सोमवार, 20 जुलाई 2009

पृथ्‍वी के जड चेतन पर सूर्य या चंद्रग्रहण के प्रभाव का क्‍या है सच ???????

आप दुनिया को जिस रूप में देख पाते हैं , उसी रूप में उसका चित्र उतार पाना मुश्किल होता है , चाहे आप किसी भी साधन से कितनी भी तन्‍मयता से क्‍यूं न कोशिश करें। इसका मुख्‍य कारण यह है कि आप हर वस्‍तु को देखते तो त्रिआयामी हैं , यानि हर वस्‍तु की लंबाई और चौडाई के साथ साथ उंचाई या मोटाई भी होती है , पर चित्र द्विआयामी ही ले पाते हैं , जिसमें वस्‍तु की सिर्फ लंबाई और चौडाई होती है। इसके कारण किसी भी वस्‍तु की वास्‍तविक स्थिति दिखाई नहीं देती है।

इसी प्रकार जब हम आकाश दर्शन करते हैं , तो हमें पूरे ब्रह्मांड का त्रिआयामी दर्शन होता है । प्राचीन गणित ज्‍योतिष के सूत्रों में सभी ग्रहों की आसमान में स्थिति का त्रिआयामी आकलण ही किया जाता है , इसी कारण सभी ग्रहों के अपने पथ से विचलन के साथ ही साथ सूर्य के उत्‍तरायण और दक्षिणायण होने की चर्चा भी ज्‍योतिष में की गयी है। पर ऋषि , महर्षियों ने जन्‍मकुंडली निर्माण से लेकर भविष्‍य कथन तक के सिद्धांतों में कहीं भी आसमान के त्रिआयामी स्थिति को ध्‍यान में नहीं रखा है । इसका अर्थ यह है कि फलित ज्‍योतिष में आसमान के द्विआयामी स्थिति भर का ही महत्‍व है। शायद यही कारण है कि पंचांग में प्रतिदिन के ग्रहों की द्विआयामी स्थिति ही दी होती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ भी ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव में ग्रहों की द्विआयामी स्थिति को ही स्‍वीकार करता है। इस कारण सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता ?

हम सभी जानते हैं कि आसमान में प्रतिमाह पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी होता है , जबकि अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति बन जाती है , लेकिन इसके बावजूद प्रतिमाह सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण नहीं होता। इसका कारण भी यही है। आसमान में प्रतिमाह वास्‍तविक तौर पर पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी और हर अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति नहीं बनती है । यह तो हमें मात्र उस चित्र में दिखाई देता है , जो द्विआयामी ही लिए जाते हैं। इस कारण एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर नहीं पडती है। जिस माह वास्‍तविक तौर पर ऐसी स्थिति बनती है, एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर पडती है और इसके कारण सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते है।

सूर्यग्रहण के दिन चंद्रमा सूर्य को पूरा ढंक लेता है , जिससे उसकी रोशनी पृथ्‍वी तक नहीं पहुंच पाती , तो दूसरी ओर चंद्रग्रहण के दिन पृथ्‍वी सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य आकर सूर्य की रोशनी चंद्रमा पर नहीं पडने देती है । सूर्य और चंद्र की तरह ही वास्‍तविक तौर पर समय समय पर अन्‍य ग्रहों की भी आसमान में ग्रहण सी स्थिति बनती है , जो विभिन्‍न ग्रहों की रोशनी को पृथ्‍वी तक पहुंचने में बाधा उपस्थित करती है। पर चूंकि अन्‍य ग्रहों की रोशनी से जनसामान्‍य प्रभावित नहीं होते हैं , इस कारण वे सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की तरह उन्‍हें साफ दिखाई नहीं देते। परंतु यदि ग्रहणों का प्रभाव पडता , तो सिर्फ सूर्य और चंद्र ग्रहण ही प्रभावी क्‍यूं होता , अन्‍य ग्रहण भी प्रभावी होते और प्राचीन ऋषियों , महर्षियों के द्वारा उनकी भी कुछ तो चर्चा की गयी होती ।

अन्‍य ग्रहों के ग्रहणों का किसी भी ग्रंथ में उल्‍लेख नहीं किए जाने से यह स्‍पष्‍ट है कि किसी भी ग्रहण का कोई ज्‍योतिषीय प्रभाव जनसामान्‍य पर नहीं पडता है। पर चूंकि सूर्य के उदय और अस्‍त के अनुरूप ही पशुओं के सारे क्रियाकलाप होते हैं , इसलिए अचानक सूर्य की रोशनी को गायब होते देख उनलोगों का व्‍यवहार असामान्‍य हो जाता है , जिसे हम ग्रहण का प्रभाव मान लेते हैं । लेकिन चिंतन करनेवाली बात तो यह है कि यदि ग्रहण के कारण जानवरों का व्‍यवहार असामान्‍य होता , तो वह सिर्फ सूर्यग्रहण में ही क्‍यूं होता ? चंद्रग्रहण के दिन भी तो उनका व्‍यवहार असामान्‍य होना चाहिए था। पर चंद्रग्रहण में उन्‍हें कोई अंतर नहीं पडता है , क्‍यूंकि अमावस्‍या के चांद को झेलने की उन्‍हें आदत होती है।

वास्‍तव में ज्‍योतिषीय दृष्टि से अमावस्‍या और पूर्णिमा का दिन ही खास होता है। यदि इन दिनों में किसी एक ग्रह का भी अच्‍छा या बुरा साथ बन जाए तो अच्‍छी या बुरी घटना से जनमानस को संयुक्‍त होना पडता है। यदि कई ग्रहों की साथ में अच्‍छी या बुरी स्थिति बन जाए तो किसी भी हद तक लाभ या हानि की उम्‍मीद रखी जा सकती है। ऐसी स्थिति किसी भी पूर्णिमा या अमावस्‍या को हो सकती है , इसके लिए उन दिनों में ग्रहण का होना मायने नहीं रखता। पर पीढी दर पीढी ग्रहों के प्रभाव के ज्ञान की यानि ज्‍योतिष शास्‍त्र की अधकचरी होती चली जानेवाली ज्‍योतिषीय जानकारियों ने कालांतर में ऐसे ही किसी ज्‍योतिषीय योग के प्रभाव से उत्‍पन्‍न हुई किसी अच्‍छी या बुरी घटना को इन्‍हीं ग्रहणों से जोड दिया हो। इसके कारण बाद की पीढी इससे भयभीत रहने लगी हो। इसलिए समय समय पर पैदा हुए अन्‍य मिथकों की तरह ही सूर्य या चंद्र ग्रहण से जुड़े सभी अंधविश्वासी मिथ गलत माने जा सकते है। यदि किसी ग्रहण के दिन कोई बुरी घटना घट जाए , तो उसे सभी ग्रहों की खास स्थिति का प्रभाव मानना ही उचित होगा , न कि किसी ग्रहण का प्रभाव।

26 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने ......बहुत बहुत शुक्रिया

vinay ने कहा…

acchi jankari

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

सदी के सबसे बड़े सूर्यग्रहण से पहले आपकी यह जानकारी सामयिक रही.. आभार

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

उम्दा बढ़िया जानकारी दी है आपने .

Murari Pareek ने कहा…

kal Aaj tak me bhi pahunche hue ek jyotishaacarya bhi bata rahethe ki sury grahan se manushy ya garbhwati stri kisi koi koi khtraa nahi hota !

mehek ने कहा…

sach bahut hi achhi gyanvardhak jankari rahi.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

achchhi jaankari ke liye dhanyavaad.

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

Bahut achhi jaankaari di aapne.

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

Bahut hi achhi jaankari di aapne.

विवेक सिंह ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया !

अच्छी जानकारी दी आपने !

eSwami ने कहा…

आपके लेख की भाषा गलत सलत है -

"आसमान में प्रतिमाह पूर्णिमा को पृथ्‍वी और चंद्र के मध्‍य सूर्य होता है "
आप गलत कह रही हैं. पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र पृथ्वी के सापेक्ष में द्वीजामितीय आधार पर तो १८० डिग्री पर होते हैं लेकिन त्रीज्यामितीय आधार पर पृथ्वी की छाया चंद्र पर नही पड रही होती है.

"तो दूसरी ओर चंद्रग्रहण के दिन सूर्य चंद्रमा को पूरी तरह ढंक लेता है "

अरे बाबा किसी बच्चे को भी पता होता है कि चंद्रग्रहण चांद पर पृथ्वी की छाया से बनता है -जब तीनो त्रीज्यामितीय आधार पर एक सीधी रेखा में हों यानी वही १८० डिग्री - तो हमेशा चंद्रग्रहण पूर्णिमा को ही होगा.

त्रिज्यामितीय या द्वीज्यमितीय आधार पर चंद्रग्रहण के लिये हमेशा पृथ्वी की छाया उत्तरदायी होगी सूर्य का बीच में घुसना नहीं - वो बहुत दूर है.

आपकी आसानी के लिये कडी ये रही [http://en.wikipedia.org/wiki/Lunar_eclipse]

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने शुक्रिया

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत बडिया जानकारी बहुत बहुत धन्यवाद्

Arvind Mishra ने कहा…

प्रतिमाह पूर्णिमा को पृथ्‍वी और चंद्र के मध्‍य सूर्य होता है ,

यह बात कुछ हजम नहीं हुयी ! इसे समझाएं !

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

बहुत उम्दा जानकारी आपने दी धन्यवाद,आप ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष की बात करती हैं इस लिए आपसे मैं इसके प्रभाव , राशियों पर क्या पडेगा,जानना चाहता हूँ वह इसलिए कि आज कल ज्योतिषी लोग इस ग्रहण को लेकर बहुत भयावह भविष्यवाणिया कर रहें हैं ,इसका सच क्या है ,कृपया लोगों को बताने की कृपा करें.

संगीता पुरी ने कहा…

ईस्‍वामी जी और डा अरविंद जी , त्रुटि की ओर इशारा करने के लिए आपलोगों का धन्‍यवाद .. मैं सभी ग्रहों के ग्रहण देखने के चक्‍कर में M यानि MERCURY को MOON समझ बैठी और इस कारण पूरी व्‍याख्‍या में गलती हो गयी .. पर अब मैने इसे सुधार दिया है .. बहुत सहज होकर लिखने के क्रम में उस पाराग्राफ में मुझसे गलती हो गयी है .. आपके दिए लिंक को पढने की मुझे आवश्‍यकता नहीं है .. आशा है आप दोनो और सभी पाठक इस त्रुटि के लिए मुझे क्षमा करेंगे .. इसके बाद भी कोई गल्‍ती रह गयी हो तो बताने का कष्‍ट करें।

Ashish Shrivastava ने कहा…

पृथ्वी पर सूर्य और चण्द्रमा के अतिरिक्त किसी और का ग्रहण संभव नही है। सूर्य ग्रहण पृथ्वी पर चण्द्रमा की छाया तथा चन्द्रग्रहण चन्द्रमा पर पृथ्वी की छाया से होता है। पृथ्वी के सापेक्ष पृथ्वी की या चन्द्रमा की किसी और ग्रह पर छाया नही पढ सकती क्योकि उन ग्रहो की पृथ्वी से दूरी काफी अधिक है। लेकिन पृथ्वी से सूर्य पर बुध और शुक्र ग्रहो का संक्रमण (सूर्य के सामने से एक छोटे से धब्बे का गुजरना) देखा जा सकता है। यह ग्रहण इसलिये नही है क्योंकि इसे सामान्य नजरो(नंगी आंखो से) से नही देखा जा सकता, सूर्य रोशनी मे कमी नगण्य होती है क्योंकि सूर्य पर इनकी छाया बहुत ही छोटी होती है। इसी तरह अन्य ग्रहो(बृहस्पति, शनी, नेपच्युन,युरेनस) पर उनके उपग्रहो का संक्रमण देखा जा सकता है। बृहस्पति पर तो ये संक्रमण आप रोज देख सकते है, आप के पास एक दूरबीन बस चाहीये।

ACHARYA RAMESH SACHDEVA ने कहा…

NAMASKAAR
AAPKE SHAS AUR GYAN KE KAYAL HO GAYE H.
LAGTA H AAP NE JYOTISH KO SCIENCE BANA DIYA H.
MERA AABHAR SAWIKAR KARE.
RAMESH SACHDEVA
--
RAMESH SACHDEVA (DIRECTOR)
HPS SENIOR SECONDARY SCHOOL
A SCHOOL WHERE LEARNING & STUDYING @ SPEED OF THOUGHTS
M. DABWALI-125104
HERE DREAMS ARE TAKING SHAPE
PHONE 01668-230327, 229327
MOBILE 09896081327
www.haryanapublicschool.wordpress.com

ACHARYA RAMESH SACHDEVA ने कहा…

NAMASKAAR
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संगीता पुरी ने कहा…

आशीष श्रीवास्‍तव जी ,
मै आलेख में खुद लिखा है किचूंकि अन्‍य ग्रहों की रोशनी से जनसामान्‍य प्रभावित नहीं होते हैं , इस कारण वे सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की तरह उन्‍हें साफ दिखाई नहीं देते।पर , बुध और शुक्र का भी ग्रहण पृथ्‍वी पर पडता है। और जनमानस पर ग्रहों के प्रभाव की बात की जाए , तो उसका देखना मायने नहीं रखता है। ग्रहण के प्रभाव की चर्चा के क्रम में ही मैने इन बातों का उल्‍लेख किया है । मैंने फलित ज्‍योतिष के ग्रंथों में फलित की चर्चा में कहीं भी इन ग्रहणों के प्रभाव पडने की बात लिखी गयी नहीं पायी है। मैं बस यही समझाना चाह रही हूं।

Abhishek Mishra ने कहा…

"यदि किसी ग्रहण के दिन कोई बुरी घटना घट जाए , तो उसे सभी ग्रहों की खास स्थिति का प्रभाव मानना ही उचित होगा , न कि किसी ग्रहण का प्रभाव। "
Jyotish se judi kuch manyataon ko spasht karne ka sarthak pryas kiya hai aapne. Aabhar.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Nish karsh saarthak hain.

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छी जानकारी दी

ghanshyam_astrologer ने कहा…

sangeeta jii
namaskar
ho sakata he ki gyatyatamak jyotish me grahan ka prabhav desh aur manav par padane ka mahattav na ho , par aisabhi nahi ki rishi muniyo ne iske prahav ko jatak par sweekara nahi hai.
R.SANATANAM ek great astrologer the, apani pustak "ESSENTIAL OF PREDICTIVE HINDU ASTROLOGY" me grahan ke prabhavi ka sundar saudharan varanan kiya hai.
nimnlikhit suchana maine sandharbh ke liye di hai.
http://astroimran.blogspot.com
is blog par aap detail dekh sakati hai.


Solar Eclipse of July 22nd




Eclipse is a celestial feature that has amazed and awed the mankind through out history. In earlier times, it was considered an eccentric event that intruded the natural cycle of day and night. Consequently, most of the folklores presented the eclipses as ominous and sinister heavenly phenomena. Religious and cultural traditions have proposed special prayers and pleas at the time of eclipses, so that luminaries could defend themselves against heavenly dragon.



In the purview of astrology too, eclipses are unavoidable phenomena having far reaching impacts, especially on mundane affairs. However, they do cast good or bad effects on individuals when fall near the longitude of radical planets or house cusp of natal chart. But as a whole, Vedic and Western astrological treatises delineate eclipses as a precursor of significant global and national events.



Indian astrology divides the eclipses into ten different kinds, according to various types of shadow at the time of occurrence.



1) Savya

2) Apasavya

3) Leha

4) Grasana

5) Nirodha

6) Avamardana

7) Aroha

8) Aghrata

9) Madhyatamas

10) Tamontay



Whereas modern astronomy considers six types of eclipse, depending upon magnitude of Moon’s shadow and position of Earth’s surface.



1) Central Total Eclipse

2) Central Annular Eclipse

3) Non-central Total Eclipse

4) Non-central Annular Eclipse

5) Annular-Total Eclipse

6) Partial Eclipse



Celebrated Varahamihira thoroughly delineated the astrological impacts of eclipses on mundane affairs in Chapter 5 of his magnum opus Brihat Samhita (BS). There he also discusses the visibility and shape of eclipse disc in detail. Later he gives the results of eclipse occurring in various lunar months and signs. One of important principle he enunciated is “should there be two eclipses (solar and a lunar) in same (lunar) month, kings would be destroyed as a result of revolt; and there would be bloody battles.” (BS Chapter 5, Verse 26)



According to Varahamihira, eclipse yields more malign results when any other transiting natural malefic planet(s) conjunct or aspect the under-eclipsed luminaries.

सुशील कुमार ने कहा…

आपकी बातें बहुत हद तक सही है कि यदि किसी ग्रहण के दिन कोई बुरी घटना घट जाए , तो उसे सभी ग्रहों की खास स्थिति का प्रभाव मानना ही उचित होगा , न कि किसी ग्रहण का प्रभाव।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

जानकारियाँ देने के लिए आभार!