मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

पूरे एक महीने मिला मुझे अपने गुरू का सान्निध्‍य : धन्‍य धन्‍य हो गयी मैं !!

भारतीय संस्‍कृति में प्राचीन काल से ही पिता का विशेष महत्व है। वाल्मीकि(रामायण, अयोध्या काण्ड) में कहा गया है ... 





न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्‌।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिपा॥
(यानि पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।)
दूसरी ओर यहां गुरू की महिमा भी कम नहीं आंकी गयी है ...
गुरू गोविन्‍द दोऊ खडे काके लागूं पायं।
बलिहारी गुरू आपनो गोविंद दियों बताए।।
यानि गुरू के पद को ईश्‍वर के बराबर महत्‍व दिया गया है। 

जब पिता और गुरू दोनों का अलग अलग इतना महत्‍व हो , उनकी तुलना बडे बडे धर्म और ईश्‍वर से की जाती हो और जब पिता ही किसी के गुरू बन जाएं, तो उसका स्‍थान स्‍वयमेव सबसे ऊंचा हो जाता है। इस दृष्टि से मेरे पिता श्री विद्या सागर महथा जी मेरे लिए ईश्‍वर से कम नहीं। मेरा रोम रोम उनका ऋणी माना जा सकता है, पर समाज की ऐसी व्‍यवस्‍था में मात्र पुत्री होने के कारण मैं इस कर्ज को किसी तरह नहीं उतार सकती। इसके अतिरिक्‍त ज्‍योतिष के क्षेत्र में किए गए उनके अध्‍ययन के कारण उनके चरित्र के सैकडों पहलुओं में से किसी एक का भी चित्रण ब्‍लॉग जगत में मौजूद बहुतों को नहीं पच पाएगा और मैं इस पवित्र पोस्‍ट को विवादास्‍पद नहीं बनाना चाहती। इसलिए चाहते हुए भी एक शिष्‍य के रूप में उनकी प्रतिभा, उनके संयमित जीवन, उनके सीख और उनके ज्ञान की चर्चा यहां नहीं करना चाहूंगी। समय आने पर सबके गुण अवगुण सामने आ ही जाते हैं। पर इतना अवश्‍य कहना चाहूंगी कि छह माह की उम्र में हुए चेचक से इनका स्‍वास्‍थ्‍य इतना बुरा हो गया था , इनके शरीर को इतना कष्‍ट था कि इनकी मुक्ति के लिए मेरी दादी जी इन्‍हें खुशी से बारंबार देवी मां को सौंपती थी कि वे इसे ले जाएं। पर देवी मां ने दादी जी की बात न मानकर हमारा बडा कल्‍याण किया, क्‍यूंकि इन्‍होने प्रकृति के एक बडे रहस्‍य को उजागर किया है , जिसे मैं 2011 के शुरूआत में दुनिया के सामने रखूंगी।
पूरे एक महीने के झारखंड प्रवास के बाद पिताजी वापस कल लौट गए , इस दौरान अधिकांश समय उन्‍होने बोकारो में ही व्‍यतीत किया , कहीं भी जाते , दो चार दिनों में पुन: मेरे यहां वापस हो जाते। विवाह के बाद मायके जाने पर ही कभी मुझे इतने दिनों तक साथ रहने का मौका मिला हो , पर इस बार मेरे घर पर उन्‍होने इतना समय दिया , वो मेरे जीवन में पहली बार हुआ। अपनी छह संतान में जितना स्‍नेह उन्‍होने मुझे दिया है , शायद ही किसी को मिला हो। मुझे तो यह देखकर ताज्‍जुब होता है कि सांसारिक सफलता की ओर कम ध्‍यान रहने के बावजूद बचपन से अभी तक की मेरी एक एक बात उन्‍हें याद रहती है। 


सात महीने की उम्र में पेट के बल चलती हुई साफ सुथरे घर में एक सरसों के दाने पर मेरी न सिर्फ दृष्टि ही गयी थी , उसे मैंने अपनी उंगलियों से पकड भी लिया था। डेढ वर्ष की उम्र में पलंग से अपने पैरों को नीचे कर तुतलाते हुए 'दिल' 'दिल' कहकर स्‍वयं के गिर जाने की उन्‍हें धमकी दिया करती थी। तीन वर्ष की उम्र में मैने हिंदी अक्षरों को पहचानना शुरू कर दिया था और 'फ' 'ल' 'फल' , 'च' 'ल' 'चल' पढना शुरू कर दिया था। चार वर्ष की उम्र में न सिर्फ 'ताली ताली तू तू तलती , दो हल डाली डाली फिरती' जैसी तुतलाती जुबान से 'कोयल रानी' की पूरी कविता सुनाया करती थी , वरन् 'छोटी चिडियां' नाम की कहानी को कंठस्‍थ कर लिया था और एक एक अर्द्धविराम , पूर्ण विराम पर जरूरत के अनुसार ठहराव के साथ लोगों को सुनाया करती थी। एक मां के लिए ये सब यादें स्‍वाभाविक है , पर पहली बार अपने पिता को मैने अपने जीवन की इतनी बातें याद रखते देखा है। मेरे मानसिक विकास पर कितनी पैनी निगाह थी उनकी ??


अध्‍यापन के अतिरिक्‍त भी मेरे पीछे उन्‍होने जितनी मेहनत की , अन्‍य भाई बहनों पर कभी उतना ध्‍यान नहीं दिया। अपने मामाजी के यहां से ग्रेज्‍युएशन करने के बाद मुझे बी एड कर लेने की सलाह दी गयी , पर मैने अर्थशास्‍त्र में स्‍नातकोत्‍तर की पढाई करने का फैसला किया। मेरे परिवार‍ में पहले किसी बहन ने गांव के स्‍कूल से मैट्रिक करने से अधिक पढाई नहीं की थी। पहली बार मेरे दादा जी और दादी जी मुझे हॉस्‍टल में डालने को तैयार नहीं थे। सो मैने एडमिशन लेकर घर में ही एम ए की पढाई करने का निश्‍चय किया। घर में ही दो वर्षों तक तैयारी की और फार्म भी भर लिया। एक एक पेपर की परीक्षा हर पांचवें दिन होनी थी। प्रत्‍येक परीक्षा से एक दिन पहले दोपहर के बाद वे मेरे साथ रांची के लिए निकलते , रातभर वहां कहीं ठहरते , सुबह परीक्षा देने के बाद अपने गांव वापस लौटते। यहां तक कि मैं चार घंटे परीक्षा भवन में होती , तो शहर में कई रिश्‍तेदार होने के बाद भी वे कहीं न जाते। उतनी देर भी वे गेट के बाहर ही टहलते रहते , इस भय से कि कहीं लडकों ने वॉक आउट किया तो ये कहां जाएगी। अन्‍य भाई बहनों पर इतना ध्‍यान देते मैने उन्‍हें कभी नहीं देखा।


अध्‍ययन मनन में विश्‍वास रखने वाले पिता जी का पद या अर्थोपार्जन के लिए पढाई लिखाई करने पर विश्‍वास नहीं था और यही कारण है कि सिर्फ अध्‍ययन मनन नहीं , वरन्  मौलिक चिंतन में मेरे लगे होने से वे अपनी परंपरा को जीवित देखकर मुझसे खुश बने रहें। वैसे तो ज्ञान का खजाना ही है उनके पास , जब भी मिलना होता है , उनकी उपस्थिति में सिर्फ कुछ न कुछ जानने और सीखने में ही मेरा ध्‍यान लगा होता है। 
ज्‍योतिष के बारे में तो उनसे चर्चा होनी ही थी , पर इस बार ज्‍योतिष के अलावे ब्‍लॉग जगत के बारे में भी बहुत बातें हुईं। मेरे आलेखों को पढकर, मेरे विचारों को समझकर और भविष्‍य के मेरे कार्यक्रमों को सुनकर काफी खुश और संतुष्‍ट होकर उन्‍होने यहां से विदाई ली। इस दुनिया से वे काफी निराश है , जो आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों को ही महत्‍व देते हें और किसी ज्ञान पिपासु , कलाकार और मेहनतकशों को भी बेकार समझते हैं।  वे एक बेहतर दुनिया का स्‍वप्‍न देखते हैं , पर सैद्धांतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अत्‍यधिक भावुकता होने तथा व्‍यवहारिकता की कमी से अपने सपने को पूरा नहीं कर पाते। वे मुझमें बडी उम्‍मीद देखते हैं , शायद मैं उनका सपना पूरा कर सकूं। 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके पापा जी अभी पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है और अभी भी दिन रात चिंतन में लगे हैं। मैं उनके स्‍वस्‍थ और दीर्घजीवी होने की कामना करती हूं !!




16 टिप्‍पणियां:

Pandit Kishore Ji ने कहा…

sangeeta ji ko namaskaar
bahut khushi hui yah jaankar ki aaj bhi aap apne pita itna maan samman deti hain ishwar aapke pitaji ko lambi aayu pradaan kare

Murari Pareek ने कहा…

वाह जब गुरु और पिटा दोनों एक साथ हों तो शिष्य का उद्धार तो होना निश्चित है !!!

ललित शर्मा ने कहा…

संगीता जी-नमस्ते, पिताजी को हमारा प्रणाम कहियेगा, गुरु पिताजी से मिलवाने के लिए आभार

डॉ टी एस दराल ने कहा…

संगीता जी, ऐसे गुणवान पिता भाग्य से ही मिलते हैं।
उनका सरल और सादा जीवन आजकल की अंधाधुंध आर्थिक दौड़ में प्रेरणा का स्रोत लगता है।
हम उनके सुखमय लम्बे जीवन की कामना करते हैं।

अन्तर सोहिल ने कहा…

पिताजी (गुरुजी)को मेरा प्रणाम कहियेगा

राज भाटिय़ा ने कहा…

उनके अध्‍ययन के कारण उनके चरित्र के सैकडों पहलुओं में से किसी एक का भी चित्रण ब्‍लॉग जगत में मौजूद बहुतों को नहीं पच पाएगा और मैं इस पवित्र पोस्‍ट को विवादास्‍पद नहीं बनाना चाहती।

संगीता जी आप बेझिझक लिखे कोई महा मुर्ख ही होगा जो आप के पिता ओर इतने बुजुर्ग के बारे गलत बोलेगा, आप के पिता जी ओर गुरु से मिल कर बहुत अच्छा लगा,मेरी तरफ़ से उन्हे प्राणाम कहे, ओर आज का लेख बहुत ही अच्छा लगा

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपके पिता जी जो आपके गुरु भी हैं उनके बारे में जानकार ..भाग्यशाली हैं आप ..

वन्दना ने कहा…

aap bahut hi bhagyawaan hain........aapke pita hi aapke guru bhi hain.........unhein hamara bhi pranam kahiyega.

Rekhaa Prahalad ने कहा…

sangeeta ji namaskaar bahut khushi hui yah jaankar ki aap apne pitaji ko itna maan samman deti hain. Pitaji ko pranam aur aapko naman.

DIVINEPREACHINGS ने कहा…

आपके पिताश्री एक महान व्यक्ति हैं...आपके प्रति उनके स्नेह का वर्णन पढते हुए लगा मानो वे युग पिता हों और हम सब का मार्गदर्शन कर रहे हों । उनका सानिध्य सदा बना रहे ऐसी कामना है ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

गुरू के प्रति आपकी निष्ठा को नमन!

Udan Tashtari ने कहा…

पिता जी को मेरा प्रणाम!!


बहुत अच्छा लगा जानकर और फोटो से दर्शन प्राप्त कर.

विष्णु बैरागी ने कहा…

पोस्‍ट का शब्‍द-शब्‍द श्रद्धा, पे्रम और पूजनीयता से रचा-बसा। अच्‍छा लगा।

निर्मला कपिला ने कहा…

अपके पिता जी के बारे मे जान कर बहुत खुशी हुयी। मुझे लगता है लडकियों को पिता बेहतर समझ सकते हैं और उनका मार्गद्र्शन जिन्दगी को आसान बना देता है । आपने मुझे भी अपने पिता की याद दिला दी। आपके पिता को मेरा नमन और शुभकामनायें

Dr Satyajit Sahu ने कहा…

पित्र देवो भवः गुरु देवो भवः

मनुदीप यदुवंशी ने कहा…

वास्तव मैं पिता और संतान के बीच जो मधुर और कोमल रिश्ता आपने अनुभव किया है वो बहुत ही प्रेरणा दायक है. असल मैं ऐसा वातावरण हमारे समाज मैं कम ही बच्चों को मिल पता है और ऐसे पिता-पुत्री व पिता-पुत्र कम ही देखने मैं आते हैं जो परस्पर इतने घनिष्ठ प्रेम से सींचे रिश्ते मैं बंधे रहते हों. बहुत बहुत बधाई इश्वर आपके पिता जी को स्वस्थ और लम्बा जीवन दे ताकि आपके साथ-साथ समाज को भी ज्ञान का उपहार मिलसके.