शनिवार, 25 जुलाई 2009

बहुत आसान है चंद्रमा के प्रभाव को महसूस कर पाना

मेरे चाचाजी के लडके ने पिछले रविवार यानि 19 जुलाई को मुझे सूचना दी कि पिछले तीन चार दिनों से उसकी पत्‍नी का तेज बुखार बिल्‍कुल ही नहीं उतर रहा और वह बहुत कमजोर हो गयी है। वह बोकारो के किसी अच्‍छे डाक्‍टर से अपनी पत्‍नी को दिखाना चाहता है। मैने उसे यहां ले आने को कहा , वह आठ महीने की गर्भवती थी , पहले से ही थोडी कमजोर थी ही , कई दिनों के बुखार ने उसके शरीर को और तोड दिया था। रविवार के दिन यहां के अधिकांश डाक्‍टर आराम करने के मूड में होते हें , इसलिए अपने मनचाहे नर्सिंग होम में न डालकर उसे दूसरे नर्सिंग होम में एडमिट करना पडा।

रविवार से ही चेकअप आरंभ हुआ , बुखार की दवा तो पहले से चल ही रही थी ,उसे काम न करते देख थोडी कडी दवा शुरू की गयी। कमजोरी को देखते हुए तुरंत पानी चढाना आरंभ किया गया , विभिन्‍न प्रकार के टेस्‍ट के लिए खून के सैम्‍पल लिए गए। दो तीन दिन बीतने के बाद भी न तो बीमारी समझ में आ रही थी और न ही बुखार उतर रहा था। होमोग्‍लोबीन कम होता जा रहा था , खून चढाने की जरूरत थी , पर बुखार की स्थिति में खून भी चढा पाने में दिक्‍कत हो रही थी। उच्‍चस्‍तरीय टेस्‍ट के लिए फिर से सैम्‍पल भेजे गए थे , अनुमान से मलेरिया की दवा शुरू कर दी गयी थी। दवाओं के असर से 21 तारीख की रात्रि तबियत और बिगड गयी। इतनी भयावह स्थिति में डाक्‍टर तो थोडे परेशान थे ही , हमलोग भी काफी तनाव से गुजर रहे थे। उस अस्‍पताल और डाक्‍टरों के प्रति भी हमारा विश्‍वास डिगता जा रहा था। सबको परेशान देखकर मैने अपनी गणना शुरू की तो पाया कि 22 जुलाई को आसमान में चंद्रमा की स्थिति गडबड है यानि अमावस्‍या है , यदि इसके असर से समस्‍या आ रही है तो 23 से स्थिति में सुधार आ जानी चाहिए। और सचमुच 23 जुलाई को रिपोर्ट में मलेरिया की पुष्टि होने से राहत मिली , दो दिनों से चल रही सही दवा के असर से बुखार भी कम हो गया , खून भी चढा दी गयी और आज स्थिति पूर्ण रूप से नियंत्रण में है , हो सकता है एक दो दिनों में अस्‍पताल से छुट्टी भी मिल जाए। यह घटना मै आत्‍म प्रशंसा के लिए नहीं सुना रही , इस उदाहरण के द्वारा मै पाठकों को एक जानकारी प्रदान करना चाह रही हूं।

पूर्णिमा और अमावस्‍या के दिन समुद्र में आनेवाले ज्‍वारभाटे से चंद्रमा के पृथ्‍वी पर प्रभाव की पुष्टि तो हो ही जाती है , भले ही वैज्ञानिक इसका कोई अन्‍य कारण बताएं। पर चंद्रमा के अन्‍य रूप में पडने वाले प्रभाव को भी महसूस किया जा सकता है। पूरी दुनिया की बात तो नहीं कह सकती , पर हमारे गांव में चतुदर्शी और अमावस्‍या की यात्रा को बुरा माना जाता है। हालांकि आज समझ की कमी से लोग अमावस्‍या और पूर्णिमा दोनो के पहले की चतुदर्शी को यात्रा के लिए बुरा मान लेते हैं , पर मैं समझती हूं कि पूर्वजों ने अमावस्‍या के पहले की चतुदर्शी और अमावस्‍या के बारे में ही ये बातें कही होंगी। वैसे तो इन दिनों को शाम में ही गहरा अंधेरा हो जाना भी इसकी एक वजह मानी जा सकती है , पर एक दूसरी वजह ग्रहों का ज्‍योतिषीय प्रभाव भी है। चूंकि पुराने जमाने में साधनों की कमी थी , यात्रा कुशल मंगल से व्‍यतीत होना कठिन होता रहा होगा , इस कारण उनलोगों ने इसपर ध्‍यान दिया होगा और चतुदर्शी या अमावस्‍या की यात्रा को कठिन पाया होगा। हमने अपने अध्‍ययन में पाया है कि सिर्फ यात्रा के लिए ही नहीं , छोटा चांद बहुत मामलों में कष्‍टदायक होता है। उस वक्‍त जो भी समस्‍या चल रही होती है , वह बढकर व्‍यक्ति के मानसिक तनाव को चरम सीमा तक पहुंचा देती है। अमावस्‍या के ठीक दूसरे या तीसरे दिन हमें काफी राहत मिल जाती है ।

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार पूर्णिमा के आसपास मन का प्रतीक ग्रह चंद्रमा मजबूत होता है , इस कारण काम आपके मनोनुकूल ढंग से होता है , जबकि अमावस्‍या के आसपास के दिनों में मन का प्रतीक ग्रह चंद्रमा बिल्‍कुल कमजोर होता है , इस कारण मनोनुकूल काम होने में बाधा उपस्थित होती है। आप अपने जीवन में दो तरह के काम करते हैं ... कुछ प्रतिदिन के रूटीन वर्क होते है , जबकि कुछ कभी कभी उपस्थित होने वाले काम होते हैं। प्रतिदिन होनेवाले काम का हर रंग आप देखते आए हैं , इसलिए उसमें सफलता असफलता का कोई खास महत्‍व नहीं , भले ही इन दिनों के चंद्रमा की स्थिति के अनुरूप ही उसका भी वातावरण हो। पर कभी कभी होनेवाले काम कुछ नए ढंग के होते हैं , माहौल नया होता है , इसलिए मनोनुकूल काम न होने से दिक्‍कत आती है और होने से आनंद आता है, जैसे किसी के यहां घूमने फिरने का कार्यक्रम , बाजार में खरीदारी या किसी तरह की मीटिंग वगैरह । मैं लगातार पंद्रह तिथियों का उल्‍लेख कर रही हूं। इनमें आठ पूर्णिमा की और सात अमावस्‍या की हैं। आनेवाले कुछ महीनों में 5 अगस्‍त , 1 सितम्‍बर , 1 अक्‍तूबर , 31 अक्‍तूबर , 2 दिसम्‍बर , 31 दिसम्‍बर , 30 जनवरी और 28 फरवरी को असमान में पूर्णिमा का चांद होगा , जबकि 20 अगस्‍त , 18 सितम्‍बर , 18 अक्‍तूबर , 16 नवम्‍बर , 16 दिसम्‍बर , 15 जनवरी , और 13 फरवरी को अमावस्‍या का । इन दिनों में खासकर 4 बजे से 8 बजे शाम तक कुछ खास तरह के काम कर आप सभी पाठक भी चंद्रमा के पृथ्‍वी पर पडने वाले प्रभाव की परीक्षा ले सकते हैं। 15 दिनों में से 12 दिनों में आपकी मन:स्थिति चंद्रमा के आकार के अनुरूप होगी , जिसे देखकर आप चौंक जाएंगे।

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

काश !! इलाज की अन्‍य पद्धतियों को भी विकसित किया गया होता !!!!

शनिवार और रविवार को बच्‍चों की छुट्टियों की वजह से नींद देर से ही खुलती है । हां , कभी कभार फोन की घंटी नींद अवश्‍य तोड दिया करती है। ऐसे ही एक शनिवार भोर की अलसायी हुई नींद के आगोश में थी कि अचानक फोन की घंटी बजी। फोन उठाकर जैसे ही मैने ‘हलो’ कहा , वैसे छोटी बहन की दर्दनाक आवाज कानों में पडी , ‘दीदी , मुझे बचा लो , ये लोग मेरी जान ले लेंगे।’ मेरे तो होश ही उड गए , विवाह के दस वर्षों तक सबकुछ सामान्‍य रहने के बाद ससुराल में इसके जीवन में कौन सा खतरा आ गया। अपने को बहुत संभालते हुए पूछा , ‘क्‍या हुआ , पूरी बात बताओ ’ तब उसने जो बताया , वह लगभग शून्‍य हुए दिमाग को काफी राहत देनेवाली थी। दरअसल गर्मी की वजह या अन्‍य किसी वजह से कई दिनों से उसके शरीर के कई जगहों पर फोडे निकल गए थे , कुछ काफी बडे भी हो गए थे। शाम को डाक्‍टर ने बडे फोडों को जल्‍द आपरेशन करा लेने की सलाह दी थी। रात में इनलोगों में लंबी बहस चली थी , बहन के पति और श्‍वसुर डाक्‍टर की सलाह मान लेने को कह रहे थे और बहन एक दो दिन इंतजार करना चाह रही थी । सुबह सुबह अपनी हार को नजदीक पाकर उसने घबडाकर मुझे फोन लगा दिया था। अपनों का कष्‍ट देखना बहुत मुश्किल होता है , उसकी समस्‍या को हल करने के लिए मैने जैसे ही अपना दिमाग खपाया , एक उपाय नजर आ ही गया।

किसी भी फोडे के लिए आयुर्वेद की एक दवा है ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ , मैने बहुत दिन पूर्व उसका प्रयोग किया था और उसके चार छह घंटे के अंदर उसके प्रभाव से प्रभावित होकर कई बार दूसरों को भी उसके उपयोग की सलाह दी थी , जिसमें से किसी को भी उस दवा पर संदेह नहीं रह गया था। अगर फोडा शुरूआती दौर में हो तो , यह दवा उसे दबा देती है और यदि फोडा पक चुका हो , तो यह दवा उसके मवाद को बहा देती है , यानि फोडा किसी भी हालत में हो , उसका मुंह हो या नहीं , इसका उपयोग किया जा सकता है। बाद में घाव भी इसी दवा से ठीक हो जाता है , इसलिए मैने उसके पति से एक दिन का समय मांगा और बहन को उसी दवा के प्रयोग की सलाह दी। और मेरी आशा के अनुरूप ही रात में उसकी खनकती हुई आवाज कानों में पडी। फोडा बह चुका था , पाठक कभी भी बहुत कम कीमत की इस दवा की परीक्षा ले सकते हैं। एलोपैथी की कडी दवाओं या आपरेशन से बचने के लिए इस प्रकार के बहुत उपाय आयुर्वेद में हैं , जिनके बारे में या तो लोगों को जानकारी नहीं है या फिर वे विश्‍वास नहीं कर पाते।

कई बार छोटे बच्‍चों के कब्‍ज को लेकर अभिभावक की पारेशानी को देखकर डाक्‍टर लगातार एलोपैथी की दवा चलाते हैं । मैने ऐसे कई बच्‍चों को छोटी हर्रे घिसकर पिलाने की सलाह दी है और उससे बच्‍चों को फिर एलोपैथी की दवा की जरूरत नहीं रह गयी है। तुलसी , अदरक का रस और मधु को साथ मिलाकर बच्‍चों को पिलाने से सर्दी ठीक हो जाती है , बडे भी इसका काढा पीकर सर्दी ठीक कर सकते हैं। बडे पत्‍ते वाली तुलसी , जो कि घर में नहीं लगायी जाती , वह कुछ बीमारियों में बहुत कारगर होती है। मेरी एक भांजी के पैर में घुटने के नीचे कुछ दाने हो गए , कभी कभी नोचने भी लगे , देखते ही देखते बढने भी लगे। हमने एलोपैथी के चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया , उसकी कई दवाएं चली , पर कम अधिक होता रहा , जड से नहीं मिटा। हारकर हमने होम्‍योपैथी के डाक्‍टर से दिखाया। पहले सप्‍ताह की दवा से उसने बीमारी बढने की उम्‍मीद की , वह सही रहा , पर दूसरे सप्‍ताह से बीमारी में जो कमी होनी चाहिए थी , वह नहीं हुई और पहले से बडी समस्‍या देखकर हमलोग और घबडा गए। कुछ दिन बाद हमारे गांव से एक व्‍यक्ति आए , उन्‍होने देखा और अपनी दवाई सुझा दी , और उनकी दवाई से पूरा इन्‍फेक्‍शन समाप्‍त । दवाई का नाम सुनेंगे , तो आप चौंक ही जाएंगे , दवा थी , गाय के ताजे दूध का फेन। एक महीने में बीमारी समाप्‍त हो गयी। बचपन से बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ रहे मेरे बडे बेटे को 12 वर्ष की उम्र के बाद सालोभर सर्दी खांसी रहने लगी , पांच छह वर्षों तक एलोपैथी की दवा चलाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ , डाक्‍टर कहा करते थे कि ध्‍यान दें , इसे किस चीज से एलर्जी है , उससे दूर रखें , पर इतने दिनों तक हमें कुछ भी समझ में न आया , जितनी सावधानी बरतते , सर्दी खांसी उतनी ही अधिक परेशान करती थी। अंत में हारकर हमलोगों ने होम्‍योपैथी की दवा चलायी , और छह महीने में एलर्जी जड से दूर। हर वक्‍त टोपी , मफलर , मोजे में अपने को पैक रखने वाले और हर ठंडा खाना से वंचित रहनेवाले उसी बेटे को आज कहीं भी किसी परहेज की जरूरत नहीं होती है। ऐसी अन्‍य बहुत सारी घटनाएं हैं , जिसके कारण एलोपैथी से इतर पद्धतियों पर भी मेरा भरोसा बना हुआ है।

एलोपैथी के साइड इफेक्‍ट के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली बहुत सी सारी शारीरिक समस्‍याओं के बावजूद भी इलाज की सर्वोत्‍तम पद्धति के रूप में अभी एलोपैथी का नाम ही लिया जा सकता है । एलोपैथी की सफलता को देखते हुए मै भी इसे स्‍वीकारती हूं , वैसे इसका सबसे बडा कारण इस मद में किया जानेवाला खर्च है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । पर छोटी छोटी बीमारियों के लिए ही सही , जहां पर हमारी ये देशी दवाएं कारगर है , वहां एलोपैथी का प्रयोग किया जाना क्‍या उचित है ? लोग ये जानते हैं कि सरदर्द हो , तो दर्दनिवारक गोली लेनी है , पर ये क्‍यूं नहीं जानते कि फोडा होने पर ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ का प्रयोग करना है। ताज्‍जुब की बात है कि यहां की इतनी सटीक देशी दवाइयों की जानकारी यहीं के ही लोगों को मालूम नहीं है। शिक्षा का मतलब अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और ज्ञान को भूल जाना नहीं होता , पर आजतक ऐसा ही होता आया है , जो हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दोषपूर्ण तो ठहरा ही देता है। युग बदलने के साथ ही साथ हर पद्धति का विकास किया जाना अधिक आवश्‍यक है , जब तक हर क्षेत्र का समानुपातिक विकास न हो , एक क्षेत्र की अंधी दौड में हमें शामिल नहीं होना चाहिए।

सोमवार, 20 जुलाई 2009

पृथ्‍वी के जड चेतन पर सूर्य या चंद्रग्रहण के प्रभाव का क्‍या है सच ???????

आप दुनिया को जिस रूप में देख पाते हैं , उसी रूप में उसका चित्र उतार पाना मुश्किल होता है , चाहे आप किसी भी साधन से कितनी भी तन्‍मयता से क्‍यूं न कोशिश करें। इसका मुख्‍य कारण यह है कि आप हर वस्‍तु को देखते तो त्रिआयामी हैं , यानि हर वस्‍तु की लंबाई और चौडाई के साथ साथ उंचाई या मोटाई भी होती है , पर चित्र द्विआयामी ही ले पाते हैं , जिसमें वस्‍तु की सिर्फ लंबाई और चौडाई होती है। इसके कारण किसी भी वस्‍तु की वास्‍तविक स्थिति दिखाई नहीं देती है।

इसी प्रकार जब हम आकाश दर्शन करते हैं , तो हमें पूरे ब्रह्मांड का त्रिआयामी दर्शन होता है । प्राचीन गणित ज्‍योतिष के सूत्रों में सभी ग्रहों की आसमान में स्थिति का त्रिआयामी आकलण ही किया जाता है , इसी कारण सभी ग्रहों के अपने पथ से विचलन के साथ ही साथ सूर्य के उत्‍तरायण और दक्षिणायण होने की चर्चा भी ज्‍योतिष में की गयी है। पर ऋषि , महर्षियों ने जन्‍मकुंडली निर्माण से लेकर भविष्‍य कथन तक के सिद्धांतों में कहीं भी आसमान के त्रिआयामी स्थिति को ध्‍यान में नहीं रखा है । इसका अर्थ यह है कि फलित ज्‍योतिष में आसमान के द्विआयामी स्थिति भर का ही महत्‍व है। शायद यही कारण है कि पंचांग में प्रतिदिन के ग्रहों की द्विआयामी स्थिति ही दी होती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ भी ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव में ग्रहों की द्विआयामी स्थिति को ही स्‍वीकार करता है। इस कारण सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता ?

हम सभी जानते हैं कि आसमान में प्रतिमाह पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी होता है , जबकि अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति बन जाती है , लेकिन इसके बावजूद प्रतिमाह सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण नहीं होता। इसका कारण भी यही है। आसमान में प्रतिमाह वास्‍तविक तौर पर पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी और हर अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति नहीं बनती है । यह तो हमें मात्र उस चित्र में दिखाई देता है , जो द्विआयामी ही लिए जाते हैं। इस कारण एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर नहीं पडती है। जिस माह वास्‍तविक तौर पर ऐसी स्थिति बनती है, एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर पडती है और इसके कारण सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते है।

सूर्यग्रहण के दिन चंद्रमा सूर्य को पूरा ढंक लेता है , जिससे उसकी रोशनी पृथ्‍वी तक नहीं पहुंच पाती , तो दूसरी ओर चंद्रग्रहण के दिन पृथ्‍वी सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य आकर सूर्य की रोशनी चंद्रमा पर नहीं पडने देती है । सूर्य और चंद्र की तरह ही वास्‍तविक तौर पर समय समय पर अन्‍य ग्रहों की भी आसमान में ग्रहण सी स्थिति बनती है , जो विभिन्‍न ग्रहों की रोशनी को पृथ्‍वी तक पहुंचने में बाधा उपस्थित करती है। पर चूंकि अन्‍य ग्रहों की रोशनी से जनसामान्‍य प्रभावित नहीं होते हैं , इस कारण वे सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की तरह उन्‍हें साफ दिखाई नहीं देते। परंतु यदि ग्रहणों का प्रभाव पडता , तो सिर्फ सूर्य और चंद्र ग्रहण ही प्रभावी क्‍यूं होता , अन्‍य ग्रहण भी प्रभावी होते और प्राचीन ऋषियों , महर्षियों के द्वारा उनकी भी कुछ तो चर्चा की गयी होती ।

अन्‍य ग्रहों के ग्रहणों का किसी भी ग्रंथ में उल्‍लेख नहीं किए जाने से यह स्‍पष्‍ट है कि किसी भी ग्रहण का कोई ज्‍योतिषीय प्रभाव जनसामान्‍य पर नहीं पडता है। पर चूंकि सूर्य के उदय और अस्‍त के अनुरूप ही पशुओं के सारे क्रियाकलाप होते हैं , इसलिए अचानक सूर्य की रोशनी को गायब होते देख उनलोगों का व्‍यवहार असामान्‍य हो जाता है , जिसे हम ग्रहण का प्रभाव मान लेते हैं । लेकिन चिंतन करनेवाली बात तो यह है कि यदि ग्रहण के कारण जानवरों का व्‍यवहार असामान्‍य होता , तो वह सिर्फ सूर्यग्रहण में ही क्‍यूं होता ? चंद्रग्रहण के दिन भी तो उनका व्‍यवहार असामान्‍य होना चाहिए था। पर चंद्रग्रहण में उन्‍हें कोई अंतर नहीं पडता है , क्‍यूंकि अमावस्‍या के चांद को झेलने की उन्‍हें आदत होती है।

वास्‍तव में ज्‍योतिषीय दृष्टि से अमावस्‍या और पूर्णिमा का दिन ही खास होता है। यदि इन दिनों में किसी एक ग्रह का भी अच्‍छा या बुरा साथ बन जाए तो अच्‍छी या बुरी घटना से जनमानस को संयुक्‍त होना पडता है। यदि कई ग्रहों की साथ में अच्‍छी या बुरी स्थिति बन जाए तो किसी भी हद तक लाभ या हानि की उम्‍मीद रखी जा सकती है। ऐसी स्थिति किसी भी पूर्णिमा या अमावस्‍या को हो सकती है , इसके लिए उन दिनों में ग्रहण का होना मायने नहीं रखता। पर पीढी दर पीढी ग्रहों के प्रभाव के ज्ञान की यानि ज्‍योतिष शास्‍त्र की अधकचरी होती चली जानेवाली ज्‍योतिषीय जानकारियों ने कालांतर में ऐसे ही किसी ज्‍योतिषीय योग के प्रभाव से उत्‍पन्‍न हुई किसी अच्‍छी या बुरी घटना को इन्‍हीं ग्रहणों से जोड दिया हो। इसके कारण बाद की पीढी इससे भयभीत रहने लगी हो। इसलिए समय समय पर पैदा हुए अन्‍य मिथकों की तरह ही सूर्य या चंद्र ग्रहण से जुड़े सभी अंधविश्वासी मिथ गलत माने जा सकते है। यदि किसी ग्रहण के दिन कोई बुरी घटना घट जाए , तो उसे सभी ग्रहों की खास स्थिति का प्रभाव मानना ही उचित होगा , न कि किसी ग्रहण का प्रभाव।