शनिवार, 28 मार्च 2009

आइए , थोडा ही सही , मातृ ऋण को चुकता करने की कोशिश तो करें

कल की नीरज नाम के उक्‍त व्‍यक्ति की टिप्‍पणी से बनी मेरी परेशानी को दूर करने में और हौसला बढाने में आप सब पाठकों का जो सहयोग मिला , उसके लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद। आइए , आज ज्‍योतिष की चर्चा न कर एक खास मुद्दे पर चर्चा करें। इतनी बडी जनसंख्‍या का बोझ उठाती , भोजन , वस्‍त्र , आवास जैसी मूल आवश्‍यकताओं के साथ ही साथ अन्‍य हर प्रकार की जरूरत को पूरा करती धरती माता के अहसान को याद करें। आजतक धरती माता हमारी सारी जरूरत इसलिए पूरी कर पा रही है , क्‍योंकि वह समर्थ है। पर सोंचकर देखें , उस दिन के बारे में , जब यह असमर्थ हो जाए , जिस दिशा में जाने की सिर्फ शुरूआत ही नहीं हुई , बहुत दूर तक का सफर तय किया जा चुका है। अपनी आंचल और गर्भ में हमारे लिए हर सुख सुविधा को समेटे हरी भरी धरती माता खूबसूरत रूप ही आज खोता जा रहा है।


बीसवीं सदी के अंधाधुंध जनसंख्‍या वृद्धि की आवश्‍यकताओं को पूरी करने के क्रम में हो या विकास की अंधी दौड के लालच में , कल कारखानों की संख्‍या के बढने से पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पडना स्‍वाभाविक है। पृथ्‍वी के बढते हुए तापमान से हिम पिघलते जा रहे हें , जलस्‍तर नीचे आता जा रहा है , समुद्र तल बढता जा रहा है। साधनों के अंधाधुंध दोहन से धरती माता की सुंदरता तो समाप्‍त हुई ही है , उसके सामर्थ्‍य पर भी बुरा प्रभाव पड रहा है और माता ही जब सामर्थ्‍यहीन हो जाए तो उसे मजबूरीवश ही सही , उसे बच्‍चों को रोता बिलखता छोडना ही होगा। हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते कि वह दिन कितना भयावह होगा।


आजतक हमने अपनी पृथ्‍वी मां को कुछ दिया नहीं है , देना भी नहीं था , सिर्फ इसे नष्‍ट भ्रष्‍ट होने से बचाए रखना था , वो भी नहीं कर पाए हमलोग। कल से ही रचना जी और अरविंद मिश्रा जी ने कई ब्‍लोगों के माध्‍यम से ‘धरती प्रहर’ में अपना वोट धरती के पक्ष में देने की अपील की है। वैसे अभी तक इस दिशा में किया जानेवाला प्रयास काफी कम है और हमें मालूम है कि इससे पूरी सदी में बिगाडे गए पर्यावरण को बनाने में सफलता नहीं मिलेगी। फिर भी आइए , थोडा ही सही , मातृऋण को चुकता करने की दिशा में कम से कम प्रयास तो किया जाए। आज धरती माता के पक्ष में मतदान करने के लिए साढे आठ बजे से साढे नौ बजे तक अपने घर के बिजली के मेन स्विच को ही आफ कर दें और एक घंटे बिना बिजली के बिताकर धरती माता के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करें।

आइए , थोडा ही सही , मातृ ऋण को चुकता करने की कोशिश तो करें

कल की नीरज नाम के उक्‍त व्‍यक्ति की टिप्‍पणी से बनी मेरी परेशानी को दूर करने में और हौसला बढाने में आप सब पाठकों का जो सहयोग मिला , उसके लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद। आइए , आज ज्‍योतिष की चर्चा न कर एक खास मुद्दे पर चर्चा करें। इतनी बडी जनसंख्‍या का बोझ उठाती , भोजन , वस्‍त्र , आवास जैसी मूल आवश्‍यकताओं के साथ ही साथ अन्‍य हर प्रकार की जरूरत को पूरा करती धरती माता के अहसान को याद करें। आजतक धरती माता हमारी सारी जरूरत इसलिए पूरी कर पा रही है , क्‍योंकि वह समर्थ है। पर सोंचकर देखें , उस दिन के बारे में , जब यह असमर्थ हो जाए , जिस दिशा में जाने की सिर्फ शुरूआत ही नहीं हुई , बहुत दूर तक का सफर तय किया जा चुका है। अपनी आंचल और गर्भ में हमारे लिए हर सुख सुविधा को समेटे हरी भरी धरती माता खूबसूरत रूप ही आज खोता जा रहा है।


बीसवीं सदी के अंधाधुंध जनसंख्‍या वृद्धि की आवश्‍यकताओं को पूरी करने के क्रम में हो या विकास की अंधी दौड के लालच में , कल कारखानों की संख्‍या के बढने से पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पडना स्‍वाभाविक है। पृथ्‍वी के बढते हुए तापमान से हिम पिघलते जा रहे हें , जलस्‍तर नीचे आता जा रहा है , समुद्र तल बढता जा रहा है। साधनों के अंधाधुंध दोहन से धरती माता की सुंदरता तो समाप्‍त हुई ही है , उसके सामर्थ्‍य पर भी बुरा प्रभाव पड रहा है और माता ही जब सामर्थ्‍यहीन हो जाए तो उसे मजबूरीवश ही सही , उसे बच्‍चों को रोता बिलखता छोडना ही होगा। हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते कि वह दिन कितना भयावह होगा।


आजतक हमने अपनी पृथ्‍वी मां को कुछ दिया नहीं है , देना भी नहीं था , सिर्फ इसे नष्‍ट भ्रष्‍ट होने से बचाए रखना था , वो भी नहीं कर पाए हमलोग। कल से ही रचना जी और अरविंद मिश्रा जी ने कई ब्‍लोगों के माध्‍यम से ‘धरती प्रहर’ में अपना वोट धरती के पक्ष में देने की अपील की है। वैसे अभी तक इस दिशा में किया जानेवाला प्रयास काफी कम है और हमें मालूम है कि इससे पूरी सदी में बिगाडे गए पर्यावरण को बनाने में सफलता नहीं मिलेगी। फिर भी आइए , थोडा ही सही , मातृऋण को चुकता करने की दिशा में कम से कम प्रयास तो किया जाए। आज धरती माता के पक्ष में मतदान करने के लिए साढे आठ बजे से साढे नौ बजे तक अपने घर के बिजली के मेन स्विच को ही आफ कर दें और एक घंटे बिना बिजली के बिताकर धरती माता के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करें।

गुरुवार, 26 मार्च 2009

धर्म गलत कैसे हो सकता है ?


धर्म गलत कैसे हो सकता है ? आज उसे गलत ढंग से परिभाषित किया जा रहा है। धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य व्यवहार , जिससे पूरी मानव जाति का शारीरिक , आर्थिक , मानसिक और पारिवारिक .... और इन सबसे अधिक नैतिक विकास हो सके , भले ही उसके लिए दुनिया को थोड़ा भय , दबाब या लालच दिया जाए। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि कोई भी विश्वास कभी ज्यादती के आधार पर नहीं हो सकती। यह सर्वदेशीय या सर्वकालिक भी नही हो सकता। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही किसी धर्म का महत्व कम हो जाए , जिस युग और जिस देश में इनके नियमों की संहिता तैयार होती है , यह काफी लोकप्रिय होता है। किसी भी देश में साधन और साध्‍य के मध्‍य तालमेल बनाने में समाज हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए किसी तरह का विकल्प तैयार किया जाए , तो वह इसे अपनाने को पूर्ण तैयार होता है , इसे ही धर्म कहकर पुकारा जाता है। कालांतर में इसमें कुछ ढकोसले , कुछ अंधविश्वास , कुछ तुच्छता स्वयमेव उपस्थित होते चले जाते हैं , जिसको समय के साथ शुद्ध किया जाना भी उतना ही आवश्‍यक है।



यदि हिन्‍दु धर्म की ओर ध्‍यान दें , तो यहां गुरू सिर्फ आध्‍यात्मिक मामलों के ही गुरू नहीं , हर विषय के अध्‍येता हुआ करते थे। वे वैज्ञानिक भी थे और दार्शनिक भी और उनके द्वारा जो भी नियम बनाए गए , वे समूचे मानव जाति के कल्‍याण के लिए थे। अतिवृष्टि और अनावृष्टि की मार से बर्वाद हुए फसल की क्षतिपूर्ति के लिए यदि समय समय पर फलाहार के बहाने बनाए गए तो गलत क्‍या था ? पर्व त्‍यौहारों पर लाखों की भीड को नदी में स्‍नान कराने और नदी के तल से सबों को एक एक मुट्ठी मिट्टी निकालने के क्रम में नदियों की गहराई को बचाया जाता रहा तो इसमें गलत क्‍या था ? तात्‍कालीक फल न प्रदान करने वाले पीपल और बट के पेडों के नष्‍ट होने के भय को देखते हुए और उसके दूरगामी फल को देखते हुए उन्‍हें धर्म से जोडा गया तो गलत क्‍या था ? संबंधों का निर्वाह सही ढंग से हो सके , इसके लिए एक बंधन बनाए गए तो इसमें गलत क्‍या था ? चूहा, उल्लू, गरुड़, हाथी, सिंह , सबको भगवान का वाहन मानने के क्रम में पशुओं से भी प्रेम करने की पवृत्ति बनायी गयी , तो इसमें गलत क्‍या था ? पुराने त्‍यौहारों पर गौर किया जाए तो पाएंगे कि इसके नियमों का पालन करने में एक एक वस्‍तु की जरूरत पडती है , जिन्‍हें मानने के क्रम में समाज के विभिन्‍न वर्गों के मध्‍य परस्‍पर गजब का लेन देन होता है और त्‍यौहार के बहाने ही सही , पर वर्षभर लोगों को जरूरत पडनेवाली हर प्रकार की सामग्री हर घर में पहुंच जाती है ।


वास्‍तव में, किसी भी बात की सही व्‍याख्‍या तभी की जा सकती है , जब उस विषय विशेष का गंभीर अध्‍ययन किया गया हो। पुराने सभी नियम पुराने युग की जीवनशैली के अनुरूप थे , आज उनका महत्‍व कम दिखाई पड सकता है , पर उसमें सुधार की पूरी गुजाइश है। मैं विचारों से उसे ही धार्मिक मानती हूं , जिसके अंदर वे सभी गुण हों , जो धारण किए जाने चाहिए। मैं परमशक्ति में विश्‍वास रखती हूं , बाह्याडंबरों में नहीं, एक ज्‍योतिषी होने के बावजूद पूजा पाठ में बहुत समय जाया करने पर भी मेरा विश्‍वास नहीं और न ही परंपरागत रीति रिवाजों को ही हूबहू मानती हूं। एक भगवान पर या प्रकृति के नियमों पर विश्‍वास रखो तो कितना भी दुख विपत्ति आ जाए , असीम शांति मिलती है। हमेशा लगता है, भगवान या प्रकृति हमारे साथ हैं । वैसे इस बात पर भी विश्‍वास रखना चाहिए कि काम प्रकृति के नियमानुसार ही होते हैं , लाख भगवान की पूजा कर लो, कुछ बदलने वाला नहीं , पर इस बहाने शांति ही मिलती है तो कम बडी बात नहीं।


आज कुछ लोगों और कई संस्थाओ का लक्ष्य धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास , पुरातनपंथ , ढकोसलों को समाप्त करना है , यह तो बहुत ही अच्छी बात है , क्योंकि हमारा लक्ष्य भी यही है। लेकिन हर व्यक्ति या पूरे समाज को किसी भी मामले में एक विकल्प की तलाश रहती है। झाड़.फूंक को तब मान्यता मिलनी बंद हो गयी , जब इलाज के लिए लोगों को एलोपैथी के रूप में एक वैज्ञानिक पद्धति मिली। यदि ये संस्थाएं आज के युग के अनुरूप समाज , प्रकृति और अन्‍य हर प्रकार के विकास के लिए आवश्‍यक कुछ नियमों की संहिता तैयार करें , जो सारे मानव जाति के कल्याण के लिए हो , तो भला जनता उसे क्यो नहीं मानेगी ? दो.चार लोगों के नियम विरूद्ध होने या अधार्मिक होने से युग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता , किन्तु यदि उन्हें देख सारी जनता अधर्म के राह पर चल पड़े , नैतिक विकास या मानवीय मूल्‍यों से अधिक महत्व अपने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक और पारिवारिक विकास को दे , तो सुख.शांति का अंत होना ही है। इसके कारण आनेवाले समय में मानवजाति चैन से नही जी पाएगी। ऐसे में आज भी जरूरत है धर्म की ही सही परिभाषा रचने की और उसके अनुरूप जनता से क्रियाकलापों को अंजाम दिलवाने की। यदि इसमें ये संस्थाएं कामयाब हुईं , तो मानव जाति का उत्थान निश्चित है।



धर्म का दिखावा करनेवाले पाखंडी , धोखेबाज और कपटी लोगों के प्रभाव में जनता कुछ दिनों के लिए भले ही बेवकूफ बन जाए , किन्तु फिर जल्‍द ही उनकी पोल अवश्य खुल जाती है , जबकि महात्मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , स्वामी दयानंद , स्वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक , चैतन्य महाप्रभु जैसे अनेकानेक व्‍यक्तित्‍व धर्माचरण के द्वारा युगों.युगों तक पूजे जा रहे हैं। फिर धर्म को गलत कैसे और क्यों समझा जाए ?

धर्म गलत कैसे हो सकता है ? ( Astrology )


धर्म गलत कैसे हो सकता है ? आज उसे गलत ढंग से परिभाषित किया जा रहा है। धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य व्यवहार , जिससे पूरी मानव जाति का शारीरिक , आर्थिक , मानसिक और पारिवारिक .... और इन सबसे अधिक नैतिक विकास हो सके , भले ही उसके लिए दुनिया को थोड़ा भय , दबाब या लालच दिया जाए। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि कोई भी विश्वास कभी ज्यादती के आधार पर नहीं हो सकती। यह सर्वदेशीय या सर्वकालिक भी नही हो सकता। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही किसी धर्म का महत्व कम हो जाए , जिस युग और जिस देश में इनके नियमों की संहिता तैयार होती है , यह काफी लोकप्रिय होता है। किसी भी देश में साधन और साध्‍य के मध्‍य तालमेल बनाने में समाज हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए किसी तरह का विकल्प तैयार किया जाए , तो वह इसे अपनाने को पूर्ण तैयार होता है , इसे ही धर्म कहकर पुकारा जाता है। कालांतर में इसमें कुछ ढकोसले , कुछ अंधविश्वास , कुछ तुच्छता स्वयमेव उपस्थित होते चले जाते हैं , जिसको समय के साथ शुद्ध किया जाना भी उतना ही आवश्‍यक है।


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बुधवार, 25 मार्च 2009

क्या भारतीय नेता अंधविश्वासी होते जा रहे हैं ? ( Astrology )

पत्रिकाओं में पढ़ने को मिला कि भारत के अधिकांश नेता अंधविश्वासी होते जा रहे हैं , जिन्हें देखकर वैज्ञानिकों को बहुत चिंता हो रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार वे समाज को जो संदेश दे रहे हैं , उससे समाज के अन्य लोगों के भी अंधविश्वासी बन जाने की संभावना है। मैनें पढ़ा , तो अचंभा हुआ , नेता और अंधविश्वासी ? अरे अंधविश्वास तो गरीबों , निरीहों और असहायों का विश्वास है , जो उन्हें जीने की शक्ति देता है। अधिकांश रिक्शाचालक मौका मिलने पर भी यात्री का सामान लेकर चंपत नहीं होते। अधिकांश नौकर मालिक की एक अठन्नी का भी स्पर्श नहीं करते। अधिकांश नौकरानियॉ अपने अय्याश मालिक के द्वारा दिए गए लालच को ठुकरा देती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका दिमाग अंधविश्वासी है और वे अगले जन्म में मिलनेवाले फल के भय से उपरोक्त पापों को अंजाम न देने को कृतसंकल्प हैं। वे न सिर्फ अपने हक की कमाई से ही जीने की सामर्थ्‍य रखते हैं , वरन् अपनी छोटी-मोटी उपलिब्घयों से ही खुश होकर अपने सामर्थ्‍यानुसार ढाई , पॉच या ग्यारह रुपए का चढावा लेकर निर्मल मन से मंदिर में पहुंच जाते हैं। इनकी तुलना भला नेताओं से की जा सकती है ?

नेताओं को न तो अपने क्षेत्र की जनता के लिए कुछ काम करने की चिंता है और न ही उनके पैसों का घोटाला करने पर भय। लूट-मार-हत्या तो इनकी आगे बढ़ने की सीढ़ी ही हैं। इनका दामन थामें बिना वे तो वे तरक्की ही नहीं कर सकते। इन पापों को करते वक्त वे अगले जन्म की क्या ,अगले चुनाव तक की चिंता नहीं करते। अनुचित ढंग से हासिल किए गए असीमित पैसों की बदौलत वे पुन: भगवान का आशीर्वाद , जनता की मुहब्बत और अपनी गद्दी --- सबकुछ प्राप्त कर लेने का दुस्साहस रखते हैं। वैज्ञानिक भले ही चिंतित हों कि नेताओं के ज्योतिश , धर्म और अन्य अंधविश्वासों के प्रति रुचि के उपस्थित होने से जनसामान्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है , पर मै आश्वस्त हूं , इन नेताओं के कर्मों से समाज की सोंच का क्षेत्र व्यापक हो रहा है।

सोमवार, 23 मार्च 2009

क्‍या प्रश्‍नकुंडली से सही भविष्‍यवाणी की जा सकती है ? ( Astrology )

बहुत सारे ज्योतिषी मूल कुंडली के अभाव में प्रश्नकुंडली से ही यजमानों की समस्याओं को समझने की चेष्‍टा करते हैं और उनकी समस्याओं का समाधान भी करते हैं। मूल कुंडली के अभाव में प्रश्नकुंडली की विवेचना भलमनसाहत के साथ ही साथ एक सद्प्रयास की बात हो सकती है , किन्तु इसके माध्यम से वस्तुत: उद्देश्य-पूर्ति में कामयाबी भी मिलती होगी , इसपर मुझे संदेह है। इस प्रकार की प्रक्रिया अपनाकर ज्योतिशी किसी न किसी प्रकार की उलझन में ही फंसते चले जाते हैं। जब हजारों वर्षों के प्रयास से आजतक फलित ज्योतिष का जितना विकास हुआ है , उससे मूल कुंडली की ही सही व्याख्या और घटनेवाले घटनाओं के सही समय की जानकारी नहीं दी जा सकती है , तो प्रश्नकुंडली से क्या सही कहा जा सकता है , यह सोंचनेवाली बात हो सकती है ?


मूल कुंडली किसी भी व्यक्ति के समग्र चरित्र , विचारधाराओं , मूल प्रवृत्तियो , संस्कार , कार्यक्षमता , मंजिल , संसाधन और सुख-दुख का परिचायक होती है। जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति और गति सर्वदा प्रकृति के भिन्न और अनोखे स्वरुप का ही प्रतिनिधित्व करती है। प्रकृति या शिव का स्वरुप प्रतिक्षण बदलता है। प्रकृति का स्वरुप शाश्वत होते हुए भी अनंतस्वरुपा है। एक बार जो दिखाई पड़ा , उसे पुन: देख पाना काफी कठिन है। अत: प्रश्नकुंडली के द्वारा व्यक्ति की मूल कुंडली की व्याख्या या मौलिक विशेषताओं का एक अंश भी सही चित्रण कर पाना काफी कठिन होगा। प्रश्नकुंडली बनाकर ज्योतिशी निश्चित रुप से अपने उद्देश्य पूर्ति में 12 लग्नों के बीच के एक लग्न का चयन कर लेते हैं और उसे ही उस जातक की नियति समझ बैठते हैं , फिर वही संभावना और लॉटरी की चर्चा हो गयी , जिससे आजतक फलित ज्योतिश गुमराह होते हुए कश्टकर परिस्थितियों से गुजर रहा है। लॉटरी से संबंधित भाग्यफल जैसा कि मैने पहले ही कहा है , आहत और व्याकुल मन की शांति के लिए अस्थायी राहत प्रदान करने वाला हो सकता है , किन्तु किसी भी हालत में पक्की और स्थायी भविष्‍यवाणी का सशक्त आधार नहीं हो सकता।

क्‍या ज्‍योतिषियों का यह व्‍यवहार उचित है ? ( Astrology )

अभी दो चार माह पूर्व मेरे पास एक सज्‍जन आए। अभी पिछले वर्ष ही तो उन्‍होने बहुत ही अच्‍छे घर परिवार के अच्‍छे लडके से अपनी पुत्री का विवाह किया था। पर आज वे बहुत परेशान थे , परेशानी की वजह उनकी वही बेटी, जिसे ससुरालवालों ने विवाह के दस महीने बाद वापस मायके पहुंचा दिया है। पति मुंबई में ही किसी कंपनी में सर्विस करता है, पर अभी तक वह वहां पहुंच भी नहीं सकी थी कि अपनी घर गृहस्‍थी जमा पाती। विवाह के बाद के एक महीने ससुराल में वह बहुत ही अच्‍छी तरह रही । एक महीने बाद पति के वापस जाने पर भी दो चार महीने परिवार के लोगों का व्‍यवहार काफी अच्‍छा था , पर अचानक एक हादसा हो गया। उसके ससुर को भ्रष्‍टाचार के किसी आरोप पर नौकरी से निलंबित कर जेल भेज दिया गया। इतने दिनों से तनख्‍वाह और उपरी , दोनो ही तरह की आमदनी से रईसी का जीवन गुजारनेवाले ससुर जी के सामने अचानक बहुत बडी समस्‍या आ गयी थी। जैसा कि ऐसी स्थिति में अक्‍सर होता है , लोग मानते हैं कि किसी ग्रह के प्रभाव से ही ऐसा हो रहा है और रत्‍न धारण या पूजा पाठ के द्वारा ग्रहों को , भगवान को खुश किया जा सकता है। जमानत होने के बाद एक अच्‍छे ज्‍योतिषी को बुलाया गया। ज्‍योतिषी जी ने घर के सब सदस्‍यों की जन्‍मपत्री देखी , कुछ चिंतन किया और सीधा सारा इलजाम बहू के सर पर डाल दिया। 'आपने इस कन्‍या से विवाह क्‍यों किया , कन्‍या आपलोगों के लिए अशुभ है' भले ही उसने अपना प्रभाव बढाने के लिए ऐसा कहा हो , पर इसका बुरा प्रभाव बेचारी कन्‍या के जीवन पर भी पड सकता है , उसने यह नहीं सोंचा। अभी तो वह नवविवाहिता पूरी तरह ससुराल का अपनापन भी नहीं प्राप्‍त कर सकी थी। तभी तो उसके बारे में न सोंचकर परिवार के लोगों ने पंडितों की बात मान ली और परिवार मे गंभीर विचार विमर्श के बाद उसे वापस मायके पहुंचा दिया। वे लोग बुरे नहीं थे , पंडित के द्वारा कही गयी बातों से भयभीत थे। लडकी के माता पिता से मिलकर वे एक ही विनती किए जा रहे थे कि शादी में खर्च हुए सारे पैसे वे वापस कर देंगे ,वे चाहें तो और ले लें , पर वे कन्‍या को अपने घर पर नहीं रखेंगे , क्‍योंकि उनका संकट और बढ सकता है। वे चाह रहे थे कि जल्‍द से जल्‍द कन्‍या तलाक के पेपर पर साइन कर दे।


लडकी के माता पिता भी उनके इस व्‍यवहार से बिल्‍कुल हैरान परेशान थे ,उन्‍होने जन्‍मकुंडली मिलवाकर विवाह किया था , विवाह करने के बाद मां बाप एक जवाबदेही से मुक्‍त होना चाहते हें और विवाह के बाद ऐसी परेशानी उपस्थित हो गयी थी। अचानक उसके ससुराल में आयी विपत्ति उनको भी कुछ सोंचने को मजबूर कर रही थी। यदि ज्‍योतिषी की बात पर विश्‍वास करें , तो उन्‍हें भी लडकी को उनके घर भेजने पर भय हो रहा था। ऐसी स्थिति में मै तो जन्‍मकुंडली देखने के पक्ष में ही नहीं थी , क्‍योंकि विवाह से पहले विचार विमर्श होना और बात है , पर विवाह के बाद क्‍यों इसे देखा जाए ? यदि उस लडकी की जगह उनकी अपनी बेटी ने जन्‍म लिया होता तो क्‍या वे घर से निकाल देते ? इस दुनिया में हमलोग बहुत बातों के साथ समझौता कर लेते हैं , क्‍योंकि उसके सिवा हमारे पास कोई विकल्‍प नहीं होता। यहां भी ऐसा ही होना चाहिए क्‍योकि विवाह के बाद लडके या लडकी के लिए कोई विकल्‍प नहीं खुला रह जाता है। हमारे समाज में अभी तक तलाक को बहुत ही पेचीदा रखा गया है , तो कोई गलत नहीं है , कम से कम एक पक्ष की मनमानी तो नहीं चलती कि जल्‍दी ही तलाक देकर दूसरी शादी रचा ली जाए।


फिर भी उक्‍त सज्‍जन के अनुरोध पर मैने लडकी की जन्‍मकुंडली देखी ,वैवाहिक जीवन स्‍पष्‍ट तौर पर गडबड दिखाई दे रहा था ,उसके सामने परिस्थितियां तो कुछ न कुछ गडबड आनी ही थी , सो आयी । उसकी कुंडली के अनुसार ससुरालवालों पर भी समस्‍याएं आनी थी , पर उस कन्‍या का विवाह उनके समाज के इतने सारे घरों को और इतने लडकों को छोडकर उन्‍हीं के घर क्‍यों हुआ ? उक्‍त परिवार के ग्रहों में भी कोई गडबडी अवश्‍य रही होगी। चूंकि सबो को झेलना था , इसलिए ईश्‍वर ने उन्‍हें साथ साथ रख दिया। चूंकि विवाह के बाद यह सब हुआ तो यह एक बहाना मिल गया कि कन्‍या के कारण ही हुआ है। समस्‍याएं आगे छह वर्षों या बारह वर्षों तक बनी ही रहनी थी , चाहे कन्‍या उनके साथ रहे या न रहे। और जब झेलना ही है तो बेटे से कन्‍या को तलाक दिलवाने की क्‍या जरूरत ? लेकिन मेरे उपदेशों को सुनने के लिए लडकेवाले मेरे पास आने को तैयार न थे। वे अपने ही ज्‍योतिषी की बात को लकीर मानकर बैठे थे। मेरे पास तो एक ही सज्‍जन इस प्रकार की समस्‍या लेकर आए हैं , पर न जाने दुनिया के कितने परिवार की ऐसी कहानी होगी ? मैं बस यही सोंच रही थी कि क्‍या ज्‍योतिषियों का यह व्‍यवहार उचित है ?

रविवार, 22 मार्च 2009

फिर आनेवाला है एक छोटा ढैय्या ( Astrology )

मेरे ब्‍लाग को पढने वाले सारे पाठक अबतक एक छोटे ढैय्या से अवश्‍य ही परिचित हो गए होंगे , जो आसमान के खास भाग में ढाई दिनों तक विभिन्‍न ग्रहों की युति के कारण उपस्थित होते हैं और इसके कारण लोगों को किसी न किसी प्रकार की परेशानी का सामना करना पडता है। इन दिनों में कोई भी काम मनोनुकूल ढंग से नहीं हो पाता और कभी कभी असामान्‍य परिस्थितियां भी उपस्थित हो जाया करती हैं। कुछ लोगों को शारीरिक या मानसिक कष्‍ट झेलने को भी बाध्‍य होना पडता है , खासकर जिनके जीवन का जो पक्ष संवेदी हो , वह अवश्‍य ही उभरकर इन दिनों मे उपस्थित हो जाया करता है।


26 मार्च 2009 को सूर्य , शुक्र , चंद्र और बुध चारो ही ग्रहों की स्थिति मीन राशि में मात्र 5 डिग्री की दूरी पर रहेगी। इस योग के प्रभाव से 26 और 27 मार्च का समय लोगों के लिए काफी तनाव भरा हो सकता है। एक साथ इतने ग्रहों का उपस्थित होना सामान्‍य बात नहीं होता है , इस योग से प्राकृतिक तौर पर होनेवाली दुर्घटनाओं के अलावे किसी प्रकार की लापरवाही या जानबूझकर की गयी दुर्घटनाएं भी हो जाया करती हैं, इसलिए थोडी सावधानी से रहना उचित होता है। इस दौरान यात्रा भी कष्‍टदायक होती है , इसलिए घूमने फिरने का कार्यक्रम न ही बनाए तो अच्‍छा रहेगा , बहुत जरूरी होने पर तो यात्रा कर ही सकते हैं , अब इसके लिए थोडा तनाव भी हो जाए तो चिंता क्‍या करनी ? ऐसे दिनों में किसी प्रकार का निर्णय भी काफी तनाव भरा होता है , इसलिए व्‍यर्थ की माथापच्‍ची से बचें और आवश्‍यक न हो तो निर्णय को दो चार दिनों के लिए टाल देना बेहतर रहता है। इन्‍हीं ग्रहों को देखते हुए मैने इन दोनो दिनों को शेयर बाजार के लिए भी प्रतिकूल माना है।

ग्रहों की इस स्थिति का ऐसा प्रभाव हो सकता है , इसपर सहज विश्‍वास नहीं किया जा सकता। इस कारण कुछ लोगों को ऐसा भी महसूस हो कि व्‍यर्थ ही सनसनी फैलाने वाली या फिर भयभीत करनेवाली कोई बात लिखी जा रही है , पर ऐसा नहीं है , भयभीत होने की आवश्‍यकता भी नहीं। सिर्फ ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है कि ये दोनो दिन आम दिनों से कुछ हटकर है या नहीं। वैसे इस ग्रह स्थिति का सर्वाधिक बुरा प्रभाव सिंह राशिवालों पर पडेगा। इसके साथ ही जिन लोगों ने किसी भी वर्ष अगस्‍त और सितम्‍बर महीने में जन्‍म लिया है , वे भी खासे प्रभावित हो सकते है । तुला राशि वालों के लिए यह दिन अच्‍छा रह सकता है , इसी तरह अक्‍तूबर नवम्‍बर में जन्‍म लेनेवाले भी बहुत प्रभावित नहीं होंगे। अन्‍य राशिवाले और अन्‍य महीनों में जन्‍म लेनेवाले इस ग्रहयोग से सामान्‍य तौर पर प्रभावित होंगे।

आज ही नुककड में प्रकाशित मेरा एक आलेख 'हम ब्‍लागरों में सबसे बडा स्‍टेटस किसका ?' को पढने के लिए यहांक्लिक करें।