मंगलवार, 31 मार्च 2009

किसी घटना के लिए धार्मिक क्रियाकलापों को दोषी न मानें

कुछ लोगों को लग रहा होगा कि मै धर्म के साथ सामाजिक या पारिवारिक नियमो का घालमेल कर रही हूं , ऐसा सिर्फ मैं ही नहीं कर रही , जब भी धर्मविरोधी धर्म के विरूद्ध तर्क देते हैं , इन सामाजिक और पारिवारिक नियमों को भी धर्म के अंदर समाहित मानते हैं , जबकि ये जो वास्‍तव से धर्म से नहीं जुडे है , अलग अलग क्षेत्र और माहौल के अनुरूप उपजी आवश्‍यकताओं से जुडी हैं । इनमें से कुछ नियमों का आज कोई महत्‍व नहीं , पर धर्मभीरू भी इन नियमों का पालन करने को बाध्‍य है। हमें इन नियमों का पालन करते वक्‍त आज के संदर्भ में इसके परिणामों को सोंचना चाहिए। यदि ये उचित जान पडे, यानि आज भी उससे व्‍यक्तिगत तौर पर नहीं , सामाजिक लाभ हो रहा हो तो नियम पालन में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए , पर अगर आज उससे किसी तरह का नुकसान हो तो पालन नहीं करने की कडाई दिखयी जानी चाहिए। बहुत लोगों को इस बात से भय होता है कि समाज या परिवार में चलती आ रही परंपराओं का पालन न किया जाना किसी बडे नुकसान की वजह बनती है। पर ऐसा नहीं है , कभी कभी यूं ही संयोग से कुछ घटनाएं हो जाया करती हैं , जिसे हम इसकी वजह मान लेते हैं और कमजोर पडकर पुन: नियम पालन को आवश्‍यक समझ बैठते हें।

जैसा कि कल मैने बताया कि हमारे परिवार में मुंडन के वक्‍त एक बकरे की बलि चढाने की प्रथा है और मेरा मुंडन इसके बिना किया गया। मेरे साथ तो कोई अनहोनी नहीं हुई , पर मेरे बाद एक भाई जन्‍म के छठे दिन ही भगवान को प्‍यारा हो गया। ज्‍योतिष के जानकार मेरे पिताजी पूरे आत्‍मविश्‍वास में बनें रहें कि यह सामान्‍य सी घटना है। चिकित्‍सीय सुविधाओं के अभाव में ऐसा अक्‍सर हो जाया करता था , पर आगे मेरे साथ ऐसी कोई दुर्घटना नहीं घटेगी। इसी सोंच से प्रभावित मेरे यहां पुन: बलि की शुरूआत नहीं की गयी । पंद्रह सत्रह वर्षों तक घर में सबकुछ कुशल मंगल ढंग से चलता रहा , तबतक हमारे घर में जन्‍म लेनेवाले सभी बच्‍चों, यानि हमारे चाचा जी वगैरह के भी सारे बच्‍चों का मुंडन बिना बलि के होता रहा। पर उसके बाद चाचा जी की एक लडकी को पोलियो हो गया , उसी के कुछ दिनों बाद एक चाचाजी का पीलीया कोमा स्‍टेज तक पहुंच गया , घर में मम्‍मी पापा के सिवा अन्‍य सभी लोगों का मानना था कि देवी मां को बलि न दिए जाने की ही वजह से ऐसा हो रहा है और लगभग 17 वर्षों बाद पुन: बलि प्रथा आरंभ कर दी गयी। तबतक हमारे अपने सभी भाई बहनों का मुंडन हो चुका था और सभी स्‍वस्‍थ और सानंद थे , पर इससे किसी को मतलब नहीं था।

अब हमारे एक ही परिवार में दो तरह के नियम बने हुए हैं , जहां मेरे सगे भतीजे भतीजियों के मुंडन में बलि की आवश्‍यकता नहीं पडती है , क्‍योंकि हमारा सबका मुंडन बिना ब‍लि के हो चुका है , वहीं चाचाजी के पोते पोतियों के मुंडन में बलि दी जाती है। मैं यही समझने लगी हूं कि अपने विचारों के अनुरूप ही काम किया जाना श्रेयस्‍कर होता है। ऐसी हालत में प्रकृति आपका साथ अवश्‍य देती है , पर यदि आपने नियम तोडकर काम करना आरंभ किया है तो अपने दिल को थोडा मजबूत बनाए रखें , क्‍योंकि जीवन में कभी भी किसी प्रकार की घटना घट जाया करती हें और इसके लिए आप अपने धार्मिक क्रियाकलापों को दोषी न मानें।

7 टिप्‍पणियां:

SWAPN ने कहा…

sangeeta ji, anyatha na len kabhi kabhi mujhe bhi aapke lekh ki pahli panki hi kuchh theek lagti hai, kabhi-2 aapke lekhon men virodhabhas mehsoos hota hai. ho sakta hai aisa mujhe lagta ho.ise aalochna naa samjhen.

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी बहुत ही सही बात कही आप ने, बस मन को मजबुत बनाओ लो. बाकी वहम को मन मै जगह ना दो, मै आज तक किसी भी प्रकार के वहम को नही मानता, कभी कोई संयोग से दुघटना घट जाये तो भी नही डरा, आप ने बहुत ही सुंदर बात , बहुत ही सूंदर ढंग से समझाई.
धन्यवाद

मा पलायनम ! ने कहा…

क्‍योंकि जीवन में कभी भी किसी प्रकार की घटना घट जाया करती हें और इसके लिए आप अपने धार्मिक क्रियाकलापों को दोषी न मानें। ....
सौ प्रतिशत सहमत .

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

मैं तो इन सब को अंधविश्वास समझती हूँ.

आलोक सिंह ने कहा…

जब हम या आप किसी धार्मिक परम्परा को त्यागना चाहते है तो हमें अपने आपको अन्दर से मजबूत बनाना होगा अन्यथा कल को हमारा वही फैसला हमें गलत सिद्ध कर देगा . जो काम दिल को अच्छा लगे वही करना चाहिए .

Abhishek Mishra ने कहा…

Vakai aatmbal hi mahatwapurnhai aise vishyon mein.

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

प्रकृति आपका साथ अवश्‍य देती है , पर यदि आपने नियम तोडकर काम करना आरंभ किया है तो अपने दिल को थोडा मजबूत बनाए रखें , क्‍योंकि जीवन में कभी भी किसी प्रकार की घटना घट जाया करती हें और इसके लिए आप अपने धार्मिक क्रियाकलापों को दोषी न मानें।...


बहुत सही..आभार