गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

धर्म अलग है, अध्यात्म अलग है, जादू-टोना अलग है, अंध-विश्वास अलग है, कैसे ??

कल एक ब्‍लॉगमें पूछे गए कुछ प्रश्‍नों के जबाब देने के क्रम में सबसे पहले मैं आध्‍यात्‍म को परिभाषित करना चाहूंगी। अपने शरीर की आवश्‍यकताओं की पूर्ति कर हर व्‍यक्ति सुख का अनुभव करते हैं , इस कारण इसे प्राप्‍त करने के लिए लगभग सारे व्‍यक्ति मेहनत करना चाहते हैं। इसके बाद मनुष्‍य के लिए उसके परिवार का स्‍थान आता है , जिन्‍हे सुख सुविधा देने में अपने सुख का कुछ त्‍याग करने में भी संतोष का अनुभव होता है। इस कारण उसके लिए भी मेहनत करने को कुछ को छोडकर सब तैयार रहते हैं। इसके आगे बढते हुए थोडे लोग अपने मुहल्‍ले , अपने समाज , अपने गांव से बढते हुए अपने राष्‍ट्र के लिए भी जीवन उत्‍सर्ग करने में पीछे नहीं हटते। उससे आगे भी कुछ लोग विश्‍व बंधुत्‍व की भावना से ओत प्रोत होते हैं , तो कुछ विश्‍व के समस्‍त चर अचर के कल्‍याण से भी आगे पूरे ब्रह्मांड के लिए अपने कार्यक्रम बनाया करते हैं। अपने स्‍वार्थ का त्‍याग करके अपने मन और मस्तिष्‍क के सोंच को व्‍यापक बनाना ही ‘आध्‍यात्‍म’ है । जब कोई व्‍यक्ति अपनी आत्‍मा के साथ विश्‍वात्‍मा, समस्‍त जड चेतन और ब्रह्मांडीय शक्ति को जोडने में समर्थ होता है, तो वस्‍तुत: वह आध्‍यात्मिकता की चरम सीमा को प्राप्‍त करता है।


अपने मस्तिष्‍क की बनावट के कारण सामान्‍यतया मनुष्‍य स्‍वार्थी होता है , अपने सुखों का परित्‍याग नहीं कर पाता , इसलिए ‘आध्‍यात्‍म’ के स्‍तर तक पहुंचे व्‍यक्ति को स्‍वयं महात्‍मा का दर्जा मिल जाता है , वैसे उनकी संख्‍या बहुत कम होती है। अपने विश्‍व कल्‍याण के लक्ष्‍य को पूरा करने के लिए उनलोगों के द्वारा मनुष्‍य के समक्ष नियमों की संहिता बनाकर पेश की जाती हैं। इसमें जन्‍म से मृत्‍यु तक मनुष्‍य के जीवन यापन के ऐसे तरीके की चर्चा होती हैं , जिससे उसका शारीरिक , मानसिक और नैतिक विकास सही हो सके। प्रकृति की एक एक वस्‍तु एक एक व्‍यक्ति में किसी न किसी प्रकार की विशेषता छुपी हुई है , जिनके समुचित उपयोग के लिए खास नियम बनाए जाते हैं। विभिन्‍न कर्मकांडों के माध्‍यम से उनका पालन कर व्‍यक्ति अपने स्‍वार्थों को त्‍याग कर विश्‍व के समस्‍त चर अचर के कल्‍याण से भी आगे पूरे ब्रह्मांड की सुरक्षा करने में समर्थ हो पाता है। इन्‍हीं नियमों की संहिता को ‘धर्म’ का नाम दिया जाता है, ताकि इन नियमों के पालन में मनुष्‍यों के द्वारा कोई लापरवाही न बरती जाए। इसके अनुसार विभिन्‍न काल और देश में भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के ‘धर्म’ का विकास हुआ।

मानव का धर्म मानवीय गुण है , खुद पर संयम रखने के लिए हमें व्रत रखना चाहिए। इसके अलावे प्रकृति के जिन वस्‍तुओं से हमें सुख की प्राप्ति होती है , उनके प्रति श्रद्धावनत होना चाहिए। विवाह के सुअवसर पर गवाही के लिए बडी संख्‍या में लोगों की उपस्थिति होनी चाहिए , पति पत्‍नी अपने रिश्‍तों को आसानी से तोड न सके , इसके लिए बंधन बनाए गए। लेकिन जब धर्म के मूल उद्देश्‍य मानवता और सच्‍ची भक्ति को भूलकर लोग कर्मकांडों को ही सत्‍य समझ बैठते हैं , तो वहीं से भ्रम या अंधविश्‍वास की उत्‍पत्ति होती है। यहीं से विभिन्‍न धर्म के मध्‍य टकराव का भी आरंभ होता है , मेरा धर्म अच्‍छा और मेरा धर्म बुरा कहने की शुरूआत होती है। सिर्फ वेशभूषा के आधार पर नकली गुरूओं को असली मानकर उनकी बातों पर विश्‍वास करना ‘अंधविश्‍वास’ है। वे गुरू नहीं ठग होते हैं , जो आजतक धर्म को गलत ढंग से परिभाषित कर लोगों को गुमराह करने का काम करते आए हैं। मूर्तियों का दूध पीना इसी तरह ठग गुरूओं द्वारा गुमराह किए जाने वाले कार्यों में से एक है। उनसे लोगों को सावधान कराना हमारा धर्म है , पर इसके कारण हम अपने सच्‍चे ‘धर्मगुरूओं’ या धर्म पर इल्‍जाम लगाना जायज नहीं।

‘जादू टोना’ तो मनुष्‍यों के मनोरंजन के लिए विकसित की गयी मात्र एक कला है , जिसकी जानकारी समाज के किसी एक वर्ग को दी गयी। इसके भेद को खोल देने से उस खेल की रोचकता समाप्‍त हो जाती , इसलिए इसे गुप्‍त रखा गया। पर ठग इसका भी फायदा उठाने से नहीं चूकते और भोलेभाले जनता को जादू टोने के कारनामें दिखाकर अपने को गुरू बनाकर उन्‍हें बेवकूफ बनाते है। अंत में मैं यही कहना चाहती हूं कि कोई भी क्षेत्र बुरा नहीं होता , आज युग ही बुरा हो गया है। इस कारण हर क्षेत्र में लोग अंधविश्‍वास का नाजायज फायदा उठा रहे हैं और भोले भाले लोग इसका शिकार बन रहे हैं। आज के नेता , आज के डॉक्‍टर , आज के वकील , आज के शिक्षक ... किसपर हम विश्‍वास करें वो हमारी समझ में नहीं आता , अंधविश्‍वास से हम कहीं भी हम फंस सकते हैं। जरूरत है भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त करने की , दिखावे को समाप्‍त करने की , सुविधाभोगी वातावरण को समाप्‍त करने की। तभी विश्‍व का कल्‍याण किया जा सकता है।





12 टिप्‍पणियां:

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ ने कहा…

रास्ते भांति-भांति के हो सकते हैं लेकिन मंजिल एक ही है---ऐसा मानना है ज़्यादातर लोगों का!!! चाहे आप पूजा करो या नमाज़ पढ़ो, मक़सद एक ही अंतिम सत्य की उपासना !!!
दर-असल मैं लखनऊ में रहता हूँ और यह कानपुर के पड़ोस में स्थित है. मैं अगर कहूँ कि कानपुर का रास्ता एक उन्नाव से होकर जाता है और दूसरा राएबरेली से होकर तो आप किसी भी रास्ते से जाओ लेकिन मंजिल आपकी एक ही है -- कानपुर पहुंचना!!! अब मैं उक्क्त तर्क और आगे ले जाता हूँ! एक रास्ता और है मैं लखनऊ से दिल्ली जाता हूँ गोमती एक्सप्रेस से... दिल्ली से आगरा जाता हूँ ... आगरा से जयपुर... जयपुर से फिर अलीगढ और वहां से फिर कानपुर पहुँचता हूँ!!! (यह रास्ता और भी लम्बा हो सकता है)

अब सवाल है कि कौन सा रास्ता ठीक है... अगर जवाब दो शब्दों "हाँ" या "ना" में देना हो तो कोई भी रास्ते का ज्ञाता आपको वाया उन्नाव ही सजेस्ट करेगा.... तो अब या तो सभी रास्ते सही है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर सभी रास्ते गलत है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर इन सबमें कोई एक ही रास्ता सबसे सही और सत्य है (इसकी संभावना ज्यादा प्रबल है) अब कानपुर जाने वाले यात्री को यह तय करना है कि कौन सा रास्ता वह चुने !!! गलत रास्ता या सही रास्ता... इसका जवाब यह भी नहीं हो सकता कि भाई मेरी आस्था फलां रास्ते में और उसी में मुझे संतुष्टि मिलती है तो बात तो ठीक है लेकिन सबसे सत्य और सही रास्ता फिर भी केवल और केवल एक ही है...

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ ने कहा…

रास्ते भांति-भांति के हो सकते हैं लेकिन मंजिल एक ही है---ऐसा मानना है ज़्यादातर लोगों का!!! चाहे आप पूजा करो या नमाज़ पढ़ो, मक़सद एक ही अंतिम सत्य की उपासना !!!
दर-असल मैं लखनऊ में रहता हूँ और यह कानपुर के पड़ोस में स्थित है. मैं अगर कहूँ कि कानपुर का रास्ता एक उन्नाव से होकर जाता है और दूसरा राएबरेली से होकर तो आप किसी भी रास्ते से जाओ लेकिन मंजिल आपकी एक ही है -- कानपुर पहुंचना!!! अब मैं उक्क्त तर्क और आगे ले जाता हूँ! एक रास्ता और है मैं लखनऊ से दिल्ली जाता हूँ गोमती एक्सप्रेस से... दिल्ली से आगरा जाता हूँ ... आगरा से जयपुर... जयपुर से फिर अलीगढ और वहां से फिर कानपुर पहुँचता हूँ!!! (यह रास्ता और भी लम्बा हो सकता है)

अब सवाल है कि कौन सा रास्ता ठीक है... अगर जवाब दो शब्दों "हाँ" या "ना" में देना हो तो कोई भी रास्ते का ज्ञाता आपको वाया उन्नाव ही सजेस्ट करेगा.... तो अब या तो सभी रास्ते सही है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर सभी रास्ते गलत है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर इन सबमें कोई एक ही रास्ता सबसे सही और सत्य है (इसकी संभावना ज्यादा प्रबल है) अब कानपुर जाने वाले यात्री को यह तय करना है कि कौन सा रास्ता वह चुने !!! गलत रास्ता या सही रास्ता... इसका जवाब यह भी नहीं हो सकता कि भाई मेरी आस्था फलां रास्ते में और उसी में मुझे संतुष्टि मिलती है तो बात तो ठीक है लेकिन सबसे सत्य और सही रास्ता फिर भी केवल और केवल एक ही है...

vinay ने कहा…

आज की सच्चाई दिखाने वाला अच्छा लेख ।

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी पोस्ट लिखी है।धन्यवाद।

अन्तर सोहिल ने कहा…

"आज युग ही बुरा हो गया है।"

इस पंक्ति से असहमती है जी
ऐसा कौन सा युग था जब बुरे लोग नही थे। हां ऐसा कह सकते हैं कि अब अच्छे लोगों की अपेक्षा बुरे लोगों की मात्रा ज्यादा हो गई है।

आज मात्रा (Quantity)का अंतर है गुणधर्म (Quality) का नही

प्रणाम स्वीकार करें

सुलभ सतरंगी ने कहा…

अंत में मैं यही कहना चाहती हूं कि कोई भी क्षेत्र बुरा नहीं होता - बिलकुल सही

आज युग ही बुरा हो गया है - असहमत युग सुधार की और अग्रसर है. सभ्यता समृद्ध हुई है. न्याय प्रणाली प्रासंगिक हैं और स्त्री पुरुष या अन्य जातिगत समानता की बात को निरंतर बल मिल रहा है. परन्तु कुछ विनाशकारी शक्तियां और असामाजिक तत्व भीलगातार बढ़ रहे हैं.

हर क्षेत्र में लोग अंधविश्‍वास का नाजायज फायदा उठा रहे हैं और भोले भाले लोग इसका शिकार बन रहे हैं। आज के नेता , आज के डॉक्‍टर , आज के वकील , आज के शिक्षक ... किसपर हम विश्‍वास करें वो हमारी समझ में नहीं आता , अंधविश्‍वास से हम कहीं भी हम फंस सकते हैं। कारण तो आपने सही बताये हैं - भ्रष्‍टाचार, दिखावे की जीवन शैली, सुविधाभोगी वातावरण इत्यादि.

जरूरत है भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त करने की , दिखावे को समाप्‍त करने की , सुविधाभोगी वातावरण को समाप्‍त करने की। तभी विश्‍व का कल्‍याण किया जा सकता है। - सत्य है. ऐसे ही सुधार हो सकता है.

वन्दना ने कहा…

ek sarthak lekh.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

आध्यात्म, धर्म, जादूटोना सब की व्याख्या कितने सुंदर और सटीक शब्दों में की है आपने । और ्ंत में आपका कथन कि कोी भी विषय बुरा नही होता आजकल समय ही सही नही है तो कुछ लोग इसका गलत फायदा उठा रहे हैं ।

रंजना ने कहा…

Aapne jitne saundar aur sarthak dhang se vishay ko vivechit kiya hai,man mugdh ho gaya aapki is vivechna par.....

Bahut hi sundar sargarbhit is vivechna ke liye aapka sadhuwaad...

Vastutah log dharm,aadhyatm aur tantra mantra ko is prakaar mila deten hain aur bhramit hote rahte hain ki yahi samast samasyaon ki jad hai....

Aaj ke samay me aise hi shanshay naashak aalekhon ki aawashyakta hai....

संगीता पुरी ने कहा…

इस लेख पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रिया है .. कि अच्‍छे बुरे लोग हर युग में हो सकते हैं .. आज के युग को ही गलत कहना सही नहीं .. ये मैं भी मानती हूं .. पर प्राचीन काल में जो बुरा होता था .. वो चोर या डाकू या लूटेरा या हत्‍यारा कहा जाता था .. इसलिए वैसे व्‍यक्ति का सामाजिक बहिष्‍कार होता था .. इस कारण उनसे हम दूर रहा करते थे .. और जब हम एक डॉक्‍टर , वकील , नेता , शिक्षक या मजदूर से सहयोग लेते थे .. तो हम निश्चिंत रहा करते थे .. पर आज किस वेश में चोर , डाकू लुटेरे या हत्‍यारे मिल जाएंगे .. समझ पाना ही कठिन है .. आज पैसे कमाने के लालच में कोई भी आपके विश्‍वास का नाजायज फायदा उठा सकता है .. किसी पर विश्‍वास अंधविश्‍वास हो जाता है .. यहां तक की पति या पत्‍नी पर विश्‍वास भी अंधविश्‍वास बन सकता है .. आज के भौतिकवादी युग की यह बहुत बडी त्रासदी है !!

वाणी गीत ने कहा…

अंध श्रद्धा ही रखनी है तो उस परमेश्वर के प्रति ही रखें ...
सार्थक रचना !

Ratan singh shekhawat ने कहा…

हर क्षेत्र में लोग अंधविश्‍वास का नाजायज फायदा उठा रहे हैं और भोले भाले लोग इसका शिकार बन रहे हैं। आज के नेता , आज के डॉक्‍टर , आज के वकील , आज के शिक्षक ... किसपर हम विश्‍वास करें|
@ एकदम सही बात है कोई अंधविश्वास के नाम पर ठग रहा है तो कोई धर्म के नाम पर ,तो कोई अपनी बुद्धिमत्ता के नाम पर ..
हम बीमारियों के बारे में नहीं जानते इसलिए आजकल डाक्टर लुटेरे बने बैठे है इसी तरह शिक्षक,वकील हर कोई आमजन को लूटने बैठा है हालाँकि इन सब पेशों अच्छे व्यक्ति भी है पर कितने प्रतिशत ?