रविवार, 23 अगस्त 2009

समाज से अंधविश्‍वास को समाप्‍त कर पाना क्‍या इतना आसान है ??

मैं दस बारह वर्ष पूर्व की एक सच्‍ची और महत्‍वपूर्ण घटना का उल्‍लेख करने जा रही हूं। बोकारो रांची मुख्‍य सडक के लगभग मध्‍य में एक छोटा सा गांव है , जिसमें एक गरीब परिवार रहा करता था। उस परिवार में दो बेटे थे , बडे बेटे ने गांव के रोगियों के उपचार में प्रयोग आनेवाली कुछ जडी बूटियों की दुकान खोल ली थी। बचपन से ही छोटे बेटे के आंखों के दोनो पलक सटे होने के कारण वह दुनिया नहीं देख पा रहा था। गरीबी की वजह से इनलोगों ने उसे डाक्‍टर को भी नहीं दिखाया था और उसे अंधा ही मान लिया था। पर वह अंधा नहीं था , इसका प्रमाण उन्‍हें तब मिला , जब 16-17 वर्ष की उम्र में किशोरावस्‍था में शरीर में अचानक होनेवाले परिवर्तन से उसकी दोनो पलकें हट गयी और आंखे खुल जाने से एक दिन में ही वह कुछ कुछ देख पाने में समर्थ हुआ। उसके शरीर में अचानक हुए इस परिवर्तन को देखकर परिवार वालों ने इसका फायदा उठाने के लिए रात में एक तरकीब सोंचा। खासकर बडे बेटे ने अपनी जडीबूटियों की दुकान को जमकर चलाने के लिए यह नाटक किया। सुबह होते ही छोटा बेटा पूर्ववत् ही लाठी लिए टटोलते टटोलते गांव के पोखर में पहुंचा और थोडी देर बाद ही हल्‍ला मचाया कि उसकी आंखे वापस आ गयी है । पूरे गांव की भीड वहां जमा हो गया और पाया कि वह वास्‍तव में सबकुछ देख पा रहा है। जब लोगों ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि अभी अभी एक बाबा उधर से गुजर रहे थे , उन्‍होने ही उसपर कृपा की है । उन्‍होने कहा है कि न सिर्फ तुम्‍हारी आंख ठीक हो जाएगी, तुम अब जिनलोगों को आशीर्वाद दे दोगे , वे भी ठीक हो जाएंगे।

पूरा गांव आश्‍चर्य चकित था , इस चमत्‍कार भरे देश में ऐसा चमत्‍कार होते उन्‍होने सुना तो जरूर ही होगा , पर देखने का मौका पहली बार मिला था। पूरे गांव के लंगडे , लूले , अंधे, काने , पागल बच्‍चों को ले लेकर अभिभावक आने लगें, बडे भाई की जडी बूटी जमकर बिकने लगी। परिवार वाले तो इतने में ही खुश थे , पर ईश्‍वर को तो इन्‍हें छप्‍पर फाडकर देना था। यह खबर आग की तरह फैली और दूर दूर से लोग अपने अपने परिवार के लाचारों को लेकर आने लगे। उसके दुकान की जडी बूटी कम पडने लगी , फिर नीम वगैरह की सूखी डालियों का उपयोग किया जाने लगा , पर भीड थी कि बढती जा रही थी । मौके की नजाकत को समझते हुए बडे बडे बरतनों में नीम की पत्तियों उबाली जाने लगी , उस जल को बोतल में भरकर बेचने के लिए गांव भर के बोतलों को जमा किया गया । समाचार पत्रों में इस बात की खबर लगातार प्रकाशित होने लगी , शीघ्र ही भीड को नियंत्रित करने के लिए पुलिस तक की व्‍यवस्‍था करनी पडी । एक डेढ महीने के अंदर उस बच्‍चे की महिमा इतनी फैल चुकी थी कि कि पुलिस की मार से बचने के लिए लोग दूर से ही गांव में रूपए पैसे फेक फेककर वापस चले जाते थे। जिस गांव में आजतक एक गाडी नहीं गुजरती थी , उस गांव में बडी बडी गाडियां आकर खडी हो गयी। इधर आसपास की बातों को तो छोड ही दिया जाए , कलकत्‍ता जैसे दूरस्‍थ स्‍थानों से भी बहुत बडे बडे व्‍यवसायी और सरकारी अधिकारी तक इस ‘महात्‍मा’ का दर्शन करने को आ पहुंचे। इतने दिनों तक उस परिवार के अतिरिक्‍त गांव के अन्‍य लोगों ने भी कुछ न कुछ व्‍यवसाय कर पैसे कमाए। लेकिन बाद में रोगियों की स्थिति में कोई सुधार न होने से उसकी पोल खुली और जनता ने उसके नाटक को समझा , तबतक उनलोग लाखों बना चुके थे।

इसी प्रकार गया में चार हाथोंवाले बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उनके मातापिता दो ही दिनों में भक्‍तों के द्वारा मिलनेवाले चढावे से ही लखपति हो गए। 48 घंटे तक ही जीवित रहे इस बच्‍चे को लोगों ने भगवान विष्‍णु का अवतार माना। भारत में अंधविश्‍वास इस हद तक फैला है कि यहां असामान्‍य बच्‍चों को जन्‍म देनेवाले मांबाप उस बच्‍चे का इलाज भी नहीं करवाना चाहते । एक माता पिता के सामने डाक्‍टर मिन्‍नते करते रह गए और उन्‍होने बच्‍चे को सामान्‍य बनाने के लिए डाक्‍टरों को कोशिश ही नहीं करने दी। जनता के अंधविश्‍वासों का ये लोग पूरा फायदा उठाते हैं। जब आज के पढे लिखे युग में इस प्रकार की घटनाएं भारतवर्ष में आम हैं , तो पुराने युग के बारे में क्‍या कहा जा सकता है। समाज से इस तरह के अंधविश्‍वासों को दूर करने के लिए बहुत सारे लोग और संस्‍थाएं कार्यरत हैं , पर सवाल है कि जनता के अंधविश्‍वास को समाप्‍त किया जा सकता है ?

यह दुनिया विविधताओं से भरी है। यहां फूल हैं तो कांटे भी , प्रेम है तो घृणा भी , मीठास है तो कडुवाहट भी , गर्मी है तो सर्दी भी , आग है तो पानी भी और किसी का भी खात्‍मा कर पाना असंभव है। कभी कभी कोशिश का और उल्‍टा परिणाम निकलता है। हमने फूलों के सुगंध को भी महसूस की और कांटे को भी बाड लगाने में प्रयुक्‍त किया। फल के मीठास को भी महसूस किया और कडुवाहट को भी बीमारी ठीक करने मं उपयोग में लाने की कोशिश की। मैं हर वक्‍त अपने ऋषि मुनियों के दूरदर्शिता की दाद देती हूं , उन्‍हें ये मालूम था कि आम जनता से यह अंधविश्‍वास दूर नहीं कर सकते । इसलिए जनता के इसी अंधविश्‍वास का सहारा लेकर उन्‍हें जीवन जीने का एक ढंग बनाया। स्‍वर्ग और नरक के बहाने बनाकर जनता को अच्‍छे कामों की ओर प्रवृत्‍त करने की कोशिश की। चेचक के होने पर रोगी के लिए जो आवश्‍यक सावधानी बरतनी थी , उसे धर्म का नाम देकर करवाया। भले ही हम इस कोण से न सोंच पाएं , पर किसी मरीज के मनोवैज्ञानिक चिकित्‍सा के लिए झाड फूंक कीवैज्ञानिक पद्धतिका ही उन्‍होने सहारा लिया था । बरसात के तुरंत बाद साफ सफाई के लिए कई त्‍यौहारकी परंपरा शुरू की गई। उनके द्वारा सभ्‍य जीवन जीने के लिए आवश्‍यक सभी जरूरतों की पूर्ति के लिए सामाजिक नियम बनाए गए। 'बट', 'पीपल' जैसे महत्‍वपूर्ण पेडों को भी सुरक्षित रखने के लिए इन्‍हें धर्म से जोड दिया गया। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण जैसे सुंदर प्राकृतिक नजारे को दिखाने के लिए उन्‍हें गांव के किनारे नदियों या तालाबों में ले जाया जाता रहा । ग्रहण के तुरंत बाद उतनी एकत्रित भीडों तक के अंधविश्‍वास का उन्‍होने भरपूर उपयोग किया। उनके द्वारा नदियों , तालाबों की गहराइयों में जाकर एक एक मुट्ठी मिटृटी निकलवाकर नदियों तालाबों की गहराई को बढाया जाता रहा । प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर जगहों में एक सुंदर मंदिर का निर्माण कर जनता को तीर्थ के बहाने उन सुंदर नजारों का अवलोकण कराया गया। प्राचीन ज्ञान में क्‍या सही है और क्‍या गलत , इसपर लाख विवाद हो जाए , मैं बहुत बातों को यदि अंधविश्‍वास मान भी लूं । फिर भी यदि धर्म के नाम पर स्‍वार्थ से दूर होकर सर्वजनहिताय जनता के अंधविश्‍वास का कोई उपयोग ही किया गया , तो उसमें मैं कोई बुराई नहीं समझती। पर आज चूंकि हर क्षेत्र स्‍वार्थमय है , लोगों के अंधविश्‍वास का उपयोग स्‍वार्थ के लिए किया जा रहा है , इसलिए यह चिंताजनक तो है ही।

24 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

आपने बिलकुल सही कहा आज दुनिया लालची हो गयी है अपने लालच के लिये रिशियों मुनियों के ग्यान का ढोंग रचा कर एक तो लोगों को लूट रहे हैं दूसरा इस विद्द्या को भी बदनाम कर रहे हैं जो आज साँईस देख रही है वो उन रिशी मुनियों ने पूर्व मे ही देख रखा था बहुत सुन्दर पोस्ट बधाई(

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

aap ne theek likha hai, lekin ab to tv wale bhi taabeej bechne lage hain paison ke liye.

Mithilesh dubey ने कहा…

बिल्कुल सही कहना है आपका। अंध विश्वास को मिटाना इतना आसान नही है।

cmpershad ने कहा…

चमत्कार, विश्वास, अंधविश्वास, आस्था.....चाहे जो भी नाम दें पर लोग उस विश्वास की डोर को पकड़ कर जीते हैं। आपको पता होगा कि हैदराबाद में जून के माह में मिरग [७-८ को पड़ता है] के दिन अस्थमा की दवा के लिए हज़ारों लोग जमा होते है। यह दवाई मछली के मुंह में रख कर दी जाती है। शाकहारी के लिए हींग का प्रयोग किया जाता है। इस दवा की ख्याति इतनी हुई कि अब एक छोटे से मुहल्ले [दूधबावली] से निकल कर एक बडे़ मैदान[नुमाइश मैदान] में बडे़ ताम झाम से दी जाती है। मंत्री से लेकर संत्री तक सभी व्यस्त हो जाते है। कई सामाजिक संस्थाएं भी रोगियों के खान-पान का ध्यान रखते हैं।

अर्चना तिवारी ने कहा…

अंधविश्‍वास का उपयोग स्‍वार्थ के लिए किया जा रहा है... सच कहा आपने

AlbelaKhatri.com ने कहा…

श्री गणेशाय नमः

सार्थक लेख के लिए बधाई !

Abhishek Mishra ने कहा…

वाकई आम जनता जो विज्ञान को पूर्णतः नहीं समझ सकती, धर्म के नाम पर सारी प्रक्रियाओं को अपना लेती है. बस यह आस्था विरूप होकर अन्धविश्वास न बन जाये. ऐसे विश्वासों को वैज्ञानिक तर्कों के भी अनुरूप होने चाहिए.

योगेश स्वप्न ने कहा…

ek dam sarthak lekh. badhai.

punah ganesh chaturthi par shubhkaamnayen, badhai.

Dr. Mahesh Sinha ने कहा…

असंभव है क्योंकि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं अन्धविश्वास / विश्वास जैसे दिन और रात, सुबह और शाम.

Udan Tashtari ने कहा…

पर आज चूंकि हर क्षेत्र स्‍वार्थमय है , लोगों के अंधविश्‍वास का उपयोग स्‍वार्थ के लिए किया जा रहा है , इसलिए यह चिंताजनक तो है ही-बिल्कुल सही कहा!

श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभ कामनाएं-
आपका शुभ हो, मंगल हो, कल्याण हो.

Anil Pusadkar ने कहा…

बाबा और साधूओं को नेताओ के दिये सर्टिफ़िकेट लेकर घूमते देखो तो और दिमाग खराब होता है।

शरद कोकास ने कहा…

ऋशि मुनियों के उद्देश्य तो निश्चित ही बहुजन हिताय थे लेकिन अब विकृतियाँ इतनी अधिक जुड़ गई हैं कि मनुष्य के स्वार्थ और् परमार्थ मे भेद करना ही मुश्किल हो गया है । जिन परम्पराओं की अब ज़रूरत नही है उन्हे भी अब छोड़ना होगा और कर्मकांड रहित धर्म का नये सिरे से आकलन करना होगा । ऐसी ही जानकारी देती रहे. मछली के साथ स्टेरोयेड दिये जाते है यह तो अब छप भी चुका है ।

हेमन्त कुमार ने कहा…

आपकी चिन्ता जायज है,सही कहा आपने।

Einstein ने कहा…

आपके विचार से सहमत हूँ .......पुराने समय में जो आवश्यक था बो किया गया और वो समयानुकूल सही था ...आज के ज़माने में जो जरुरी है बो तो हम लोग को करना होगा ....

कैटरीना ने कहा…

कोशिश तो करिए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को प्रगति पथ पर ले जाएं।

अजय कुमार झा ने कहा…

उस समाज...उस देश ..में तो बिल्कुल भी नहीं..जहां अभी..भी साक्छरता कम है...और ऐसी सभी समस्याओं के समाधान के लिये इनका पढना जरूरी है

नीरज जाट जी ने कहा…

BILKUL SAHI.

वीरेन्द्र जैन ने कहा…

आपके इस लेख के लिए आपको साधुवाद . कृपया इसी तरह पाखण्ड को उजागर कराती रहें तभी देश का कुछ कल्याण होगा

jamos jhalla ने कहा…

Vishvaash ka swaarth vash dohan ANDHVISHVAASH ko janam detaa hai ise door hi kiyaa jaanaa chaahhiye.Aapkaa prayaas sarahniye hai.saadhuvaad.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सोच समझ के अपनी बुद्धि से कार्य होने चाहिए .आपके लेख से सहमत ..बहुत सही लिखा है आपने संगीता जी आज इस तरह के सोच की जरुरत है

क्रिएटिव मंच ने कहा…

जब तक अशिक्षा और जागरूकता का अभाव रहेगा तब तक ऐसी कहानियां सुनने को मिलती रहेंगी
बढ़िया पोस्ट


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vinay ने कहा…

मै तो निर्मला जी से शत प्रतिशत सेहमत हू

Popular India ने कहा…

बहुत ही अच्छी व रोचक जानकारी दिए हैं. धन्यवाद.

महेश
http://popularindia.blogspot.com/

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

अंधविश्वास केवल भारत ही नहीं, दुनिया भर में हैं. इसकी वजह कुछ ख़ास नहीं, केवल अतार्किक सोच और लालच है. हर आदमी शॉर्टकट चाहता है. लोग शॉर्टकट की चाह छोड़ दें, अंधविश्वास ख़त्म हो जाएंगे.