शनिवार, 14 नवंबर 2009

मंगल के घर में शनि बैठा है .. क्‍या यह खिल्‍ली उडानेवाली बात है ??

ज्‍योतिष की खिल्‍ली उडानेवालों के मुहं से अक्‍सर कुछ न कुछ ऐसी बातें सुनने को मिल जाती है , जो उनके अनुसार बिल्‍कुल अविश्‍वसनीय है....उसी में से एक है किसी ग्रह का घर। उनका मानना है कि सब सभी पिंड अपने परिभ्रमण पथ पर निश्चित रूप से चलते रहते हैं , तो उनमें से किसी का घर कहां माना जाए ? यदि वास्‍तव में उनका कोई घर होता , तो वे थोडी देर वहां न रूकते , आराम न करते ? उनका शक स्‍वाभाविक है , पर मैं आपलोगों को जानकारी देना चाहती हूं कि किसी ग्रह का खुद के घर में या अपने मित्र के घर में या अपने शत्रु के घर में होना 'फलित ज्‍योतिष' के क्षेत्र में नहीं , वरन् 'परंपरागत खगोल शास्‍त्र' के क्षेत्र में आता है और इस कारण यह किसी भी दृष्टि से हास्‍यास्‍पद नहीं। यदि आज तक वैज्ञानिकों ने खगोल शास्‍त्र से संबंधित अपना सूत्र न विकसित किया होता , तो आज वे ग्रहों की गति से संबंधित 'गणित ज्‍योतिष' के सूत्रों पर भी शक की निगाह रख सकते थे। पर इसपर किसी को संदेह नहीं होता है , क्‍यूंकि हजारो वर्ष बाद भी आज तक हमारी परंपरागत गणना में मामूली त्रुटि ही देखी जा सकी है।

सतही तौर पर किसी बात पर नजर डालकर उसे गलत समझा जा सकता है , पर गंभीरता से विचार करने पर ही इसके असली तथ्‍य पर पहुंचा जा सकता है। वैज्ञानिको को परंपरागत ज्‍योतिष में लिखे मंगल के लाल ग्रह होने की बात तब सही लगी होगी , जब वे मंगल ग्रह की सतह पर लाल मिट्टी होने का अनुभव कर पाए होंगे। इसी प्रकार चंद्रमा के जलतत्‍व होने की बात की पुष्टि तब हुई हो, जब वैज्ञानिकों को इसी वर्ष किए गए अपने परीक्षण में चंद्रमा पर पानी होने का पता चला हो। पर इन सबसे आगे आसमान के विभिन्‍न राशियों से अलग अलग रंगों का परावर्तन अभी तक वैज्ञानिकों की नजर में नहीं आ रहा , इसलिए इसे स्‍वीकार करना सचमुच आसान नहीं। ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में विभिन्‍न राशियों द्वारा अलग अलग रंगों के प्रकाश के परावर्तन के बारे में लिखा गया है , पर उसे देखने के लिए जो भी साधन या दृष्टि चाहिए , उसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं। हो सकता है ऋषि मुनि उन्‍हें लिख न पाए हों या उनकी वह रचना कहीं खो गयी हो। इससे विषय तो विवादास्‍पद रहेगा ही , अगले अनुच्‍छेद में मैं अपनी बात को समझाने की कोशिश करती हूं।

जिस तरह धरती में कहीं भी कोई रेखा खींची हुई नहीं है , पर भूगोल का अध्‍ययन करते वक्‍त हम काल्‍पनिक आक्षांस या देशांतर रेखाएं खींचते हैं। इन रेखाओं को खींचने का एक आधार होता है यानि दोनो की 0 डिग्री किसी आधार पर पृथ्‍वी को दो बराबर भागों में बांटती है , और इसी के समानांतर या किसी अन्‍य आधार पर अन्‍य रेखाएं खींची गयी हैं। किसी भी जगह के सूर्योदय , सूर्यास्‍त, मौसम परिवर्तन या अन्‍य कई बातों की गणना में आक्षांस और देशांतर रेखाएं सहयोगी बनती हैं। इस बात से तो आप सभी सहमत होंगे।

भूगोल की ही तरह गणित ज्‍योतिष में पृथ्‍वी को स्थिर मानने से पूरब से पश्चिम तक जाता हुआ पूरा गोल 360 डिग्री का जो आसमान में एक वृत्‍त नजर आता है , उसे 30-30 डिग्री के बारह काल्‍पनिक भागों में बांटा गया है। इन्‍ही 30 डिग्री की एक एक राशि मानी गयी है यानि 0 डिग्री से 30 डिग्री तक मेष, 30 डिग्री से 60 डिग्री तक वृष, 60 डिग्री से 90 डिग्री तक मिथुन,  90 डिग्री से 120 डिग्री तक कर्क, 120 डिग्री से 150 डिग्री तक सिंह, 150 डिग्री से 180 डिग्री तक कन्‍या, 180 डिग्री से 210 डिग्री तक तुला, 210 डिग्री से 240 डिग्री तक वृश्चिक, 240 डिग्री से 270 डिग्री तक धनु, 270 डिग्री से 300 डिग्री तक मकर, 300 डिग्री से 330 डिग्री तक कुंभ, 330 डिग्री से 360 डिग्री तक मीन कहलाती है।

भूगोल के आक्षांस और देशांतर रेखाओं की तरह ही इन खास खास विंदुओं को भी एक महत्‍वपूर्ण आधार पर लिया गया है यानि आसमान के किसी भी विंदु से 0 डिग्री नहीं शुरू कर दी गयी है और कहीं भी अंत नहीं कर दिया गया है। यदि प्राचीन ऋषि मुनियों और उनके ग्रंथो की मानें , तो आसमान के मेष और वृश्चिक राशि से लाल , वृष और तुला राशि से चमकीले सफेद , मिथुन और कन्‍या राशि से हरे , कर्क राशि से दूधिए , सिंह राशि से तप्‍त लाल , मकर और कुंभ राशि से काले और धनु तथा मीन राशि से पीले रंग को परावर्तित होते देखा गया है। अभी तक विज्ञान इसे ढूंढ नहीं सका है , इसलिए इसमें संदेह रहना स्‍वाभाविक है।

पर जब प्राचीन ऋषियों , महर्षियों को इस बात के रहस्‍य का पता हुआ , उन्‍होने उन राशियों का संबंध वैसे ही रंगों को परावर्तित करने वाले ग्रहों के साथ जोड दिया। यही कारण है कि मेष और वृश्चिक राशि का आधिपत्‍य लाल रंग परावर्तित करने वाले मंगल को , वृष और तुला राशि का सफेद चमकीले रंग परावर्तित करनेवाले शुक्र को , मिथुन और कन्‍या राशि का हरा रंग परावर्तित करनेवाले बुध को , कर्क का दूधिया सफेद रंग परावर्तित करनेवाले चंद्रमा को , सिंह राशि का तप्‍त लाल रंग परावर्तित करनेवाले सूर्य को ,  धनु और मीन राशि का पीली किरण बिखेरनेवाले बृहस्‍पति को तथा मकर और कुभ राशि का काले शनि को दे दिया। अपने पथ पर चलते हुए ही कोई भी ग्रह अपनी राशि से गुजरते हैं तो स्‍वक्षेत्री कहलाते हैं, जबकि कभी कभी इन्‍हें दूसरे ग्रहों की राशि से भी गुजरना होता है, इसलिए यह मजाक उडाने वाली बात तो बिल्‍कुल नहीं । ज्‍योतिष के कई अविश्‍वसनीय मुद्दों पर विश्‍वभर के ज्‍योतिषियों में बहस या अलग अलग विचारधाराएं हैं , पर इस बात को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं , इसलिए इसकी वैज्ञानिकता की पुष्टि तो हो ही जाती है।

फलित ज्‍योतिष मानता है कि ग्रह स्‍वक्षेत्री हों तो अधिक मजबूत होते हैं , क्‍यूंकि अपने क्षेत्र में कोई भी राजा ही होता है, पर दूसरों के क्षेत्र में ग्रहों के होने से कुछ समझौते की नौबत आ जाती है। ग्रंथो में वर्णित ग्रहों के स्‍वभाव के हिसाब से कुछ ग्रहों में आपस में मित्रता और कुछ की आपस में शत्रुता भी है। इसलिए ज्‍योतिष में यह भी माना जाता है कि यदि कोई ग्रह मित्र क्षेत्र से गुजरता है  , तब भी उसका प्रभाव भी अच्‍छा ही दिखता है। लेकिन ग्रह यदि शत्रु के क्षेत्र से गुजरे , तो ग्रह लोगों के सम्‍मुख तरह तरह की बाधा उपस्थित करते हैं।

9 टिप्‍पणियां:

vinay ने कहा…

बहुत अच्छे प्रकार से आपने ग्रहों के घर के बारे में समझा दिया ।

जी.के. अवधिया ने कहा…

तर्कयुक्त अच्छी जानकारी।

अपने विचार के अनुसार थोड़ा सुधार करना चाहूँगा। जब कोई भी रंग परावर्तित नहीं हो पाता काला दिखाई पड़ता है अर्थात् काला कोई रंग नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता है कि मकर एवं कुम्भ राशि से किसी भी प्रकार के रंग परावर्तित नहीं हो पाते इसलिये वे काले का द्योतक हैं।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

संगीता जी, आप तनिक यह भी बता देते कि यह खिल्ली उडाई किसने, तो बेहतर होता, क्योंकि जब मैंने इस लेख का शीर्षक पढा तो उसी आधार पर एक लम्बी चौड़ी प्रतिक्रया लिख डाली थी मगर जब लेख पढ़ा तो वहाँ खिल्ली उडाने वाले का कोई संदर्भ नहीं पाया !

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी,खिल्ली उडाने क हक तो किसी को भी नही होना चाहिये हां सहमत ओर असहमत हो सकते है लोग, चलिये आप किसी की परवाह ना करे आज तो लोग भगवान की भी खिल्ली उडाते है, आप ने कोई उपाय नही बताया इस मंगल से बचने का? इंतजार रहे गा आप के अगले लेख का, कृप्या लेख मै या मेल मै बताये लेकिन बिस्तार से.
धन्यवाद

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

ज्योतिष में फलित के अलावा तो विज्ञान ही है। जिसे बताने वाले सभी वैज्ञानिक ही थे। मुनि शब्द वैज्ञानिकों के लिए ही है। सारा गड़बड़ घुटाला तो फलित से ही आरंभ होता है।

संगीता पुरी ने कहा…

दिनेश राय द्विवेदी जी,
आपको जानकारी दे दूं कि .. जादू टोना जंतर मंतर की तरह यह अंधविश्‍वास के रूप में दुनिया में नहीं आया .. किसी व्‍यक्ति या समाज ने शुरू नहीं किया फलित ज्‍योतिष को .. ज्‍योतिष के फलित के क्षेत्र में भी काम ऋषि मुनियों द्वारा ही किया गया है .. और अपनी खामियों को छुपाने के लिए फलित ज्‍येतिष को गलत कहकर हम उनका अपमान करते हैं !!

tulsibhai ने कहा…

" her baar ki tarah aapka ye aalekh bhi jankariyoan se bhara raha ...ANMOL jankari ke liye sukriya "

----- eksacchai { aawaz }

http://eksacchai.blogspot.com

MANOJ KUMAR ने कहा…

बहुत अच्छी रचना। हमें तो नई और अच्छी जानकारी मिली बांकी का नहीं पता।

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif ने कहा…

काफ़ी जानकारियों भरा लेख..!!

लेकिन मैं ज्योतिष में यकीन नही रखता हूं लेकिन एक बहुत करीब दोस्त के कहने पर तीन बार कुण्डली बनवाई और हर बार अलग अलग ज्योतिष से लेकिन कुछ नही हुआ उनकी कही गयी हर भविष्यवाणी गलत गयी....

हर ज्योतिष ने ग्रहों की स्थिती अलग बताई और अलग ही कहानी बताई...

मेरी निगाह में ये सिर्फ़ अन्दाज़े लगाने से ज़्यादा कुछ नही है...दुनिया में ना कोई इंसान और कोई ऎसी चीज़ नही है जो भविष्य देख सके