शनिवार, 28 नवंबर 2009

ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 8 ??

एक सप्‍ताह से मैं अपनी अप्रकाशित पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक झरोखे से ज्‍योतिष' के एक लेख 'ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है' के हिस्‍से को प्रतिदिन पोस्‍ट करती जा रही थी। आपलोगों के द्वारा समय समय पर किए जानेवाले प्रश्‍न के जबाब में यह लेख लिखा गया था, पर आलोचना के भय से मैं इसे प्रकाशित करना नहीं चाहती थी। पर एक सप्‍ताह से पिताजी की बोकारो में उपस्थिति से मैं उनके साथ ज्‍योतिष से ही जुडे कई प्रकार के विमर्श में व्‍यस्‍त थी , नया कुछ न लिख पाने के कारण मैने इस पुराने आलेख को ही प्रतिदिन ठेलती गयी। आज वे रांची के लिए निकल चुके हैं , तो मैं यह सफाई देना चाहती हूं कि इन आलेखों में लिखे गए सारे तथ्‍य सटीक हैं और ये सारे परीक्षण हमारे द्वारा किए जा चुके हैं, इसलिए किसी के द्वारा कहे जाने पर आपलोगों को गुमराह होने की आवश्‍यकता नहीं। मैं ऐसा एक भी वाक्‍य नहीं लिखती , जिसे उस समय तार्किक ढंग से समझाया नहीं जा सके , जब सभी लोगों को 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की जानकारी हो जाए , जो कि हमारा लक्ष्‍य है। इस आठवीं कडी को मैं आज लिख रही हूं , जिसे अपनी पुस्‍तक में जोडना होगा।

आलेखों की इस शृंखला को पढने के बाद एक पाठक का प्रश्‍न है कि पुराने जमाने में तो हमलोगों के लिए ये कोई उपाय नहीं किए गए , फिर हमलोगों पर ग्रहों का बुरा प्रभाव नहीं पडा , आज इसकी जरूरत क्‍यूं पड गयी। अभी हाल फिलहाल में मेरे यहां आए एक डॉक्‍टर ने भी मुझसे यही प्रश्‍न पूछा था। मैने डॉक्‍टर से पूछा कि क्‍या कारण है कि आपलोग गर्भवती स्‍त्री को इतने विटामीन लिखा करते हैं , कल तक गांव में अत्‍यंत निर्धन महिलाओं को छोडकर शायद किसी को भी ऐसी आवश्‍यकता नहीं पडती थी। उन्‍होने कहा कि हमारे रहन सहन में आए फर्क के कारण ऐसा हो रहा है। गांव में औरतें पर्याप्‍त मात्रा में साग सब्जियां खाया करती थी , परंपरागत खाने की थालियों के बाद शरीर में किसी और चीज की जरूरत नहीं रह जाती है। पर आज कुछ व्‍यस्‍तता की वजह से , तो कुछ ताजी सब्जियों की अनुप्‍लब्‍धता के कारण महिलाओं में इसकी कमी हो जाया करती है। अर्थ यही है कि प्रकृति से आप जितनी ही दूरी बनाए रखेंगे , आपको कृत्रिम उपायों की आवश्‍यकता उतनी ही पडेगी।

मैने उन्‍हें समझाया कि ऐसी ही बात हर क्षेत्र में हैं , मेरी पूरी शृंखला को पढनेवाले ने पाया होगा कि सबसे पहले मैने शुभ मुहूर्त्‍त में बननेवाले अंगूठी यानि गहने की चर्चा की है। मुरारी पारीक जी ने पूछा भी कि हम यह कैसे पता करें कि अंगूठी शुभ मुहूर्त्‍त में बनी है। सचमुच हर बात में ज्‍योतिषीयों से राय लेना काफी कठिन है। इसी के लिए परंपरा बनायी गयी थी। जब आपके घर में कोई शुभ कार्य आराम से हो रहा हो , तो समझ जाएं कि आपके लिए ग्रहों की शुभ स्थिति बनी है। संतान का जन्‍म खुशी खुशी हुआ , बच्‍च पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है यानि ग्रह मनोनुकूल हैं , आप जन्‍मोत्‍सव की तैयारी करते हैं। इस समय सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे आपके गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया गया।यही नहीं अन्‍य लोगों के द्वारा उपहार में मिले सामान भी इसी समय के बने होते हैं , बाद में ग्रह अच्‍छा हो या बुरा , बच्‍चे की मानसिक स्थिति पर अधिक प्रभाव नहीं पडता है।

इसी तरह बेटे या बेटी के विवाह के लिए योग्‍य पार्टनर नहीं मिल रहा है , कितने दिनों से ढूंढ ढूंढकर लोग परेशान हैं , अचानक एक उपयुक्‍त पार्टनर मिल जाता है। वैज्ञानिकों की भाषा में इसे संयोग कहते हैं , पर इसमें भी शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है। इस समय फिर से सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे वर और वधू दोनो के गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया जाता है। अब यदि इनके ग्रह बुरे भी हों तो मानसिक शांति देने के लिए ये जेवर काफी होते थे। सुख और दुख तो जीवन के नियम हैं , लडकी की शादी हो गयी , पति नहीं कमाता है , कोई बात नहीं , पापाजी बेटी जैसा प्‍यार कर रहे हैं , नौकरी नहीं हो रही है , चलो कोई बात नहीं , पापा की दुकान पर ही बैठ जाया जाए , कुछ और काम कर लिया जाए। मतलब संतोष ही संतोष। और फिर समय हमेशा एक जैसा तो हो ही नहीं सकता , कल सबकुछ मन मुताबिक होना ही है।

पर आजकल आपका शुभ मुहूर्त्‍त चल रहा होता है तो आप गहने नहीं बनवाते , गहने खरीदकर ले आते हैं , वह गहना उस समय का बना हो सकता है , जब आपके ग्रह कमजोर चल रहे थे। उसे पहनकर बच्‍चा या वर वधू शांति से तभी तक रह पाते हैं , जबतक उनके ग्रह मजबूत चल रहे हों , जैसे ही उनका ग्रह कमजोर होता है , उनपर दुगुना बुरा प्रभाव पडता है , वे परेशान हो जाते हैं , दुख से लडने की उनकी शक्ति नहीं होती। छोटी छोटी समस्‍याओं से जूझना नहीं चाहते , असंतोष उनपर हावी हो जाता है। पति कमा रहा है तो सास ससुर के साथ क्‍यूं रहना पड रहा है , ट्रांसफर करवा लो , ट्रांसफर हो गया , तो मुझे नौकरी नहीं करने दे रहा , नौकरी भी करने दी , तो हमारे घूमने फिरने के दिन हैं , ये फ्लैट खरीद रहा है यानि हर बात में परेशानी। कैरियर में युवकों को ऐसी ही परेशानी है , इस तरह पति को वैसा ही असंतोष , किसी को किसी से संतुष्टि नहीं। इसी प्रकार जब आपका बुरा समय चल रहा होता है और आप एक ज्‍योतिषी के कहने पर अंगूठी बनवाकर पहनते हैं , तो आप अपने कष्‍ट को दुगुनी कर लेते हैं, इसलिए कभी भी बुरे वक्‍त में नई अंगूठी बनवाने की कोशिश न करें। कल से दूसरे उपायों यानि संगति , दान , रंगों और पेड पौधों की वैज्ञानिकता पर बात की जाएगी !!






5 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी है संगीता जी आप अपनी बात केवल कहती ही नहीं पाठकों की जिग्यासा भी शाँत करती हैं

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी जेसे आप ने आज तक किसी के बिरुढ नही लिखा अच्छा लगता है, लेकिन जब कोई आप के बिरुध लिखता है तो उन की मानसिकता का पता चलता है, इस लिये आप अपने लेख युही लिखती रहे, आज भी आप ने बहुत अच्छा लिखा है.
धन्यवाद

Einstein ने कहा…

पढ़ा ...अपने ज्ञान कोष में कुछ जोड़ा ..अगले लेख का इंतजार है .....

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया जानकारी..जारी रहिये.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

जानकारी देने के लिए धन्यवाद!