शनिवार, 18 जुलाई 2009

हेड या टेल : यह ज्‍योतिष का नहीं आंकडों का खेल है

कल ज्‍योतिष को चुनौती दिए जाने से पहले मैने अपनी ओर से कुछ सुझावों का जिक्र किया था ,जिसे आप मेरी शर्तें भी मान सकते हैं । पर फिर भी पाठकों ने इसका स्‍वागत किया ,इसके लिए उनका बहुत बहुत शुक्रिया। वैसे इतनी सावधानी बरतने के पीछे जो कारण है ,उसके बारे में आप अनजान हो सकते हैं ,पर मैं नहीं। वैसे मैने अभी तक किसी ऐसी प्रतियोगिता मे भाग नहीं लिया ,पर प्रतियोगिता के फैसले के बाद उसकी जो रिपोर्ट पढी थी ,उससे वैज्ञानिकों के ज्‍योतिष के प्रति निष्‍पक्ष व्‍यवहार की तो उम्‍मीद नहीं की जा सकती है।आज फिरयह समाचारअभिषेक जी लेकर आए हैं।

इस आलेख को पढने के बाद पुन: मेरे दिमाग में बहुत बातें आयी , पर मुझे इसमें उलझना उचित न लगा और मैने यह टिप्‍पणी कर दी ....

“अब इस प्रकार की बहस में मुझे नहीं उलझना.. ज्‍योतिष के खेल को हेड और टेल साबित कर लिया गया .. इसके लिए वैज्ञानिकों को बहुत बहुत बधाई !!”

पर कह देना जितना आसान होता , करना उतना नहीं , सही को सही और गलत को गलत कहना अपने संस्‍कार में शामिल जो है। आप पाठकों से मैं तीन प्रश्‍नों के उत्‍तर चाहती हूं ....

1. ज्‍योतिष के क्षेत्र में आजतक सरकारी ,अर्द्धसरकारी या गैरसरकारी संगठनों द्वारा कितना खर्च किया गया है ?
2. ज्‍योतिष के क्षेत्र में कितना आई क्‍यू रखने वाले लोग मौजूद हैं ?
3. हमें पढने के लिए कौन सी पुस्‍तकें मिलती हैं ?

निश्चित रूप से आपका जवाब निराशाजनक होगा , कभी भी इस क्षेत्र में नाममात्र का भी खर्च नहीं किया गया है । साथ ही इस क्षेत्र में अधिक आई क्‍यू वाले लोग भी अधिक संख्‍या में पूर्ण तौर पर समर्पित नहीं हैं , क्‍यूंकि अधिक आई क्‍यू वाले लोग तो विभिन्‍न क्षेत्रों में सरकारी सेवाओं में चले जाते हें। अपने जीवन में असफल रहे लोग ही अधिकांशत: ज्‍योतिष के अध्‍ययन में देखे जाते हैं , या फिर अधिक पैसे कमाने के लालच में पडे कुछ लोग । ज्‍योतिष में रूचि रखनेवाले और प्रतिभाशाली इस क्षेत्र में अपवादस्‍वरूप ही होंगे , उन्‍हें भी जीवन निर्वाह के लिए किसी और धंधे से जुडा रहना पडता है । ज्‍योतिष में मजबूरीवश आए हो या शौकवश , पर ज्‍योतिष के क्षेत्र में आने के बाद हमलोगों को पढने के लिए जो मिल पाता है , उसमें एकमात्र ज्‍योतिष का सही आधार है , जो कि सर्वमान्‍य है । पर जैसे जैसे फलित के क्षेत्र में हम आगे बढते हैं , सूत्रों का ढेर , जो कि अनावश्‍यक रूप से ज्‍योतिष को विवादास्‍पद बनाता है । इतने सारे सूत्रों में कौन सही है कौन गलत , इसका फैसला भी आज तक ज्‍योतिषी नहीं कर सके हैं। बिना किसी प्रकार की सरकारी सहायता से या एकजुट हुए किस पद्धति को गलत ठहराएं , किसे सही , समझ में नहीं आता। इसी कारण ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणियों में विविधता भी आती है , और गलती के भी चांसेज रहते हैं , पर इसके बावजूद एक सच्‍चा ज्‍योतिषी भविष्‍यवाणियों को एक सीमा तक सही ले जाने में समर्थ होता है , जो उसकी औसत आई क्‍यू और समाज की ओर से ज्‍योतिष के क्षेत्र में मिली उसकी कुल परिस्थितियों के हिसाब से वह बहुत अधिक होता है।

आप इसी प्रतियोगिता को लें । “एक ही ज्योतिषी ऐसे थे जिन्होंने 40 में 24 हल निकालने का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (!) किया” मतलब 60 प्रतिशत नंबर उसको मिलने चाहिए थे । हमारे देश में 60 प्रतिशत नंबर लानेवाले लोगों को प्रथम श्रेणी दी जाती है। वैसे आप आज के युग में प्रथम श्रेणी का कोई महत्‍व नहीं देंगे , क्‍यूंकि आज तो 95 प्रतिशत लानेवाले ढेर सारे बच्‍चे हैं , पर उन बच्‍चों के पीछे होने वाले खर्च को भी ध्‍यान में रखिए । वैसे आज भी ग्रामीण क्षेत्र के किसी सरकारी स्‍कूल से 60 प्रतिशत लानेवाले बच्‍चे को पूरे गांव में प्रतिष्‍ठा मिलती है , क्‍यूंकि उन्‍होने बहुत कम सुविधा के बावजूद यह सफलता हासिल की है। यही कारण है कि मेरे मन में उक्‍त ज्‍योतिषी के लिए बहुत श्रद्धा है , और मैं उनसे अवश्‍य मिलना चाहूंगी , यदि कोई मुझे उनका नाम पता बताए , क्‍यूंकि उन्‍होने अपने दम पर इतना कुछ कहा तो।

पर पूरे समूह के ज्‍योतिषियो के द्वारा सटीक विश्‍लेषण न किए जाने का उन्‍हें फल किस प्रकार मिला , उसे आयोजकों के द्वारा किए गए आंकडों के उलट फेर के खेल से देखा जा सकता है , “सभी प्रतिभागियों की औसत सफलता 17.25 थी जो कि एक सिक्के के इतने ही हेड -टेल की संभावित से भी कम थी।“ यह तो वही बात हो गयी नकि गांव के किसी स्‍कूल के सारे बच्‍चों केऔसत परिणाम को गडबड देखकर स्‍कूल की व्‍यवस्‍था के दोष को न देखते हुए उक्‍त प्रथम श्रेणी से पास करनेवाले बच्‍चे की प्रतिभा को नकारा जाए। आश्‍चर्य है कि वैज्ञानिकों को और इतने सारे पाठकों को इतनी छोटी सी बात समझ में नहीं आती या फिर वास्‍तव में वे ज्‍योतिष के प्रति पूर्वाग्रह से ही ग्रस्‍त हैं ? मतलब यही है कि विज्ञान को सब सुविधा दो , फिर भी शत प्रतिशत सफलता की उम्‍मीद न करो , पर ज्‍योतिष को सुविधा तो कुछ भी नहीं दी जाएगी , पर 100 प्रतिशत सटीक करो , यदि नहीं तो ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है। इस तरह की प्रतियोगिता में भाग लेने से तो हर कोई बचना चाहेगा । खासकर वैसी स्थिति में , जब ज्‍योतिषियों के पक्ष में कोई न हो (क्‍यूंकि दुनिया तो छुपछुपकर ज्‍योतिषियों के पास आती है) , ज्‍योतिषी हार मानने को बाध्‍य होंगे ही। चलिए , कुल मिलाकर बात यहीं पर आ जाती है कि ज्‍योतिष के क्षेत्र में प्रतिभागी चाहे जितना भी अच्‍छा प्रदर्शन कर ले , यानि सिक्‍का हेड गिरे या टेल ,आयोजकों के द्वारा किए गए आंकडों के हेर फेर से उनकी जीत तो निश्चित ही है।

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ज्‍योतिषियों को चुनौती देने से पहले मेरे सुझावों पर भी ध्‍यान दें

परसों से हीज्योतिषियों के लिए 10,000.00 आस्ट्रेलियन डालर की एक और चुनौतीआलेख में ज्‍योतिष पर लंबी चौडी बहस चल रही है। ‘साइंस ब्‍लागर एशोसिएशन’ ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता को चैलेंज करते हुए हम ज्‍योतिषियों के लिए एक प्रतियोगिता रखने की तैयारी में है। इस लेख के नीचे टिप्‍पणी में रजनीश जी ने लिखा है ...


“मैं सभी ज्‍योतिषी भाइयों एवं बहनों से यह जानना चहता हूं कि ज्‍योतिष से क्‍या क्‍या जाना जा सकता है। कृपया यह बताने का कष्‍ट करें। संगीता जी, आप स्‍वयं स्‍पष्‍ट करने की कृपा करें कि आप किस आधार पर और किन किन विषयों पर कितनी प्रामाणिक जानकारी दे सकती हैं।


साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन के पदाधिकारी इस बात पर विचार विमर्श कर रहे हैं कि वे स्‍वयं इस तरह की कोई चुनौती सभी लोगों के सामने रखे, जिससे दूध का दूध और पानी का पानी किया जा सके।“


इसके जवाब में सबसे पहले तो मै बताना चाहूंगी कि ज्‍योतिष के द्वारा किसी के जीवन के हर संदर्भ के बारे में सांकेतिक रूप से बात की जा सकती है , पर उनका सिर्फ गुणात्‍मक पहलू ही बताया जा सकता है , परिमाणात्‍मक पहलू बताना संभव नहीं । जातक के चारित्रिक विशेषताओं के साथ साथ हर पक्ष के सुख , दुख , महत्‍वाकांक्षा , कार्यक्षमता , आई क्‍यू के बारे मे साल , महीने और दिन तक की चर्चा करते हुए जातक की आगे बढती जीवनयात्रा को साफ साफ बताया जा सकता है। निम्‍न तरीके से ज्‍योतिषियों को सही चुनौती देते हुए ज्‍योतिष को सही साबित किया जा सकता है ...


1. सबसे पहले तो पुरस्‍कार की राशि सोंच समझकर रखी जाए , ताकि पुरस्‍कार न दे पाने की स्थिति में ज्‍योतिषी पर दोषारोपण करते हुए मामले को रफा दफा कर दिया जाए।
2. निर्णायक मंडल में सात सदस्‍य मौजूद रहें । ‘साइंस ब्‍लागर एशोसिएशन’ द्वारा उनका चुनाव किया जा सकता है ।
3. सभी ब्‍लागर हों , ज्‍योतिष पर अबतक उनको विश्‍वास नहीं हो , पर कम से कम प्रतियोगिता के दौरान ज्‍योतिष के प्रति किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से वे मुक्‍त रहें। वैसे वे रहेंगे ही , क्‍यूंकि हमारे देश में पंच परमेश्‍वर होते हैं।
4. सभी प्रभावशाली हों , जो सही कहने की हिम्‍मत रखते हों और सभी उनकी बातों पर भरोसा करते हों। वैसे पंचों पर तो भरोसा किया ही जाना चाहिए।
5. सबको अपना अपना जन्‍म विवरण यानि जन्‍म तिथि , जन्‍म समय और जन्‍म स्‍थान मालूम हो , ताकि उनको जो भविष्‍यवाणी दी जाए उसका वे खुद विश्‍लेषण कर सकें। किसी दूसरे का जन्‍म विवरण ज्‍योतिषियों को नहीं दिया जाना चाहिए।
6. सबकी उम्र 50 वर्ष के आसपास या अधिक की हो , ताकि वे जीवन के उतार चढाव को महसूस कर चुके हों। इससे भविष्‍यवाणियों के विश्‍लेषण में उन्‍हें सुविधा रहेगी।
7. सभी सदस्‍य अपना जन्‍म विवरण ज्‍योतिषियों को ईमेल कर दें और स्‍वतंत्र रूप से उन्‍हें उनके स्‍वभाव , व्‍यवहार एवं चरित्र के बारे में तथा उनकी जीवनयात्रा के बारे में लिखने को दें ।
8. सभी सदस्‍य अपना जन्‍म विवरण ज्‍योतिषियों के अलावे उन ब्‍लागरों को भी ईमेल कर दें , जिन्‍हें ज्‍योतिष की जानकारी नहीं , पर मानते हैं कि तुक्‍का लगाने से भी बहुत बातें सही हो जाती हैं । उन्‍हें भी स्‍वतंत्र रूप से उनके स्‍वभाव , व्‍यवहार एवं चरित्र के बारे में तथा उनकी जीवनयात्रा के बारे में लिखने को दें । यह इसलिए कि उन्‍हें समझ में आए कि तुक्‍का लगाना इतना आसान नहीं होता।
9. ज्‍योतिषियों को सातो जन्‍मकुंडली की चर्चा के लिए 15-20 दिनों का समय दिया जाए ।
10. पंद्रह-बीस दिनों के बाद ज्‍योतिषियों द्वारा सभी जन्‍म विवरण की संभावित बातें उससे संबंधित ब्‍लागर को ईमेल के द्वारा ही भेज दी जाए , ताकि वे अपने जीवन की घटनाओं से उसका मेल कर सकें। इससे एक फायदा होगा कि किसी की निजी जिंदगी सार्वजनिक भी नहीं होगी। कभी कभी सार्वजनिक रूप में भी लोग कई बातें स्‍वीकार नहीं कर पाते हैं। इससे भी ज्‍योतिषियों के सामने समस्‍या आती है।
11. फिर सभी सदस्‍य अपने अपने घर में ज्‍योतिषियों के द्वारा की गयी संभावित बातें और तुक्‍का लगानेवालों के द्वारा प्राप्‍त विवरण का तुलनात्‍मक अध्‍ययन करते हुए अपने ब्‍लाग में अपना अनुभव लिखें कि भविष्‍य की जानकारी की इस विधा का यानि ज्‍योतिष विज्ञान का कोई भविष्‍य होना चाहिए या नहीं ?

सातो सदस्‍यों के द्वारा दिए जानेवाले निर्णय के अनुसार ही अंतिम फैसला किया जाए । इस तरह ज्‍योतिष पर चलनेवाले विवाद को हमेशा के लिए मिटाया जा सकता है । बताइए , आपका क्‍या कहना है ?

सोमवार, 13 जुलाई 2009

समझौता गमों से ... कर ही लेना चाहिए

ब्‍लाग जगत में डेढ महीने से चल रही अनियमितता शायद अब समाप्‍त हो जाए , पूरे जून और आधे जुलाई भर में मात्र पांच पोस्‍ट लिख पायी , वो भी नाम के लिए ही। बहुत उम्‍मीद है कि अब पुन: पहले की तरह ही अधिक से अधिक पोस्‍टों को पढने, अपने विचार देने के साथ ही साथ अपना पोस्‍ट डालने की भी कोशिश करूगी। पर इस दौरान इंटरनेट से जुडे मेरे सारे क्रियाकलाप बंद रहें , आपलोगों से किसी दूसरे क्षेत्र में अपनी व्‍यस्‍तता का बहाना भी बनाती रही , पर ऐसा नहीं था , कहीं व्‍यस्‍त नहीं थी मैं। दरअसल पिछले महीने हुई मेरी जिंदगी के एक महत्‍वपूर्ण फैसले के पक्ष में न होने से मेरा मन ही कहीं भी नहीं लग पा रहा था। अपने जीवन के 45 वर्षों की उम्र तक मैने खुद को एक एक सीढी उपर ही चढते पाया था , इसलिए मेरा मन एक छोटी सी हार को भी स्‍वीकार कर पाने की स्थिति में न था। ऐसा नहीं कि मुझे जीवन में सबकुछ मिला हो , पर जो भी मिला , वह अनायास तौर पर मिला था और जो न मिला , उसके लिए कभी मेहनत भी तो न की थी , सो क्‍या मलाल होता। पर खासकर उस कार्यक्रम में फैसला मेरे विपक्ष में हो , जिसके लिए मैने ही नहीं , पूरे परिवार ने वर्षों मेहनत की हो और अंतिम क्षणो तक विजय की पूरी उम्‍मीद बनीं हो , कष्‍ट होना तो स्‍वाभाविक है। सारे विशेषज्ञ गवाह हैं कि हमारे पूरे कार्यक्रम में कहीं कोई खामी नहीं थी। खैर , दिल , दिमाग या आत्‍मा स्‍वीकारे या नहीं , इस दुनिया में रहना है तो दुनिया के दिए फैसले को मानना हमारी मजबूरी ही तो होती है। क्‍यूंकि कहने को तो हमारे लिए सारी व्‍यवस्‍था है , पर सच तो यह है कि लोग आज भी भाग्‍य भरोसे ही है। 99 प्रतिशत लोगों का भाग्‍य सामान्‍य होता है , इसलिए भले ही सबकुछ सामन्‍य सा महसूस हो , पर जिस 1 प्रतिशत को भाग्‍य की मार सहनी पडती है , वही इसका महत्‍व समझ पाता है।


आप सभी अवश्‍य सोचेंगे कि ग्रह , नक्षत्र और भाग्‍य तो सदा से मेरे अध्‍ययन के विषय रहे हैं , तो मुझे इसका अंदेशा अवश्‍य रहा होगा , हां जरूर था । पर मैं अपनी सावधानी से ग्रहों के प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश में लगी थी। कहावत यह भी है कि भाग्‍य गडबड हो तो पहले बुद्धि भ्रष्‍ट हो जाती है , लोग कुछ उल्‍टा पुल्‍टा करते हैं , इस कारण इस दौरान मैं कोई नया काम भी नहीं कर रही थी , सबकुछ पूर्ववत् ही चल रहा था। फिर अचानक बिल्‍कुल उल्‍टी परिस्थिति की उम्‍मीद मैं कैसे कर सकती थी । मेरे आलेखों से आपने अवश्‍य महसूस किया होगा कि मैं कर्म को हमेशा महत्‍वपूर्ण मानती आयी हूं , अभी तक लोगों को कर्म प्रधान सलाह ही दिया है । मैं मानती आ रही थी कि फल देने में ग्रह पांच दस प्रतिशत तक अच्‍छा या बुरा असर दिखा सकते हैं। हां , जब योग्‍यता की कमी हो तो कभी कभी संयोग उपस्थित कर मनोनुकूल लक्ष्‍य को पूरा करने में ग्रह मददगार हो जाते हैं । पर अपने जीवन में हमेशा ग्रहों के शुभ प्रभाव को अनुभव करने और सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखने के कारण कभी यह अहसास नहीं हो पाया था कि जब ग्रह संयोग उपस्थित कर मनोनुकूल काम करवाने में मददगार हो सकते हैं , तो भला दुर्योग उपस्थित कर लक्ष्‍य के विपरीत परिस्थिति को जन्‍म क्‍यूं नहीं दे सकते ?


भले ही मेरे अपने जीवन में असफलता की यह पहली घटना हो , पर ऐसा भी नहीं कि असफलताओं को मैने देखा भी नहीं है। बचपन में अपने परिवार में मैने असफलताओं की एक श्रृंखला को सामने पाया था। परिवार में पिताजी और उनके सभी भाई अपने अपने स्‍कूल कालेजों में टापर होने और अच्‍छी शिक्षा प्राप्‍त करने के बावजूद अपने अपने कैरियर में असफल रह गए थे। क्‍यूंकि गुण और ज्ञान तो बेकार नहीं जाता , अभी भी सभी अपने अपने क्षेत्र में विशेषज्ञता और मौलिकता के लिए चर्चित हैं , पर अपने सिद्धांतों पर अडिग रहनेवाले वे सभी सांसारिक जीवन में असफल तो माने ही जा सकते हैं। वे भले ही खुद की असफलता का कारण अपने भाग्‍य को बताएं , पर बडे होने पर मै इसे दिल से नहीं स्‍वीकार करती थी। गांव में पालन पोषण होने के कारण व्‍यावहारिक तौर पर कुछ खामियां उनमें थी , जिन्‍हें मै चुनचुनकर निकाला करती और उनकी असफलता का दोटूक विश्‍लेषण करती थी। यहां तक कि मेरे पास जो भी ज्‍योतिषीय सलाह लेने को आते , उन्‍हें भी मैं कर्म करने की ही फटकार लगाया करती थी । पर आज महसूस हो रहा है कितनी गलत थी मै ? आज तो मुझे यहां तक महसूस हो रहा है कि बुरे वक्‍त में भाग्‍य का पलडा कर्म से भी भारी हो जाता है।


दुनिया बडी विचित्र और रहस्‍यमय बातों से भरी पडी है,दूसरों को देखकर मनुष्‍य कुछ भी नहीं सीख सकता , जबतक उस परिस्थिति से स्‍वयं न गुजरे। इन डेढ महीनों ने मेरे जीवन दर्शन को ही बदल कर रख दिया है। ग्रह नक्षत्रों का पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को विश्‍लेषित करने का ढंग भी बदल गया है । इतना निश्चित हो गया है कि ग्रहों , नक्षत्रों के प्रभाव को इतना हल्‍का भी नहीं लिया जाना चाहिए । इसके साथ ही साथ अन्‍य रहस्‍यमय शक्तियों और आध्‍यात्‍म को भी महत्‍व देने लगी हूं। ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण हो या अन्‍य किसी रहस्‍मय शक्ति का प्रभाव , मुझे जीवन में यह समझौता करना पडेगा , इसकी उम्‍मीद सपने में भी न थी। पर खैर, जीवन शायद समझौते का ही नाम है , यह समझौता करके मै निश्चिंत हो जाना चाहती हूं। दूर दराज मे जुगनू के समान जलती बुझती रोशनी बहुत आशाएं जगाती हैं , महसूस होता है , ये जैसे जैसे नजदीक आएंगी , इनकी रोशनी बढती जाएगी , जो भाग्‍य के ठीक होते ही पुन: मेरे जीवन को सुखमय बनाएगी। आखिर इसी प्रकार के विश्‍वास के सहारे तो दुनिया चलती आयी है , वरना कितने प्रतिशत लोग आज की परिस्थिति से संतुष्‍ट रहते हैं।

समझौता गमों से ... कर ही लेना चाहिए

ब्‍लाग जगत में डेढ महीने से चल रही अनियमितता शायद अब समाप्‍त हो जाए , पूरे जून और आधे जुलाई भर में मात्र पांच पोस्‍ट लिख पायी , वो भी नाम के लिए ही। बहुत उम्‍मीद है कि अब पुन: पहले की तरह ही अधिक से अधिक पोस्‍टों को पढने, अपने विचार देने के साथ ही साथ अपना पोस्‍ट डालने की भी कोशिश करूगी। पर इस दौरान इंटरनेट से जुडे मेरे सारे क्रियाकलाप बंद रहें , आपलोगों से किसी दूसरे क्षेत्र में अपनी व्‍यस्‍तता का बहाना भी बनाती रही , पर ऐसा नहीं था , कहीं व्‍यस्‍त नहीं थी मैं। दरअसल पिछले महीने हुई मेरी जिंदगी के एक महत्‍वपूर्ण फैसले के पक्ष में न होने से मेरा मन ही कहीं भी नहीं लग पा रहा था। अपने जीवन के 45 वर्षों की उम्र तक मैने खुद को एक एक सीढी उपर ही चढते पाया था , इसलिए मेरा मन एक छोटी सी हार को भी स्‍वीकार कर पाने की स्थिति में न था। ऐसा नहीं कि मुझे जीवन में सबकुछ मिला हो , पर जो भी मिला , वह अनायास तौर पर मिला था और जो न मिला , उसके लिए कभी मेहनत भी तो न की थी , सो क्‍या मलाल होता। पर खासकर उस कार्यक्रम में फैसला मेरे विपक्ष में हो , जिसके लिए मैने ही नहीं , पूरे परिवार ने वर्षों मेहनत की हो और अंतिम क्षणो तक विजय की पूरी उम्‍मीद बनीं हो , कष्‍ट होना तो स्‍वाभाविक है। सारे विशेषज्ञ गवाह हैं कि हमारे पूरे कार्यक्रम में कहीं कोई खामी नहीं थी। खैर , दिल , दिमाग या आत्‍मा स्‍वीकारे या नहीं , इस दुनिया में रहना है तो दुनिया के दिए फैसले को मानना हमारी मजबूरी ही तो होती है। क्‍यूंकि कहने को तो हमारे लिए सारी व्‍यवस्‍था है , पर सच तो यह है कि लोग आज भी भाग्‍य भरोसे ही है। 99 प्रतिशत लोगों का भाग्‍य सामान्‍य होता है , इसलिए भले ही सबकुछ सामन्‍य सा महसूस हो , पर जिस 1 प्रतिशत को भाग्‍य की मार सहनी पडती है , वही इसका महत्‍व समझ पाता है।


आप सभी अवश्‍य सोचेंगे कि ग्रह , नक्षत्र और भाग्‍य तो सदा से मेरे अध्‍ययन के विषय रहे हैं , तो मुझे इसका अंदेशा अवश्‍य रहा होगा , हां जरूर था । पर मैं अपनी सावधानी से ग्रहों के प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश में लगी थी। कहावत यह भी है कि भाग्‍य गडबड हो तो पहले बुद्धि भ्रष्‍ट हो जाती है , लोग कुछ उल्‍टा पुल्‍टा करते हैं , इस कारण इस दौरान मैं कोई नया काम भी नहीं कर रही थी , सबकुछ पूर्ववत् ही चल रहा था। फिर अचानक बिल्‍कुल उल्‍टी परिस्थिति की उम्‍मीद मैं कैसे कर सकती थी । मेरे आलेखों से आपने अवश्‍य महसूस किया होगा कि मैं कर्म को हमेशा महत्‍वपूर्ण मानती आयी हूं , अभी तक लोगों को कर्म प्रधान सलाह ही दिया है । मैं मानती आ रही थी कि फल देने में ग्रह पांच दस प्रतिशत तक अच्‍छा या बुरा असर दिखा सकते हैं। हां , जब योग्‍यता की कमी हो तो कभी कभी संयोग उपस्थित कर मनोनुकूल लक्ष्‍य को पूरा करने में ग्रह मददगार हो जाते हैं । पर अपने जीवन में हमेशा ग्रहों के शुभ प्रभाव को अनुभव करने और सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखने के कारण कभी यह अहसास नहीं हो पाया था कि जब ग्रह संयोग उपस्थित कर मनोनुकूल काम करवाने में मददगार हो सकते हैं , तो भला दुर्योग उपस्थित कर लक्ष्‍य के विपरीत परिस्थिति को जन्‍म क्‍यूं नहीं दे सकते ?


भले ही मेरे अपने जीवन में असफलता की यह पहली घटना हो , पर ऐसा भी नहीं कि असफलताओं को मैने देखा भी नहीं है। बचपन में अपने परिवार में मैने असफलताओं की एक श्रृंखला को सामने पाया था। परिवार में पिताजी और उनके सभी भाई अपने अपने स्‍कूल कालेजों में टापर होने और अच्‍छी शिक्षा प्राप्‍त करने के बावजूद अपने अपने कैरियर में असफल रह गए थे। क्‍यूंकि गुण और ज्ञान तो बेकार नहीं जाता , अभी भी सभी अपने अपने क्षेत्र में विशेषज्ञता और मौलिकता के लिए चर्चित हैं , पर अपने सिद्धांतों पर अडिग रहनेवाले वे सभी सांसारिक जीवन में असफल तो माने ही जा सकते हैं। वे भले ही खुद की असफलता का कारण अपने भाग्‍य को बताएं , पर बडे होने पर मै इसे दिल से नहीं स्‍वीकार करती थी। गांव में पालन पोषण होने के कारण व्‍यावहारिक तौर पर कुछ खामियां उनमें थी , जिन्‍हें मै चुनचुनकर निकाला करती और उनकी असफलता का दोटूक विश्‍लेषण करती थी। यहां तक कि मेरे पास जो भी ज्‍योतिषीय सलाह लेने को आते , उन्‍हें भी मैं कर्म करने की ही फटकार लगाया करती थी । पर आज महसूस हो रहा है कितनी गलत थी मै ? आज तो मुझे यहां तक महसूस हो रहा है कि बुरे वक्‍त में भाग्‍य का पलडा कर्म से भी भारी हो जाता है।


दुनिया बडी विचित्र और रहस्‍यमय बातों से भरी पडी है,दूसरों को देखकर मनुष्‍य कुछ भी नहीं सीख सकता , जबतक उस परिस्थिति से स्‍वयं न गुजरे। इन डेढ महीनों ने मेरे जीवन दर्शन को ही बदल कर रख दिया है। ग्रह नक्षत्रों का पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को विश्‍लेषित करने का ढंग भी बदल गया है । इतना निश्चित हो गया है कि ग्रहों , नक्षत्रों के प्रभाव को इतना हल्‍का भी नहीं लिया जाना चाहिए । इसके साथ ही साथ अन्‍य रहस्‍यमय शक्तियों और आध्‍यात्‍म को भी महत्‍व देने लगी हूं। ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण हो या अन्‍य किसी रहस्‍मय शक्ति का प्रभाव , मुझे जीवन में यह समझौता करना पडेगा , इसकी उम्‍मीद सपने में भी न थी। पर खैर, जीवन शायद समझौते का ही नाम है , यह समझौता करके मै निश्चिंत हो जाना चाहती हूं। दूर दराज मे जुगनू के समान जलती बुझती रोशनी बहुत आशाएं जगाती हैं , महसूस होता है , ये जैसे जैसे नजदीक आएंगी , इनकी रोशनी बढती जाएगी , जो भाग्‍य के ठीक होते ही पुन: मेरे जीवन को सुखमय बनाएगी। आखिर इसी प्रकार के विश्‍वास के सहारे तो दुनिया चलती आयी है , वरना कितने प्रतिशत लोग आज की परिस्थिति से संतुष्‍ट रहते हैं।

रविवार, 12 जुलाई 2009

मेरे ब्‍लाग में कुछ पाठकों को देवनागरी शब्‍द क्‍यूं नहीं दिखाई देते हैं ??????

इस ब्‍लागिंग के कारण भी रोज एक न एक समस्‍या से उलझना ही पडता है । जितने दिनों तक वर्डप्रेस पर बने अपने ब्‍लाग पर पोस्‍ट करती रही , कोई बडी समस्‍या तो नहीं आयी , पर जैसे ही मैने ब्‍लागस्‍पाट पर अपना ब्‍लाग बनाया , उसे न पढ पाने की शिकायत लेकर पाठकों के मेल आने लगे । कुछ पाठको की ज्‍योतिष की रू‍चि के कारण उनके द्वारा मेरे आलेखों को रोमन में पढने की बाध्‍यता को देखते हुए मैने कई बार अपने टेम्‍प्‍लेट भी बदलें , उसके कुछ पाठकों की ओर से सकारात्‍मक जवाब आने से मैं निश्चिंत भी हो गयी ।


पर कल मैने जब वर्डप्रेस पर एक पोस्‍ट किया तो संदीप जी और राजकुमार ग्‍वालानी जी की टिप्‍पणी मिली कि मेरे ब्‍लाग को वे अब पढ पा रहे हें , अभी तक नहीं पढ पाते थे। इसका अर्थ यह है कि मेरे ब्‍लागस्‍पाट वाले ब्‍लाग में अभी तक देवनागरी न दिखने की समस्‍या बनी हुई है । इस समस्‍या का कारण क्‍या है और इसके निदान के लिए मैं क्‍या करूं , यह समझ में नहीं आ रहा है । जिन ब्‍लागर भाइयों को इस बारे में जानकारी हो , बताने की कृपा करें। नहीं तो डेढ वर्षों बाद पुन: वर्डप्रेस पर ही लिखना आरंभ करना होगा।