गुरुवार, 23 जुलाई 2009

काश !! इलाज की अन्‍य पद्धतियों को भी विकसित किया गया होता !!!!

शनिवार और रविवार को बच्‍चों की छुट्टियों की वजह से नींद देर से ही खुलती है । हां , कभी कभार फोन की घंटी नींद अवश्‍य तोड दिया करती है। ऐसे ही एक शनिवार भोर की अलसायी हुई नींद के आगोश में थी कि अचानक फोन की घंटी बजी। फोन उठाकर जैसे ही मैने ‘हलो’ कहा , वैसे छोटी बहन की दर्दनाक आवाज कानों में पडी , ‘दीदी , मुझे बचा लो , ये लोग मेरी जान ले लेंगे।’ मेरे तो होश ही उड गए , विवाह के दस वर्षों तक सबकुछ सामान्‍य रहने के बाद ससुराल में इसके जीवन में कौन सा खतरा आ गया। अपने को बहुत संभालते हुए पूछा , ‘क्‍या हुआ , पूरी बात बताओ ’ तब उसने जो बताया , वह लगभग शून्‍य हुए दिमाग को काफी राहत देनेवाली थी। दरअसल गर्मी की वजह या अन्‍य किसी वजह से कई दिनों से उसके शरीर के कई जगहों पर फोडे निकल गए थे , कुछ काफी बडे भी हो गए थे। शाम को डाक्‍टर ने बडे फोडों को जल्‍द आपरेशन करा लेने की सलाह दी थी। रात में इनलोगों में लंबी बहस चली थी , बहन के पति और श्‍वसुर डाक्‍टर की सलाह मान लेने को कह रहे थे और बहन एक दो दिन इंतजार करना चाह रही थी । सुबह सुबह अपनी हार को नजदीक पाकर उसने घबडाकर मुझे फोन लगा दिया था। अपनों का कष्‍ट देखना बहुत मुश्किल होता है , उसकी समस्‍या को हल करने के लिए मैने जैसे ही अपना दिमाग खपाया , एक उपाय नजर आ ही गया।

किसी भी फोडे के लिए आयुर्वेद की एक दवा है ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ , मैने बहुत दिन पूर्व उसका प्रयोग किया था और उसके चार छह घंटे के अंदर उसके प्रभाव से प्रभावित होकर कई बार दूसरों को भी उसके उपयोग की सलाह दी थी , जिसमें से किसी को भी उस दवा पर संदेह नहीं रह गया था। अगर फोडा शुरूआती दौर में हो तो , यह दवा उसे दबा देती है और यदि फोडा पक चुका हो , तो यह दवा उसके मवाद को बहा देती है , यानि फोडा किसी भी हालत में हो , उसका मुंह हो या नहीं , इसका उपयोग किया जा सकता है। बाद में घाव भी इसी दवा से ठीक हो जाता है , इसलिए मैने उसके पति से एक दिन का समय मांगा और बहन को उसी दवा के प्रयोग की सलाह दी। और मेरी आशा के अनुरूप ही रात में उसकी खनकती हुई आवाज कानों में पडी। फोडा बह चुका था , पाठक कभी भी बहुत कम कीमत की इस दवा की परीक्षा ले सकते हैं। एलोपैथी की कडी दवाओं या आपरेशन से बचने के लिए इस प्रकार के बहुत उपाय आयुर्वेद में हैं , जिनके बारे में या तो लोगों को जानकारी नहीं है या फिर वे विश्‍वास नहीं कर पाते।

कई बार छोटे बच्‍चों के कब्‍ज को लेकर अभिभावक की पारेशानी को देखकर डाक्‍टर लगातार एलोपैथी की दवा चलाते हैं । मैने ऐसे कई बच्‍चों को छोटी हर्रे घिसकर पिलाने की सलाह दी है और उससे बच्‍चों को फिर एलोपैथी की दवा की जरूरत नहीं रह गयी है। तुलसी , अदरक का रस और मधु को साथ मिलाकर बच्‍चों को पिलाने से सर्दी ठीक हो जाती है , बडे भी इसका काढा पीकर सर्दी ठीक कर सकते हैं। बडे पत्‍ते वाली तुलसी , जो कि घर में नहीं लगायी जाती , वह कुछ बीमारियों में बहुत कारगर होती है। मेरी एक भांजी के पैर में घुटने के नीचे कुछ दाने हो गए , कभी कभी नोचने भी लगे , देखते ही देखते बढने भी लगे। हमने एलोपैथी के चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया , उसकी कई दवाएं चली , पर कम अधिक होता रहा , जड से नहीं मिटा। हारकर हमने होम्‍योपैथी के डाक्‍टर से दिखाया। पहले सप्‍ताह की दवा से उसने बीमारी बढने की उम्‍मीद की , वह सही रहा , पर दूसरे सप्‍ताह से बीमारी में जो कमी होनी चाहिए थी , वह नहीं हुई और पहले से बडी समस्‍या देखकर हमलोग और घबडा गए। कुछ दिन बाद हमारे गांव से एक व्‍यक्ति आए , उन्‍होने देखा और अपनी दवाई सुझा दी , और उनकी दवाई से पूरा इन्‍फेक्‍शन समाप्‍त । दवाई का नाम सुनेंगे , तो आप चौंक ही जाएंगे , दवा थी , गाय के ताजे दूध का फेन। एक महीने में बीमारी समाप्‍त हो गयी। बचपन से बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ रहे मेरे बडे बेटे को 12 वर्ष की उम्र के बाद सालोभर सर्दी खांसी रहने लगी , पांच छह वर्षों तक एलोपैथी की दवा चलाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ , डाक्‍टर कहा करते थे कि ध्‍यान दें , इसे किस चीज से एलर्जी है , उससे दूर रखें , पर इतने दिनों तक हमें कुछ भी समझ में न आया , जितनी सावधानी बरतते , सर्दी खांसी उतनी ही अधिक परेशान करती थी। अंत में हारकर हमलोगों ने होम्‍योपैथी की दवा चलायी , और छह महीने में एलर्जी जड से दूर। हर वक्‍त टोपी , मफलर , मोजे में अपने को पैक रखने वाले और हर ठंडा खाना से वंचित रहनेवाले उसी बेटे को आज कहीं भी किसी परहेज की जरूरत नहीं होती है। ऐसी अन्‍य बहुत सारी घटनाएं हैं , जिसके कारण एलोपैथी से इतर पद्धतियों पर भी मेरा भरोसा बना हुआ है।

एलोपैथी के साइड इफेक्‍ट के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली बहुत सी सारी शारीरिक समस्‍याओं के बावजूद भी इलाज की सर्वोत्‍तम पद्धति के रूप में अभी एलोपैथी का नाम ही लिया जा सकता है । एलोपैथी की सफलता को देखते हुए मै भी इसे स्‍वीकारती हूं , वैसे इसका सबसे बडा कारण इस मद में किया जानेवाला खर्च है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । पर छोटी छोटी बीमारियों के लिए ही सही , जहां पर हमारी ये देशी दवाएं कारगर है , वहां एलोपैथी का प्रयोग किया जाना क्‍या उचित है ? लोग ये जानते हैं कि सरदर्द हो , तो दर्दनिवारक गोली लेनी है , पर ये क्‍यूं नहीं जानते कि फोडा होने पर ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ का प्रयोग करना है। ताज्‍जुब की बात है कि यहां की इतनी सटीक देशी दवाइयों की जानकारी यहीं के ही लोगों को मालूम नहीं है। शिक्षा का मतलब अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और ज्ञान को भूल जाना नहीं होता , पर आजतक ऐसा ही होता आया है , जो हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दोषपूर्ण तो ठहरा ही देता है। युग बदलने के साथ ही साथ हर पद्धति का विकास किया जाना अधिक आवश्‍यक है , जब तक हर क्षेत्र का समानुपातिक विकास न हो , एक क्षेत्र की अंधी दौड में हमें शामिल नहीं होना चाहिए।

20 टिप्‍पणियां:

Murari Pareek ने कहा…

बहुत सही कहा है संगीता जी, मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ मैं क्या मेरे पिताजी भी सहमत हैं ,हम दोनों ही बहुत कम एलोपथिक दवाई लेते हैं |

Mahesh Sinha ने कहा…

दरअसल अपने देश में इस तरह का ज्ञान इतना बिखरा पड़ा है कि हर किसी के पास कुछ न कुछ नुसखा मिल जायेगा . इसका कोई विश्वसनीय संकलन नहीं है न ही इस पर कोई शोध होता है . विडम्बना तो यह है कि विभिन्न चिकित्सा पद्धति में शिक्षित व्यक्ति भी एलॉपथी का उपयोग करते हैं . नानी दादी के नुस्खे के नाम से एक ब्लॉग या वेब साईट बनाया जा सकता है , अख़बारों में भी आजकल इस तरह के नुस्खे छपते रहते हैं . लेकिन कोई सर्वमान्य विस्तृत व्यवस्था नहीं विकसित हो पाई है

शंकर फुलारा ने कहा…

sach kaha aapne ye dadi nani ke nuskhe ham bachpan se baratte aa rahe hain.

रंजना ने कहा…

वाह !! बड़ी ही उपयोगी जानकारी दी आपने.....

सही कहा है आपने...आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.....

सर्जरी या कतिपय गंभीर बिमारियों के लिए एलोपैथ ठीक है,नहीं तो एलोपैथ में ऐसी कोई दावा नहीं जिसका नकारात्मक साइड इफेक्ट न हो...

mehek ने कहा…

bahut hi upayogi jankari rahi,aabhar

Abhishek Mishra ने कहा…

Vakai vaikalpik chikitsa paddhati par bhi gambhirtapurvak dhyan dene ki jarurat hai.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

अगर हालात आपरेसन की न हो तो एलोपैथी से दूरी ही भली लगती है.

शरद कोकास ने कहा…

हर पैथी का अपनी जगह महत्व है

Manish Kumar ने कहा…

ये मौसम ही सर्दी खाँसी बुखार वाला है। ऍसे समय में आपका ये लेख काफी उपयोगी रहा। फोड़े वाली दवा भी अब याद रहेगी।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

बहुत से मामलों में देसी इलाज सबसे कारगर सिद्ध होता है, एलोपैथी का कट्टर समर्थक होने के बाद भी मैं इस बात को मानता हूँ क्योंकि मूलतः प्रत्येक चिकित्सकीय पदार्थ आण्विक स्तर पर क्रिया करके रोगों के लक्षणों या रोग उत्पन्न करने वाले कारकों का शमन करता है.

एलोपैथी में अरबों डौलर का शोध होता है. अधिकांश एलोपैथी दवाओं के कार्य करने की प्रक्रिया के बारे में विज्ञानसम्मत जानकारी है. हम जानते हैं की तुलसी से गले को रहत मिलती है और हरड से पेट की तकलीफें कम हो जाती हैं लेकिन ऐसा क्यों होता है इसपर शोध नहीं किया जाता. इसीलिए एलोपैथी के कट्टर समर्थक इसे प्रमाणिक पद्धति मानने से इनकार कर देते हैं.

बी एस पाबला ने कहा…

महेश सिन्हा जी का सुझाव बढ़िया है। मेरा ख्याल है कि एक ब्लॉग मैंने देखा ह कहीं, अब याद नहीं आ रहा :-)
इस दिशा में पंकज अवधिया जी के लेख भी मुझे बहुत भाते हैं

विवेक सिंह ने कहा…

यह तो संग्रहणीय पोस्ट हो गई !

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

संगीता जी आपके विचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ | अच्छी जानकारी दी है आपने , इसके लिए धन्यवाद | मेरे भी परिवार मैं एक-दो ऐसे वाकये हुए हैं जिसका जिक्र बाद मैं करूंगा |

अपने देश मैं ही योग की विद्या विलुप्त हो रही थी, ज्यादातर लोग योग को समय की बर्बादी मानते थे | फिर कम से कम दो महान सक्स अयंगार और बाबा रामदेव ने योग विद्या को सम्मान दिलाया | और आज योग विद्या पुरे विश्व मैं मान्य है |

आयुर्वेद और अन्य भारतीय विद्या को लीजिये, हमारे शास्त्रों मैं जो लिखा है उसे आज ठीक से पढ़ कर समझने वालों की कमी है | पहले गुरु-शिष्य परंपरा से ये ज्ञान एक पीढी से दूसरी पीढी तक आती थी | १००० वर्षों की गुलामी, अंग्रेजी शिक्षा पद्धति और आज के बाजारवाद ने गुरु-शिष्य परंपरा को तोड़ दिया है | आज प्रतिभावान लोग भारतीय विद्या से जुड़ते ही नहीं तो इसमें झोला छाप लोग आ गए हैं | और इस से लोगों को लगता है की भारतीय विद्या बेकार है | रही सही कसर भारतीय संस्कृति विरोधी मीडिया ने कर दी |

vinay ने कहा…

log aaj kal ayurvedic chiktsa ko bhultey ja rhaey hai,is chiktsa ka prachar avashyak hai, jo ho nahi ho rha,kuch nuskhey apney batay hai,gyanvardhak hain.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

संगीता जी आपने सही लिखा ..सहमत हूँ आपसे ..आयुर्वेद पर एक ब्लाग बहुत अच्छा लगा है मुझे

http://merasamast.blogspot.com/

अर्कजेश *Arkjesh* ने कहा…

आपकी बात सही है, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अपना महत्व है | कभी कभी ये ऐलोपथिक से ज्यादा असरकारक होती हैं |

ऐलोपथिक से असर ना होने पर इन्हें एक बार जरूर आजमाना चाहिए |
धन्यवाद !

Nirmla Kapila ने कहा…

संगीता जी आपकी आपकी पोस्ट तो कमाल है मै तो हमेशा आयुर्वेद की दवाओं का प्रयोग करती हूँ मेरे पिता जे इस शहर के और आसपास के लगभग 20-25 गाँओम के माने हुये हकीम थे उनके बहुत से नुस्खे अभी भछम लोग प्रयोग मे लाते हैं उन्की मौत के बाद मैं बहुत बीमार हुई तो अपोलो डी एम सी आदि मे कई बार दाखिल रही लेकिन 8--10 सल तक बहुत कश्ट पाया तो अपनी मा के कहने पर उन से ही देसी दवा ली और दो माह मे ठीक हो गयी मैं तो बच्चों को भी यही दवायें देती हूँ बहुत बडिया जानकारी है आपकी बधाई

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

बहुत अच्छा बताया जी! वैसे सेल्फमेडीकेशन करते भय लगता है।
पर कुछ प्रयोग तो होने ही चाहियें अपने साथ।

Mahesh Sinha ने कहा…

दरअसल एलॉपथी का उपयोग अन्य से अंतर केवल आपात चिकित्सा और शल्य विज्ञानं के रूप में ही सफल है . पुराणी बीमारियों में ये सिर्फ नियंत्रण रख सकता है जड़ से दूर करने की इसमें व्यवस्था बहुत कम है .

Science Bloggers Association ने कहा…

हॉं, पर मुझे लगता है कि सर्वाइवल आफ द फिटेस्‍ट का सिद्धांत हरजगह लागू होता है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }