tashtari ने कहा…

याने मंत्रों तंत्रों में कोई शक्ति नहीं????

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

अच्छे लेखन के लिए बधाई।
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र
नये रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को रचनायें भेज सहयोग करें।

विष्णु बैरागी ने कहा…

आपके सदाशयतापूर्ण इस अनूठे दृष्टिकोण का सादर अभिनन्‍दन। किन्‍तु अन्‍ध विश्‍वास आज सबसे बडी समस्‍याओं में अग्रणी है। विद्वानों की ऐसी प्रस्‍तुतियां (भले ही वे सम्‍पूर्ण सदाशयता से की गई हों) अन्‍तत: अन्‍ध विश्‍वासों को बढावा देती प्रतीत होंगी।

ज्ञानदत्त । GD Pandey ने कहा…

जब मन्त्र शक्ति का अर्थ है तो झाड़ फूंक का भी है। असल में सब आंतरिक श्रद्धा पर निर्भर है।

neeshoo ने कहा…

अभी भी इस तरह के मुद्दे समाज में व्याप्त हैं। अशिक्षा भी एक कारण है ।