रविवार, 5 अप्रैल 2009

काश !! हमारा सपना दिल्‍ली में एक कोठी लेने का ही होता।

21वीं सदी आरंभ हो चुकी थी , पत्र पत्रिकाओं में पढा करती थी कि देश नए नए सपने देख रहा है या फिर उसे हकीकत में बदलने की कोशिश कर रहा है। कभी राष्‍ट्रपति कलाम जैसों की देशभक्ति की चर्चा होती कि उनके द्वारा 2020 तक भारत को शिखर पर ले जाने कर योजनाएं बन रही है , तो कभी माशेलकर जी के कारण भारत के विज्ञान के क्षेत्र में हो रही उपलब्धियों की। किरण वेदी की संस्‍था ‘प्रोजेक्‍ट इंडिया विजन फाउंडेशन’ के द्वारा दी जानेवाली ‘ओरिजिनल माइंड अवार्ड’ की और अनिल जी के द्वारा देश के कोने कोने से प्रतिभाओं को ढूंढकर लाए जाने की। परंपरागत ज्ञान विज्ञान को बढावा देने के कार्यक्रम की भी अक्‍सर चर्चा होती ही रहती।


पापाजी 1999 में दिल्‍ली चले गए थे और अपने जीवनभर के शोध को लेकर इधर उधर भटक रहे थे। शोध भी इतना महत्‍वपूर्ण कि मात्र किसी की जन्‍मतिथि , जन्‍मसमय और जन्‍म स्‍थान से किसी भी व्‍यक्ति के जीवनभर की परिस्थितियों के उतार चढाव का लेखाचित्र खींच पाने में सफलता प्राप्‍त कर सकना। हजारो लोगों के जीवन का ग्राफ खींचा , विरले ही अपवाद आया हो। इधर मैं अपने घर में परेशान , आखिर पापाजी को सफलता क्‍यों नहीं मिल रही है ? मैने भी यहां से कोशिश करनी आरंभ की। सबसे पहले ‘कादम्बिनी’ के तात्‍कालीन् संपादक राजेन्‍द्र अवस्‍थी जी को पत्र लिखा कि वे 40 वर्ष से अधिक उम्र वाले दो चार व्‍यक्तियों के जन्‍म विवरण मुझे भेजें , ताकि उनके बारे में भविष्‍यवाणी कर मैं ज्‍योतिष को विज्ञान साबित कर सकूं। उन्‍होने तुरंत जवाब भेजा , पर हमारा दुर्भाग्‍य , उसके साथ जो दो चार विवरण भेजे जाने थे , वो पृष्‍ठ अटैच नहीं हो सका। यहां दोबारा पत्र लिखा , पर फिर जवाब नहीं‍ मिला। इसके बाद कई पत्र पत्रिकाओं में कोशिश की , पर फल वहीं ढाक के तीन पात।

महामहिम राष्‍ट्रपति जी से मिलने के लिए पापाजी ने अपनी पूरी फाइल भेजी , उन्‍होने अप्‍वाइंटमेंट तक दे दिया , पर मिलने के समय कुछ ऐसी व्‍यस्‍तता आयी कि उसे कैंसिल करना पडा , फिर दोबारा वहां भी मौका न मिल सका। माशेलकर जी के तात्‍कालीन सेक्रेटरी मि कालरा से भी मैने फोन पर बातचीत की , उसके बाद अपने भाई को वहां भेजा , पर शायद समय की कमी हो या कोई और समस्‍या पापाजी को सुनने में उन्‍होने दिलचस्‍पी नहीं दिखायी। मैने एक शोधपत्र का रूप देते हुए अपने सिद्धांत को ‘सी एस आई आर’ में भी दो बार भेजा , पर वहां से यह खेद के साथ वापस आ गया कि ज्‍योतिष विषय उनके क्षेत्र में नहीं आता , इसलिए वे इसे न तो प्रकाशित कर पाएंगे और न ही घ्‍यान दे पाएंगे। एक किन्‍ही अनिल कुमार के बारे में काफी पढा , पर जब भी साइट को खोलने की चेष्‍टा की , वह नहीं खुला। मेरा भाई किरण वेदी की संस्‍था ‘प्रोजेक्‍ट इंडिया विजन फाउंडेशन’ के द्वारा दी जानेवाली ‘ओरिजिनल माइंड अवार्ड’ के लिए भी दौड लगाते रहा , पर फार्म ही उपलब्‍ध नहीं हो सका कि फार्म भरा जा सके।


ज्‍योतिष के क्षेत्र में खासी लोकप्रियता के बावजूद हमारी निराशा बढती जा रही थी कि अचानक एक दिन विज्ञान प्रगति के किसी अंक में भारतीय विज्ञान लेखक संघ के अध्‍यक्ष डा आर डी शर्मा का पता मिला । मैने एक और कोशिश करने का निश्‍चय किया , उन्‍हें अपनी उपलब्धियों का जिक्र करते हुए पत्र लिखा कि वे 40 वर्ष से अधिक उम्र के 10 लोगों के जन्‍म विवरण भेज दें , मै उनकी जीवनयात्रा के बारे में लिखूंगी। उन्‍होने पत्रोतर देते हुए लिखा ‘आपलोग दिल्‍ली में कुछ नेताओं का चुनाव से पहले भविष्‍य बताएं। 10 में से 4 या 5 भी उनके बताए अनुसार जीत गए तो फिर नेता पूजने लगेंगे और सेठ लोग भी। दिल्‍ली में तो ज्‍योतिषी ऐसे ही कोठियां खडी कर लेते हैं।‘ मेरी परीक्षा के लिए उन्‍होने कुछ जन्‍म विवरण अवश्‍य भेजें , कहा कि यदि आप सही बता सकें तो मै आपका मुरीद हो जाउंगा। पर उन्‍होने जो जन्‍म विवरण भेजा , दो को छोडकर बाकी का जन्‍म 1982 के बाद हुआ था यानि सभी 20 वर्ष से भी कम उम्र के । अब इतनी कम उम्र में उनलोगों ने कौन सा उतार चढाव देखा होगा कि मैं उसकी चर्चा कर सकूं। दो जन्‍म विवरण पर मैने काम किया जो उन लोगों में सर्वाधिक थे यानि जिनका जन्‍म 1976 और 1977 में हुआ था , हालांकि वे भी अधिक तो नहीं पर उस वक्‍त 27 और 28 वर्ष के थे । पर वे उससे संतुष्‍ट नहीं हुए ,क्‍योंकि उसके बाद उनका कोई पत्र मुझे नहीं मिला। पर उसके कुछ दिनों बाद एक महिला का पत्र मुझे मिला ,जिसने बताया कि वह शर्मा सर के यहां काम करती है और मेरे द्वारा लिखी गयी बातें बेटी के जीवन से मैच कर रही थी इसलिए वह और भी कुछ जानना चाहती थी। पर दूसरे के बारे में मुझे कोई खबर नहीं मिल पायी।


फिर उसके बाद हमने पुस्‍तको को लेकर सिर्फ प्रकाशक के यहां ही चक्‍कर लगाए हैं , पर प्रकाशक भी पुस्‍तकों को छापना नहीं चाहते। समाज से ज्‍योतिषीय एवं अन्‍य भ्रांतियों को दूर करने का सपना दूर दिखायी पड रहा है। ब्‍लागिंग से बडी आस जगी है , पर कभी कभी मन विचलित भी हो जाता है ,इतना बडा सपना जो देख लिया है , तब सोंचती हूं ‘काश !! हमारा सपना दिल्‍ली में एक कोठी लेने का ही होता।‘

15 टिप्‍पणियां:

Anil Pusadkar ने कहा…

निराश होने की आवश्यकता नही है,समय आने पर सब सपने पूरे हो जाते हैं,ईश्वर से प्रार्थना करूंगा की आपकी कोशिश सफ़ल हो।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपके मन में लगन और निष्ठा है तो आपका सपना अवश्य पूर्ण होगा।

कमल शर्मा ने कहा…

कष्‍टों से घबराना ठीक नहीं..बेहद लंबा संघर्ष है और इसका फल अच्‍छा मिलेगा। बस आपने शार्ट कर्ट नहीं अपनाया अन्‍यथा आप भी दूसरों की तरह कोठियों, गाडि़यों में घूम रहे होते। लेकिन सत्‍यता का मार्ग बेहद कठिन होता है। निराश न हो, आपके सपने जरुर पूरे होंगे और जो मेहनत ज्‍योतिष पर आप वर्षों से कर रहे हैं उसके सुंदर नतीजे सामने आएंगे।

sudhakarsingh0007 ने कहा…

‍‍नमस्कार संगीताजी...सबसे पहले आपकी शुभकामनाओं के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद....मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा अपने विचारों को पहुंचाने की...दुष्यंत कुमार जी की इन्हीं पंक्तियों से प्रेरणा लेने की कोशिश जारी है...लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती...असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो जब तक न सफल हो नींद चैन की त्यागो तुम संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती...

mehek ने कहा…

ek din ye sapno ka panchi gagan jeet lega,dua hai appki koshish ko safalta mile,hardwork u do will get its reward,amen.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

ऐसा कुछ नहीं है ,जो सरस्वती पुत्र है उसे तो संघर्ष ही बदा है ,लेकिन आप और आप के आदरणीय पिता जी ने जो सम्मान प्राप्त किया है ,उसे कोठी खरीद कर नहीं पाया जा सकता .सपनों का कोई वास्तविक वजूद नहीं हुआ करता ,ब्यक्ति द्वारा कृत कर्म ही उसे ऊँचाइयों पर ले जाता है जिसके सामने फिर कोई उचाई छोटी दिखने लगती है .बहुत अच्छी पोस्ट लिखा है आपने ,एकदम भावपूर्ण .

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

आपने शार्ट कर्ट नहीं अपनाया अन्‍यथा आप भी दूसरों की तरह कोठियों, गाडि़यों में घूम रही होती।

लेकिन जैसा अमूनन होता और कहा जाता है कि सत्‍यता का मार्ग बेहद कठिन होता है, कुछ वैसा ही आपके साथ भी घट रहा है.

वस्तुतः ये आपका दोष नहीं बल्कि इससे यह स्वतः सिद्ध होता है कि आज देश में कितने जौहरी रह गए हैं जो वास्तव में हीरों की परख कर सकें.

निराश न हो, आपके सपने जरुर पूरे होंगे और जो मेहनत ज्‍योतिष पर आप वर्षों से कर रहे हैं उसके सुंदर नतीजे सामने आएंगे ही.

मैं भी स्वयं इमानदारी के लिए, इमानदारी के साथ संघर्षरत हूँ, और परिणाम में आभाव, तिरस्कार, असहयोग ही ज्यादा मिला है, पर हार नहीं मानी है, जीवन में किये जनहितार्थ कार्य स्वान्तः सुखाय ही ज्यादा होते है.

कोठी के तमन्ना ही आदमी को आदमियत से दूर ले जा रही है................

चन्द्र मोहन गुप्त

पंगेबाज ने कहा…

सपने पालते रहिये .सात साल मे तो घूरे के भी दिन फ़िरते है . हमे देखिये हम दिल्ली मे पाच सात हजर गज का एक छॊटा सा प्लाट कब्जा करने सपना जमाने से पाले हुये है उम्मीद है एक दिन जरूर पूरा होगा :)

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

संगीता जी गणित ज्योतिष को मैं मानती हूँ फलित के बारे में मेरे विचार जरा विरोधी हैं ..पर इनसब से परे एक बात कहूँगी ..जब आपने लहरों के विपरीत चलने का सोंचा ही है तो यह उदासी किस लिए है ..सब ठीक हो जायेगा आप प्रयास करती रहें .

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

आप जैसी समर्पित महिला ब्लॉगर की कलम से थोड़ी सी भी हताशा बाहर निकले, ऐसा कोई नहीं चाहेगा। ब्लॉगिंग से जगी आपकी आस बहुत जल्द पूरी होगी.. ऐसा मेरा मानना है और मेरी शुभकामनाएं हमेशा आपके साथ है.. आपका हर सपना पूरा हो.. आमीन..

Udan Tashtari ने कहा…

बिना सपनों के ये समीकरण हल नहीं होते..मेरी शुभकामनाऐं.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सपने देखेंगे तभी पूरे होंगे ..आप निराश न हो ..काम तो जो होना है वह जब ठान लिया तो हो कर ही रहेगा ..शुभ कामनाएं बहुत बहुत ..

Hari Joshi ने कहा…

ये जिंदगी की चूहा दौड़ है। कभी आप लोगों के पीछे दौड़ रहे होते हैं तो कभी लोग। मैं ऐसे कई ज्‍योतिषियों को जानता हूं जो अपने वारे-न्‍यारे कर चुकें। एक मेरे मित्र हैं जिन्‍होंने एक नेत्री के मुख्‍यमंत्री बनने की भविष्‍यवाणी और समय बताया था जो उनके सौभाग्‍य से सही निकला और उनका भाग्‍य चमक गया। लेकिन ऐसे लोग ज्ञानी कम तिकड़मी ज्‍यादा होते हैं। मैने ऐसे तिकड़मियों को नजदीक से देखा है और उन संपादकों को भी जिनका जिक्र है।
कभी-कभी निराशा भी होती है। लेकिन व्‍यक्ति को अपने कर्म करने चाहिएं; सफलता अवश्‍य मिलती है।

विष्णु बैरागी ने कहा…

कृपया मेरी इस टिप्‍पणी को परिहास, उपहास, आक्षेप बिलकुल न समझें। आपकी यह पोस्‍ट और आपकी मनोदशा का विवरण अपने आप में आपके विषय को प्रश्‍नों के घेरे में खडा नहीं कर रहा? आपके पास वे सारे तथ्‍य हैं जो आपके इस अभियान की सफलता की गणना करने के लिए आवश्‍यक हैं। क्‍या यह उचित और प्रासंगिक नहीं होगा कि आप अपने ही प्रकरण को 'पा्रयोगिक उदाहरण' मान कर गणना करें और हम सबको बताएं कि आपको इसमें कब सफलता मिलती दिखाई देती है।
अपनी सम्‍पूर्ण सदाशयता और जिज्ञासा भाव से यह टिप्‍पणी कर रहा हूं। यदि आप अथवा कोई और इसे क्षणांश को भी अन्‍यथा लेता है तो यह मेरे लिए चरम दुर्भाग्‍य वाली स्थिति होगी।

Nirmla Kapila ने कहा…

shubhkaamnayen aapka sapna jaroor poora hoga agar apke bhagy me likha hai to ise koi nahin mita sakta