शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

जब जीवन में आपको आउट आफ सिलेबस प्रश्‍न पत्र मिले ....

1 ) इतिहास में 1632 से 1653 के दौरान बनी भव्‍य इमारत ताज महल के बारे में पढने को मिलता है, विज्ञान के विकास के बिना उस युग में इतनी बडी इमारत के बनने का विश्‍वास नहीं होता , आखिर राजस्‍थान से आगरे तक इतना संगमरमर ढोया और इतनी उंचाई पर पहुचाया कैसे गया , हमारे समक्ष इसका कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि आगरे में ताजमहल खडा है ।

2 ) इतिहास में अजंता और एलौरा की गुफा के बारे में भी पढने को मिलता है , इस कला पर विश्‍वास तो किया ही जा सकता है , फिर भी एक प्रश्‍न तो उठता ही है , आखिर गुफा के अंदर रोशनी का प्रबंध कैसे किया गया था , हमारे सामने कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि अजंता और एलौरा की कलाकृतियां इसकी गवाह बनकर खडी हैं।

3 ) इतिहास में खगोल शास्‍त्र के बारे में भी इतना कुछ पढने को मिलता है , जब आकाश दर्शन के लिए प्राचीन खगोल वैज्ञानिकों के पास मात्र बांस के खोखे थे , इतने रिसर्च हुए कैसे , हमारे पास कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि उन प्राचीन सूत्रों से आसमान की हर स्थिति की सटीक गणना के हो जा रही है।

4 ) इतिहास में रामचंद्र जी और कृष्‍ण जी के जीवन में घटी घटनाओं के बारे में भी पढने को मिलता है , पर उन घटनाओं का कोई प्रमाण नहीं मिला , इसलिए हम इसे साहित्‍य कहते हैं ।

5 ) इतिहास में ज्‍योतिष की अच्‍छी खासी चर्चा है , पर उसका प्रभाव महसूस करने की चीज है , यह दिखाई नहीं देती , इसलिए इसे हम अंधविश्‍वास कहते है ।

उपरोक्‍त बातें प्रमाणित करती हैं कि हम तर्क नहीं करते , आंखो देखे पर विश्‍वास करते हैं , जबकि ईश्‍वर ने अन्‍य पशुओं की तरह हमें सिर्फ आंख ही नहीं दिए , हमें महसूस करने के लिए दिमाग और दिल भी दिए हैं , मेरे विचार से हमें उनका भी उपयोग करना चाहिए।

                            अब एक कहानी भी सुन लें

किसी गांव में एक भी स्‍कूल नहीं , पर एक बच्‍चे को पढने का बहुत शौक था। अपने अध्‍ययन के लिए वह शहर में रहनेवाले अपने चाचाजी के पुत्र की पुरानी पुस्‍तके मंगवा लिया करता था और दिन रात अध्‍ययन में जुटा रहता। वैसे उसे कोई डिग्री तो नहीं मिल सकी थी , पर अपनी मेहनत के बल पर नवीं कक्षा तक की पूरी जानकारी हासिल कर रखी थी। इस कारण उस बच्‍चे से सबको बडी आशा थी। पर शहर से आए एक व्‍यक्ति , जिसका अपना बच्‍चा पढाई नहीं कर पा रहा था , को उस बच्‍चे से जलन हो गयी। उसने अपनी प्रशंसा के लिए उस बच्‍चे की परीक्षा लेने और उसमें पास करने पर बच्‍चे को आगे पढाने की बात करते हुए पूरे गांववालों को निश्चित स्‍थान पर जमा होने को कहा। सारे गांववाले बडे खुश थे कि अब बच्‍चे को पढाई का सही माहौल मिलेगा , पर आयोजक की मंशा तो बच्‍चे के मनोबल को कम करने की थी , इसलिए उसने प्रश्‍न पत्र में स्‍नातक स्‍तर के सारे प्रश्‍न डाल दिए , आयोजक की मंशा पूरी हुई , बच्‍च फेल कर गया और गांववाले निराश , पर बच्‍चे का मनोबल कम नहीं हुआ , उसने उस प्रश्‍न पत्र को हिफाजत से रखा , ताकि अपने अध्‍ययन के उपरांत कभी उसका भी हल निकाल सके। वैसे सफलता असफलता तो ईश्‍वर के हाथों में है , पर सफलता का सपना देखना तो अपने हाथ में ,क्‍यूं न देखा जाए ?
                                              
                         अब चलते चलते एक बात और

जब एक गुरू के द्वारा अपने किसी शिष्‍य की परीक्षा ली जाती है , तो शिष्‍य को सिलेबस के अंदर के ही प्रश्‍नो के जबाब देने पडते हैं , जो एक शिष्‍य के लिए बहुत आसान होता है और यदि एक गुरू के द्वारा दूसरे गुरू के शिष्‍य की परीक्षा ली जाती है तो उसके प्रश्‍नपत्र में आधे प्रश्‍न आउट आफ सिलेबस हो सकते हैं , जो शिष्‍य के लिए कुछ कठिन तो हो जाता है , लेकिन जो गुरू ही नहीं , वो परीक्षा लेना शुरू कर दे , तो बडी खतरनाक स्थिति पैदा होती है , शिष्‍य के प्रश्‍न पत्र के सारे प्रश्‍न आउट आफ सिलेबस हो सकते हैं !!

दुर्गापूजा के अवसर पर कल मेरा बाहर जाने का कार्यक्रम है। हो सकता है मैं एक सप्‍ताह के बाद ही लौटूं , आप सभी पाठकों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं !!

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

आज एक बार फिर इस लेख को पोस्‍ट करने की आवश्‍यकता पड गयी है !!

लोगों के मन में ज्‍योतिष के प्रति गलत धारणाएं होती हैं। अक्‍सर लोग एक प्रश्‍न किया करते हैं कि आखिर जब ग्रह ही सब कुछ निर्धारित करते हैं , तो फिर कर्म का क्‍या महत्‍व है ? उन्‍हें मैं समझाना चाहूंगी कि मानव जीवन में ग्रहों का प्रभाव तो है , क्‍योंकि आपके सामने जो भी परिस्थितियां उत्‍पन्‍न होती हैं , वह इन्‍हीं ग्रहों के परिणामस्‍वरूप ,इसलिए उसे आपकी जन्‍मकुंडली के अनुसार प्राप्‍त फल कह सकते हें , पर इनसे लडकर खुद की या समाज के अन्‍य लोगों के मेहनत से जो उपलब्धियां आप हासिल करते हैं , वह आपकी कर्मकुंडली के अनुसार होता है। जन्‍मकुंडली और कर्मकुंडली के मुख्‍य अंतर को आपके समक्ष इस प्रकार रखा जा सकता है।


जहां जन्मकुंडली को निश्चित करने में जातक के जन्म के समय भचक्र के विभिन्न कोणों पर स्थित ग्रहों की भूमिका होती है , वहीं कर्मकुंडली को निश्चित करने में जातक के भौगोलिक परिवेश के साथ.साथ युग के परिवर्तन का भी प्रभाव होता है। जन्मकुंडली सांकेतिक तौर पर ही सही , पूरे जीवन की परिस्थितियों का विश्लेषण करती है , जबकि कर्मकुंडली वास्तविक तौर पर , लेकिन सिर्फ भूत और वर्तमान तक का। जातक के लिए जन्मकुंडली निश्चित् होती है , जबकि कर्मकुंडली अनिश्चित। जहां जन्मकुंडली को निश्चित करने में जातक की परिस्थितियां जिम्मेदार होता है , वहीं कर्मकुंडली को निश्चित करने में सामाजिक ,पारिवारिक , राजनीतिक , धार्मिक और आर्थिक वातावरण के साथ.साथ व्यक्ति खुद भी जिम्मेदार होता है। जन्मकुंडली के अनुसार जातक की रूचि होती है , जबकि कर्मकुंडली के अनुसार जातक का खान.पान और रहन.सहन। जन्मकुंडली से व्यक्ति के स्वभाव का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से व्यवहार का।

जन्मकुंडली से स्वास्थ्य का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से शरीर के वजन का। जन्मकुंडली से धन के प्रति दृष्टिकोण का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से धन की मात्रा का। जन्मकुंडली से भाई.बहन ,बंधु.बांधव से संबंध का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से भाई.बहन ,बंधु.बांधव की संख्या का। जन्मकुंडली से माता के सुख और उनसे मिलनेवाले सहयोग का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से माता के पद और उनकी स्थिति का। जन्मकुंडली से हर प्रकार की संपत्ति से मिलनेवाले सुख या दुख का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से हर प्रकार की संपत्ति के स्तर का। जन्मकुंडली से दिमाग की क्रियाशीलता और एकाग्रता का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से दिमाग की मजबूती और विविध प्रकार की डिग्रियों का। जन्मकुंडली से विविध प्रकार के रोगों से लड़ने की शक्ति या रोगग्रस्तता का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से बीमारियों के नाम का। जन्मकुंडली से ऋणग्रस्तता के होने या न होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से ऋण की मात्रा का।

जन्मकुंडली से दाम्पत्य जीवन के सुखमय या दुखमय होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से विवाह की उम्र या पार्टनर के कद.काठी और पद का। जन्मकुंडली से जीवनशैली के सुखमय या दुखमय होने या जीवनी शक्ति का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से जीवन जीने के स्तर या जातक की उम्र का। जन्मकुंडली से भाग्य या धर्म के प्रति सोंच या नजरिए का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से किसी धर्म को अपनाने का । जन्मकुंडली से रूचि और स्तर के अनुरूप कैरियर के होने या न होने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से कैरियर की शाखा या पद का । जन्मकुंडली से अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहने या न रहने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से लक्ष्य के स्तर का। जन्मकुंडली से अपने खर्च के प्रति दृष्टिकोण का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से खर्च कर पाने की मात्रा का। जन्मकुंडली से बाहरी स्थान में सफलता मिलने या न मिलने का पता चलता है , जबकि कर्मकुंडली से बाहरी स्थान में जा पाने या न जा पाने का।

जन्मकुंडली से भविष्य के छोटे से छोटे समयांतराल के बारे में सांकेतिक ही सही ,जानकारी प्राप्त की जा सकती है , किन्तु कर्मकुंडली में भविष्य बिल्कुल अनिश्चित होता है , कहा जाए कि सामने अंधेरा सा छाया होता है , तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जन्मकुंडली देखकर हम ज्योतिषी जन्मकुंडली पर आधारित प्रश्नों के सांकेतिक ही सही , पर भूत , वर्तमान और भविष्य के हर प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं , कर्मकुंडली पर आधारित प्रश्न पूछकर एक ज्योतिषी की योग्यता या ज्योतिष-शास्त्र पर प्रश्नचिन्ह लगाना उचित नहीं है।

इस आलेख कों मैने 24 फरवरी 2009 को इस वेब पते परप्रकाशित किया था , जिसमें एक भी शब्‍द का फेरबदल न करते हुए आज पुन: प्रकाशित किया गया है , यहां चटका लगाकर इसमें आयी टिप्‍पणियों को भी देख ससकते हैं  !!

सोमवार, 21 सितंबर 2009

19 सितम्‍बर के विशेष ग्रहयोग से हिन्‍दी चिट्ठा जगत अछूता नहीं रह सका !!

कई दिन पहले मैने 19 सितम्‍बर को 5 बजे से 9 बजे सुबह तक आसमान में एक खास ग्रह स्थिति के होने और उसके फलस्‍वरूप कुल आबादी के कम से कम 40 प्रतिशत लोगों के प्रभावित होने की भविष्‍यवाणी करते हुए सबको सावधान रहने के लिएएक आलेखलिखा था। इसकी वजह से विश्‍व , देश और राज्‍य में राजनीतिक और अन्‍य स्‍तर पर थोडी हलचल तो दिखाई पडी , पर एक मुख्‍य घटना इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में भूकम्‍प का आना रहा। 19 सितम्‍बर को सुबह 6.04 बजे भूकम्प के तेज झटके महसूस किए गए। रिक्टर पैमाने पर 6.4 की तीव्रता वाले इस भूकम्प में बहुत नुकसान तो नहीं हुआ , पर इस घटना केतिथि और समयपर ध्‍यान दिया जाए, तो ग्रहों के उस योग के प्रभाव की पुष्टि हो जाती है। वैसे जानते हुए भी ग्रहों के प्रभाव को पहले से अच्‍छी तरह स्‍पष्‍ट न कर पाने से अक्‍सर हमलोगों को खीझ हो जाती है ,पर विश्‍वास है कि अध्‍ययन यूं ही चलता रहा तो निकट भविष्‍य में ही हम अपनी बात और अधिक स्‍पष्‍टत: कह पाएंगे।

बाली द्वीप में हुए इस भूकम्‍प के अलावे इस ग्रह स्थिति का एक बडा प्रभाव हिन्‍दी चिट्ठा जगत पर भी देखने को मिला। ठीक एक महीने पूर्व 10 अगस्‍त को बुझे दिल से समीर लाल जी के द्वारा लिखे गए ‘हारा हुआ योद्धा’ और 17 अगस्‍त को मेरे द्वारा टेंशन में लिखे गएआलेखपर समूचा चिट्ठा जगत जिस तरह एक होकर सामने आया , वह काबिले तारीफ है। फिर एक महीने में ऐसी कोई बात भी नहीं हुई , जिसके कारण दो दिनों में इतना तनावपूर्ण वातावरण तैयार हो जाए। वैसे तो किसी विवाद में पूरी जानकारी के बिना मैं पक्ष और विपक्ष में एक शब्‍द भी बोलना पसंद नहीं करती , पर संयोगवश कुछ दिनों से चिट्ठाजगत में अधिक समय व्‍यतीत करने के कारण लगभग सभी बातों की जानकारी मुझे है। नीचे लिखी बातों के अतिरिक्‍त और कोई मुद्दा हो , तो अवश्‍य बताने का कष्‍ट करेंगे।

जहां तकनीकी जानकारी देनेवाले आशीष खंडेलवाल जी काअपने पोस्‍टमें सामूहिक ईमेल भेजने वाले को सचेत करनेवाला लेख आपत्तिजनक नहीं माना जा सकता , वहीं लोकेन्‍द्र जी केप्रतिरोध को भी हम बिल्‍कुल सामान्‍य ही कह सकते हैं। जहां इस आलेख में सुमन जी के बारे में विवेक जी काप्रश्‍नबिल्‍कुल स्‍वाभाविक है , वहीं रचना जी की उत्‍तराधिकारी सुमन जी का भी उनके अधिकार पर प्रश्‍न करनानाजायजनहीं। यहां तक कि न तो शुक्‍ला जी के पहलेवाले चिट्ठा चर्चा में कोईगडबड झालाहै , न ही बबली जी की गलती को दिखाने के लिए किए गएस्टिंग आपरेशनमें और न सबों के द्वारा किए जानेवाले टिप्‍पणियों में । मै तो सारे आलेखों और टिप्‍पणियों को पढती आ रही हूं , यदि साफ दिल से पढा जाए तो उसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं दिखाई पडा था। यह संसार ही विविधता से भरा है और अपनी अपनी विशेषताओं के अनुरूप हमारी कार्यशैली होती है पर ‘जहां काम आवै सुई क्‍या करै तलवारि’ की तर्ज पर दुनिया में सबका अपना अपना महत्‍व है। एक परिवार में विभिन्‍न दृष्टिकोणों के लोग हंसी खुशी गुजर करते हैं।

मैं तो 19 सितम्‍बर की ग्रह स्थिति का ही दोष मानती हूं ,  जिसके कारण न तो अनूप शुक्‍ला जी चिट्ठा चर्चा में की गयी समीर लालजी की टिप्‍पणी को सामान्‍य तौर पर ले सके और न हीं अनूप शुक्‍लाजी कीपोस्‍टको समीर लाल जी भी हमेशा की तरह मजाक में । फिर समीर लाल जी का क्षमा मांगने वाला स्‍टाइल अनूप शुक्‍ला जी को कैसे जंच सकता था ? यह छोटी सी बात उन दोनो के बीच की होती , तो शायद संभल भी जाती , पर अन्‍य पाठकों की टिप्‍पणी प्रतिटिप्‍पणियों ने 18 सितम्‍बर का दिन भर का माहौल तनावपूर्ण बना ही दिया।

वैसे ग्रहों का असली लक्ष्‍य तो 19 सितम्‍बर को तनाव को और बढाना था , इसलिए मेरी पोस्‍ट पर टिप्‍पणी दर्ज कर आए खुशदीप सहगल जी अपने कहे अनुरूप चद्दर तानकर न सो सके और इतने संवेदनशील समय में बबली जी कावकीलबनकर सामने आ गए , जबकि बबली जी चार दिनों से दूसरे ब्‍लोगों पर टिप्‍पणियां दर्ज कर रही है , पर अपनी चर्चावाले ब्‍लोगों पर कोई सफाई नहीं दे रही। आशीष खंडेलवाल प्रशंसा के पात्र हो सकते हैं , उनकी कोई रचना पढने से रह न जाए , इसके कारण मैं इसे ईमेल में मंगाया करती हूं , पर उनकी प्रशंसा करने का प्रवीण जाखड जी के लिए यह मौकाउचित नहीं था। आशीष खंडेलवाल जी ने तो धोखाधडी करने और लोगों को बदनाम करने का एकअलग गुरही सिखा दिया , ताकि आनेवाले समय में गलत ढंग से किसी को भी शिकार बनाया जा सके। डा अरविंद मिश्राजी ने भले ही स्‍वस्‍थ मानसिकता से ही यहआलेखलिखा हो , पर वह भी स्‍वस्‍थ टिप्‍पणियों और प्रतिटिप्‍पणियों से सजा न रह सका और सबने मिलकर आग में घी डाल डाल डाल डालकर पूरे चिट्ठा जगत की गरिमा को धूमिल करने में बडी भूमिका निभायी।पर यह विवाद आज के बाद और निराशा पैदा नहीं करेगा , इसका मुझे विश्‍वास है, क्‍यूंकि मैं रहीम के इस दोहे से सहमत नहीं ...
रहीमन धागा प्रेम का , मत तोरो चटकाय ।
टूटे पर भी ना जुडे जुडे गांठ लगी जाए ।।
मैं मानती हूं कि संबंधों के कमजोर हो रहे धागे को तोडकर गांठ लगा ही देनी चाहिए , ताकि संबंध और मजबूत बना रह सके। मुझे विश्‍वास है कि खुलकर बहस होने के बाद दोनो पक्ष एक दूसरे की समस्‍याओं को समझ पाते हैं और इससे  संबंधों में और मजबूती आती है। उम्‍मीद रखती हूं , ब्‍लाग जगत के सभी सदस्‍य पुरानी बातों को भूल जाएंगे।

इन दोनो दिनों में जहां सभी ब्‍लागर भाई टिप्‍पणियों और प्रतिटिप्‍पणियों पढने लिखने में व्‍यस्‍त थे , वही मेरा ध्‍यान इस ग्रहों की इस खास स्थिति पर था , जिसे 1988 में पडोसियों और गांव के अधिकांश घरो मुहल्‍लों में छोटे मोटे विवाद के उभरने और तनावयुक्‍त सफर को देखते हुए ही ढूंढा जा सका था। तब से अब तक इस ग्रह स्थिति के फलस्‍वरूप तनावपूर्ण वातावरण का आना हमने निश्चित मान लिया था , हालांकि कुछ लोग इसके प्रभाव से अवश्‍य अछूते भी हो जाते हैं।मेरी उक्‍त पोस्‍ट पर टिप्‍पणी लिखते हुए नारायण प्रसाद जी ने भूतकाल की घटनाओं या दुर्घटनाओं का कुछ उल्लेख करते हुए इसे समझने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की है , पर मैं ऐसे उदाहरण नहीं दे सकती , बस इतना ही जानती हूं कि अधिकांश लोग इससे परेशान रहते हैं। इसी पोस्‍ट पर प्रवीण जी ने कहा है “सभी टिप्पणी कारों से ये जरूर आग्रह करूंगा कि २१ को बतायें कि १९-२० कैसे गुजरे”।

वैसे तो हिन्‍दी के चिट्ठाकारों का हिन्‍दी चिट्ठा जगत से इतना जुडाव है कि उन्‍हें तनाव देने के लिए यह विवाद भी कम नहीं , इसकी अपवाद मैं भी नहीं , पर इसके अलावे पूछा जाए तो 24 घंटे बिजली सप्‍लाई रहनेवाले हमारे शहर में 18 तारीख को ही 5 बजे से 9 बजे तक सुबह हमारे यहां बिजली की कटौती हुई और उसके बाद के 48 घंटों में 12 घंटे भी बिजली रही हो तो यह मैं अधिक बोल रही। मेरे बेटे के अर्द्धवार्षिक परीक्षा के प्रश्‍न पत्र भी दोनो ही दिन जरूरत से अधिक लंबे रहे। इन दोनो दिनों में छोटी बहन को सर्दी खांसी बुखार रहा। पोते को मारते हुए मेरी कामवाली के पति का चांटा उसके कानों पर पड गया , जिससे दो दिनों से कान में तेज दर्द रहा। इसके अतिरिक्‍त मेरे पास जितने भी लोगों के फोन आए , दो दिनों में किसी न किसी प्रकार के तनाव या चिडचिडाहट होने की बहुतों ने पुष्टि की , खासकर तीनो ही दिन 4 बजे से 7 बजे शाम तक यह अधिक प्रभावी रहा।

वैसे ये सब बिल्‍कुल सामान्‍य घटनाएं हैं , पर एक ही दिन सभी घरों में तो एक साथ संयोग नहीं हो सकता न। अब प्रवीण शाह जी के कहे अनुसार आप सब भी यह स्‍पष्‍ट करने का कष्‍ट करें कि पिछले दो दिनों में आप बिल्‍कुल सामान्‍य रह पाए या छोटी मोटी ही सही , कोई वैसी समस्‍या आयी , जो भले ही अक्‍सर आती हो , पर प्रतिदिन नहीं आती और इसलिए इसे सामान्‍य नहीं माना जा सकता। ग्रहों के प्रभाव की परीक्षा हो ही जाए , ताकि आगे भी ऐसी तिथियां रहे,  तो आपको खबर की जा सके।

रविवार, 20 सितंबर 2009

क्‍या अपने चिट्ठे का नाम planet’s effect on microbiological, pathological, pharmacologica या पैथोलोजिकल बायो रिदम में एडवांस स्‍टडीज रख लूं ??

मेरे प्रोफाइल को विजिट करनेवाले अक्‍सर मुझे ईमेल भेजा करते हैं ...

“ आपका प्रोफाइल देखा , पर आप तो ज्‍योतिष जैसे विषय पर लिखती हैं , जिसमें मेरी रूचि नहीं और उसके बारे में मुझे कोई जानकारी भी नहीं , इसलिए आपका ब्‍लाग नहीं पढ पाता हूं। “ 

जो भी मुझे इस प्रकार के ईमेल भेजा करते हैं , उनसे मेरा अनुरोध रहता है कि वे मेरा ब्‍लाग अवश्‍य पढें , मेरे ब्‍लाग पर ज्‍योतिष की तो कोई चर्चा ही नहीं होती , आसमान में मौजूद ग्रहों की वर्तमान स्थिति के आधार पर सामयिक प्रश्‍नों के तिथियुक्‍त जबाब भी होते हैं , इसके माध्‍यम से समाज से धार्मिक और ज्‍योतिषीय भ्रांतियों का दूर करने की दिशा में भी प्रयास जारी है , इसके साथ ही मेरी अपनी और ब्‍लाग जगत से जुडी बातें भी मैं इसी चिट्ठे में करती हूं। इसलिए कुल मिलाकर मेरे ब्‍लाग में ऐसा कुछ भी नहीं , जो आपकी समझ में इसलिए नहीं आए कि आप ज्‍योतिष के बारे में कुछ नहीं जानते। इतना कहने के बाद भी बहुत लोग चिट्ठे का 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' नाम देखकर ही मेरे चिट्ठे को ज्‍योतिषीय चिट्ठा समझकर नहीं पढते हैं , तो अनजान पाठकों की बात करने की आवश्‍यकता ही नहीं । इसलिए कुछ दिनों से मेरे दिमाग में अपने चिट्ठा का नाम बदले देने की बात चल रही थी ।

25 जुलाई को अपनेएक आलेखमें मैने चंद्रमा के घटने बढने यानि पूर्णिमा और अमावस्‍या के जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव की चर्चा करते हुए एक आलेख लिखा था। उसमें निशांत मिश्रा की निम्‍न टिप्‍पणी आयी थी ...... “क्या आप इसे microbiological, pathological, और pharmacological सन्दर्भों में नहीं देखतीं? इन विषयों के परिप्रेक्ष्य में देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि तबीयत खराब होने, निदान न हो पाने, बाद में निदान हो जाने, और फिर तबीयत ठीक हो जाने को जैवरासायनिकी द्वारा बेहतर समझाया जा सकता है.”

इसके कुछ दिनों बाद ही 4 सितम्‍बर को मैने भावना पांडेय जी का एक आलेख पढकर उसे बृहस्‍पति के 12–12 वर्षों में एक जैसी स्थिति को जोडने काप्रयासकिया , तो डा अरविंद मिश्रा की निम्‍न टिप्‍पणी मिली ... ” मनुष्य में एक जैवीय घड़ी होती है -यह कुदरत से संतुलन बना के चलती है -अब जैसे ज्वार भाटा चंद्रमा की गतियों से प्रभावित है -मनुष्य की लय ताल /बारंबारता की घटनाओं में मासिक चक्र आदि हैं -कुछ असामान्य स्थतियों में जब जैवीय घडी बिगड़ती है तो कुछ रोग बारंबारता लिए हो जाते हैं -आप पैथोलोजिकल बायो रिदम से गूगलिंग करें -परिणाम सभी को बताएं -कृपा कर अध्यन का दायरा बढायें -आप इन्टरनेट युग में जी रही हैं !”

इन दोनो टिप्‍पणियों से अर्थ यह निकलता है कि ब्रह्मांड में घटनेवाली हर घटना का संबंध एक दूसरे से होता है , जो बायो रिदम का कारण है।  आकाशीय पिंडों की गति के अनुसार धरती पर घटनाओं का संबंध होता है , इसे विज्ञान भी मानता है। पर ज्‍योतिष को मानने में वैज्ञानिकों को मुश्किल हो जाती है और जिसे वैज्ञानिक न माने , उसे आम जनों को मानने में तो दिक्‍कत होगी ही। अब जहां ज्‍योतिष के प्रति ये मानसिकता हो , वहां मेरे चिट्ठे को पढनेवालों की संख्‍या कम होनी ही है। इसलिए मेरे मन में अपने चिट्ठे के नाम को परिवर्तित कर देने के विचार बार बार आ रहे हैं। आप पाठको से मेरा प्रश्‍न है कि क्‍या इस चिट्ठे का नामकरण planet’s effect on microbiological, pathological, pharmacologica या पैथोलोजिकल बायो रिदम में एडवांस स्‍टडीज कर दिया जाए ?