सोमवार, 23 नवंबर 2009

ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 2 ??

कल आपने पढा .... ...........ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 1 ??  आज आगे पढिए ..............

जीव-जंतुओं के अतिरिक्त हमारे पूर्वजों ने पेड-पौधों का बारीकी से निरिक्षण किया। पेड़-पौधे की बनावट , उनके जीवनकाल और उसके विभिन्न अंगों की विशेषताओं का जैसे ही उसे अहसास हुआ, उन्होने जंगलो का उपयोग आरंभ किया। हर युग में वनस्पति-शास्त्र वनस्पति से जुड़े तथ्यो का खुलासा करता रहा ,जिसके अनुसार ही हमारे पूर्वजों ने उनका उपयोग करना सीखा। फल देनेवाले बड़े वृक्षों के लिए बगीचे लगाए जाने लगे। सब्जी देनेवाले पौधों को मौसम के अनुसार बारी-बारी से खाली जमीन पर लगाया जाने लगा। इमली जैसे खट्टे फलों का स्वाद बढ़ानेवाले व्यंजनों में इस्तेमाल होने लगा। मजबूत तने वाली लकड़ी फर्नीचर बनाने में उपयोगी रही। पुष्‍पों का प्रयोग इत्र बनाने में किया जाने लगा। कॉटेदार पौधें का उपयोग बाड़ लगाने में होने लगा। ईख के मीठे तनों से मीठास पायी जाने लगी। कडवे फलों का उपयोग बीमारी के इलाज में किया जाने लगा।

इसी तरह भूगर्भ में बिखरी धातुएं भी मानव की नजर से छुपी नहीं रहीं। प्रारंभ में लौह-अयस्क, ताम्र-अयस्क और सोने-चॉदी जैसे अयस्को को गलाकर शुद्ध रुप प्राप्त कर उनका उपयोग किया गया । भिन्‍न भिन्‍न धातुओं की प्रकृति के अनुरूप उनका उपयोग भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के गहने और बर्तनों को बनाने में किया गया। फिर क्रमश: कई धातुओं को मिलाकर या कृत्रिम धातुओं को बनाकर उनका उपयोग भी किया जाने लगा। भूगर्भ के रहस्यों का खुलासा करने के लिए वैज्ञानिकों के द्वारा कितने साधन भी बनाए जा चुके , ध्येय भूगर्भ के आंतरिक संरचना की पहचान करना है, उसमें किसी प्रकार के बदलाव की कल्पना भी वैज्ञानिकों द्वारा नहीं की जा सकती ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति में तरह-तरह के जीव-जंतु , पेड़-पौधे और खनिज-भंडार भरे पड़े हैं। गुण और स्वभाव की दृष्टि से देखा जाए , तो कुदरत की हर वस्तु का अलग-अलग महत्व है। बड़े फलदार वृक्ष दस-बीस वर्षों तक अच्छी तरह देखभाल करने के बाद ही फल देने लायक होते हैं। कुछ फलदार वृक्ष दो-तीन वर्षों में ही फल देना आरंभ कर देते हैं। सब्जियों के पौधे दो-चार माह में ही पूंजी और मेहनत दोनों को वापस लौटा देते हैं। फर्नीचर बनाने वाले पौधों में फल नहीं होता , इनकी लकड़ी ही काम लायक होती है। वर्षों बाद ही इन वृक्षों से लाभ हो पाता है। यदि हमें समुचित जानकारी नहीं हो और टमाटर के पौधों को चार-पॉच महीने बाद ही फल देते देखकर उपेक्षित दृष्टि से आम के पेड़ को देखें या आम के सुंदर पेड को देखकर बबूल को खरी-खोटी सुनाएं , तो यह हमारी भूल होगी।

आर्थिक दृष्टि से देखा जाए , तो कभी लोहे का महत्व अधिक होता है , तो कभी सोने का , कभी पेट्रोलियम का महत्व अधिक होता है , तो कभी अभ्रख का। कभी घोड़े-हाथी राजा-महाराजाओं द्वारा पाले जाते थे , जबकि आज घोडे हाथी दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और चुने हुए नस्लों के कुत्तों का प्रचलन अच्‍छे घरानों में है। कभी आम के पेड़ से अधिक पैसे मिलते थे , कभी शीशम से और आज टीक के पेड़ विशेष महत्व पा रहे हैं। युग की दृष्टि से किसी वस्तु का विशेष महत्व हो जाने से हम पाय: उसी वस्तु की आकांक्षा कर बैठते हैं , तो क्या अन्य वस्तुओं को लुप्त होने दिया जाए। आज टीक सर्वाधिक पैसे देनेवाला पेड़ बन गया है , तो क्या आम का महत्व कम है ? आखिर आम का स्वाद तो आम का पेड़ ही तो दे सकता है। वर्षों से उपेक्षित पड़े देश पेट्रोलियम के निर्यात करने के क्रम में आज भले ही विश्व के अमीर देशों में शामिल हो गए हों , पर अन्य वस्तुओं के लिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!





10 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी आप ने बहुत सुंदर लिखा हर चीज की अपना महत्व है, धन्यवाद

Nirmla Kapila ने कहा…

अपनी बात को समझाने का हुनर आप जानती हैं धन्यवाद्

Nirmla Kapila ने कहा…

आप अपनी बात सरल ढण्ग से कहने और समझाने का हुनर खूब जानती हैं धन्यवाद्

Nirmla Kapila ने कहा…

आप अपनी बात सरल ढण्ग से कहने और समझाने का हुनर खूब जानती हैं धन्यवाद्

etips-blog ने कहा…

बहुत बेहत्तर लिखा है आपने, धन्यबाद !

Einstein ने कहा…

बिलकुल सही कह रही हैं आप ...
इक सबाल मन में कौंधती है की नियत नियति के बाद भी हम एक अनिशिचित्ता के माहौल में जीने को क्यों मजबूर हैं...
किस ओर चल पड़े हैं हम...
रोटी जो रास्ता दिखा रही उस पर चल कर हममें से बहुत खुश नहीं ...
हाँ मै भी नहीं...
आखिर ये कैसा ग्रहों का संयोग है...
क्या इन ग्रहों के संयोग से बचने के कोई औजार नहीं...

लोकेन्द्र ने कहा…

हर चीज का अपना महत्व तो होता ही है साथ ही साथ समय भी इसकी महत्ता निर्धारित करती हैं...

Murari Pareek ने कहा…

बिलकुल वाजिब बात है हर चीज की अपनी अपनी खाशियत है ! आम का स्वाद लेने के लिए बबूल नहीं खाया जा सकता !! बबुल के गुण आम में नहीं पाए जा सकते !!!

vinay ने कहा…

अच्छा लेख,समय अनुसार प्रत्येक जड़,चेतन वस्तु का महत्ब घटता,बड़्ता रहता है ।

महावीर बी. सेमलानी ने कहा…

सगीताजी
आपने अच्छी जानकारी दी.


href="http://blogchurchaa.blogspot.com/">मुन्भाई ने आपको याद किया है! मुन्नाभाई को अपना कुण्ड्ली तपास करवाने का है.