शनिवार, 11 अप्रैल 2009

आखिर निकलते निकलते समीर लाल जी ने मेरे फोन की घंटी बजा ही दी

जिस बात की उम्‍मीद लगाए बैठे हो वह मिल भी जाए तो उतनी खुशी नहीं होती , जितनी उस बात के पूरे होने में , जिसकी उम्‍मीद आप छोड चुके हों। ऐसी ही खुशी मुझे कल तब मिली , जब अपना फोन उठाने पर मुझे मालूम हुआ कि यह फोन समीर लाल जी ने किया है। दरअसल उन्‍होने भारत आने से पहले ही मेरा फोन नं लिया था , पर आने के बाद इतनी व्‍यस्‍तता ही थी कि फोन नहीं कर सके थे , पर जाते जाते उन्‍हें याद आ ही गया कि कोई काम बाकी रह गया है और मुझे फोन कर ही लिया। हिन्‍दी ब्‍लाग जगत के सभी सदस्‍य अब एक दूसरे से इतने परिचित हो गए हैं कि महसूस ही नहीं होता कि हम पहली बार बात कर रहे हों , उनसे बातें करने का अनुभव बहुत अच्‍छा रहा।


मैने चिट्ठा पढने से पहले लिखना ही शुरू किया था , इसीलिए कौन कौन से लोग हिन्‍दी चिट्ठाकारिता से जुडे हैं , इसका कोई आइडिया नहीं था , जब मैने अपने चिट्ठे पर कमेंट करनेवालों का प्रोफाइल देखा , तब चिट्ठाकारों से परिचय आरंभ हुआ। फिर दूसरों के चिट्ठों को खोलने और उनकी टिप्‍पणियों में औरों के प्रोफाइल से धीरे धीरे सबको जानने लगी थी। इस प्रकार ब्‍लोगों की टिप्‍पणियों से ही हिन्‍दी ब्‍लाग जगत के लोगों से मेरा परिचय बढना शुरू हुआ , तो यह कहना गलत न होगा कि मैने चिट्ठाजगत के दो चार लोगों को भी पहचानना आरंभ किया हो तो उसमें समीर लाल जी थे। यह भी कहा जा सकता है कि हिन्‍दी चिट्ठा जगत से जुडे किसी भी ब्‍लागर के लिए समीर लाल जी के परिचय में दो चार सप्‍ताह से अधिक समय नहीं लगता होगा। इसका मुख्‍य कारण सभी ब्‍लोगों मे नियमित तौर पर की जाने वाली उनकी टिप्‍पणी ही है , इसमें भी शक नहीं। हिन्‍दी ब्‍लाग जगत को प्रतिदिन दो चार घंटों का समय देकर ब्‍लोगरों को प्रोत्‍साहित करने का उनका प्रयास सराहनीय है। कोई छोटा हो या बडा हो , अच्‍छा लिखता हो या बुरा लिखता हो , किसी भी विषय को किसी भी रूप में लिखता हो , सबकी पढते हैं , सबमें टिप्‍पणी करते हैं , इसके एवज में उनको लोकप्रियता मिली है , तो यह बिल्‍कुल सामान्‍य बात है ।


समीर लाल जी का भारत मे रहना भले ही उनके लिए या जबलपुर वालों के लिए खुशी की बात हो , पर हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में एक खालीपन नजर आता रहता है। कुछ महत्‍वपूर्ण ब्‍लोगों को छोड दिया जाए , क्‍योंकि उसमें टिप्‍पणी करनेवालों की तो कमी नहीं रहती , पर समीर जी की इंटरनेट में कम समय देने से सामान्‍य ब्‍लोगों में टिप्‍पणी की कमी साफ तौर पर नजर आती है। मैने नवम्‍बर से समीर लाल जी की वजह से हुए इस खालीपन को भरने का पूरा प्रयास किया है , नए ब्‍लोगरों को भी मै नियमित तौर पर प्रोत्‍साहित कर रही हूं, पर उनके जैसी सटीक टिप्‍पणी कर पाना मेरे वश की बात नहीं है। इसके बावजूद मेरे पास सभी ब्‍लोगरों के धन्‍यवाद भरे मेल आते हैं , तो मुझे बहुत खुशी होती है। पर अब समीर लाल जी जैसे ही कनाडा पहुंच जाएंगे और अपना बहुमूल्‍य समय यहां देना शुरू करेंगे , मेरा भार कुछ हल्‍का हो जाएगा। अंत में , मुझे याद रखने के लिए समीर लाल जी को बहुत बहुत धन्‍यवाद।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

कम से कम 12 अप्रैल तक मौसम खुशनुमा बना रहेगा

दो चार दिनों से यत्र तत्र आंधी ,पानी की खबरें तो पढ रही थी , पर मुझे होश कल आया , जब कल रात यहां बोकारो में भी बारिश हो ही गयी। हमने ग्रहों का मौसम के साथ तालमेल करते हुए कुछ ज्‍योतिषीय सिद्धांतों को भी विकसित किया है। मैने एक पुराने आलेखमें भी कहा था कि ग्रहों के आधार पर मौसम की भविष्‍यवाणी की एक विधा के रूप में ज्‍योतिष के सिद्धांतों को बडे स्‍तर पर ले जाने की बडी संभावना है। पर इस सप्‍ताह आसमान में ऐसी कोई स्थिति नहीं बन रही थी , जो मौसम को प्रभावित करती हो। मैने बडे रूप से मौसम को प्रभावित करनेवाले सारे नियमों पर एक बार फिर से निगाह डाला , वह योग 1 से 4 मई 2009 को ही बन रहा है। छोटे छोटे योग भी बरसात के दिनों में ही काम करते हैं। और अभी कोई छोटा योग भी नहीं। बार बार ग्रहों की दो चार दिनों की स्थिति पर ध्‍यान डालने से एक बात स्‍पष्‍ट हो ही गयी।

इस सप्‍ताह ग्रहों की जो स्थिति बन रही है , खासकर आनेवाले तीन दिनों में , वह सम परिस्थितियां लाती हैं । इसका अर्थ यह है कि आप जिस भी माहौल में हों , कुछ बेहतर महसूस करना आरंभ कर देते हैं। मतलब कि 90 प्रतिशत लोगों के लिए यह ग्रहयोग लाभदायक होता है और वे शारीरिक , मानसिक , आर्थिक या फिर अन्‍य कारणों से कोई तनाव झेल रहे हो , तो उन्‍हें अवश्‍य राहत मिल जाती है। पर जब इस दृष्टि से चिंतन किया तो वस्‍तुस्थिति साफ हो गयी। इस बेमौसम हल्‍की फुल्‍की बरसात की खास वजह लोगों के समक्ष आरामदायक माहौल उपस्थित करना ही था। अप्रैल के आरंभ में ही इतनी भीषण गर्मी जनसामान्‍य के संकट को बढा रही थी , पर जब राहत देनेवाले ग्रहों की बारी आयी तो उसने बादल इकट्ठा कर ,तापमान को कम कर मौसम को खुशनुमा बना दिया है । जो भी किसान या अन्‍य लोग इस बेमौसम के बरसात से चिंतित हों , उन्‍हें फसल के नुकसान की या अन्‍य तरह की क्षति की जो आश्‍ंका दिखाई पड रही है , वह नहीं होनेवाली , वैसे पांच प्रतिशत मामलों में कुछ गडबडी हो जाए तो बात अलग है , पर वह भी 12 अप्रैल के बाद ही होगा । 12 अप्रैल तक मौसम के खुशनुमा बने रहने की पूरी संभावना है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

विभिन्‍न रंगों की वस्‍तुओं के मांग और पूर्ति के संतुलन पर इनसे संबंधित ग्रहों का प्रभाव

संपूर्ण संसार रंगमय है , यह मानना तो काफी कठिन है , पर सत्‍य है कि रंगों में अद्भुत प्रभाव होता है । यह तथ्‍य भी सर्वविदित ही है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। यदि ये नियम सही हैं तो चंद्र के द्वारा दूधिया सफेद , बुध के द्वारा हरे , मंगल के द्वारा लाल , शुक्र के द्वारा चमकीले सफेद , सूर्य के द्वारा तप्‍त लाल , बृहस्पति के द्वारा पीले और शनि के द्वारा काले रंग का परावर्तन भी एक सच्‍चाई होनी चाहिए।


पृथ्‍वी में हर वस्‍तु का अलग अलग रंग है , यानि ये भी अलग अलग रंगों को परावर्तित करती है । इस आधार पर सफेद रंग की वस्‍तुओं का चंद्र , हरे रंग की वस्‍तुओं का बुध , लाल रंग की वस्‍तुओं का मंगल , चमकीले सफेद रंग की वस्‍तुओं का शुक्र , तप्‍त लाल रंग की वस्‍तुओं का सूर्य , पीले रंग की वस्‍तुओं का बृहस्‍पति और काले रंग की वस्‍तुओं का श‍नि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि विभिन्‍न रंगों की वस्‍तुओं के मांग और पूर्ति का संतुलन असंतुलन और मूल्‍य पर इनसे संबंधित ग्रहों का प्रभाव देखा जाता है। एक नजर में यह बात बिल्‍कुल अंधविश्‍वास लगती है , पर आपको अपने और वाहमनी ब्‍लाग के संचालक कमल शर्मा जी के बातचीत का दो स्‍नैप शाट दिखा रही हूं , आप अवश्‍य मान जाएंगे कि ग्रहों का विभिन्‍न रंग की वस्‍तुओं पर अलग अलग प्रभाव पडता है। पहली बातचीत हमलोगों के मध्‍य 21 फरवरी 2009 को हुई , जिस समय गत्‍यात्‍मक दृष्टि से गोचर में शुक्र और बृहस्‍पति की स्थिति मजबूत और शनि की कमजोर चल रही थी आप यह बातचीत देखें .....





उसके बाद शनि के मजबूत हो जाने पर दो अप्रैल 2009 को हमारे मध्‍य जो बातचीत हुई , इसे भी आप पढे , स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि ग्रहों का प्रभाव विभिन्‍न रंग की वस्‍तुओं पर पडता है या नहीं । तो हमारी बातचीत देखें ....


मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

हमारी छत एक तरह की वेधशाला ही थी ....

मेरे जीवन में भले ही ग्रह नक्षत्रों ने जन्‍म से ही प्रभाव डालना आरंभ कर दिया हो , पर ग्रह नक्षत्रों में खुद के ध्‍यान देने की कहानी कब से शुरू हुई , पूरा याद नहीं। शायद यह सिलसिला उस दिन से आरंभ हुआ हो , जिस दिन की एक घटना मुझे अक्‍सर याद आ जाती है। मेरे छत के उपर की मंजिल तैयार ही हुई थी और हमलोगों को छत के दो कमरे मिल गए थे। संयुक्‍त परिवार होने से मम्‍मी नीचे रसोई में बहुत व्‍यस्‍त रहा करती और मुश्किल से 12 या 13 वर्ष की उम्र में ही बडी बहन होने के नाते छोटे सभी भाई बहनों की जिम्‍मेदारी मुझपर ही आ गयी थी , जिन्‍हें मैं अक्‍सर छत पर ही संभाला करती थी। एक दिन अपने साथ ही साथ सब भाई बहनों को कमरे के आगे के चौडे बरामदे पर होमवर्क देकर पढने बैठाया तो मेरी नजर चांद पर पडी। पूर्णिमा का चांद पूरी छटा बिखेरता ठीक सामने पूर्वी क्षितिज पर उदित हो रहा था। दूसरे दिन पापाजी ने अभी तक पढाई शुरू न करने का कारण पूछा तो मैने उन्‍हें जानकारी दी कि मै कल के टाइम यानि चांद निकलने के बाद ही पढाई शुरू करूंगी। तब पापाजी ने समझाया कि चांद हर दिन पहले दिन की तुलना में 48 मिनट बाद निकलता है। इसका कारण पूछने पर उन्‍होने प्रतिदिन सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य बढते अंतर और इसके कारण सूर्यास्‍त के बाद चंद्रमा के देर से होते जाने वाले उदय का अंतर स्‍पष्‍टत: समझाया। उसी दिन संभवत: मैने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के घटने के बारे में भी जानकारी प्राप्‍त कर ली थी , जो किताबों और स्‍कूलों में पढाए जाने के के बाद भी उतनी स्‍पष्‍ट नहीं हो सकी थी।


हमलोग पापाजी को रातभर आसमान को निहारते हुए देखता पाते। वे ग्रहों को देखते , एक ग्रह से दूसरे की कोणिक दूरी और ग्रहों की गति में अंतर ही उनके अध्‍ययन का मुख्‍य विषय था । उसके आधार पर ही वे मुहल्‍ले के एक एक परिवार में और अपने परिवार के एक एक लोगों और अपने साथ हो रही घटनाओं का तालमेल बैठाते , ग्रहों की मुख्‍य स्थितियों की मौसम ,बाजार , देश और विश्‍व की राजनीति से तुलना करते और फिर ये सब करते हुए किसी एक नियम का सत्‍यापन हो जाता। जाडे और बरसात में तो हमें इन सब के बारे में बातें करने की कोई गुंजाइश नहीं थी , क्‍योंकि हम कमरे में और वे छत पर होते थे। पापाजी से इन सब बातों के बारे में चर्चा करने का मौका हमें तब मिलता , जब गर्मियों में हमलोग सभी खुले छत के नीचे सोया करते। सामने खुला आसमान और उसमें डूबे हुए पापाजी , हमलोगों के द्वारा भी प्रश्‍नों की बौछार होती। पापाजी हम बच्‍चों की ग्रह नक्षत्रों में रूचि नहीं देखना चाहते थे , उनका कहना था कि इसने मेरा कैरियर चौपट किया ही है , अब तुमलोग अपना कैरियर बचाओ। पर दिन रात जो बात दिमाग में चल रही हो , उसका मुंह से निकलना बिल्‍कुल स्‍वाभाविक होता और इस तरह हमलोगों के समक्ष ग्रहों के किसी न किसी रहस्‍य का पर्दाफाश हो ही जाता।


आप पाठको को अभी तक इस बात की जानकारी हो ही गयी होगी कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के सिद्धांत पापाजी के अपने मौलिक सोच के आधार पर विकसित किए गए हैं और इसके आधार पर भविष्‍यवाणी करने के लिए हमें प्राचीन फलित ज्‍योतिष की गणनाओं का बहुत कम सहारा लेना पडता है। आज किसी ग्रह की जो खास स्थिति बन रही है , वह फिर कब आएगी और उसका मोहल्‍ले के किस घर में, अपने घर के सारे सदस्‍यों में कैसा प्रभाव पडेगा , मौसम पर कैसा प्रभाव पडेगा , बाजार पर कैसा प्रभाव पडेगा, ये सब समझकर और फिर देखकर प्रकृति के नियमों के प्रति मन में श्रद्धा जन्‍म लेती। लोगों पर क्‍या प्रभाव पडेगा , इसके लिए जन्‍मकुडली देखने की आवश्‍यकता थी , जिसकी मुझे तब बिल्‍कुल भी जानकारी नहीं थी। इसलिए छोटी छोटी अन्‍य बातों को देखकर खुशी होती। सौरमंडल के अंदर की ही, पर धीरे धीरे मैं हर ग्रह को पहचानने लगी थी। हर ग्रह की गति को जानने लगी थी और उसके महत्‍व को समझने लगी थी। फिर पापाजी के न चाहने के बावजूद मेरा मन इसी में रमने लगा , उन्‍हीं की तरह किसी नौकरी में समय जाया करने की अपेक्षा ज्‍योतिष को विकसित करने के लिए ही समय देना जरूरी समझते हुए मैने अपना जीवन भी झोंक ही दिया । मेरी रूचि को देखने के बाद पापाजी ने मुझे कुंडली बनाना तो बहुत बाद में सिखाया। गणित में बहुत अधिक रूचि होने के कारण मैने कुंडली बनाना , लोगों का जीवनग्राफ खींचना भी बहुत जल्‍द सीख लिया और फिर भविष्‍यवाणियां करने लगी। जैसे जैसे पापाजी के सिद्धांत की सत्‍यता को प्रमाण मिलता गया , मैं दि ब दिन इसकी गहराइयों में डूबती चली गयी। आज सोचती हूं तो महसूस होता है, शायद यह सबकुछ न होता यदि हमारा छत न होता। सचमुच हमारी छत एक तरह की वेधशाला ही थी।

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

भविष्‍य को अनिश्चित और रोमांचक ही रहने दिया जाए ?

फलित ज्‍योतिष की विवादास्‍पदता के लिए जो मुख्‍य बात जिम्‍मेदार है , वह यह कि यदि भाग्‍य से ही हमें सबकुछ प्राप्‍त होना या न होना लिखा है तो फिर कर्म करने का क्‍या फायदा ? हमने हमेशा ही लोगों को समझाया है कि हमें जन्‍म के बाद और जीवनपर्यंत जिन परिस्थितियों का सामना करना पडता है , वह हमारा प्रारब्‍ध है , पर हम अपने सोंच , अपनी मेहनत और अपने क्रियाकलापों के द्वारा जो प्राप्‍त करते हैं , वह परिणाम होता है। जन्‍म के पूर्व और तुरंत पश्‍चात् सभी बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यवहार या माहौल में असमानता प्रारब्‍ध को सिद्ध करने के लिए काफी है। पर यह भी सच है कि हम पिछले जन्‍म के कर्म से अपने भाग्‍य में जो कुछ भी लेकर आते हैं और जन्‍मकुंडली के द्वारा उसे जानने का प्रयास करते हैं , उसे मेहनत से बढाया या घटाया जा सकता है और इसे हर स्‍तर तक ले जाया जा सकता है। इसमें प्रारब्‍ध का कोई वश नहीं , यह सिर्फ हालात पैदा करने भर के लिए उत्‍तरदायी है।

मान लिया कोई व्‍यक्ति अपने भाग्‍य में काफी मजबूत शरीर लेकर आया है , पर वह उसपर और अधिक ध्‍यान दे , तो शरीर की मजबूती बढते हुए उसे किसी भी स्‍तर तक ले जाकर उसे इनाम पाने का हकदार बना सकती है। इसी प्रकार यदि वह भाग्‍य से कमजोर शरीर लेकर आया है , तो जहां सावधान रहने से उसकी कमजोरी उसे कम परेशान करेगी , वहीं सावधान न होने से यह अधिक तकलीफदेह हो जाएगी , उससे संबंधित महत्‍वाकांक्षा तो वह रख ही नहीं सकता है , क्‍योंकि महत्‍वाकांक्षा भी अपने शरीर की मजबूती को देखकर ही की जा सकती है। इसी प्रकार धन और संपत्ति का मामला है , भाग्‍य से धन और हर प्रकार की संपत्ति की प्राप्ति की एक निश्चित सीमा होती है , पर कर्म से उसे अनिश्चित की ओर ले जाया जा सकता है।


किसी किशोर में प्रकृति प्रदत्‍त प्रतिभा है , हर बात को सीखने समझने की प्रवृत्ति है , पर सामाजिक माहौल न मिल पाने से उसका बौद्धिक विकास ढंग से नहीं हो सकता है। आखिर पाकिस्‍तान के सभी बच्‍चों का जन्‍म तो भारत में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों से अलग समय पर नहीं होता होगा ? उनकी जन्‍मकुंडली तो भारत के बच्‍चों से अलग नहीं होती होगी , पर क्‍या कारण हो सकता है कि बच्‍चे की प्रतिभा का या तो उपयोग ही नहीं हो रहा या फिर उपयोग गलत क्षेत्र में हो रहा है। यह उस देश की परिस्थितियों का दोष है , इसे कर्म से सुधारा जा सकता है। भारत के युवा अगर प्रतिभा में वैश्विक स्‍तर के हैं , तो वह यहां की शिक्षा प्रणाली के कारण हैं , सिर्फ भाग्‍य के कारण नहीं। इसी प्रकार जीवन जीने का अलग अलग ढंग पर भी विशेष क्षेत्र या युग का प्रभाव देखा जा सकता है। इसलिए कर्म करने से इंकार तो नहीं किया जा सकता।

लोगों का यह भी मानना है कि भविष्‍य सिर्फ आनंददायक ही नहीं होता , इसमें उलझनें भी होती है , कठिनाइयां भी होती हैं , तो क्‍यों न इसे अनिश्चित और रोमांचक ही रहने दिया जाए। इसे भी सही माना जा सकता है , पर फिर भी भविष्‍य की परिस्थितियों को जानना सबके लिए आवश्‍यक है , क्‍योंकि भविष्‍य में उपस्थित होनेवाली सफलताओं की जानकारी जहां वर्तमान कठिनाइयों से लडने की शक्ति देती है , वहीं भविष्‍य में उपस्थित होनेवाली कठिनाइयों की जानकारी अति आशावाद को कम कर , निश्चिंति को कम कर कर्तब्‍यों के प्रति जागरूक बनाती है। भविष्‍य इतना भी दृढ और निश्चित नहीं होता कि आपका रोमांच नहीं बने रहने दे , क्‍योंकि भविष्‍य को प्रभावित करने छोटा अंश ही सही , पर सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक , पारिवारिक परिवेश भी होता है और मनुष्‍य का खुद कर्म भी , इसलिए सबकुछ ईश्‍वर और ज्‍योतिषी पर न छोडकर कर्म करना मनुष्‍य का पहला कर्तब्‍य होना चाहिए।

रविवार, 5 अप्रैल 2009

काश !! हमारा सपना दिल्‍ली में एक कोठी लेने का ही होता।

21वीं सदी आरंभ हो चुकी थी , पत्र पत्रिकाओं में पढा करती थी कि देश नए नए सपने देख रहा है या फिर उसे हकीकत में बदलने की कोशिश कर रहा है। कभी राष्‍ट्रपति कलाम जैसों की देशभक्ति की चर्चा होती कि उनके द्वारा 2020 तक भारत को शिखर पर ले जाने कर योजनाएं बन रही है , तो कभी माशेलकर जी के कारण भारत के विज्ञान के क्षेत्र में हो रही उपलब्धियों की। किरण वेदी की संस्‍था ‘प्रोजेक्‍ट इंडिया विजन फाउंडेशन’ के द्वारा दी जानेवाली ‘ओरिजिनल माइंड अवार्ड’ की और अनिल जी के द्वारा देश के कोने कोने से प्रतिभाओं को ढूंढकर लाए जाने की। परंपरागत ज्ञान विज्ञान को बढावा देने के कार्यक्रम की भी अक्‍सर चर्चा होती ही रहती।


पापाजी 1999 में दिल्‍ली चले गए थे और अपने जीवनभर के शोध को लेकर इधर उधर भटक रहे थे। शोध भी इतना महत्‍वपूर्ण कि मात्र किसी की जन्‍मतिथि , जन्‍मसमय और जन्‍म स्‍थान से किसी भी व्‍यक्ति के जीवनभर की परिस्थितियों के उतार चढाव का लेखाचित्र खींच पाने में सफलता प्राप्‍त कर सकना। हजारो लोगों के जीवन का ग्राफ खींचा , विरले ही अपवाद आया हो। इधर मैं अपने घर में परेशान , आखिर पापाजी को सफलता क्‍यों नहीं मिल रही है ? मैने भी यहां से कोशिश करनी आरंभ की। सबसे पहले ‘कादम्बिनी’ के तात्‍कालीन् संपादक राजेन्‍द्र अवस्‍थी जी को पत्र लिखा कि वे 40 वर्ष से अधिक उम्र वाले दो चार व्‍यक्तियों के जन्‍म विवरण मुझे भेजें , ताकि उनके बारे में भविष्‍यवाणी कर मैं ज्‍योतिष को विज्ञान साबित कर सकूं। उन्‍होने तुरंत जवाब भेजा , पर हमारा दुर्भाग्‍य , उसके साथ जो दो चार विवरण भेजे जाने थे , वो पृष्‍ठ अटैच नहीं हो सका। यहां दोबारा पत्र लिखा , पर फिर जवाब नहीं‍ मिला। इसके बाद कई पत्र पत्रिकाओं में कोशिश की , पर फल वहीं ढाक के तीन पात।

महामहिम राष्‍ट्रपति जी से मिलने के लिए पापाजी ने अपनी पूरी फाइल भेजी , उन्‍होने अप्‍वाइंटमेंट तक दे दिया , पर मिलने के समय कुछ ऐसी व्‍यस्‍तता आयी कि उसे कैंसिल करना पडा , फिर दोबारा वहां भी मौका न मिल सका। माशेलकर जी के तात्‍कालीन सेक्रेटरी मि कालरा से भी मैने फोन पर बातचीत की , उसके बाद अपने भाई को वहां भेजा , पर शायद समय की कमी हो या कोई और समस्‍या पापाजी को सुनने में उन्‍होने दिलचस्‍पी नहीं दिखायी। मैने एक शोधपत्र का रूप देते हुए अपने सिद्धांत को ‘सी एस आई आर’ में भी दो बार भेजा , पर वहां से यह खेद के साथ वापस आ गया कि ज्‍योतिष विषय उनके क्षेत्र में नहीं आता , इसलिए वे इसे न तो प्रकाशित कर पाएंगे और न ही घ्‍यान दे पाएंगे। एक किन्‍ही अनिल कुमार के बारे में काफी पढा , पर जब भी साइट को खोलने की चेष्‍टा की , वह नहीं खुला। मेरा भाई किरण वेदी की संस्‍था ‘प्रोजेक्‍ट इंडिया विजन फाउंडेशन’ के द्वारा दी जानेवाली ‘ओरिजिनल माइंड अवार्ड’ के लिए भी दौड लगाते रहा , पर फार्म ही उपलब्‍ध नहीं हो सका कि फार्म भरा जा सके।


ज्‍योतिष के क्षेत्र में खासी लोकप्रियता के बावजूद हमारी निराशा बढती जा रही थी कि अचानक एक दिन विज्ञान प्रगति के किसी अंक में भारतीय विज्ञान लेखक संघ के अध्‍यक्ष डा आर डी शर्मा का पता मिला । मैने एक और कोशिश करने का निश्‍चय किया , उन्‍हें अपनी उपलब्धियों का जिक्र करते हुए पत्र लिखा कि वे 40 वर्ष से अधिक उम्र के 10 लोगों के जन्‍म विवरण भेज दें , मै उनकी जीवनयात्रा के बारे में लिखूंगी। उन्‍होने पत्रोतर देते हुए लिखा ‘आपलोग दिल्‍ली में कुछ नेताओं का चुनाव से पहले भविष्‍य बताएं। 10 में से 4 या 5 भी उनके बताए अनुसार जीत गए तो फिर नेता पूजने लगेंगे और सेठ लोग भी। दिल्‍ली में तो ज्‍योतिषी ऐसे ही कोठियां खडी कर लेते हैं।‘ मेरी परीक्षा के लिए उन्‍होने कुछ जन्‍म विवरण अवश्‍य भेजें , कहा कि यदि आप सही बता सकें तो मै आपका मुरीद हो जाउंगा। पर उन्‍होने जो जन्‍म विवरण भेजा , दो को छोडकर बाकी का जन्‍म 1982 के बाद हुआ था यानि सभी 20 वर्ष से भी कम उम्र के । अब इतनी कम उम्र में उनलोगों ने कौन सा उतार चढाव देखा होगा कि मैं उसकी चर्चा कर सकूं। दो जन्‍म विवरण पर मैने काम किया जो उन लोगों में सर्वाधिक थे यानि जिनका जन्‍म 1976 और 1977 में हुआ था , हालांकि वे भी अधिक तो नहीं पर उस वक्‍त 27 और 28 वर्ष के थे । पर वे उससे संतुष्‍ट नहीं हुए ,क्‍योंकि उसके बाद उनका कोई पत्र मुझे नहीं मिला। पर उसके कुछ दिनों बाद एक महिला का पत्र मुझे मिला ,जिसने बताया कि वह शर्मा सर के यहां काम करती है और मेरे द्वारा लिखी गयी बातें बेटी के जीवन से मैच कर रही थी इसलिए वह और भी कुछ जानना चाहती थी। पर दूसरे के बारे में मुझे कोई खबर नहीं मिल पायी।


फिर उसके बाद हमने पुस्‍तको को लेकर सिर्फ प्रकाशक के यहां ही चक्‍कर लगाए हैं , पर प्रकाशक भी पुस्‍तकों को छापना नहीं चाहते। समाज से ज्‍योतिषीय एवं अन्‍य भ्रांतियों को दूर करने का सपना दूर दिखायी पड रहा है। ब्‍लागिंग से बडी आस जगी है , पर कभी कभी मन विचलित भी हो जाता है ,इतना बडा सपना जो देख लिया है , तब सोंचती हूं ‘काश !! हमारा सपना दिल्‍ली में एक कोठी लेने का ही होता।‘