शनिवार, 14 नवंबर 2009

मंगल के घर में शनि बैठा है .. क्‍या यह खिल्‍ली उडानेवाली बात है ??

ज्‍योतिष की खिल्‍ली उडानेवालों के मुहं से अक्‍सर कुछ न कुछ ऐसी बातें सुनने को मिल जाती है , जो उनके अनुसार बिल्‍कुल अविश्‍वसनीय है....उसी में से एक है किसी ग्रह का घर। उनका मानना है कि सब सभी पिंड अपने परिभ्रमण पथ पर निश्चित रूप से चलते रहते हैं , तो उनमें से किसी का घर कहां माना जाए ? यदि वास्‍तव में उनका कोई घर होता , तो वे थोडी देर वहां न रूकते , आराम न करते ? उनका शक स्‍वाभाविक है , पर मैं आपलोगों को जानकारी देना चाहती हूं कि किसी ग्रह का खुद के घर में या अपने मित्र के घर में या अपने शत्रु के घर में होना 'फलित ज्‍योतिष' के क्षेत्र में नहीं , वरन् 'परंपरागत खगोल शास्‍त्र' के क्षेत्र में आता है और इस कारण यह किसी भी दृष्टि से हास्‍यास्‍पद नहीं। यदि आज तक वैज्ञानिकों ने खगोल शास्‍त्र से संबंधित अपना सूत्र न विकसित किया होता , तो आज वे ग्रहों की गति से संबंधित 'गणित ज्‍योतिष' के सूत्रों पर भी शक की निगाह रख सकते थे। पर इसपर किसी को संदेह नहीं होता है , क्‍यूंकि हजारो वर्ष बाद भी आज तक हमारी परंपरागत गणना में मामूली त्रुटि ही देखी जा सकी है।

सतही तौर पर किसी बात पर नजर डालकर उसे गलत समझा जा सकता है , पर गंभीरता से विचार करने पर ही इसके असली तथ्‍य पर पहुंचा जा सकता है। वैज्ञानिको को परंपरागत ज्‍योतिष में लिखे मंगल के लाल ग्रह होने की बात तब सही लगी होगी , जब वे मंगल ग्रह की सतह पर लाल मिट्टी होने का अनुभव कर पाए होंगे। इसी प्रकार चंद्रमा के जलतत्‍व होने की बात की पुष्टि तब हुई हो, जब वैज्ञानिकों को इसी वर्ष किए गए अपने परीक्षण में चंद्रमा पर पानी होने का पता चला हो। पर इन सबसे आगे आसमान के विभिन्‍न राशियों से अलग अलग रंगों का परावर्तन अभी तक वैज्ञानिकों की नजर में नहीं आ रहा , इसलिए इसे स्‍वीकार करना सचमुच आसान नहीं। ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में विभिन्‍न राशियों द्वारा अलग अलग रंगों के प्रकाश के परावर्तन के बारे में लिखा गया है , पर उसे देखने के लिए जो भी साधन या दृष्टि चाहिए , उसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं। हो सकता है ऋषि मुनि उन्‍हें लिख न पाए हों या उनकी वह रचना कहीं खो गयी हो। इससे विषय तो विवादास्‍पद रहेगा ही , अगले अनुच्‍छेद में मैं अपनी बात को समझाने की कोशिश करती हूं।

जिस तरह धरती में कहीं भी कोई रेखा खींची हुई नहीं है , पर भूगोल का अध्‍ययन करते वक्‍त हम काल्‍पनिक आक्षांस या देशांतर रेखाएं खींचते हैं। इन रेखाओं को खींचने का एक आधार होता है यानि दोनो की 0 डिग्री किसी आधार पर पृथ्‍वी को दो बराबर भागों में बांटती है , और इसी के समानांतर या किसी अन्‍य आधार पर अन्‍य रेखाएं खींची गयी हैं। किसी भी जगह के सूर्योदय , सूर्यास्‍त, मौसम परिवर्तन या अन्‍य कई बातों की गणना में आक्षांस और देशांतर रेखाएं सहयोगी बनती हैं। इस बात से तो आप सभी सहमत होंगे।

भूगोल की ही तरह गणित ज्‍योतिष में पृथ्‍वी को स्थिर मानने से पूरब से पश्चिम तक जाता हुआ पूरा गोल 360 डिग्री का जो आसमान में एक वृत्‍त नजर आता है , उसे 30-30 डिग्री के बारह काल्‍पनिक भागों में बांटा गया है। इन्‍ही 30 डिग्री की एक एक राशि मानी गयी है यानि 0 डिग्री से 30 डिग्री तक मेष, 30 डिग्री से 60 डिग्री तक वृष, 60 डिग्री से 90 डिग्री तक मिथुन,  90 डिग्री से 120 डिग्री तक कर्क, 120 डिग्री से 150 डिग्री तक सिंह, 150 डिग्री से 180 डिग्री तक कन्‍या, 180 डिग्री से 210 डिग्री तक तुला, 210 डिग्री से 240 डिग्री तक वृश्चिक, 240 डिग्री से 270 डिग्री तक धनु, 270 डिग्री से 300 डिग्री तक मकर, 300 डिग्री से 330 डिग्री तक कुंभ, 330 डिग्री से 360 डिग्री तक मीन कहलाती है।

भूगोल के आक्षांस और देशांतर रेखाओं की तरह ही इन खास खास विंदुओं को भी एक महत्‍वपूर्ण आधार पर लिया गया है यानि आसमान के किसी भी विंदु से 0 डिग्री नहीं शुरू कर दी गयी है और कहीं भी अंत नहीं कर दिया गया है। यदि प्राचीन ऋषि मुनियों और उनके ग्रंथो की मानें , तो आसमान के मेष और वृश्चिक राशि से लाल , वृष और तुला राशि से चमकीले सफेद , मिथुन और कन्‍या राशि से हरे , कर्क राशि से दूधिए , सिंह राशि से तप्‍त लाल , मकर और कुंभ राशि से काले और धनु तथा मीन राशि से पीले रंग को परावर्तित होते देखा गया है। अभी तक विज्ञान इसे ढूंढ नहीं सका है , इसलिए इसमें संदेह रहना स्‍वाभाविक है।

पर जब प्राचीन ऋषियों , महर्षियों को इस बात के रहस्‍य का पता हुआ , उन्‍होने उन राशियों का संबंध वैसे ही रंगों को परावर्तित करने वाले ग्रहों के साथ जोड दिया। यही कारण है कि मेष और वृश्चिक राशि का आधिपत्‍य लाल रंग परावर्तित करने वाले मंगल को , वृष और तुला राशि का सफेद चमकीले रंग परावर्तित करनेवाले शुक्र को , मिथुन और कन्‍या राशि का हरा रंग परावर्तित करनेवाले बुध को , कर्क का दूधिया सफेद रंग परावर्तित करनेवाले चंद्रमा को , सिंह राशि का तप्‍त लाल रंग परावर्तित करनेवाले सूर्य को ,  धनु और मीन राशि का पीली किरण बिखेरनेवाले बृहस्‍पति को तथा मकर और कुभ राशि का काले शनि को दे दिया। अपने पथ पर चलते हुए ही कोई भी ग्रह अपनी राशि से गुजरते हैं तो स्‍वक्षेत्री कहलाते हैं, जबकि कभी कभी इन्‍हें दूसरे ग्रहों की राशि से भी गुजरना होता है, इसलिए यह मजाक उडाने वाली बात तो बिल्‍कुल नहीं । ज्‍योतिष के कई अविश्‍वसनीय मुद्दों पर विश्‍वभर के ज्‍योतिषियों में बहस या अलग अलग विचारधाराएं हैं , पर इस बात को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं , इसलिए इसकी वैज्ञानिकता की पुष्टि तो हो ही जाती है।

फलित ज्‍योतिष मानता है कि ग्रह स्‍वक्षेत्री हों तो अधिक मजबूत होते हैं , क्‍यूंकि अपने क्षेत्र में कोई भी राजा ही होता है, पर दूसरों के क्षेत्र में ग्रहों के होने से कुछ समझौते की नौबत आ जाती है। ग्रंथो में वर्णित ग्रहों के स्‍वभाव के हिसाब से कुछ ग्रहों में आपस में मित्रता और कुछ की आपस में शत्रुता भी है। इसलिए ज्‍योतिष में यह भी माना जाता है कि यदि कोई ग्रह मित्र क्षेत्र से गुजरता है  , तब भी उसका प्रभाव भी अच्‍छा ही दिखता है। लेकिन ग्रह यदि शत्रु के क्षेत्र से गुजरे , तो ग्रह लोगों के सम्‍मुख तरह तरह की बाधा उपस्थित करते हैं।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

इस पूरी सदी में किन लोगों की जन्‍मकुंडलियों में मंगल कमजोर थे ??

अभी आसमान में मंगल की एक खास स्थिति के होने के कारण मैं इसकी चर्चा करते हुए पिछले कई दिनों से मैं मंगल से संबंधित आलेखही लिख रही हूं। इनमे मैने बताया है कि जब मंगल कमजोर हो तो उस वक्‍त जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों की जन्‍मकुंडलियों में मंगल की स्थिति कमजोर बन जाती है और इसके कारण उनका युवावस्‍था का वातावरण अच्‍छा नहीं बन पाता है। खासकर 24 वर्ष की उम्र से शुरू होनेवाली किसी न किसी पक्ष से संबंधित उनकी समस्‍याएं 30 वर्ष की उम्र तक बढती ही चली जाती हैं।वैसे 30 वर्ष की उम्र के बाद थोडी राहत तो मिलती है पर पूरा सुधार 36 वर्ष की उम्र के बाद ही हो पाता है , जब युवावस्‍था समाप्‍त होने को रहता है।

आज के आलेख में हम देखेंगे कि इस सदी में किन तिथियों के मध्‍य जन्‍म लेनेवाले लोगों का जन्‍मकालीन मंगल कमजोर था , जिसके कारण खास 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र तक उनके समक्ष किसी खास संदर्भ की समस्‍याएं बढते क्रम में बनी रही। इस समस्‍याओं के कारण इस पूरी अवधि के दौरान ये किंकर्तबय विमूढावस्‍था में रहें। ज्‍योतिष को अतिसूक्ष्‍म गणना मानने वाले इस सहज ज्ञान को  भी गोल मोल न समझ लें। इस लिस्‍ट को आप भी साथ रखिए और इन जन्‍मतिथियों के मध्‍य जन्‍मलेनेवालों के बारे में बेखौफ ऐसी बातें कीजिए ........

1 फरवरी से 20 मार्च 1901
4 मार्च से 25 अप्रैल 1903
19 अप्रैल से 3 जून 1905
21 जून से 25 जुलाई 1907
8 सितम्‍बर से 9 अक्‍तूबर 1909
4 नवम्‍बर से 15 दिसम्‍बर 1911
12 दिसम्‍बर 1913 से 28 जनवरी 1914
16 जनवरी से 5 मार्च 1916
19 फरवरी से 11 अप्रैल 1918
30 मार्च से 17 जून 1920
23 मई से 6 जून 1922
8 अगस्‍त से 7 सितम्‍बर 1924
14 अक्‍तूबर से 22 नवम्‍बर 1926
27 नवम्‍बर 1928 से 12 जनवरी 1929
4 जनवरी से 24 फरवरी 1931
6 फरवरी से 27 मार्च 1933
12 मार्च से 3 मई 1935
30 अप्रैल से 12 जून 1937
8 जुलाई से 9 अगस्‍त 1939
22 सितम्‍बर से 25 अक्‍तूबर 1941
12 नवम्‍बर से 25 दिसम्‍बर 1943
1 जनवरी से 7 फरवरी 1946
24 जनवरी से 15 मार्च 1948
28 फरवरी से 20 अप्रैल 1950
10 अप्रैल से 26 मई 1952
8 जून से 14 जुलाई 1954
25 अगस्‍त से 24 सितम्‍बर 1956
26 अक्‍तूबर से 6 दिसम्‍बर 1958
6 दिसम्‍बर 1960 से 21 मार्च 1961
11 जनवरी से 28 फरवरी 1963
15 फरवरी से 5 अप्रैल 1965
23 मार्च से 10 मई 1967
12 मई से 23 जून 1969
24 जुलाई से 24 अगस्‍त 1971
15 अक्‍तूबर से 10 नवम्‍बर 1973
20 नवम्‍बर से 31 दिसम्‍बर 1975
1 जनवरी से 18 फरवरी 1978
1फरवरी से 24 मार्च 1980
7 मार्च से 27 अप्रैल 1982
22 अप्रैल से 6 जून 1984
25 जून से 29 जुलाई 1986
12 सितम्‍बर से 14 अक्‍तूबर 1988
6 नवम्‍बर से 18 दिसम्‍बर 1990
15 दिसम्‍बर 1992 से 2 फरवरी 1993
19 जनवरी से 11 मार्च 1995
22 फरवरी से 15 अप्रैल 1997
4 अप्रैल से 20 मई 1999

जैसा कि मैं पहले लिख ही चुकी हूं , उपरोक्‍त समयांतराल में जन्‍मलेनेवाले सारे लोगों का मंगल कमजोर होगा , यहां तक कि इन तिथियों के आसपास जन्‍मलेनेवाले बहुत सारे लोग भी मंगल के बुरे प्रभाव में आएंगे। इसके कारण 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक उनके सम्‍मुख मुश्किले आयी होंगी या आएंगी , 30 वर्ष की उम्र के आसपास ये मुश्किल सर्वाधिक होंगी। पर किनके सम्‍मुख किस प्रकार की मुश्किलें , इसे जानने के लिए आपको अगली कडी का इंतजार करना होगा।




बुधवार, 11 नवंबर 2009

आज आपलोग मेरी कहानी 'थम गया तूफान' पढिए !!

आज साहित्‍य शिल्‍पी में मेरी एक कहानी 'थम गया तूफान' प्रकाशित की गयी है , कृपया उसे पढकर अपनी प्रतिक्रिया देने का कष्‍ट करें !

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

कीडे मकोडे भी जोडा बनाकर ही रहते हैं ??

कीडो मकोडो से मुझे जितना भय है , कीडे मकोडे हमें उतना ही परेशान करते हैं। बोकारो स्‍टील सिटी के सेक्‍टर 4 के जिस क्‍वार्टर में हमें पहली बार ठीक बरसात में रहने की शुरूआत करनी पडी , वहां कीडे मकोडो के नई नई प्रजातियों को देखने का मौका मिला। रसोई घर के सीपेज वाली एक दीवाल में न जाने कितने छेद थे और सबों से अक्‍सर तरह तरह के कीडे मुझे मुंह चिढाते। कीटनाशक के छिडकाव से कोई कीडा मर जाता , तो थोडी देर बाद उसका जोडा अवश्‍य निकलकर कुछ समझने की कोशिश करता था। उबले आलू के चार फांक कर दें , तो जो शेप बनता है , बिल्‍कुल उसी शेप को वहां एक दिन चलते हुए देखा , तो मैं चौंक ही गयी थी। ऐसे भी कीडे होते हैं ? दो तीन महीने बडी मुश्किल से कीटनाशकों के बल पर मैं उस रसोई में खाना बनाने में समर्थ हो सकी थी। फिर अक्‍तूबर में उस दीवाल के नए सिरे से प्‍लास्‍टर हो जाने के बाद ही हमें समस्‍या से निजात मिल सकी थी।

बोकारो में पेड पौधो की अधिकता है , इस कारण अलग अलग डिजाइनों वाली तितली या पतंगे या कीडे मकोडे को भी रहने की जगह मिल जाती है। मेरे उसी क्‍वार्टर में एक कमरे में एक ही खिडकी थी, उसी से अक्‍सर ऐसे कीडे मकोडे उस कमरे में आ जाते , पर छोटी खिडकी होने से वे उससे बाहर नहीं निकल पाते थे। मुडे हुए अखबार की सहायता से उसे भगाने की कोशिश करती तो कभी कभी एक दो मर भी जाते। वैसे उसका जोडा कभी आए या नहीं , पर यदि किसी खास तरह का कीडा कमरे में मर जाता , तो दूसरे ही दिन उसी तरह का एक कीडा उसे ढूंढता हुआ पहुंच जाता था। उसे देखकर मैं समझ जाती थी कि उसी का जोडा किसी खास संकेत की सहायता से इसे ढूंढने आया है। ऐसी समझ आने के बाद मैं उन्‍हें भगाने के क्रम में उनकी सुरक्षा का भी ध्‍यान रखने लगी थी।

पिछले छह वर्षों से मैं बोकारो में कॉपरेटिव कालोनी में रह रही हूं। वैसे तो यह काफी साफ सुथरी जगह है , पर अगल बगल कहीं पर एक खास तरह के मकडे का बसेरा है , जिसका चित्र मैं आपको दिखा रही हूं। ये अक्‍सर घर में भी घुस आते हैं , सो तुरंत उनपर कीटनाशक का छिडकाव करने का विचार आ जाता है। पर इनके भागने की स्‍पीड इतनी अधिक होती है कि मैं शायद ही कभी छिडकाव कर पाती होउं। ये देखने में ही इतने भयानक लगते हैं कि हमेशा इनको लेकर भय बना रहता है। पर कुछ दिन पूर्व एक मकडा कई दिनों तक मेरे स्‍टोर के कबर्ड के रैक के छत पर पडा था। आपलोगों के लिए मैने अपने मोबाइल से कई एंगल से इसके फोटो भी लिए , पर यह इधर से उधर भी नहीं हुआ , चुपचाप पडा रहा। इसे ऐसी हालत में देखकर कीटनाशक का छिडकाव करने की मेरी हिम्‍मत ही नहीं हुई , नीचे दिए गए चित्र को देखकर आप मकडे के इस हालत का कारण समझ सकते हैं , जिसमें दीपावली की सफाई के क्रम में एक डब्‍बे से कुचलकर उसका जोडा मृत पडा हुआ है और उसी के बगल में यह तीन दिनों से भूखा प्‍यासा शोक मना रहा था !!





सोमवार, 9 नवंबर 2009

धन, कर्म और प्रयोग से हमें 'विज्ञान' मिल सकता है, 'ज्ञान' प्राप्‍त करने के लिए ग्रहों का साथ होना आवश्‍यक है!!

कल प्रवीण शाह जी नेटाईम ट्रैवल और टाईम मशीन के बहाने ज्योतिष शास्त्र के विज्ञान होने या न होने का विश्लेषण...........नामक एक आलेख पोस्‍ट किया , जिसमें भूत या भविष्‍य में झांकनेवाली टाइम मशीन और ज्‍योतिष दोनो की ही वैज्ञानिकता पर शक किया गया था। उनके विश्‍लेषण के अनुसार कल्पना के घोड़े जितने भी दौड़ा लिये जायें पर हकीकत में टाईम ट्रेवल करना और टाईम मशीन बनना असंभव है। इसी तरह ज्योतिष हो या टैरो या क्रिस्टल बॉल गेजिंग... भविष्य का पूर्ण निश्चितता के साथ कथन असंभव है।

उस लेख में मैने निम्‍न टिप्‍पणी की ....
ऐसी भविष्‍यवाणियां हम करें ही क्‍यूं .. जिसका काट मनुष्‍य के वश में हो .. हम ऐसी भविष्‍यवाणियां क्‍यूं न करें .. जिसका काट मनुष्‍य के पास हो ही नहीं !!

दिनेशराय द्विवेदी जी को मेरी टिप्‍पणी नहीं जंची , आगे उनकी टिप्‍पणी देखें ...
है कोई जवाब? आप के पास पहली टिप्पणी का।

अब प्रवीण शाह जी को मुझे जबाब तो देना ही था , उन्‍होने प्रश्‍न के रूप में ही एक जबाब लिखा .
क्या यह सत्य नहीं है संगीता जी, कि अधिकांश भविष्यवाणियां ऐसी ही होती हैं जिसकी काट मनुष्य के हाथ में हो?

टिप्‍पणी के रूप में इस छोटे से प्रश्‍न का उत्‍तर बडा होता , जिसे टिप्‍पणी के रूप में देना संभव नहीं था , इसलिए मैने उनके जबाब में एक आलेख लिखने का वादा किया , जो मैं प्रस्‍तुत कर रही हूं...

मेरा मानना है कि इतने वैज्ञानिक युग में होने के बावजूद धन , कर्म और प्रयोग से  'सबकुछ' हासिल करने के बाद भी उसे हासिल करने के मुख्‍य उद्देश्‍य को पूरा करने का सभी दावा नहीं कर सकते। जैसे आज शरीर की कद, काठी और वजन तक को नियंत्रित करने के साधन उपलब्‍ध है ... पर वे दावे के साथ अच्‍छा स्‍वास्‍थ्‍य नहीं दे सकते , अथाह धन को प्राप्‍त करने के कितने कार्यक्रम बनाए जा सकते हैं .. पर वे धन का संतोष नहीं दे सकते , मनचाहे जीन को एकत्रित करके मनचाहे संतान पा सकते हैं ... पर उन्‍हें सुपात्र नहीं बना सकते , आज अपनी पसंद के अनुसार पात्र चुनकर विवाह करने की आजादी है .. पर सभी सुखी दाम्‍पत्‍य जीवन नहीं पाते , पैसों के बल पर लोग नौकर इकट्ठे कर सकते हैं .. पर सच्‍चा सेवक मिलना सबको मुमकिन नहीं , पलंग पर गद्दों का अंबार लगा सकते हैं .. पर नींद लाना सबके वश की बात नहीं , नाना व्‍यंजन जुटा सकते हैं .. पर भूख नहीं लगे तो कैसे खाएंगे , हर क्षेत्र के विशेषज्ञों की औषधि मिल सकती है .. पर चैन कैसे मिले , विष ढूंढना बहुत ही आसान है .. पर अमृत ढूंढकर दिखाए कोई , मास्‍टर क्‍या पूरा स्‍कूल ही बनवा सकते हैं .. पर किसी को अकल नहीं दे सकते आप,  पैसों के बल पर बडे से बडे गुरू आपके सम्‍मुख खडे हो जाएंगे .. पर ज्ञान पाना सबके लिए संभव नहीं , किताबें क्‍या , पूरी लाइब्रेरी मिल सकती हैं .. पर विद्या प्राप्‍त करना इतना आसान नहीं , पिस्‍तौल या अत्‍याधुनिक हथियार मिल सकते हैं आपको .. पर कुछ करने के लिए साहस जुटाना बहुत मुश्किल है , जीवन के विभिन्‍न मोडों पर अनगिनत साथी मिल सकते हैं  ..  पर सभी असली मित्र नहीं हो सकते , आप हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति प्राप्‍त कर सकते हैं .. पर शांति नहीं पा सकते , सैकडों भाई बंधु प्राप्‍त कर सकते हैं .. पर उनमें से कोई भी सहयोगी नहीं हो सकता , भ्रमण के लिए टिकट खरीद सकते हैं आप .. पर भ्रमण का आनंद ले पाना सबके वश में नहीं , कुर्सी मिल सकती है .. पर प्रतिष्‍ठा नहीं , और इसी तरह विज्ञान प्राप्‍त कर सकते हैं पर ज्ञान नहीं !!

इसका कारण यह है कि स्‍वास्‍थ्‍य, संतोष, दाम्‍पत्‍य जीवन, नींद, सुपुत्र, भूख, चैन, अमृत,अकल, विद्या, साहस, मित्र, शांति, सहयोगी, प्रतिष्‍ठा, भ्रमण का आनंद और ज्ञान प्राप्ति आपके वश में नहीं होती। इनको हासिल करने के लिए आपको अपने जन्‍मकालीन ग्रहों पर निर्भर रहना पडता है। किसी भी व्‍यक्ति के जीवन में ये सभी मुद्दे समय सापेक्ष होते हैं और कभी कमजोर तो कभी मजबूत दिखाई देते रहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो अपने मजबूत समय में तरक्‍की करनेवाले दुनिया के एक से एक दिग्‍गज अपने कमजोर समय में लाचार होते क्‍यूं देखे जाते ? और एक से एक कमजोर व्‍यक्ति मजबूत समय में दुनिया के लिए आदर्श कैसे बन जाते हैं ? इसलिए ज्‍योतिष की चर्चा इन्‍हीं संदर्भों में की जानी चाहिए। जन्‍मकुंडली के निर्माण से लेकर भृगुसंहिता तक के भविष्‍य कथन में हमारे पूज्‍य ऋषि , महर्षियों ने इसी तरह सांकेतिक तौर पर ही ज्‍योतिष की विवेचना करने की कोशिश की थी , पर कालांतर में पंडितों ने अधिक ज्ञानी बनने के चक्‍कर में उन बातों की भविष्‍यवाणी करने का दावा किया , जो मनुष्‍य के अपने हाथ में है। इसलिए मैने कहा कि ऐसी भविष्‍यवाणियां हम करें ही क्‍यूं , जिसका काट मनुष्‍य के वश में हो। हम ऐसी भविष्‍यवाणियां क्‍यूं न करें , जिसका काट मनुष्‍य के पास हो ही नहीं !!
अपनी प्रतिक्रिया अवश्‍य दें ......



रविवार, 8 नवंबर 2009

मंगल चंद्र की यह युति धनु राशिवालों के लिए खासी बुरी और कुंभ राशिवालों के लिए खासी अच्‍छी रहेगी !!

आज आसमान में मंगल और चंद्र की एक बहुत ही मजबूत स्थिति बन रही है , जिसका रात्रि साढे नौ बजे के आसपास उदय होगा और रातभर मंगल और चंद्र को आप एक साथ आकाश में चमकता देख सकते हैं। इसके कारण आज और कल का दिन युवाओं के लिए खासकर 24 वर्ष की उम्र से 36 वर्ष की उम्र तक के युवकों युवतियों के लिए बहुत ही निर्णायक होगा , इसलिए वे आज कल में किसी महत्‍वपूर्ण घटना से संयुक्‍त हो सकते हैं। वैसे इसका प्रभाव अभी आनेवाले छह महीने तक रहेगा। अधिकांश के लिए यह घटना सुखद हो सकती है , पर कुछ के लिए तो कष्‍टकर होगी ही। मई 2010 तक इस घटना के विशेष प्रभाव से उन्‍हें सुख या दुख की अनुभूति होती रहेगी। जहां सुखद प्रभाव महसूस करनेवाले युवक युवतियों को इसकी बधाई देना चाहूंगी , तो दुखद प्रभाव महसूस करनेवालों के लिए मेरे दिल में संवेदनाएं भी हैं। वे अपने धैर्य की परीक्षा देते रहें , आनेवाला कल उनका भी होगा। वैसे इसके बारे में कल ही हल्‍के फुल्‍के ढंग से बताया था , पर आज विस्‍तार से जानकारी प्राप्‍त करें।

वैसे तो पंचांग में मंगल और चंद्र की यह युति हर महीने आती है , क्‍यूंकि 28 दिन में ही चंद्रमा हर राशि की परिक्रमा करता है और किसी न किसी राशि में मंगल को होना ही है , इसलिए युति तो हर महीने होगी ही। पर हर महीने की युति को हम नहीं देख पाते , क्‍यूंकि सूर्य के साथ रहने के कारण वह पृथ्‍वी के हर भाग में वह दिन में ही उदय और अस्‍त हो जाता है। वैसे दिखाई न देने से हमपर प्रभाव भी न पडे , यह बात तो ग्रहों के संबंध में कहना तो उचित नहीं होगा। वास्‍तव में सूर्य से कोणिक दूरी के बढने के साथ ही साथ पृथ्‍वी से इसकी दूरी अपेक्षाकृत कम होने लगती है। यही कारण है कि इस समय नासा के वैज्ञानिक भी मंगल पर अपने यान भेजने या मंगल पर अन्‍य प्रकार के परीक्षण करने की शुरूआत करते हैं।

मंगल से संबंधित कई आलेखमैं पोस्‍ट कर चुकी , जिसमें मैने स्‍पष्‍टत: समझाया है कि पृथ्‍वी से अपेक्षाकृत कम दूरी बनते जाने से ही यह पृथ्‍वी पर अधिक प्रभावी होने लगता है। जैसा कि पिछले आलेखों में कह ही चुकी हूं , मंगल युवाओं को काफी हद तक प्रभावित करता है। इस कारण 7 और 8 नवम्‍बर 2010 को युवा वर्ग के किसी खास घटना से संबंधित होने की संभावना बढ जाती है। यहां ही नहीं आनेवाले कई महीनों में मंगल और चंद्र की इस तरह की युति का प्रभाव वे देख सकेंगे। जहां कुंभ राशिवालोंके लिए यह युति खासी अच्‍छी होगी , वहीं धनु राशिवालेइस युति के कारण कुछ परेशान भी रह सकते हैं।

युवाओं के अतिरिक्‍त अन्‍य लोगों पर भी इसका आंशिक प्रभाव पडेगा , मंगल की इस खास स्थिति के कारण आज के अलावे आनेवाले छह महीनों में सभी लोग मंगल से संबंधित मुद्दों को मजबूत बनाने की कोशिश में लगे रहेंगे। विभिन्‍न लग्‍नवाले भिन्‍न प्रकार के संदर्भों में विशेष ध्‍यान संकेन्‍द्रण करेंगे .......

जैसे मेष लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य और जीवनशैली को , वृष लग्‍नवाले घर गृहस्‍थी और खर्च को , मिथुन लग्‍नवाले लाभ और प्रभाव को , कर्क लग्‍नवाले संतान और प्रतिष्‍ठा के वातावरण को , सिंह लग्‍नवाले किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति को प्राप्‍त करने को , कन्‍या लग्‍नवाले भाई बंधु से संबंधित वातावरण को , तुला लग्‍न वाले अपनी घर गृहस्‍थी और आर्थिक वातावरण को , वृश्चिक लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य और प्रभाव को , धनु लग्‍नवाले अपनी संतान और बाह्य संदर्भों की स्थिति को , मकर लग्‍नवाले किसी प्रकार की संपत्ति के लाभ को , कुंभ लग्‍नवाले पारिवारिक और पद प्रतिष्‍ठा से संबंधित वातावरण को तथा मीन लग्‍नवाले अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने की कोशिश में जुटे रहेंगे , उनमें से अधिकांश को सफलता मिलेगी , पर कुछ को असफलता भी हाथ आ सकती है। असफलता हाथ आने का कारण उनकी जन्‍मकालीन ग्रह स्थिति होगी , तात्‍कालीन नहीं !!