मंगलवार, 4 अगस्त 2009

विवाह के लिए जन्‍म कुंडली मिलाना आवश्यक नहीं

आए दिन हमारी भेंट ऐसे अभिभावकों से होती है, जो अपने बेटे या बेटी के विवाह न हो पाने से बहुत परेशान हैं। उनकी विवाह योग्य संतानें पढ़ी-लिखी है ,पर पॉच-सात वर्ष से उपयुक्त वर या वधू की तलाश कर रहें हैं ,कहीं भी सफलता हाथ नहीं आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण किसी संतान का मंगली होना है और मंगली पार्टनर न होने से वे कई जगह बात बढ़ा भी नहीं पाते। अगर पार्टनर मंगली मिल भी जाए तो कई जगहों पर लड़के-लड़कियों के गुण न मिल पाने से भी समस्या बनी ही रह जाती है। ये समस्या समाज में बहुतायत में है और सिर्फ कन्या के ही अभिभावक नहीं , वर के अभिभावक भी ऐसी समस्याओं से समान रुप से जूझ रहे हैं । लड़का-लड़की या परिवार के पूर्ण रुप से जंचने के बावजूद भी मंगला-मंगली और गुण-मिलान के चक्कर में संबंध जोड़ना संभव नहीं हो पाता है।

पुराने युग में शादी-विवाह एक गुड्डे या गुड़िया की खेल की तरह था। सिर्फ पारिवारिक पृश्ठभूमि का ध्यान रखते हुए किसी भी लड़की का हाथ किसी भी लड़के को सौंप दिया जाता था । कम उम्र में शादी होने के कारण लड़के-लड़कियों कें व्यक्तित्व ,आचरण या व्यवहार का कोई महत्व नहीं था। इस कारण बड़े होने के बाद कभी-कभी लड़के-लड़कियों के विचारों में टकराव होने की संभावना बनी रहती थी । इसी कारण अभिभावक शादी करने से पूर्व ज्योतिषियों से सलाह लेना आवश्यक समझने लगें और इस तरह कुंडली मिलाने की प्रथा की शुरुआत हुई। कुंडली मिलाने के अवैज्ञानिक तरीके के कारण समाज में वैवाहिक मतभेदों में कोई कमी नहीं आई ,साथ ही दुर्घटनाओं के कारण भी जातक के वैवाहिक सुख में बाधाएं उपस्थित होती ही रहीं , लेकिन फिर भी कुंडली मिलाना वर्तमान युग में भी एक आवश्यक कार्य समझा जाता है यद्यपि कुंडली मिलाना आज किसी समस्या का समाधान न होकर स्वयं एक समस्या बन गया है।

ज्योतिष की पुस्तकों के अनुसार किसी भी लड़के या लड़की की जन्मकुंडली में लग्न भाव , व्यय भाव , चतुर्थ भाव , सप्तम भाव या अश्टम भाव में मंगल स्थित हो तो उन्हें मांगलीक कहा जाता है। परंपरागत ज्योतिष में ऐसे मंगल का प्रभाव बहुत ही खराब माना जाता है। यदि पति मंगला हो तो पत्नी का नाश तथा पत्नी मंगल हो तो पति का नाश होता है । संभावनावाद की दृष्टि से इस बात में कोई वैज्ञानिकता नहीं है। किसी कुंडली में बारह भाव होते हैं और पॉच भाव में मंगल की स्थिति को अनिष्‍टकर बताया गया है। इस तरह समूह का 5/12 भाग यानि लगभग 41 प्रतिशत लोग मांगलिक होते है ,लेकिन अगर समाज में ऐसे लोगों पर ध्यान दिया जाए जिनके पति या पत्नियां मर गयी हों ,तो हम पाएंगे कि उनकी संख्या हजारों में भी एक नहीं है।

मंगला-मंगली के अतिरिक्त ज्योतिष की पुस्तकों में कुंडली मिलाने के लिए एक कुंडली मेलापक सारणी का उपयोग किया जाता है। इस सारणी से केवल चंद्रमा के नक्षत्र-चरण के आधार पर लड़के और लड़कियों के मिलनेवाले गुण को निकाला जाता है। यह विधि भी पूर्णतया अवैज्ञानिक है। किसी भी लड़के या लड़की के स्वभाव , व्यक्तित्व और भविष्‍य का निर्धारण सिर्फ चंद्रमा ही नहीं ,वरन् अन्य सभी ग्रह भी करतें हैं । इसलिए दो जन्मकुंडलियों के कुंडली-मेलापक द्वारा गुण निकालने की प्रथा बिल्‍कुल गलत है।

इस संबंध में एक उदाहरण का उल्लेख किया जा सकता है। मेरे पिताजी के एक ब्राह्मण मित्र ने , जो स्वयं ज्योतिषी हैं और जिनका जन्म पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में हुआ था , पुष्‍य नक्षत्र में स्थित चंद्रमावाली लड़की को ही अपनी जीवनसंगिनी बनाया , क्योंकि ऐसा करने से कुंडली मेलापक तालिका के अनुसार उन्हें सर्वाधिक 35 अंक प्राप्त हो रहे थें । इतना करने के बावजूद उन्हें अपनी पत्नी से एक दिन भी नहीं बनी । किसी कारणवश वे तलाक तो नहीं ले पाए परंतु उनका मतभेद इतना गहरा बना रहा कि एक ही घर में रहते हुए भी आपस में बातचीत भीं बंद रहा। इसका अर्थ यह नहीं कि ज्‍योतिष विज्ञान ही झूठा है , ग्रहों का प्रभाव मनुष्‍य पर नहीं पड़ता है।दरअसल मेरे पिताजी के उस मित्र की कुंडली में स्‍त्री पक्ष या घर-गृहस्थी के सुख में कुछ कमी थी ,इसलिए विवाह के बावजूद उन्हें सुख नहीं प्राप्त हो सका।

एक सज्जन अपनी पुत्री की तुला लग्‍न की कुंडली लेकर मेरे पास आएं। सप्तम भावाधिपति मंगल अतिवक्र होकर अष्‍टमभाव में स्थित था , ऐसी स्थिति में लड़की पूरी युवावस्था यानि 24 वर्ष से 48 वर्ष तक पति के सुख में कमी और घर-गृहस्‍थी में बाधा महसूस कर सकती थी , यह सोंचकर मैने उस लड़की को नौकरी कर अपने पैरों पर खड़े होने की सलाह दी ,लेकिन अभिभावक तो लड़की की शादी करके ही निश्चिंत होना चाहते हैं ,उन्होनें दूसरे ज्योतिषी से संपर्क किया , जिसने अच्छी तरह कुंडली मिलवाकर अच्‍छे मुहूर्त में उसका विवाह करवा दिया। मात्र दो वर्ष के बाद ही एक एक्सीडेंट में उसके पति की मृत्यु हो गयी और वह लड़की अभी विधवा का जीवन व्यतीत कर रही हैं। मेरे पिताजी एक ज्योतिषी हैं पर उन्होने अपने सारे बच्चों की शादी में कुंडली मेलापक की कोई चर्चा नहीं की । क्या कोई पंडित 10 पुरुष और 10 स्त्रियो की कुंडली में से वर और कन्या की कुंडली को अलग कर सकता है , यदि नही तो वह किसी जोड़े को बनने से भी नहीं रोक सकता।

आज घर-धर में कम्प्यूटर और इंटरनेट के होने से मंगला-मंगली और कुंडली मेलापक की सुविधा घर-बैठे मिल जाने से यह और बड़ी समस्या बन गयी है। किन्ही भी दो बायोडाटा को डालकर उनका मैच देखना काफी आसान हो गया है , पर इसके चक्कर में अच्छे-अच्छे रिश्ते हाथ से निकलते देखे जाते हैं । उन दो बायोडाटा को डालकर देखने से ,जिनकी बिना कुंडली मिलाए शादी हुई है और जिनकी काफी अच्छी निभ रही है या जिनकी कुंडली मिलाकर शादी हुई है और जिनकी नहीं निभ रही है , कम्प्यूटर और उसमें डाले गए इस प्रोग्राम की पोल खोली जा सकती है। एक ज्योतिषी होने के नाते मेरा कर्तब्य है कि मै अभिभावकों को उचित राय दूं। मेरा उनसे अनुरोध हे कि वे पुरानी मान्यताओं पर ध्यान दिए बिना , कुंडली मेलापक की चर्चा किए बिना , अपने बच्चों का विवाह उपयुक्त पार्टनर ढूंढ़कर करें । किसी मंगला और मंगली की शादी भी सामान्य वर या कन्या से निश्चिंत होकर की जा सकती है।

25 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

एक दम सही बात कही है आपने,

पूर्वजो द्बारा बनाई कुछ बाते है जिनका मै समर्थन करता हूँ और करना चाहिए, मगर लडकी , लड़के के जी सिर्फ २२ गुण मिलते है, इस लिए शादी नहीं हो सकती है, यह सब बकवास है !

लेकिन क्या हमारा समाज इस कुरीति से जल्दी उभर पायेगा, मुझे तो नहीं लगता

Science Bloggers Association ने कहा…

Pahlee baar ye suna hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

M VERMA ने कहा…

अच्छा विश्लेषण -- तार्किक दृष्टिकोण

vinay ने कहा…

yeh to apney ek shodh ka vishay prastut kar diya,ek dam molllik

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप की बात सोलह आने सही है।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बात तो आपने सही कही है आज कल हम इसी समस्या में उलझे हुए हैं ..हम न माने पर सामने वाले गुण मिलाये बिना बात नहीं करना चाहते हैं ..तो क्या किया जा सकता है ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बहुत ही अच्छी बात बताई आपने.

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र ने कहा…

तार्किक दृष्टिकोण...

संगीता-जीवन सफ़र ने कहा…

आपने अच्छा विश्लेषण किया है!

Vivek Rastogi ने कहा…

मेरा मत में तो कुँडली मिलानी चाहिये मांगलिक के लिये नहीं बल्कि दांपत्य जीवन सुखी होगा या नहीं इसके लिये।

बी एस पाबला ने कहा…

विश्लेषण बढ़िया रहा

बेरोजगार ने कहा…

aap ki baat ham kyon mane?kya aap khuda ho?ya koi prakand jyotish?

Mahesh Sinha ने कहा…

आपने कई मुद्दे उठाये हैं . पहले तो आपने कुंडली मिलाने को पूरी तरह नकार दिया लागत है जबकि किसी व्यक्ति की कुंडली उस व्यक्ति का नाक्षत्रिक बायोडाटा होता है और जैसा कि कहा जाता है बिना कारण किसी को अपना हाथ या कुंडली नहीं दिखानी चाहिए . एक उदाहरण जो आपने पंडित जी का दिया है उसम ३६ गुण मिलता हैं . जबकि ये कहा जाता है कि २८ से ज्यादा गुण नहीं मिलने चाहिए . गुण मिलने की भी एक उपयुक्त रेंज है मेरी जानकारी के अनुसार २४ से २८ सबसे अच्छा माना जाता है . कुंडली से व्यक्ति के बारे में तो पता चलता है इसी तरह दो व्यक्तियों की कुंडली देखकर उनमे कैसा मित्रता या शत्रुता भावः होगा पट चलना चाहिए . प्रचिलित पद्धति हो सकता है दोषपूर्ण हो . आपका क्या विचार है इस बारे में ?
मंगल के प्रभाव के बारे में हो सकता है एक मिथ पंडितों के द्वारा बनाया गया हो सकता है क्योंकि इसी प्रकार कुंडली शनि राहू या केतु भी हो सकती है.
अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखा जाये तो आज खून की जाँच ज्यादा जरूरी है कई रोगों और वंशानुगत प्रभावों से बचने के लिए .
.

विवेक सिंह ने कहा…

हमारे गावँ में तो कुण्डली नाम की चीज एक दो लोग ही जानते होंगे.

हमारी शादी भी ऐसे ही हो गयी !

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बहुत बढ़िया आलेख ! हमें तो अपनी जन्म तिथि का भी सही ध्यान नहीं था फिर भी पंडित जी ने जुगाड़ कर कुंडली मिलादी ! बताओ इस तरह कुंडली मिलाना तो नहीं मिलाने के समान ही हुआ ना |

महफूज़ अली ने कहा…

jaankaari pradaan karane ke liye dhanyawaad.......

Popular India ने कहा…

Spasht aur sahi ray dene ke liye dhanyawaad.

mahesh

hem pandey ने कहा…

यदि कुंडली मिलान अवैज्ञानिक है तो ज्योतिष द्वारा घोषित अन्य आकलन को सच क्यों माना जाए ?

Nirmla Kapila ने कहा…

सुनिता जी बहुत बडिया आलेख है वैसे मेरे पति भी मंगलीक हैं और सिर्फ 18 गुम मिलते थे मगर हमारी शादी बहुत बडिया रही अपस के ताल मेल के लिये इस पर पन्दित जि का कहना था कि तुल लगन वलों पर मंगल का प्रभाव कम पडता है मेरी लगन तुला है वैसे पँडित कहाँ सही तरह से मिलान करते हैं इसी मे हम अच्छे रिश्ते खो देते हैं आभार्

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

aapne bahut hi sahi baat kahi hai .. aur yahi hona bhi chahiye ..


regards

vijay
please read my new poem " झील" on www.poemsofvijay.blogspot.com

sharmadx ने कहा…

vishwapradhan karamrachi rakha
jo jas karahi tas phal chakha
Seeta ke varan par konasi kundali mlayi gayi thi?
dropadti varan par konse melapak milaye gaye the?

Ritz ने कहा…

I am very thankful to you for sharing this excellent knowledge with us.

Jyadatar log nahi samjhte ki vastav main kundli milan ka kya arth hota hai aur kis had tak kundli milan ko mahtwa dena uchit hai.

Aap ke is bolg ki madad se main shayad apane aaspas ke kuchh logon ko ye baat samjha paungi.

Bahut bahut shanyawad

pardeepchawla ने कहा…

आपका लेख वास्‍तव में क्रांतिकारी है । लेकिन हमारे देश में क्रांति नहीं होती । क्रांति करने से डर लगता है । रिस्‍क लेने की आदत नहीं हम लोगों में । खैर एक शुरुआत तो हुई । आज नही तो कल लोग अवश्‍य ही सोचेंगें । साधुवाद ।


पंडित ललित मोहन कगडीयाल ने कहा…

इस क्षेत्र में आप काफी सीनियर हैं किन्तु फिर भी कुंडली मिलान को पूरी तरह नकार देने की आपकी बात से मैं सहमत नहीं हूँ.हाँ मात्र चंद्रमा आधारित एक नक्षत्र से कुंडलियों का मिलान तय कर देना,अधूरे रिसल्ट अवश्य देता है किन्तु यह १००%गलत नहीं कहा जा सकता.वास्तव में कुण्डलियाँ एक दूसरे की पूरक होनी चाहियें. जिस प्रकार दूध बहुत अच्छा पदार्थ है उसी प्रकार नीम्बू भी अपने क्षेत्र में शानदार रिसल्ट देता है.किन्तु ये दोनों अपने अपने हिसाब से अव्वल होने के बावजूद एक दूसरे के पूरक नहीं हो सकते.इसे ही ज्योतिषीय दृष्टि से कुंडली का न मिलना कहता हूँ.मैं जब भी स्वयं कुंडली मिलान करता हूँ तो गुणों के साथ साथ इस बात का बहुत अधिक ध्यान रखता हूँ की कुण्डलियाँ एक दूसरे की पूरक हों.अर्थात यदि एक कुंडली में संतान कष्ट हो तो दूसरी कुंडली में संतान सुख प्रबल हो.यदि किसी एक कुंडली में वाहन सुख न हो तो दूसरी कुंडली में यह सुख प्रचुर हो ताकि बैलेंस बना रहे.इसी प्रकार अन्य सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर कुंडली मिलान करता हूँ.जहाँ तक मंगल की बात समझ में आती है तो मंगल शरीर में रक्त का कारक ,रक्त से सम्बंधित बीमारियों का कारक, अपरोक्ष रूप से पुरुष में वीर्य,व स्त्री में गर्भ धारण करने की क्षमता के रूप में भी देखा जाता है.कुछ ख़ास भावों में (जहाँ मंगल को दोष कारक कहा जाता है)मंगल रक्त व व्यवहार सम्बन्धी कुछ विषमताओं को जन्म देने में सक्षम होता है.कुंडली मिलान में मांगलिक से मांगलिक का विवाह सम्बंधित समस्या को अधिक बढ़ा देगा,ऐसा मेरा मानना है.व्यक्तिगत रूप से मैं कभी मांगलिक का विवाह मांगलिक से करने की सालाह नहीं देता.अपितु मंगल से विपरीत प्रभाव रखने वाले ग्रहों व कुंडली में शुभ प्रभाव रखने वाले ग्रहों की उपस्थिति सम्बंधित भाव में आवश्यक मानता हूँ ताकि कुंडलियों में बैलेंस बना रहे.मांगलिक से मांगलिक का विवाह समस्या का निवारण नहीं करता अपितु उसे बढ़ा देता है.
सूत्रों को समझने में भूल जरूर हो रही है किन्तु सूत्र गलत नहीं हैं.आवश्यकता इनका सही अर्थ लागने की है,मैं सदा से कहता हूँ की एक ज्योतिषी गलत हो सकता है .लाखों ज्योतिषी गलत हो सकते है किन्तु शाश्त्र गलत नहीं हो सकता.ये तो देवताओं का लिखा हुआ है.(अपना अपना विश्वास है.) आपके लेखों से कई नयी दिशाओं में सोचने का अवसर पाठक प्राप्त करते हैं. आपकी कीमती रायों के लिए धन्यवाद.

हेमन्त कुमार ने कहा…

होईहैं वही जो राम रचि राखा।जब हम थक जाते हैं तो इसी लाईन के की शरण मे जाते हैं।इंसान जब अपने सामर्थ्य से निरुत्तरित हो जाने की बजाय आरंभ मे ही ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करे।