रविवार, 27 दिसंबर 2009

दो दिन पूर्व धर्म और ईश्‍वर के विरोध में लिखे गए एक आलेख में मैने ये कमेंट कर दिया है !!

पता नही क्‍यूं , अंधविश्‍वासी स्‍वभाव नहीं होने के बावजूद प्राचीन परंपराएं मुझे बुरी नहीं लगती , धर्म मुझे बुरा नहीं लगता । क्‍यूंकि मैं मानती हूं कि विदेशी आक्रमणों के दौरान हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति का जितना विनाश हुआ , उससे कहीं कम इस स्‍वतंत्र भारत में धर्म के क्षेत्र में घुसकर कमाने खाने वाले चोर डाकुओं ने नहीं किया। इस कारण धर्म का जो भी रूप हमारे सामने है , हम जैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवालों को पच ही नहीं सकता। पर धर्म तो धारण करने योग्‍य व्‍यवहार होता है , उससे हम कब तक दूर रह सकते हैं , आज हमें धर्म के पालन के लिए नए नियम बनाने की आवश्‍यकता है। आज हर क्षेत्र में झूठ और अन्‍याय का बोलबाला है , क्‍या हम हर क्षेत्र को ही समाप्‍त कर सकते हैं ? सबमें सुधार की आवश्‍यकता है , पर बस  हम सिर्फ दोषारोपण करते रहें , तो बात सुधरनेवाली नहीं। यही कारण है कि जब भी मैं धर्म विरोधियों के आलेख देखती हूं , मैं उसमें कमेंट दिए बिना नहीं रह पाती , दो दिन पूर्व भी धर्म और ईश्‍वर के विरोध में लिखे गए एक आलेख में मैने ये कमेंट कर दिया है .............

ईश्‍वर को किसी ने देखा नहीं .. इसलिए इसे मानने की जबरदस्‍ती किसी पर नहीं की जा सकती .. पर हजारो हजार वर्षों से बिना संविधान के .. बिना सरकार के यदि यह समाज व्‍यवस्थित ढंग से चल रहा है .. तो वह धर्म के सहारे से ही .. यदि भाग्‍य, भगवान और स्‍वर्ग नरक का भय या लालच न होता .. तो समर्थों के द्वारा असमर्थों को कब का समाप्‍त कर दिया जाता .. शरीर और दिल दोनो से कमजोर नारियों की रक्षा अभी तक धर्म के कारण ही हो सकी है .. बुद्धि , बल और व्‍यवसायिक योग्‍यता में से कुछ भी न रखनेवालों को भी रोजगार के उपाय निकालकर उनके रोजी रोटी की व्‍यवस्‍था भी धर्म के द्वारा ही की गयी थी .. गृहस्‍थों को इतने कर्मकांडों में उलझाया जाता रहा कि दीन हीनों को कभी रोजगार की कमी न हो .. दूनिया के हर धर्म में समय समय पर साफ सफाई की आवश्‍यकता रहती थी .. पर इसका परिशोधन न कर हम अपनी परंपराओं को , अपने धर्म को गलत मानते रहे .. तो आनेवाले युग में भयंकर मार काट मचेगी .. आज ही पैसे कमाने के लिए कोई भी रास्‍ता अख्तियार करना हमें गलत नहीं लगता .. क्‍यूंकि किसी को भगवान का भय नहीं रह गया है .. जो बहुत बडे वैज्ञानिक हैं .. क्‍या उनके वश में सबकुछ है .. वे भगवान को माने न माने पकृति के नियमों को मानना ही होगा .. और मैं दावे से कहती हूं कि इस प्रकृति में कुछ भी संयोग या दुर्योग नहीं होता है .. हमारे एक एक काम का लेखा जोखा है प्रकृति के पास .. और जब हर व्‍यक्ति इस बात को समझ जाएंगे .. ये दुनिया स्‍वर्ग हो जाएगी .. मेरा दावा है !!





43 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

sangeeta ji

achche achche jo dharm ko nhi mante ek waqt aata hai jab wo bhi manne lagte hain......aap jis cheese ko nhi manege paristhitiyan apne aap manwa lengi uske liye hum kisi ko bhi tark dekar to majboor nhi kar sakte magar samay aur paristhitiyan sab karwa leti hain.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

कई बार सोचता हूं कि धर्म केवल इंसान का ही क्यों होता है

संगीता पुरी ने कहा…

काजल जी ,
सारे जीव जंतु अपने अपने धर्म के अनुसार काम स्‍वयं करते हैं .. पर मनुष्‍य के पास जो अतिरिक्‍त बुद्धि है ना .. इसका दुरूपयोग करने लगता है .. इसलिए इसे नियमों के चंगुल में बांधना आवश्‍यक है !!

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

धर्म, अर्थ (सम्पति), काम (इच्छा)
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धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थो धर्म एव च।

अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थिति॥

परित्यजेदर्थकामो यो स्याता धर्म वर्जितो।

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ब्लोग चर्चा मुन्नाभाई की

ललित शर्मा ने कहा…

इस युग में धर्म शब्द के मायने बदल गए हैं।

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

संगीता जी
आप कुछ बातों से सहमत होते हुए ..कुछ से असहमत होने की सुविधा चाहूंगी .
धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है इसे संप्रदाय के अर्थ में लेना कुछ ठीक नही लगता. आपने ठीक कहा की विदेशी आक्रमणों के कारन भारतीय पुरातन ज्ञान -विज्ञान को बहुत हानि पहुंची है.
जिस विज्ञान की बात आप कर रही हैं वह वस्तुतः समाज के सम्पन्न वर्ग द्वारा फैलाया गया आधे - अधूरे ज्ञान का मायाजाल है. वास्तविक विज्ञान को इस डर से लोगों के सामने आने नही दिया जाता की कहीं वे प्रगति का मार्ग दिखा कर लोगों को दुःख तकलीफों से मुक्त न कर दे. वास्तविक विज्ञान वह है जिसके आधार पर हम कारण और परिणाम में स्पस्ट सम्बन्ध बैठा सकें. इस मायाजाल रूपी अधकचरे ज्ञान से उस वर्ग को लाभ पहुंचेगा जिस के पास सुविधाओं की कोई कमी नही है. रही बात प्रकृति और ईश्वर की वह कोई ऐसा विषय नही जिसे किसी ११-२०० शब्द की टिप्पणी में निपटाया जा सके..उसपर लिख ही रही हूँ ..आगे भी लिखती रहूंगी.
रही बात परंपरा की तब सती प्रथा, मानव वध(बलि) और बहुपत्नी प्रथा भी परम्पराएँ थी ..पर वह कितनी सही थी आप भी जानती हैं. हर बार ज्ञान नई दृष्टि, नए रूप में सामने आता है उसे पुराणी व्याख्याओं से आगे बढ़ा कर देखा जाता है , न की अस्वीकार करके ऐसे हम अपना ही नुकसान करते हैं..खैर ..

अच्छा लगता है जब आप जैसे मित्र पूर्वाग्रह छोड़ कर चर्चा के लिए तैयार होते हैं. कोई बात बुरी लगी हो तब क्षमा कीजिएगा. आपकी सहृदयता के कारण स्पस्ट कहने का मन हुआ.

- Lovely

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

*११-२००=100-200

संगीता पुरी ने कहा…

लवली जी .. बहुत अच्‍छा लगा कि आप मेरे ब्‍लॉग पर आकर इतनी लंबी टिप्‍पणी लिख गयीं .. यही मैं चाहती हूं कि ब्‍लॉगिंग की दुनिया में हमेशा स्‍वस्‍थ बहस हो .. पर आपका ये भ्रम है किवास्तविक विज्ञान को इस डर से लोगों के सामने आने नही दिया जाता की कहीं वे प्रगति का मार्ग दिखा कर लोगों को दुःख तकलीफों से मुक्त न कर दे.दुनिया में हर वक्‍त बल, बुद्धि और व्‍यवासायिक ज्ञान में से कुछ भी न रखने वाले लोग होते हैं .. जिनके पालन पोषण के लिए उन्‍हे सहारा देने की आवश्‍यकता होती है .. वे खुद रास्‍ता नहीं बना सकते .. पर दिखाए रास्‍ते पर तल्‍लीनता से चल सकते हें .. आज की दुनिया में भी ऐसे व्‍यक्ति हैं .. पर उनमें से जो धन संपन्‍न हैं उनकी स्थिति ठीक है .. कोई ट्रेनिंग ले सकते हैं वे .. बाकी के कष्‍ट की सीमा नहीं .. उनके लिए आज के विज्ञान ने कोई व्‍यवस्‍था नहीं की है आज का विज्ञान 'survival of the fittest' को मानता है .. एक अंधी दौड लगाए जा रहे हैं लोग .. जो मजबूत है वो आगे बढेगा वो जितेगा जबकि जो कमजोर है ,गिरकर मर जाए .. पर धर्म ऐसा नहीं कहता .. वह हर स्‍तर के लोगों की खूबियों से फायदा उठाकर पृथ्‍वी के समस्‍त चल और अचल के कल्‍याण की बात करता है .. समाज के विभिन्‍न समुदायों को अलग अलग प्रकार के विज्ञान की जानकारी नहीं दी गयी थी .. तो बिना गणित और विज्ञान के लोहार , सुनार , पीत्‍तल का काम करने वाले , कपास के धागे निकालनेवाले , रेशम के डोर निकालनेवाले , शराब बनाने वाले, जूत्‍ते बनाने वाले या अन्‍य इतने तरह के कलाकार ने जिन जिन विधियों से अपनी अपनी कला का प्रदर्शन किया .. उसमें विज्ञान नहीं था क्‍या .. यदि आप मानती है कि आज ही सिविल इंजीनियर हैं .. तो आपकी गलतफहमी है .. इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल में जो भी बडे बडे इमारत , मंदिर , मस्जिद और पुल बने .. वे कलाकारों के ही दिमाग की ऊपज हैं .. परेशानी तब शुरू हुई जब उच्‍च वर्ग ने इन कलाओं को महत्‍व देना कम कर दिया .. और चूंकि उच्‍च वर्ग के हिस्‍से में अनाज थे .. इसलिए कलाकारों को शोषण का शिकार बनना पडा .. कम मजदूरी देकर उनसे काम करवाए जाते रहे .. जिन्‍हे कालांतर में शूद्र कहा जाने लगा .. उन्‍हें मैं प्राचीन भारत का बडा कलाकार मानती हूं !!
सती प्रथा, मानव वध(बलि) और बहुपत्नी प्रथा तब आयी समाज में जब धर्म के नाम पर ताकतवर ने कमजोरो का शोषण करना शुरू कर दिया था .. हमेशा से गुंडो को समाज में उत्‍पात मचाने का एक बहाना चाहिए होता है धर्म एक बहाना बन गया होगा .. जब सामाजिक राजनीतिक स्थिति के कमजोर पडने से पति के मरने के बाद पत्‍नी को राजाओं या उनके आदमियों द्वारा उठाकर ले जाया जाता हो .. तो जीवनभर झेलने से एक बार मर जाना क्‍या बुरा रहा होगा .. जिस व्‍यक्ति के संतान न होने से मजबूत लोग उसकी संपत्ति को अपने में में मिला लेते हो .. उसका संतान के लिए दूसरा या चौथा विवाह करना क्‍या नाजायज होता होगा .. धर्म की छिछली जानकारी रखनेवालों के लिए ही धर्म खराब हो जाता है .. पर मसेहनजोदडो और हडप्‍पा की खुदाई में हम सारी व्‍यवस्‍था को पाते हैं .. ये सब व्‍यवस्‍था धर्म के क्षरा ही संभव है .. बस धर्म के नाम पर कमा रहे बेईमान लोगों को अलग करना होगा ।

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

संगीता जी मैंने कभी ऐसा नही कहा की विज्ञान सिर्फ आज ही है(पर हर बार कार्य पहले होता है व्याख्या बाद में ) ...बल्कि सच यही है प्राचीन विज्ञान की दुर्दशा होनी आरम्भ हुई जब चंद मुठ्ठी भर लोगों ने पुरे समाज पर कब्ज़ा कर लिया.
उससे पहले हमारा प्राचीन ज्ञान इतना समृद्ध था की ६ - ७ वीं सदी में ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञों ने पृथ्वी की परिधि की गणना लगभग सही ही बताई थी.मुझे भारतीय ज्ञान पर कोई संदेह नही कृपया यह भ्रम आप मन से निकल दे.
पर एक साख्य दर्शन भी हुआ करता था हिन्दू धर्म में उसे ब्राह्मणों ने किस कारण अछूत कर रखा है उसका कारण आप बताएंगी ? क्या सिर्फ इसलिए की वह निरीश्वर वादी दर्शन था..?
मैं भारत के ज्ञान और परम्परा की इज्जत करती हूँ, इसलिए नही की मैं भारतीय हूँ इसलिए की हम
किसी वक्त समकालीन सभ्यताओं से बहुत आगे थे...पर ऐसे किसी विषय का कोई महत्व नही समझती जो खुद को ही स्पस्ट न कर सके.
स्वर्ग- नरक के नाम पर सिर्फ अग्यानिओं को डराया जा सकता है ऐसा नही होता तब बाबाओं के मठ से अरबों की संपतियां और अवैध संबंधों की लम्बी लम्बी कहानियां बाहर नही आती. न ही वह संतोष होता जिसके आधार पर साधारण आदमी का खून चूसकर भी ईश्वर पर भरोसाकरने की सलाह दी जाती है.

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

और हाँ हड्डपा और मोहेंजोदड़ो के लोग प्रकृति और प्रजनन शक्ति के पूजक थे(वहां से प्राप्त मुहरों के अनुसार ). आज मनुष्य जीवित है तो सिर्फ इसलिए की उसने प्रकृति के विरुद्ध जाकर खुद के स्थान ढूंढा प्रकृति दुरह है और उसे साधने का नाम ही विज्ञान है. हम जीवित है क्योंकि हमने प्रकृति से लड़ना सिखा. अगर की परिवार जैसी व्यवस्था न होती (ध्यान दीजिएगा की भाई -बहन जैसा कोई रिश्ता प्रकृति में नही होता ) हम अतः प्रजनन कर के कब के मर खप गए होते. यह पुर्णतः मानव निर्मित व्यवस्था है जिसमे हम जी रहे हैं और इसके चलने और इसके नियमो के संसोधन के लिए हमे किसी दैवीय शक्ति की जरुरत नही है.

संगीता पुरी ने कहा…

ब्‍लॉगिंग की दुनिया से जुडने के बाद ज्‍योतिष या धर्म के क्षेत्र में शायद पहली बार स्‍वस्‍थ मानसिकता से बहस के लिए आप तैयार हुई हैं .. अभी तक मुझे या तो बाहबाही मिली या फिर आलोचना .. पर विज्ञान सिर्फ आज ही है(पर हर बार कार्य पहले होता है व्याख्या बाद में )
आपकी ये बात समझ में नहीं आयी ... पर
किसी एक युग में किसी एक घटना से किसी धर्म को खराब नहीं माना जा सकता है .. आज भी साहित्‍य , ज्‍योतिष , राजनीति या अन्‍य क्षेत्र में शीषर्स्‍थ स्‍थानों पर बैठे लोग नए लोगों या विचारों को महत्‍व नहीं देना चाहते .. अधिक लोग जिस विचारधारा को मानते हैं .. उस युग में उसी की जीत होती है .. पी एन ओक पूरे जीवन इतने रिसर्च किए .. पर वे सही थे या गलत .. इसकी जांच भी हुई .. अधिक इतिहासकार जो कह रहे हैं .. वही सही होगा .. ये तो आज के युग की की बात है .. उतने पुराने एक उदाहरण में आप क्‍यूं जाती हैं ??

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

बात पुराणी चीजो की आपने आरम्भ की इसलिए मैंने वहां का परिप्रेक्ष्य दिया..और 'survival of the fittest' की अवधारणा विज्ञान "के लिए" प्रतिपादित नही है बल्कि प्रकृति के चयन को देखकर सामने आई है.
(पर हर बार कार्य पहले होता है व्याख्या बाद में ) - इसका अर्थ यह है की पहिए की खोज पहले हुई गति का नियम बाद में आया, पर उसका सत्यापन तो हुआ न. कृपया व्यवस्था गत खामिओं के लिए वैज्ञानिको को दोष न दें ..अगर हमने उनके खोजों का गलत उपयोग किया है जिम्मेवार हम है विज्ञान नही.

संगीता पुरी ने कहा…

पुर्णतः मानव निर्मित व्यवस्था है जिसमे हम जी रहे हैं
बिल्‍कुल सहमत हूं आपसे .. इसमें संशोधन के लिए दैवीय शक्ति की आवश्‍यकता भी नहीं है .. इससे भी सहमत हूं .. पर प्रकृति के विरूद्ध कहां जा पाएंगी आप .. आपको बुद्धि प्रकृति ने ही दी है .. जब तक प्रकृति का साथ मिलता है .. लोगों को उसका महत्‍व समझ में नहीं आता .. जिस प्रकार पैसेवाले घर में जन्‍म लेनेवाले लोग पैसों को महत्‍व नहीं देते .. पर जैसे ही प्रकृति का साथ नहीं मिलता है .. उसके महत्‍व को स्‍वीकारते हैं .. मैने अपने जीवन में कितनो को देखा है ऐसा करते .. क्‍या गलती थी रूचिका गिरहोत्रा की .. या अभी भी उससे भी बदतर जीवन जी रही हजारो हजार लडकियों की .. क्‍या आप दावा कर सकती है कि पूरे नौ महीने डॉक्‍टर के देख रेख में रहने के बाद भी बालक असामान्‍य शारीरिक बनावट लेकर नहीं आ सकता है .. इस दौरान सोनोग्राफी की छूट नहीं दी जाए तो !!

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

और मैंने कभी किसी चीज के प्रति अस्वस्थ्य मानसिकता नही रखी..पर लोग चर्चा करना कहाँ चाहते हैं? आगे जो लोग आएँगे या की आपकी वाहवाही और मेरी आलोचना करेंगे या फिर मेरी वाहवाही और आपकी आलोचना. खुद कुछ कहेंगे नही बातों का रुख मोड़ने की कोशिश कि जाएगी. ऐसे माहौल में मैं सिर्फ आपके कारण ही चर्चा के लिए तैयार हुई हूँ इसमें आपको कोई संदेह नही होना चाहिए.

संगीता पुरी ने कहा…

'survival of the fittest' प्रकृति का नियम नहीं है .. यदि वह प्रकृति का नियम होता तो सब जीवो का विनाश युगों पूर्व हो गया होता .. एक एक जीव को उसकी रक्षा के लिए प्रकृति से खास खास शारीरिक विशेषताएं न दी गयी होती .. आज जो प्रजातियां दुनिया से विलुप्‍त हो रही हैं .. वे मानवीय हरकतों की वजह से !!

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

आपको बुद्धि प्रकृति ने ही दी है- मोहतरमा, इसमे जरा अंर्तविरोध है मनुष्य को प्रकृति ने बुद्धि दी की प्रकृति प्रदत्त डरों और और जीने के लिए कभी न मरने वाली इच्छा और अंत तक संघर्ष करने की हिम्मत ही ऐसी ही चीजों थी जिसने मनुष्य में चेतना अथवा बुद्धि भरी. वे जंतु जो सामाजिक नही है जिनमे कोई समष्टि भावना नही है उनमे चेतना नही होती उदहारण के लिए आप पशु पक्षिओं को लें. चेतना मानव के सामाजिक होने का वरदान (कहा जाय तो बाई प्रोडक्ट)है.जो किसी प्रकृति प्रेरणा से नही वरन उसके डरों से अकेले न लड़ पाने के कारण अपने जैसे और सजीवों(human being) से मिलकर मुकाबला करने की प्रवृति(या जरुरत ) के कारण उपजा है.
और विनाश तो हुआ है संगीता जी विशालकाय हांथी मैमथ का डाइनासोर्स का ..मानव का भी होगा इसमें कोई संदेह नही है...अगर की मानव अपनी संख्या अंधाधुंध तरीके से बढ़ता रहा जितने की साधन उपलब्ध नही है..यह न भी हुआ तब भी अगर लोग संप्रदाय, जाति और रंगभेद जैसी कुरीतिओं से बचे रह गए तब सूरज और हमारे सौर परिवार की भी आयु निश्चित है...और हम तब तक बैठ कर सिफ मौत का इन्तिज़ार कर सकते हैं.
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जिस प्रकार पैसेवाले घर में जन्‍म लेनेवाले लोग पैसों को महत्‍व नहीं देते .. पर जैसे ही प्रकृति का साथ नहीं मिलता है- आपकी जानकारी के लिए मैं ने कई साल पार्श्व नाथ के बीहड़ में आदिवशिओन के लिए काम किया हैं बड़ी भी वहीँ हुई हूँ .

संगीता पुरी ने कहा…

देखिए लवली जी .. जहां तक विज्ञान की बात है .. हम दोनों एक मत है .. यदि मैं विज्ञान का थोडा विरोध करती हूं तो इस बात से कि विज्ञान को अपने विकास का एक कदम बढाने से पहले उसके भविष्‍य में होनेवाले प्रभाव को सोंच लेना चाहिए , जिसे वह नहीं करता .. पर धर्म और ज्‍योतिष के मामलों में हमारे मध्‍य इतनी मतभिन्‍नता है कि एक बैठकी में तो स्‍पष्‍ट होने से रही .. इसलिए मैं यह कह दूं कि एक ही माता पिता के दो संतान भिन्‍न भिन्‍न बुद्धि के होने का कारण भी प्रकृति का ही नियम है .. तो आप नहीं मानेंगी .. आपका कहना है कि मनुष्‍य ने अपनी बुद्धि स्‍वयं विकसित की है .. यह कहना वैसे ही हास्‍यास्‍पद है जैसा कि सर्प कहे कि विष मैने अपने शरीर में खुद भरा .. पक्षी कहे कि मैने उडना स्‍वयं सीखा !!

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

पुनः कहूँगी - चेतना मानव के सामाजिक होने का वरदान (कहा जाय तो बाई प्रोडक्ट) है
संगीता जी, पक्षी और सर्प का उड़ना और डसना जैविक गुण है जैसे मनुष्य का खाना -पीना और चलना...चेतना अथवा बुद्धि कोई जैविक गुण नही है. वह सामाजिक गुण है. पक्षिओं को हमारी तरह अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित नही होना पड़ता है. मैं भी प्रकृति विरोधी नही हूँ पर प्रकृति के नाम पर रहस्य बनाये रखने की विरोधी हूँ.
उस व्यवस्था का विरोध करें जिसने मानव के नवीनतम ज्ञान से कोशों दूर सड़ी और गंधाती हुई शिक्षा पद्धति का निर्माण किया है इस का आरोप विज्ञान पर न लगावें (जो उसने किया ही नही)...और मुझे कोई शक नही की यह सब सिर्फ अधिसंख्यक निर्धन मनुष्यों को प्रताड़ित करने के लिए किया गया सुनियोजित उपक्रम है.
अंततः "तमसो माँ ज्योतिर्गमय " यही मनुष्य का स्वभाव होना चाहिए.
सार्थक चर्चा का धन्यवाद.

संगीता पुरी ने कहा…

आपको भी बहुत बहुत धन्‍यवाद लवली जी .. मेरे चिंतन के लिए आपने कई और नए विंदु दिए !!

zeashan zaidi ने कहा…

ईश्वर के बारे में बिना कुछ सोचे समझे उसे सिरे से नकार देना भी एक अंधविश्वास ही है. और अवैज्ञानिक भी.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

सचमुच आज तो मजा आ गया , संगीता जी, आप का और लावली जी की बहस पढ़ करके, दोनों एक दुसरे पर भारी,
लेकिन मेरा खुद का मानना है की प्रकृति और विज्ञान दोनों की जरुरत है. एक विकसित समाज को मजबूत बनाने के लिए, लेकिन प्रकृति का कोई जबाब नहीं है, प्रकृति की ही देन है की इन्सान और जानवर अलग -अलग नजर आते है।

vedvyathit ने कहा…

mhodya dhnyvad man liya pr meri bat shayd dhnyavad ke kabil hi n ho fir bhi
aaj sb se jyada dhrm shbd ka drupuog ho rha hai dhrm ke vastvik ttv v art ko smjhe bina hi hm dhrm 2 chila kr dhrmik bnne or hone ka dhong rch rhe hai sb jante haun dhrm sty se shuru hota hai pr aaj sty ki kya sithit hai sb ko pta hai kon dusara hirsh chndr paida hua hai any lkshno ki chrcha to bad ki bat hai lvli ji ki bat se main bhi shmt hoon ki mt ko bhi dhrm btaya ja rha hai jo anuchit hai or isi se sara ghal mel huaa hai yh lmbi bhs hai vaise bhs to bekar hi haiaachrn hi mhtvpoorn hai yntr pr likhna mere liye kuchh kthin hai yh to shj bhav se sauhard purn vatavrn men mil baith kr aadan prda ki bat hai
dr. ved vyathit@gmail.com

vinay ने कहा…

अच्छा लगा इस लेख की लेखिका संगीता जी और लवली जी की स्वसथ बहस देख दोनों की अपनी,अपनी विचारधारा है,प्रक्रिती के नियमों को ही विज्ञान प्रतिपादित करता है,कुछ लोगों ने धर्म को अपने स्वारथों के कारण कलकिंत कर दिया है,अब तक मेंने पड़ी हुई देखी हुई चीजो के बारे में अपने अनुभब लिखे हैं और टिप्पणी दी है,परन्तु आपने और लवली जी ने तथ्यो को जानने के लिये और अध्यन्न के लिये प्रेरित कर दिया,आप दोनों को तहदिल से धन्यवाद ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

लवली जी, सांख्य तब भी सब भारतीय दर्शनों पर भारी था इस लिए कि उस की अवधारणाएँ वैज्ञानिक थीं। और आज भी उस की मूल अवधारणाएँ उतनी ही सही हैं। एक अच्छी बहस के लिए संगीता जी को और लवली जी को साधुवाद । पर यह तो बहस का आरंभ मात्र है।

अर्कजेश ने कहा…

चर्चा के मुख्‍य बिंदु पूरी तरह स्‍पष्‍ट न होने पर भी कुछ बाते कह रहा हूं ।

1 संगठित धर्मों को विदा होना चाहिए । तभी धर्म के नाम पर शोषण रुक सकता है ।

2 धर्म निहायत व्‍यक्तिगत होना चाहिए , सामाजिक नहीं

3 धर्म का कोई एक विशेष सिद्धांत नहीं है जिसे लेकर बहस की जाय

4 बहस के केंन्‍द्र में सिर्फ ईश्‍वरवादी धर्म हैं , सामान्‍यत: जो आम मानस में प्रचलित है । जबकि धार्मिकता के लिए किसी विचारधारा का अनुसरण करना जरूरी नहीं है

5 धर्म कोई सामाजिक व्‍यवस्‍था नहीं है और न ही किसी भी व्‍यक्ति के किसी कदम से इसे कोई खतरा है

6 धर्म भी एक विज्ञान है और धर्म और विज्ञान में कोई झगडा नहीं है

7 धार्मिक होने के लिए आस्तिकता अनिवार्य नहीं है, यह अवधारणा बहुत ही संकुचित है कि नास्तिक धार्मिक नहीं है ।

8 बुद्ध से बडा धार्मिक नास्तिक कौन होगा । जो कि आत्‍मा के अस्तित्‍व से भी इंकार करते हैं ।

9 धर्म को खतरे की बात इसलिए होती है क्‍योंकि ऐसा कहते वक्‍त किसी एक सम्‍प्रदाय को ख्‍याल में रखा जाता है

10 'सार' अस्तित्‍व से पहले है ।

11 धर्म ने ज्ञान को दबाकर रखा है और विज्ञान ने उसे सबके लिए सुलभ किया है ।

हास्यफुहार ने कहा…

Main andh vishwasi bhi hun aur bhagmaan ko manti hun. Apaka aalekh achchha laga.

Arvind Mishra ने कहा…

देर से आया ...क्षुब्ध हूँ -
लीलावती -गार्गी संवाद से श्रोत द्वय धन्य और ज्ञान रंध्र संतृप्त हुए ! कहीं की विज्ञान चर्चा कहीं हो गयी -जो नित्य नियमित होना ही चाहिए -कहीं का कहीं भी चलेगा ! मैं आँख कान गडाए कहीं और देख रहा था और ज्ञान की निर्झरिणी यहाँ बह रही थी कल कल निनाद करती !
मुझे तो लगता है, न ही लीलावती और न हीं गार्गी अपने अपने अलग रूपं ज्ञान में स्वीकार्य हो पाएगीं जन मनीषा को -क्या ही अच्छा हो दोनों के एक साझा समन्वित रूपाकार की निर्मिति हो और हम नतमस्तक हो जाएँ !

प्रवीण शाह ने कहा…

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भाई जीशान जैदी कहते हैं:-

"ईश्वर के बारे में बिना कुछ सोचे समझे उसे सिरे से नकार देना भी एक अंधविश्वास ही है. और अवैज्ञानिक भी..."

मेरे विचार में तो 'ईश्वर' की अवधारणा को आप तब ही मान सकते हैं जब आप उस विषय में स्वयं कुछ भी सोचे-समझे बगैर केवल उन बातों पर विश्वास कर ले जो हमारे ही कुछ पुरखे संस्कृत, अरबी, हिब्रू, पारसी आदि जबानों में लिख गये हैं। धर्म संबंधी अपने पूर्वाग्रहों को दरकिनार कर, तर्क और तथ्य पर भरोसा कर यदि नतीजा निकाला जाये तो हर कोई इस नतीजे पर ही पहुंचेगा कि धर्म, ईश्वर, धर्मग्रंथ, कर्मकान्ड, स्वर्ग-नर्क और कर्मफल आदि आदि का यह प्रपंच मानव के दिमाग का सबसे मौलिक और सबसे खतरनाक आविष्कार है जिसने आज तक बहुत खून बहाया है और आगे भी बहायेगा । यथास्थिति (STATUS QUO) को बनाये रखने के लिये क्योंकि यह प्रपंच मददगार है इसलिये जानने समझने वाले भी इस प्रपंच को बेनकाब करने के बजाय पुष्ट करते रहते हैं।

आस्था और विश्वास का खोखला तर्क देने वालों से मेरा कहना है कि "मेरी आस्था है, मेरा विश्वास है और मेरी किताब में भी लिखा है कि चांद तो गाय के दूध से निकाले मक्खन से बना है! इसीलिये सफेद है।" अब आप कुछ भी सबूत दो, तर्क करो या समझाओ, मैं तो तभी मानूंगा जब तक कि खुद न देख लूं अब इस जीवन में मैं तो चांद पर पहुंचने से रहा... तो फिर हो गया न चांद गाय के दूध से बनाये मक्खन का !!!

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

@ अर्केजेश जी - मैंने पहली टिप्पणी के पहले वाक्य में कहा है - धर्म को संप्रदाय के अर्थ में लेना कुछ सही नही लगता .... और शेष किसी बिंदु पर चर्चा करनी हो तब पोस्ट लिखें और उसका लिंक मुझे मेल कर दें.
@द्विवदी जी - कभी मौका मिला तब भारतीय पौराणिक विज्ञान और दर्शन पर लिखें ..मैं अभी कुछ समय मनोविज्ञान पर ही लिखूंगी.

संगीता पुरी ने कहा…

अर्कजेश जी,
आपके मुख्‍य विंदुओं में से कुछ से सहमत और कुछ से असहमत हूं ...

1 संगठित धर्मों को विदा होना चाहिए । तभी धर्म के नाम पर शोषण रुक सकता है ।
सहमत।

2 धर्म निहायत व्‍यक्तिगत होना चाहिए , सामाजिक नहीं
संगठित धर्म विदा हो जाएं .. तो नए नियमों का संविधान बनाना ही होगा .. धर्म पालन व्‍यक्तिगत होगा तो व्‍यक्ति अपने सुख के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

3 धर्म का कोई एक विशेष सिद्धांत नहीं है जिसे लेकर बहस की जाय
विशेष सिद्धांत हो न हों .. धर्म के मूल तत्‍व तो होने ही चाहिए।

4 बहस के केंन्‍द्र में सिर्फ ईश्‍वरवादी धर्म हैं , सामान्‍यत: जो आम मानस में प्रचलित है । जबकि धार्मिकता के लिए किसी विचारधारा का अनुसरण करना जरूरी नहीं है
गलत .. किसी भी विचार धारा को तो मानना ही होगा .. विचारधारा को जमाने के उपयुक्‍त बनाना होगा।

5 धर्म कोई सामाजिक व्‍यवस्‍था नहीं है और न ही किसी भी व्‍यक्ति के किसी कदम से इसे कोई खतरा है
दो चार व्‍यक्ति के गलत कदम उठाने से धर्म को खतरा नहीं हो सकता .. पर सारे लोग मनमानी कर लें तो दुनिया कैसे चले ?

6 धर्म भी एक विज्ञान है और धर्म और विज्ञान में कोई झगडा नहीं है
सहमत .. धर्म के नियम यदि विज्ञान के अनुरूप नहीं है तो इसे बनाया जाना चाहिए।

7 धार्मिक होने के लिए आस्तिकता अनिवार्य नहीं है, यह अवधारणा बहुत ही संकुचित है कि नास्तिक धार्मिक नहीं है ।

सहमत .. मेरे पिताजी भी सच्‍च्‍े धार्मिक हैं .. पर आजतक उन्‍होने पूजा नहीं की .. किसी देवता या देवी के आगे सर नहीं झुकाया .. पर सर्वशक्तिमान को मानते हैं .. वे ऐसे दिनों में हजामत करवाते आ रहे हैं .. जो इसके लिए मना किए गए हैं .. वो इस कारण कि उस दिन भीड कम होती है।

8 बुद्ध से बडा धार्मिक नास्तिक कौन होगा । जो कि आत्‍मा के अस्तित्‍व से भी इंकार करते हैं ।
सहमत।

9 धर्म को खतरे की बात इसलिए होती है क्‍योंकि ऐसा कहते वक्‍त किसी एक सम्‍प्रदाय को ख्‍याल में रखा जाता है
सहमत।

10 'सार' अस्तित्‍व से पहले है ।
सहमत।

11 धर्म ने ज्ञान को दबाकर रखा है और विज्ञान ने उसे सबके लिए सुलभ किया है ।
असहमत .. धर्म का असली उद्देश्‍य अज्ञान को दूर कर ज्ञान के प्रकाश को फैलाना रहा है .. पर इसकी पवित्रता प्राचीनकाल से ही लोगों को स्‍वीकार्य नहीं होती है .. और असामाजिक तत्‍व इसके माध्‍यम से इसे दूषित करने का प्रयास करते आ रहे हैं .. ऐसे लोगों को धर्म से बाहर करने की आवश्‍यकता है।

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

अरविन्द जी,
मुझे किसी की मुझसे सहमती/असहमति से कोई विशेष सरोकार नही है. जिन्हें अपनी आँखे खोलकर ज्ञान के प्रकाश को देखने से भय होता है ..उनपर मैं कुछ नही कहना चाहूंगी. सच है की घटाघोप में अभ्यस्त आँखें अचानक तीव्र आलोक से चौंधिया ही जाती है..अभी वक्त लगेगा पर इस कारण न समझौता होगा न समर्पण.
व्याख्याओं में पड़कर मूल पाठ की अनदेखी मुझसे न हो सकेगी. मैं बार -बार कहूँगी हम मनुष्य प्रकृति के रहमोकरम पर नही अपनी चेतना और बुद्धि के उपयोग पर जिन्दा हैं जो स्वअर्जित है. किसी के पास कोई अन्य तर्क है तब उसका स्वागत है.
इति

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…

अच्छी बहस के लिए संगीता जी को और लवली जी को धन्यवाद !!!!!!

Dr.Adhura ने कहा…

sangita ji bhash achhi hai.bas aap dhaem or vigkyan ke bich me fas kar rh gai hai vigkyan hi dharm hai jaha isme tark dekar aadmi ne apne anurup kar liya vaha vghyan rha nahi or vghyan nahi to dharm bhi nahi rha . aap ke dharm vo tathye galat hai jo vigjyan nahi hai. hum dharm ke anurup na chal ke dharm ko apne anurup bana liya . isliye dharm galat ho gaya vighyan tark pr nahi satyata pr chalta hai. saty ka tark nahi hota . tark apne anusar dete hai jo galat ho sakta hai.vighyan hi dharm hai . ane duara banye gaye dham galat hai .blog- adhura darpan.

संगीता पुरी ने कहा…

लवली जी .. आज के युग में आप जिसे तीव्र आलोक कह रही हैं .. वह एक प्रतिशत लोगों के लिए भी नहीं हैं .. मैं तो उन 99 प्रतिशत लोगों की चिंता में हूं .. जिन्‍हें आज इन एक प्रतिशत लोगों को तीव्र आलोक देने के लिए प्राकृतिक संसाधन विहीन होकर घटाटोप में जीना पड रहा है .. और आनेवाले काल में भी विज्ञान के सहारे उनके लिए तीव्र आलोक में जीने की कोई संभावना मुझे नहीं दिखती .. इसलिए अब बेकार की व्‍याख्‍या में मुझे पडना भी नहीं .. चिंतन करते हुए उनके लिए तो कोई रास्‍ता निकालना ही है .. उनके लिए भी रास्‍ता निकालना है .. जो आज के तीव्र आलोक में जीने के बावजूद भी आज की सामाजिक राजनीतिक स्थिति से लाचार परेशान मेरी सलाह की आवश्‍यकता समझते हें .. पर मैं मेहनत करके भी कोई उपाय निकाल ही पाऊंगी .. यह तबतक नहीं कह सकती .. जबतक प्रकृति मेरा सहयोग ना करे .. क्‍यूंकि यदि इस कार्यक्रम के दौरान ही कोई दुर्योग आ सकता है .. या तो मेरी मौत हो जाए .. या मैं पागल हो जाऊं .. या मैं अपंग हो जाऊं .. तो मेरा सारा कार्यक्रम तो अधर में ही रह जाएगा ना .. इस हालत में आप ही बताएं .. चेतना और बुद्धि से क्‍या कर पाऊंगी मैं ??

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

पोस्ट का मुत्व इसी वात से साबित होता है कि इसमें पोस्ट से बड़े कमेंट हैं!

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

संगीता जी मुझे जो कहना था मैं कह चुकी ..अब कुछ नही कहना. आप अपना काम करिए मैं अपना करुँगी ..हो सकता है हमारे रश्ते अलग हो पर हम दोनों ही समाज का भला चाहते हैं. आप अपना प्रयास जारी रखें मैं अपना जारी रखूंगी लोगों को अधिकार है पक्ष चुनने का. वे जिसे ठीक समझेंगे चुनेगे. बात यही खत्म हो जानी चाहिए. आपके लक्ष्य के लिए शुभकामनाएं.

गरिमा ने कहा…

Roman likhne ke liye sabse pahle maafi chaahti hoon, abhi pc me hindi font nahi hai.

dharm aur vigyaan par saal se Bahas hota aa raha hai aura hota rahega, kyunki dharm aur vigyaan dono hi manav man ki upaj hai (aisa mujhe lagta hai) Insaan apane apane soch se chalta hai,aur chalta rahega.

Na mai atyant dharmik hoon na Adharmik hoon, mai ise kuchh aise samajh sakti hoon ki mai jitna sangeeta ji ko padhti hoon Utna hi lovely ko bhi, na hi padhti hoon balki sahmat bhi hoti hoon, ab iska matlab ye nahi banta ki mai ek confused personality hoon (kam se kam meri apani najar me).

Mai hamesha is baat se pareshaan rahi ki agar ishwar ek hai to log use alag alag naamo se kyun jante hain? Ishwar agar satya hai to Satya ek hi kyun nahi hai? Ishwar agar asatya hai to iske pichhe log diwane kyun ban gaye? Haan par asatya se deewangi bhi ho sakti hai…. Haan shayad

Iska jawaab mujhe khood se kuchh aisa mila ki, mai Hoon aur mere honepan me kaii roop chhipe hain, aur sabhi sach hai, jhutha ek bhi nahi, pratek insaan mujhe alag alag roop me jaanta hai, to iska matlab ye kataii nahi ki mai ek jhooth hoon, meri samajh me ye aaya ki ishwar ke saath aisa hi kuchh hoga.

Ishwar, Bhagwaan, Karmkand, wagairah wagairah naam mere kaano me bachpan se pade jinse chhutkaara paana asaan nahi hoga, par mai paana bhi nahi chaahti.

Dharm ko kaha jaata hai “jise dharan kiya jaa sake wo dharm hai” yaani ki mera aachrana, aahar vihaar, khana pina, padhna likhna, etc etc sabkuchh dharm hai.

Dharma Samajik vyawastha bhi aur wyaktigat wywastha bhi. Dharm Samyak banaata hai. Par yeh sab aisa lagta hai ki maansik khel hai. Ho sakta hai iske pare bhi ho, par uske pare soch sakun abhi wo sthiti nahi pahuchi.

Vigyaan, yah bhi to yahi hai, kisi topic ko samjhna, uspar kaam karma nishkarsh nikaalna, amal karma, itna hi samjhti hoon. Jaise koi beemaari hai to uske kaaran ke bare me jaana, usko theek karne ke liye research kiya, medicine banaaii, aur theek kiya, par yeh sab bhi dimaagi halchal hai, mara huwa dimaag na dharm ke bare me soch sakta hai na vigyaan ke bare me.

Ab baati aatii hai sahmati asahmati ki to wo to chalta rahega, harek insaan ke sochne ka dhang alag hota hai aur isi kaaran vikaas hota hai, yahi sochne ka tarika jab kahi atak jaye to samaj ka vikaas ruk jaata hai…

Mai samjhti hoon Dharm aur Vigyaan do alag alag shabd maatra hai bhaaw wahi hai…. Insani soch…

संगीता पुरी ने कहा…

लवली जी .. मैने पहले ही एक आलेख में लिखा है कि जब दो व्‍यक्ति का लक्ष्‍य अच्‍छा होता है .. तो वे प्रतिस्‍पर्धी हो जाते हैं .. जबकि जिनका लक्ष्‍य बुरा होता है .. उनमें बडी दोस्‍ती होती है .. यही कारण है कि बुरे लोगों का लक्ष्‍य पूरा हो जाता है .. और अच्‍छे लोग अपने लक्ष्‍य में कामयाबी नहीं पाते .. पर मैं ऐसा नहीं होने देना चाहती .. मैं तो उन सभी लोगों को साथ लेकर काम करूंगी .. जो समाज के लिए बेहतर व्‍यवस्‍था का लक्ष्‍य रखते हैं .. विश्‍वास में लेकर मैं अपने कार्यक्रमों में आपको अवश्‍य साथ रखूंगी .. क्‍यूंकि आपका तेवर मुझे अच्‍छज्ञ लगा !!

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

अच्छा तो मुझे भी लगता है आपका स्वभाव, आपके विचार.आप,सिद्धार्थ जोशी जी ऐसे ज्योतिष है जिनसे मैं अक्सर संवाद कर पाने की स्थिति में होती हूँ. कई लोग तो सीधे मुझे यूरोपीय देशो का वक्ता और भारतीय प्राचीन ज्ञान का विरोधी बताते हैं. अपनी -अपनी सोंच है किस किस को समझाया जाय...बेहतर होगा अपना काम करती रहूँ . लोगों को जवाब मिलाता रहेगा. यह भी योजना है की कभी निरीश्वर वादी प्राचीन भारतीय दर्शन पर कुछ लिखूं पर पहले मनोविज्ञान फिर और कुछ.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

पर एक साख्य दर्शन भी हुआ करता था हिन्दू धर्म में उसे ब्राह्मणों ने किस कारण अछूत कर रखा है उसका कारण आप बताएंगी ? क्या सिर्फ इसलिए की वह निरीश्वर वादी दर्शन था..?
ऐसा क्या? अन्यदर्शनों की तरह सांख्य दर्शन के प्रवर्तक भी ब्राह्मण ही थे. सभी भारतीय दार्शनिक सत्यशोधक ही थे.

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

@स्मार्ट इंडियन - अनुराग जी हो सकता है मैं चर्चा में आक्रामक होकर उक्त वाक्य लिख गई हूँ ..पर सवाल यह है की कौन सी सामाजिक शक्तियां भारतीय प्रत्ययवाद (खासकर माया वाद और अज्ञेयवाद) को इतना समृद्ध और प्रसिद्द करवाने में लगी थी की आज कहीं भी प्राचीन भौतिकवाद का नामलेवा कोई न बचा(आसाम -बंगाल के कुछ क्षेत्रों को छोड़ कर)?

सागर नाहर ने कहा…

बड़ी ही उलझन है।
संगीताजी की पोस्ट पढ़ते समय लगता है कि ज्योतिष, भगवान आदि सब कुछ एकदम सही है,या वे वास्तव में होते हैं।
यहां से उठ कर लवली जी के यहां जाकर उनकी पोस्ट पढ़ने से लगता है कि यह सब फालतू बातें है। भगवान- आदि कुछ नहीं होते।
क्या करूं, किधर जाऊं- एक तरफ संगीता जी एक तरफ लवली जी!!
:)

संगीता पुरी ने कहा…

सागर नाहर जी .. लवली जी की पोस्‍ट और मेरी पोस्‍टों में कोई विरोधाभास नहीं है .. लवली जी की सोंच बिल्‍कुल सही है .. और मैं उनके हर आलेख से सहमत होती हूं .. पर सच सिर्फ उतना ही नहीं होता .. जितना हमें दिखाई देता है .. हमारी आंखों से ओझल भी बहुत सारे सत्‍य होते हैं !!