रविवार, 29 मार्च 2009

राज को राज ही रहने दो ... तर्क की क्‍या जरूरत

कई दिनों से मैं ज्‍योतिष से हटकर धर्म और अंधविश्‍वास की चर्चा करने लगी हूं , ज्‍योतिषीय के साथ साथ धार्मिक और अन्‍य भ्रांतियां भी समाज में कम नहीं , इसलिए इसकी चर्चा भी आवश्‍यक है। बात यह है कि चूंकि धर्म है , तो भगवान का होना स्‍वाभाविक है , और भगवान है , तो भक्‍त तो होंगे ही , अब दोनो है , तो दोनो के मध्‍य संबंध मजबूत करने के लिए नियम और कानून की आवश्‍यकता तो पडेगी ही। कसौटी पर कसे बिना भगवान भक्‍त को दर्शन क्‍यूं दें ? धर्म के नियमानुसार काम करो , तो पुण्‍य की प्राप्ति होगी , जिससे मरने के बाद स्‍वर्ग में जगह मिलेगी , भगवान के दर्शन होंगे। न करो तो पाप मिलेगा , मरने के बाद नरक में कष्‍ट झेलने को मजबूर होना पडेगा। आंख मूंदकर माना जाए तो भले ही धर्म की ये बातें सच्‍ची लगे , पर तर्क की कसौटी पर ये खरी तो नहीं उतरती। पर हमने अपने जीवन में पाया है कि जो अपने प्रारंभिक जीवन से ही धर्मपरायन होते हैं , धार्मिक क्रियाकलापों और पुस्‍तको आदि में जिनकी रूचि होती है ,वे मानवीय गुणों को भी महत्‍व देते हैं और गलत कार्यों से परहेज रखते हैं। ऐसी स्थिति में यह सोंचनेवाली बात अवश्‍य हो जाती है कि आखिर ऐसा क्‍या लिखा है, उन धार्मिक पुस्‍तकों में , प्राचीन कहानियों में और कर्मकांडों में , जिसे पढने के बाद किसी प्रकार की गलती करने पर हमें भय होता है ?



हो सकता है , हमें मरने के बाद स्‍वर्ग में जाने का लालच देकर अच्‍छे काम करने को कहा जाता रहा है और नरक में जाने का भय दिखाकर बुरे काम से डराया जाता रहा है , जबकि स्‍वर्ग और नरक कुछ नहीं होते हैं , पर हमें इतने तर्क करने की क्‍या जरूरत है ? आज पोलीथीन के प्रयोग से पर्यावरण का बहुत नुकसान हो रहा है , लाख चेताने के बावजूद आज की सुविधा को देखते हुए लोग इसका प्रयोग करना बंद नहीं करते हैं । वैसे तो आज के दौर में ऐसे गुरू शायद न हो , जो सबों का विश्‍वास जीत ले , पर मान ही लें कि किसी बडे गुरू , जिनकी बातें सब मानते हों , के द्वारा किसी दिन घोषणा कर दी जाए कि पोलीथीन के प्रयोग करने से लोगों को नरक जाना पड सकता है और लोग इसका प्रयोग करना बंद कर दें , तो इसमें दिक्‍कत की क्‍या बात है ? हम स्‍वर्ग या नरक के होने या न होने की बहस में क्‍यों पडें।



इसी क्रम में अचानक एक बात याद आ गयी , तब मेरे दोनो बेटे छोटे थे , गर्मियों में कभी कभी उन्‍हे अपने कमरे से अटैच बाथरूम में नहाने को छोड दिया करती थी। वे नहाकर निकलते तो सारा कमरा पानी से भीग जाया करता था। एक दिन मैने गौर किया तो पाया कि सर पर पानी डालकर वो सीधा कमरे में आ जाते हैं । मुंडन हुआ नहीं था उनका, बाल लंबे थे, कमरे में आने के बाद बाल से टपकता वह पानी फर्श को पूरी तरह गीला कर देता था। मैने उन्‍हें बताया कि नहाने के वक्‍त अंत में सर पर पानी नहीं डालते । सर पर पानी डालने के बाद एक दो बार बदन पर पानी डाल लो, फिर कमरे में आओ। मैने ऐसा इसलिए कहा , क्‍योकि जबतक वे दो बार बदन में पानी डालें , सर का पानी बह जाए और कमरे में पानी न टपके। तर्क करने की बुद्धि नहीं थी तब उनकी , उनलोगों ने इसे नियम बना लिया और जब तौलिया लेकर बाथरूम जाने और पोछ पाछकर निकलने की आदत हो गयी , तब भी वे सर में पानी डालने के बाद कम से कम दो बार बदन में पानी डालकर ही स्‍नान को पूरा समझते रहें। एक दिन पूछने पर मैने कारण बताया तो अपनी बेवकूफी पर हंसने लगे । वास्‍तव में, वे अबतक इसका कोई बडा कारण समझते आ रहे थे। आज का जमाना है , दो पीढी के लोग बैठकर हर मुद्दे पर बात कर लेते हैं ,सब समझ में आ जाता है , पर पहले तो बात होती नहीं होगी , जो नियम बन गया सो बन गया । छोटे छोटे फायदे के लिए बना दिया , कभी कारण नहीं बताया और लोग उसे ढोते रहे । यदि कारण बता दिया जाता तो शायद नहीं मानते।



किसी भी धर्म के सारे नियम गलत नहीं होते हैं , इसलिए इन नियमों या समाज में चले आ रहे अन्‍य नियमों , कानूनों के लिए तबतक पचडे में पडने की आवश्‍यकता नहीं , जबतक उससे किसी प्रकार का अहित न हो रहा हो। हां , किसी जमाने में लडकियों के सुरक्षा को देखते हुए ही सही , बालविवाह की प्रथा की जो शुरूआत की गयी , वह आज के दौर में एक सामाजिक कलंक है और इसे सुधारना हमारा कर्तब्‍य अवश्‍य होना चाहिए। इसी प्रकार की और बहुत सी बातें हैं , जिन्‍हे सुधारा जाना चाहिए। लेकिन कुछ ऐसे लोगों ने धर्म के नाम को बदनाम किया है जो वास्‍तव में धर्मपरायण नहीं हैं , जीवन भर गलतियां करना इनके स्‍वभाव में शुमार है , ये हर प्रकार का षडयंत्र रच सकते हैं और जब कुछ बुरा वक्‍त आता है और फंसने लगते हें तो भगवान को पुकारते हैं । अपनी शक्ति , अपने सामर्थ्‍य की बदौलत वे भगवान का विश्‍वास प्राप्‍त करने की कोशिश करते हैं। मगर वे नहीं जानते हैं कि धर्म सच्‍चे दिलवालों का होता है और भगवान को पैसों से नहीं , प्‍यार से जीता जा सकता ।

12 टिप्‍पणियां:

Shefali Pande ने कहा…

main aapkee baat se sahmat hun....

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी आप ने बहुत ही सुंदर तर्क दिया, कई बाते पहले जमाने मै उस समय के अनुसार ठीक थी, लेकिन आज के अनुसार गलत है, इस लिये उन्हे ढोने से क्या लाभ...
एक दिन मेरे बच्चे इतवार के दिन रात को नाखुन काटने लगे, तो बीबी ने मना कर दिया कि कल सुबह नाखुन काटना, अब बच्चो ने पुछा अभी क्यो नही मां, तो मां बोली कि शाम को नाखुन क्लाटो तो पाप लगता है, बच्चे तो बच्चे, बच्चो ने फ़िर पुछा केसा पाप ?? तब मेने बच्चो को बुलाया, ओर बताया कि पहले घरो मे बिजली नही होती थी, दीये की रोशनी बहुत कम होती थी, ओर यह नेल कटर भी नही होते थे, इस लिये कम रोशनी मे, केंची, चाकू से नाखुन काटते वक्त साथ मे ऊगली कटने का डर होता था, इस लिये बडॆ बच्चो को मना करते थे, ओर बस यही पाप होता था, यानि दुख... चलो अब तुम काट सकते हो, अब अगर इसे अंध विशवास मै ले लिया जाये तो ...
धन्यवाद इस सुंदर पोस्ट के लिये

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आदरणीया बहिन संगीता पुरी जी।
आपने धर्म की व्याख्या उपाख्यान देकर
अच्छी तरह से समझाई हैं।
नियम-कानून के बिना तो हम छोटा सा
घर भी नही चला सकते हैं।
फिर कुदरत का कानून मानने में
कुतर्कों का सहारा क्यो लेते हैं?
गवेषणापूर्ण लेख के लिए,
धन्यवाद।

अशोक पाण्डेय ने कहा…

आपकी बात से पूर्णत: सहमत हूं। धार्मिकता जीवन में सदाचार व अनुशासन लाती है, जबकि अधार्मिकता से उच्‍छृंखलता व अराजकता को बढ़ावा मिलता है।

नितिन माथुर ने कहा…

संगीता जी
नमस्कार
आपकी बात से सहमति रखते हुए मैं एक मजेदार किस्सा बताता हूं।
अफगानिस्तान के एक वैद्य ने अपने एक शिष्य को आयुर्वेद की शिक्षा के लिए भारत भेजा। लेकिन उस शिष्य को ताकीद की कि जब तक वो भारत पहुंचे सिर्फ बबूल के पेड़ के नीचे ही सोए।
शिष्य ने एसा ही किया। भारत आते-आते उसे क्षय रोग हो गया। अब वो परेशान किसी आयुर्वेदाचार्य के पास पहुंचा। वैद्य ने हंसते हुए पूछा किसी विशेष पेड़ के नीचे सोते हुए आए हो। उसके हां कहने पर कहा। अब जाते समय नीम के पेड़ के नीचे सोते हुए जाना।
जब तक वो वापस पहुंचा उसका क्षयरोग ठीक हो गया था।
उसके गुरू ने कहा कि तू फिर वापस जा। इस प्रकरण से पता चलता है कि वाकई भारत में कुछ तो है जिसे जाना जा सकता है।
तो इस कहानी में हम देखते हैं कि कैसे एक मामूली सी बात से अफगानिस्तान में बैठे गुरू ने भारत के आयुर्वेद की परीक्षा ली। इसी तरह इन छोटी छोटी बातों के पीछे जीवन के कई रहस्य हैं जिन्हें हम चाह कर भी सुलझा नहीं पाते। और अपनी इस कमी को छुपाने के लिए नकारने का रास्ता अपना लेते हैं।
आपने एक बढ़िया विचार को ब्लॉग पर उठाया। एक बार फिर धन्यवाद।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | G.D.Pandey ने कहा…

धर्म अनुशासित करे पर प्रयोगधर्मिता का गला न घोंटे। मेरा व्यक्तिगत हिन्दू धर्म यही सिखाता है और यह मुझे अत्यंत प्रिय है।

जी.के. अवधिया ने कहा…

संगीता जी, सभी के अपने अपने "व्हैल्यूज" होते हैं। सरकारी आफिस का एक चपरासी कहता है कि अपने बेट को कम से कम ग्रेजएट तो बनाउंगा ही जबकि गाँव का एक किसान कहता है कि बेटा उतना पढ़ ले कि चिट्ठी पत्री बाँच सके, आखिर तो उसे किसानी करना है। तो शिक्षा तो वही है किन्तु अलग अलग लोगों की नजरों में उसकी अलग अलग "व्हैल्यूज" हैं। यही बात धर्म पर भी लागू होती है।

Nirmla Kapila ने कहा…

sangeetaji aapne bahut hi sunder aur kaamki baat kahi haihamare rishi muni admi ke savbhav ko jante the is liye unhon ne jo niyam banaye vo tab ke hisab se soch samajh kar banaye the aaj bhi unki utani hi prasangigta hai bas agar ham budhi se kaam le kar kuchh achhe niyam apna len to usme samaj ka bhala hai ham har bat ko jhoothha sabit karne par hi tul jate hain tabhi aaj smaj ka chehra itna vikrit ho gaya hai

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

धर्म के विषय में आपकी चर्चा बहुत सारगर्भित है.. आभार

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

मैं भी कुछ ऐसा ही सोचता रहता हूं।
एक प्रेरणादायक पोस्‍ट।

इसके लिए धन्‍यवाद संगीता जी।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

हमारे घर -परिवार में बचपन से लेकर आज तक धर्म का अभिप्राय कर्त्तव्य से जोड़कर समझाया जाता रहा है , यानी यह करो यही धर्म है ,यह न करो यह धर्म नहीं ......आपकी बात से सहमत हूं की धार्मिकता जीवन में सदाचार व अनुशासन लाती है, ज्ञान दत्त पांडे जी ने सही टिपण्णी दी है इस सन्दर्भ में किधर्म अनुशासित करे पर प्रयोगधर्मिता का गला न घोंटे।प्रेरणादायक पोस्‍ट। आभार..../

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत पसंद आई आपकी यह पोस्ट ..धर्म के नाम पर कुछ भी मनवाना उचित नहीं ..