सोमवार, 4 मई 2009

क्‍या गणित में हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ में ही होता है ????????

इसमें कोई शक नहीं कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ब्‍लागिंग की मदद से अपनी पहचान बना पाने में कामयाबी प्राप्‍त करता जा रहा है , पर कुछ दिनों से पाठकों द्वारा इसके द्वारा ज्‍योतिष के विज्ञान कहे जाने के विरोध में कुछ आवाजें भी उठ रही हैं। वैसे तो सबसे पहले मसीजीवी जी ने ज्‍योतिष को विज्ञान कहे जाने पर आपत्ति जतायी थी , पर अभी हाल में ज्ञानदत्‍त पांडेय जी के द्वारा यह प्रश्‍न उठाया गया तो मुझे काफी खुशी हुई , क्‍योंकि उनकी सकारात्‍मक टिप्‍पणियां हमेशा ही मेरा उत्‍साह बढाती आयी है। उनके बाद एक दो और पाठक भी इसी प्रकार के प्रश्‍न करते मिले हैं। आज उन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्‍न का तर्कसंगत जवाब देना मैं उचित समझ रही हूं और शायद पहली बार हो रही इस प्रकार की सकारात्‍मक चर्चा करते हुए मुझे काफी खुशी भी हो रही है। मैं चाहूंगी कि इस प्रकार के और प्रश्‍न भी सामने आएं , मैं सबकी जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास करूंगी।

सबसे पहले गणित विषय को ही लें। गणित में हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ ही नहीं होता है। इसमें किसी समीकरण का उत्‍तर ‘लगभग’ में होने के साथ ही साथ ‘>’ और ‘<’ या ‘=<’ और ‘=>’ में भी हो सकता है। कोई समीकरण ‘लिमिट’ में भी अपना जवाब देती है । सभी समीकरण एक सीधी रेखा का ही ग्राफ नहीं बनाती , पाराबोला और हाइपरबोला भी बना सकती है। गणित के संभावनावाद का सिद्धांत संभावना की भी चर्चा करता है। और चूंकि भौतिकी जैसा पूर्ण विज्ञान के भी सभी नियम गणित पर ही आधारित होते हैं , तो भला इसके भी हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ में कैसे दिया जा सकता है ? और बाकी विज्ञान जो भौतिकी की तरह पूर्ण विज्ञान न हो तो उसके प्रश्‍नों का जवाब ‘=’ में देना तो और भी मुश्किल है।


एलोपैथी चिकित्‍सा विज्ञान के बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘=’ में दिया जा सकता है , पर सबका दे पाना असंभव है , बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘लगभग’ और बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘संभावनावाद’ के नियमों के अनुसार दिया जा सकता है। पहले एक ही लक्षण देखकर चार प्रकार के बीमारी की संभावना व्‍यक्‍त की जाती है , जिससे पहले डाक्‍टरों को अक्‍सर दुविधा हो जाया करती थी , आज जरूर विभिन्‍न प्रकार के टेस्‍टों ने डाक्‍टरों का काम आसान कर दिया है , तो क्‍या पहले मेडिकल साइंस विज्ञान नहीं था ? अभी तक कोई खास सफलता नहीं मिलने के बावजूद मौसम विज्ञान कहा जाता है , क्‍योंकि इस क्षेत्र में बेहतर भविष्‍यवाणी कर पाने की संभावनाएं दिखाई पड रही है। क्‍या भूगर्भ विज्ञान की भूगर्भ के बारे में की गयी गणना बिल्‍कुल सटीक रहती है ? नहीं , फिर भी उसे भूगर्भ विज्ञान कहा जाता है। संक्षेप में , हम यही कह सकते हें कि जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक सिद्धांत हमें सत्‍य की ही जानकारी दे , जिन सिद्धांतो की सहायता से हमें सत्‍य के निकट आने में भी सहायता मिल जाए , उसे विज्ञान कहा जाता है।


यदि ज्‍योतिष शास्‍त्र के नियमों की बात करें , तो इसके कुछ नियम बिल्‍कुल सत्‍य हैं , मौसम से संबंधित जिस सिद्धांत के बारे में कल चर्चा हुई , वह बिल्‍कुल सत्‍य है। ऐसा इसलिए है , क्‍योंकि इस नियम को स्‍थापित करने में ग्रहों को छोडकर सिर्फ भौगोलिक तत्‍वों का ही प्रभाव पडता है। ग्‍लोबल वार्मिंग का ही यह असर माना जा सकता है कि आज यह योग कम काम कर रहा है और शायद आनेवाले दिनों में इतनी बरसात के लिए भी यह योग काम करना बंद कर दे। 14 – 15 जून को आप पुन: इस सिद्धांत को सत्‍यापित होते देख सकते हैं , हालांकि वह मानसून का महीना है , इसलिए स्थिति के इस बार से भी भीषण रूप में होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। भारत में चारो ओर आंधी , तूफान के साथ ही साथ जोरों की बारिश भी होती रहेगी। पर ज्‍योतिष के कुछ नियम सत्‍य के निकट भी होते हैं , और कुछ के बारे में तो सिर्फ संभावना ही व्‍यक्‍त की जा सकती है , दावा नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए होता है , क्‍योंकि उन नियमों पर सामाजिक , राजनीतिक , भौगोलिक या अन्‍य बहुत से कारकों का प्रभाव देखा जाता है । पर इसका अर्थ यह नहीं है कि यह एक विज्ञान नहीं है।

30 टिप्‍पणियां:

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

jyada se jyada ise ek soft science kaha ja sakta hai kyunki iske nishkarsh statistics par adharit hote hain.kuunki yah prayogik vidnyan nahi hai iseeliye ise vigyan manane par aapatti ho sakti hai.

श्यामल सुमन ने कहा…

आपने बेहतर समझाने की कोशिश की है। लेकिन मेरी दृष्टि में ज्योतिष विज्ञान है। अतः इस आलेख के लिए आगे कहने को शेष कुछ नहीं।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

अखिलेश शुक्ल ने कहा…

प्रिय मित्र
आपकी उत्कृठ रचनाओं को प्रकाशन के लिए अवश्य ही भेंजे। पत्रिकाओं के पते के लिए मेरे ब्लाग पर पधारें।
अखिलेश शुक्ल्
http://katha-chakra.blogspot.com
http://rich-maker.blogspot.com

विनय ने कहा…

आपने मेरा ज्ञानवर्धन किया

शुक्रिया

---
चाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलें

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

बहुत ही अच्छी रचना....!ज्योतिष के बारे में ज्यादा जानते नहीं...सो...

अभिषेक ओझा ने कहा…

जहाँ प्रेडिक्शन होगा वहां प्रोबैबीलिटी का होना स्वाभाविक है !

समय ने कहा…

मोहतरमा,
विज्ञान, प्रकृति का सुव्यवस्थित और सुस्थापित ज्ञान है। प्राकॄतिक शक्तियों और स्वयं मानव पर किसी अलौकिक नियंत्रण का विचार हज़ारों वर्ष पुराना है, और यह अब भी कई दिमागों में अपनी पैठ रखता है क्योंकि उनके ज्ञान और समझ का स्तर इसमें अवलंबन ढूंढ़्ता है।
आखिर कैसे तो मैं अपने अस्तित्व, अपने भविष्य पर नियंत्रण कर पाऊं, यह विचार हमें आकर्षित करता है।
खैर...इस अंतर्विरोध पर क्या कहिएगा..
एक ओर तो आप लिखती है कि गत्यात्मक ज्योतिष से सटीक और तिथि युक्त भविष्यवाणियां होती हैं....और दूसरी ओर अपने बारे में लिखते वक्त यह कहती है कि..आकाश को छूने के सपने हैं मेरे..और उनको हकी़कत में बदलने को प्रयासरत हूं..देखें सफलता कब मिलती है..

अब बताइए...
क्या गत्यात्मक ज्योतिष यह जानने में आपकी मदद नहीं कर सकता..या आपको खुद ही इसमें विश्वाश नहीं है...

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

हूं....


फिर भी मैं यही कहूंगा कि ज्‍योतिष विज्ञान नहीं है।


एक सामान्‍य फार्मूला है किसी भी विषय को विज्ञान की कसौटी पर कसने का और वह है कि जिस विषय में


प्रयोग
प्रेक्षण
और परिणाम


हर बार एक ही तरीके से हासिल किए जा सकें। यानि लैबोरेट्री प्रयोग संभव हो तो वह विज्ञान है। वरना जबरन किसी विषय को विज्ञान बना देना कहां तक उचित है।



पर एक बात और बाकी रह जाती है। गीता में लिखा है अनुभव पर आधारित ज्ञान विज्ञान है।


इस कथन से विज्ञान को विज्ञान सिद्ध करने वाली परिपाटी पर ही सवालिया निशान लग जाता है। क्‍योंकि अनुभव हमेशा स्‍थूल हो जरूरी नहीं ।


खैर यह लॉजिक की बात है। ठोस बात तो मैं यही मानता हूं कि विज्ञान विज्ञान है और ज्‍योतिष ज्‍योतिष। घालमेल की क्‍या जरूरत है।

Neeraj Rohilla ने कहा…

संगीताजी,
नमस्कार !
पहले सोचा कि इस पोस्ट पर टिप्पणी लिखने से बचें, फ़िर सोचा कि असहमति जताते चलें, आखिर में सोचा कि विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते सबसे अच्छा होगा कि प्रश्न पूछा जाये, भले ही टिप्पणी लम्बी हो जाये।

मेरा ये प्रश्न आपकी पिछली पोस्ट में गत्यात्मक ज्योतिष से मौसम की भविष्यवाणी करने के सन्दर्भ में है।

आपने लिखा था"

१) मई १-४ के बीच में गर्मियों का महीना होने के बावजूद भारत में यत्र-तत्र बारिश का एक योग बन रहा है।

२) रात में समाचार से मालूम हुआ कि पश्चिम बंगाल और राजस्‍थान में बारिश भी हुई है।

आप विज्ञान की बात कर रही हैं, तो विज्ञान के किसी भी Predictive Model में कुछ Inputs होते हैं और फ़िर Output Predict किया जाता है। उदाहरण के लिये ज्योतिष से किसी एक निश्चित स्थान (मान लीजिये आपके शहर या मेरे शहर मथुरा अथवा ह्यूस्टन) पर मौसम की भविष्यवाणी करने के लिये आपको किस किस जानकारी की आवश्यकता होती है।

अगर इसको प्रीडिक्ट करने के लिये उस स्थान विशेष की जानकारी का प्रयोग किया गया है तो भविष्यवाणी भी उस निश्चित स्थान के लिये ही होनी चाहिये, न कि भारत में यत्र-तत्र बारिश होगी।

भारत जैसे विशाल देश में इस प्रकार की भविष्यवाणी क्या बहुत बडी बात है?

मेरा मन्तव्य आपकी आलोचना नहीं है बल्कि कुछ नया जानने की भूख है।

एक और बात, मौसम/भूगर्भ जैसे विज्ञान को आपने जिस प्रकार से हल्के में लिया है वो चिन्तनीय है। इस प्रकार के सभी प्रभाव बडे Complex होते हैं और इसीलिये Underlying Phenomena की जानकारी ठीक से समझने में समय लगता है। लेकिन इसको सिरे से नकारना और बहुत सरलता सी उपमा देकर खारिज करना सही प्रवत्ति नहीं है। गणित और विज्ञान में सही जवाब हमेशा "=" ही होता है लेकिन जब सैकडों कारण होते हैं तो मुख्य प्रभावी कारकों पर ध्यान देकर "=" को लगभग बराबर में बदलकर गणना की जाती हैं। ऐसी गणनायें कभी सफ़ल होती हैं और कभी असफ़ल लेकिन इस प्रकार की हर गणना आगे आनी वाली गणना में सुधार की सम्भावना प्रदान करती है और हमारी समझ को बढाती है।

आगे भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन आपसे विनती है कि मेरे पूछे गये प्रशन का उत्तर दें कि मौसम की ज्योतिषीय गणना में आपके Inputs क्या हैं, मैं आपसे तरीका नहीं पूछ रहा हूँ (उसे आप सीक्रेट रख सकती हैं)। इसके बाद ही सही विज्ञान के मामलों में चर्चा हो सकेगी जिससे सभी लाभान्वित होंगे।

साभार,
नीरज रोहिल्ला

Arvind Mishra ने कहा…

सिद्धार्थ और नीरज से शब्द्शः सहमत ! आप फलित ज्योतिष का अपना परचम लहराती चलें -उसे विज्ञानं बनाने पर क्यों तुली हैं ?
हम जब अंतर्जाल पर हों तो यह जरूर धयान रखें पूरी दुनिया हमें देख रही है ! लेट अस बी सेंसिबल !

AlbelaKhatri.com ने कहा…

ek achha aur gyanvardhak aalekh hai
.....badhai aur dhanyavaad

संगीता पुरी ने कहा…

नीरज रोहिल्‍ला जी , सिद्धार्थ जोशी जी और डा अरविंद जी , 1 मई तक पूरे भारतवर्ष के लोग गर्मी से बेचैन थे , मेरे द्वारा दी गयी तिथि यानि 2मई से ही पूरे भारत वर्ष के मौसम का यूं अचानक बदल जाना आपको संयोग ही दिखाई पड रहा है।जबकि यह पहली बार नहीं हुआ , इसके पहले तीन बार मौसम से संबंधित तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणियां सही हो चुकी हैं। जब गर्मी के दिनों में हुई यह बारिश आपको प्रभावित नहीं कर रही .. तो आनेवाले 14-15 जून तो बरसात का दिन है .. उसे तो आप और सामान्‍य मान लेंगे .. शास्‍त्र के नाम पर ज्‍योतिष न जाने कितने वर्षों से घिसट घिसट कर चल रहा है। इस सदी में विज्ञान के रूप में इसे दौडाने की इच्‍छा थी हमारी .. क्‍योंकि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष चालीस वर्षों में इतना रिसर्च कर चुका है .. पर आप गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष को परंपरागत ज्‍योतिष से अलग करके नहीं देख रहे हैं .. रहा मेरे परिचय में दिए गए विरोधाभासी वक्‍तब्‍य से , तो मैं इतना कहना चाहूंगी कि सिर्फ ग्रह ही लोगों को प्रभावित नहीं करते .. सामाजिक राजनीतिक या अन्‍य माहौल भी प्रभावित करता है .. साधन साध्‍य के मध्‍य तालमेल की कमी भी प्रभावित करती है किसी की सफलता में .. आज शहर के मध्‍यमवर्गीय सभी बच्‍चे प्रोफेशनल पढाई करके अपने कैरियर को मजबूत बना रहे हैं .. क्‍या उनका जन्‍म गांव में जन्‍म लेनेवालों से अलग समय में हुआ है .. जबकि गांव के प्रतिभासंपन्‍न बच्‍चे भी सुविधा के अभाव में सडको पर भटकने को बाध्‍य हैं .. ग्रहों का सांकेतिक प्रभाव पडता है और इसे विज्ञान के रूप में सिद्ध किया जा सकता है .. पर आप पाठको को इतनी आपत्ति है तो आज से ही इसे विज्ञान कहना बंद कर देती हूं .. लेकिन मेरे कहने से य बदलनेवाला नहीं .. यह विज्ञान था , विज्ञान है और विज्ञान रहेगा ।

Neeraj Rohilla ने कहा…

आपकी टिपण्णी ने मेरे प्रश्न का जवाब नहीं दिया !!!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

पढ़ कर समझने की कोशिश में है ..आपके लिखे से भी और टिप्पणियों से भी ..

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

रोचक विचार विमर्श!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

ज्योतिष एक ऐसा विज्ञान है,
जिसमें तर्क-कुतक्र्र नही,
केवल गणनाएँ बोलती हैं।

अन्तर सोहिल ने कहा…

आदरणीया संगीता जी
मैने फरवरी में ही एक नोट लिख लिया था कि "गत्यात्मक ज्योतिष का दावा - एक से चार मई के बीच पूरे भारतवर्ष में मौसम गडबड रहेगा"
यह सब मैने केवल आजमाईश के लिये लिख रखा था। हालांकि मैं ना तो ज्योतिष को नकारता था और ना ही ज्योतिष पर पूर्ण विश्वास करता था। फिर भी अपने घर में और आस-पास के लोगों को भी आपके दावे के बारे में बता रहा था। आपकी सभी पोस्टों की तरह कल की पोस्ट भी पढी थी, लेकिन यहां हरियाणा और दिल्ली में तीन मई तक कुछ नही हुआ तो मुझे लगा कि अब ऐसा कुछ नही होने वाला, लेकिन कल चार मई को एकाएक बारिश और ओले गिरे हैं। अब आपके ब्लाग का प्रचार कर रहा हूं।
एक बात और आज सुबह ट्रेन में एक हस्तरेखा विशेषज्ञ, जो हंसवाहिनी के नाम से एक हस्तरेखा अनुसंधान केन्द्र चलाते हैं से भेंट हुई, उनके अनुसार वो गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में कुछ नही जानते हैं।
नमस्कार स्वीकार करें

संगीता पुरी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
रंजन ने कहा…

सार्थक चर्चा.. अच्छा लगा..

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

सिद्धार्थ और नीरज कि बातों में सचमुच दम है , कि ज्योतिष विज्ञान नहीं हो सकता ? वैसे इसके बारे में मेरे भीतर ज्ञान का अभाव है , इसलिए ज्यादा कुछ कहना मेरे लिए उचित नहीं है .....सिर्फ ग्रह ही लोगों को प्रभावित नहीं करते .. सामाजिक राजनीतिक या अन्‍य माहौल भी प्रभावित करता है .. साधन साध्‍य के मध्‍य तालमेल की कमी भी प्रभावित करती है किसी की सफलता में .. आपने बेहतर समझाने की कोशिश की है।

मुसाफिर जाट ने कहा…

संगीता जी,
काफी दिन बाद आपको पढ़ा.
लेकिन ये क्या हो रहा है??? ज्योतिष को विज्ञान मानने में झगडा??
तो जी मेरा तो ये कहना है कि आप बस लिखती रहें. आप और हम कोई भी किसी अन्य के विचारों को नहीं बदल सकते. ये उनके अपने विचार हैं. उन्हें प्रकट करने दो. अच्छा हो कि आप उनके विचारों से प्रभावित हुए बिना लिखती रहें.
बाकी मुझे तो आप जानती ही हो. मैं आपके हर एक वक्तव्य से सहमत रहता हूँ.

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

har baar ek jordaar prashna aur har baar ek tarksangat jawaab..! aap apani vidha ko aage le jane ke liye jis atmavishwas se morcha le rahi haiN, uska suparinaam avashya sheeghra hi milega aap ko.

ShubhkamanaeN

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

बेहतर तरीके से आपने यह आलेख प्रस्तुत किया .. आभार

संगीता पुरी ने कहा…

मेरे ब्‍लाग पर आने , मेरे विचारों को पढने और अपने सुझाव देने के लिए सबका बहुत बहुत धन्‍यवाद । नीरज रोहिल्‍ला जी , सचमुच आपके प्रश्‍न का उत्‍तर बाकी रह गया था .. मौसम की भविष्‍यवाणी करने के लिए अब ग्रहों की स्थिति ही इनपुट्स होते हैं , क्‍योंकि उसके अनुसार भारत की जलवायु को देखते हुए सिद्धांत प्रतिपादित किया जा चुका है , पर जब तक किसी सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं हो जाता , हमलोग सांख्यिकी को भी साथ लेकर चलते हैं और उन दोनो का तालमेल बिठाकर सिद्धांत को स्‍थापित करते हैं। चूंकि यह भारत की जलवायु से संबंधित नियम है , मैने अपने पुराने आलेख में 'यत्र तत्र' की चर्चा नहीं की थी , वास्‍तव में इसे 'अधिकांश जगह' कहा गया था।

समय ने कहा…

मोहतरमा,
आपने इस मामले को बहस का मुद्दा बनाया इसिलिए यहां इतना विमर्श संपन्न हुआ है। यहां किसी की भी कोशिश आपके मासूम दिल को चोट पहुंचाने की नहीं दिखाई देती।
किसी के कहने भर से हमें बात नहीं मान लेनी चाहिए। अगर हमारी तत्कालीन समझ इसे मानने के लिए तैयार है तब ही..
और यदि आपको आलोचना और बहस में विश्वास नहीं है, या अपने विचारों पर ही दृढ़ रहना है, तो बहस आमंत्रित ही नहीं करनी चाहिए थी।
अगर आपको लगता है कि आप सही हैं और अब आगे सुधार और विकास की जरूरत नहीं है तो लगे रहिए शांति से, अपने जैसी मानसिकता के काफ़ी लोग आपको मिल ही जाएंगे आत्मसंतुष्टि के लिए।
आखिर हम भी अभी तक आपको शांति से पढ़ ही रहे थे।
..............
आपने लिखा है..सिर्फ ग्रह ही लोगों को प्रभावित नहीं करते .. सामाजिक राजनीतिक या अन्‍य माहौल भी प्रभावित करता है .. साधन साध्‍य के मध्‍य तालमेल की कमी भी प्रभावित करती है किसी की सफलता में ..
यानि कि आपको भी लगता है, चीज़ों को एक साथ कई कारक प्रभावित करते हैं।यानि कि चीज़ों को इन्हीं आपसी अंतर्संबंधो और अंतर्द्वंदों के सापेक्ष ही समझा जा सकता है। यानि कि किसी एक कारक के आधार पर चीज़ों को सही-सही समझा ही नहीं जा सकता, उसके आधार पर भविष्यवाणी तो उफ़....
चीज़ो को उसके अंतर्संबंधो और अंतर्द्वंदों से अलग करके निरपेक्ष तरीके से देखने को दर्शन की भाषा में अधिभूतवादी (metaphysical) नज़रिया कहते हैं, ये तो आप जानती ही हैं।

खैर..
व्यक्तिगत ना लें, ये विचारों का टकराव हैं।
आप हमारे लिए आदरणीय हैं ही।

संगीता पुरी ने कहा…

हां , मुझे ये बहस नहीं शुरू करनी चाहिए थी .. क्‍यूंकि समाज में अभी ज्‍योतिष जिस रूप में प्रचलित है .. उसे ही समाज के लोगों ने देखा है .. ऋषि , महर्षियों के समय में ये क्‍या था .. और अभी गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ने इसे कौन सा स्‍वरूप दिया है .. इसे समाज के लोग नहीं जानते .. अब जिसका स्‍वाद ही नहीं चखा गया .. उस व्‍यंजन का स्‍वाद लोग कैसे बता सकते हैं .. इसलिए मुझे भी बेहतर यही लग रहा है कि मैं सिर्फ लिखती चलूं .. जिसे मानना है मानें और जिसे नहीं मानना है नहीं मानें ।

Prem Farrukhabadi ने कहा…

सुन्दर रोचक बहस . बधाई

Murari Pareek ने कहा…

ज्योतिष और साइंस के दरमियान हमेशा झगडा रहा है, पर साइंस भी हकीक़त मैं अपने आप मैं साइंस है की नहीं किसी ने नहीं देखा, अभी तक साइंस ने इतनी उन्नति नहीं की की वो प्रकृति के रहस्यों को सुलझा सके नास्त्रे दमास की भविष्य वानिया, पादरी पियो की भविष्य वानिया, और तो और जो नव गृह हैं वो विज्ञान ने बादमे पर ज्योतिष शास्त्र ने पहले ही घोषित कर दिए थे! तब उनके पास कोनसे उपकरण थे! विज्ञान कभी किसी गृह को निकालता है किसी को शामिल करता है,

संगीता पुरी ने कहा…

सबों को एक बार फिर बहुत बहुत धन्‍यवाद .. अंतर सोहेल जी , आज गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष को आप जैसे हजारों युवकों की ही आवश्‍यकता है .. जो इसका वृहत तौर पर प्रचार प्रसार कर सके .. मेरे ब्‍लाग पर नजर बनाए रखने के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद।

Einstein ने कहा…

Haan jyotish vigyan ek purna vigyan hai...Mai ye manta hoon...

Kisi ke na manane se satya badal nahi jata...

Na manane balon se mujhe kahana hai ki AAP jyotish vigyan ke gahre pani me paith banakar to dekhiye...sab kuchh saf saf hai...kuchh bhi dhundhala nahi hai...

jahan tak meri samajh hai vigyan(science) sirf prayogik(experimental) nahi hota. ye saidhantik(Theoretical)bhi hota hai. es bat se har tippanikar sahmat honge...

Jyotish vigyan, science ke dono bhag ko khud me sanjoye huye hai...experimental and Theoretical both...

Science ko sirf experimental science ke dayre me bandhana ALBERT EINSTEIN jaise scientist ki hatya hi hogi.....!

Science is the way to undersatnd about the Nature...Here Nature could be any-thing, every-thing...

This is my personal attitude 4 science...

Thanks a Lot Sangita je 4 ur successful effort and also 4 comments on my blog...

Regards
Einstein Kunwar