शनिवार, 26 दिसंबर 2009

क्‍या आप इन दिनों बुध ग्रह के प्रभाव को महसूस कर रहे हैं ??

17 दिसंबर 2009 से ही आसमान में पृथ्‍वी से खास कोणिक दूरी बनाता बुध ग्रह बहुत ही प्रभावी हो गया है। चूंकि ज्‍योतिष में बुध ग्रह बुद्धि , ज्ञान का ग्रह माना जाता है , इसलिए यह विद्यार्थियों और बौद्धिक श्रम करनेवाले लोगों को ही अधिक प्रभावित करता है। इसकी यह स्थिति 31 जनवरी तक बनीं रहेगी , जिसके कारण बुद्धिजीवी वर्ग खास सकारात्‍मक कार्यों में उलझे रह सकते हैं। वैसे 29 दिसंबर से 12 जनवरी तक का समय इनके कार्यक्रम में थोडी सुस्‍ती लानेवाला होगा। वैसे तो अधिकांश लोगों पर इसका अच्‍छा ही प्रभाव देखा जाएगा , पर कुछ विद्यार्थी , जिनकी  जन्‍मकुंडली में बुध ग्रह कमजोर होकर स्थित है , और इसके कारण वे विद्यार्थी जीवन में मनोनुकूल वातावरण का अभाव पा रहे हैं , की समस्‍या इस वक्‍त थोडी और गहरा सकती है। ऐसे विद्यार्थियों , जिनका जन्‍म निम्‍न तिथियों में हुआ है , अपने कार्यक्रम में बाधा महसूस कर सकते हैं ....

  • 1986 में 12 मार्च से 17 मार्च , 15 जुलाई से 31 जुलाई , 7 नवंबर से 19 नवंबर , 
  • 1987 में 24 फरवरी से 11 मार्च , 26 जून से 12 जुलाई , 22 अक्‍तूबर से 3 नवम्‍बर , 
  • 1988 में 7 फरवरी से 21 फरवरी , 6 जून से 22 जून, 4 अक्‍तूबर से 17 अक्‍तूबर, 
  • 1989 में 21 जनवरी से 3 फरवरी , 18 मई से 2 जून , 17 सितंबर से 1 अक्‍तूबर, 
  • 1990 में 6 जनवरी से 17 जनवरी , 28 अप्रैल से 14 मई , 31 अगस्‍त से 15 सितंबर , 20 दिसंबर से 31 दिसंबर, 
  • 1991 में 10 अप्रैल से 25 अप्रैल , 13 अगस्‍त से 29 अगस्‍त , 4 दिसंबर से 9 दिसंबर ,
  • 1992 में 22 मार्च से 6 अप्रैल , 25 जुलाई से 10 अगस्‍त , 16 नवंबर से 28 नवंबर, 
  • 1993 में 6 मार्च से 20 मार्च , 7 जुलाई से 23 जुलाई , 1 नवंबर से 12 नवंबर, 
  • 1994 में 16 फरवरी से 2 मार्च , 18 जून से 4 जुलाई , 14 अक्‍तूबर से 27 अक्‍तूबर , 
  • 1995 में 31 जनवरी से 13 फरवरी , 29 मई से 14 जून , 27 सितंबर से 11 अक्‍तूबर, 
  • 1996 में 15 जनवरी से 27 जनवरी , 9 मई से 25 मई , 9 सितंबर से 21 सितंबर, 
  • 1997 में 1 जनवरी से 10 जनवरी , 20 अप्रैल से 6 मई , 23 अगस्‍त से 6 सितंबर, 13 दिसंबर से 24 दिसंबर,   

कुछ लोगों के लिए यह ग्रह स्थिति विशेष तौर पर फलदायक भी हो सकती है। किसी संयोग के काम करने से वे किसी महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम से जुड सकते हैं । 1926 , 1933 , 1939 , 1946 , 1952 , 1953 , 1959 , 1966 , 1972 , 1979 , 1985 , 1986 , 1992 , 1998 , 1999 और 2005 के जुलाई और अगस्‍त में जन्‍म लेनेवाले इन दिनों में किसी मामले में मनोनुकूल माहौल में रहेंगे। इसके साथ ही कर्क राशि में जन्‍म लेनेवालों के लिए भी बुध ग्रह की यह स्थिति किसी संदर्भ में मनोनुकूल होगी।

पर कुछ लोगों के लिए  यह ग्रह स्थिति विशेष तौर पर कष्‍टदायक भी हो सकती है। किसी दुर्योग से उनका जीवन बाधित हो सकता है। 1923 , 1929 , 1930 , 1936 , 1942 , 1949 , 1956 , 1962 , 1969 , 1975 , 1982 , 1988 , 1989 , 1995 , 2001 और 2008 के मई जून में जन्‍म लेने वालों के समक्ष इन दिनों में किसी मामले में मनोनुकूल स्थिति का अभाव हो सकता है। इसके साथ ही वृष राशि में जन्‍म लेनेवालों के लिए भी बुध ग्रह की यह स्थिति किसी संदर्भ में परेशानी उपस्थि‍त कर सकती है।

वैसे इस 'अच्‍छे' या 'बुरे' समय को आप किसी बडी उपलब्धि या बडे नुकसान से न जोड लें , क्‍यूंकि ये अस्‍थायी तौर पर आनेवाला ग्रहयोग है और कोई अच्‍छा या बुरा बडा निर्णय तभी होगा , जब आपकी जन्‍मकुंडली के हिसाब से स्‍थायी तौर पर कोई बडी सफलता या असफलता इस समय मिलनी होगी। पर यदि जन्‍मकुंडली के हिसाब से आपका कोई बडा अच्‍छा या बुरा योग न हो , तो इस ग्रहयोग के कारण डेढ महीने'अच्‍छा' होने के किसी भ्रम में या 'बुरा' होने के संशय में गुजार देंगे।









शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

समाज में लिंग परीक्षण कर कन्‍या भ्रूण की हत्‍या की गलत परंपरा का फल भुगतना होगा हमें !!

ज्‍योतिष जैसे विषय से मेरे संबंधित होने के कारण मेरे समक्ष परेशान लोगों की भीड लगनी ही है। तब मुझे महसूस होता है कि इस दुनिया में समस्‍याओं की कमी नहीं , सारे लोग किसी न किसी प्रकार के दुख से परेशान हैं। इसमें वैसे अभिभावकों की संख्‍या भी कम नहीं , जो अपने पुत्र या पुत्रियों के विवाह के लिए कई कई वर्षों से परेशान हैं। प्रतिवर्ष मेरे पास आनेवाले परेशान अभिभावकों को मदद करने के क्रम में एक दो विवाह मेरे द्वारा भी हो जाया करते हैं। पर इधर कुछ वर्षों से मैं महसूस कर रही हूं कि हमारे पास आनेवाले परेशान अभिभावकों में बेटियों के माता पिता कम हैं और बेटों के अधिक। इससे स्‍पष्‍ट है कि वर की तुलना में विवाह के लिए वधूओं की संख्‍या कम है।

कन्‍या भ्रूण हत्‍या के फलस्‍वरूप भविष्‍य में इस प्रकार की स्थिति के बनने की आशंका तो सबों को है , पर इसके इतनी जल्‍दी उपस्थि‍त हो जाने से मुझे बडी चिंता हो रही है। आज विवाह के लिए जो भी वर और कन्‍या तैयार दिख रहे हैं , उनका जन्‍म 1975 से 1985 के मध्‍य का माना जा सकता है। उस समय शायद भ्रूण हत्‍या को तो कानूनी मान्‍यता मिल गयी थी , पर इतनी जल्‍दी गर्भ में लिंग परीक्षण होने की विधि विकसित नहीं हुई थी कि परीक्षण करने के बाद उसकी हत्‍या की जा सके। उस वक्‍त भ्रूण हत्‍या के द्वारा अनचाही संतान को ही दुनिया में आने से रोका जाता था। पर इससे भी लिंग असंतुलन हो ही गया , वो इस कारण कि जिस दंपत्ति के दो या तीन बेटे हो गए , उन्‍होने तीसरे या चौथे संतान को ही आने से रोक दिया , जबकि जिस दंपत्ति की दो या तीन बेटियां थी , उन्‍होने लडके को जन्‍म देने के लिए चौथे या पांचवे संतान का भी इंतजार किया। इससे कन्‍याओं की संख्‍या मामूली घटी और इसका ही प्रभाव हम आज पा रहे हैं ।

तीसरी संतान न होने देना कोई गुनाह नहीं था , पर जब इसका इतनी छोटी सी बात का इतना भयावह प्रभाव सामने नजर आ रहा है , तो मात्र 15 वर्षों के बाद समाज में लिंग परीक्षण कर कन्‍या भ्रूण की हत्‍या की जो गलत परंपरा शुरू हुई है , उसका असर भी मात्र 15 वर्षों में क्‍या होगा , ये चिंता करने वाली बात है। पर अभी तक समाज को कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा , अभी भी निरंतर कन्‍याओं की भ्रूण हत्‍या हो रही है और बालिकाओं की संख्‍या में कमी होती जा रही है। सारे अस्‍पताल तो सेवा के अपने धर्म को भूलकर पैसे कमाने की एक बडी कंपनी बन चुके हैं। स्‍वयंसेवी संस्‍थाएं बेकार रह गयी है। सरकारी कार्यक्रम फाइलों की शोभा बढा रहे हैं। यदि कन्‍या भ्रूण हत्‍या के विरोध में कडे कानून भी बनें तो भी कोई उपाय नहीं दिखता है। आवश्‍यकता है लोगों में स्‍वयं की जागरूकता के आने की। तभी आनेवाले दिनों में कन्‍या की संख्‍या को बढाया जा सकता है , अन्‍यथा बहुत ही भयावह स्थिति के उपस्थित होने की आशंका दिख रही है, और जब ये समय आएगा , हमारे सम्‍मुख कोई उपाय नहीं होगा।


विद्यार्थी अधिक से अधिक फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने की कोशिश करें!!

मनुष्‍य के शारीरिक मानसिक विकास की चर्चा करने के क्रम में एक 'टीन एजर' बात अवश्‍य आ जाती है। यह शब्‍द 13 से 19 वर्ष तक के किशोरों के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। शारीरिक विकास के मामले में यह उम्र तो विशेष है ही , मानसिक संतुलन बनाए रखने में भी इस उम्र की बडी भूमिका होती है। इसी उम्र में जब कोई बच्‍चे सा काम करे , तो तुरंत फटकार मिलती है कि वे अब बच्‍चे नहीं रहे और जब बडे जैसा व्‍यवहार करते करने जा रहे होते , उन्‍हें टोका जाता है कि वे अभी बच्‍चे हैं।यदि अभिभावक समझदार हों और उनके साथ उनका दोस्‍ताना व्‍यवहार हो , तो भी इस समय बच्‍चों का व्‍यवहार सचमुच अजीब सा हो जाता है। कभी कभी तो अपनी पढाई लिखाई सबकुछ भूलकर वे ऐसी संगति में आ जाते हैं , बुरी आदतें अपना लेते हैं कि बच्‍चों को देखकर भी ताज्‍जुब हो सकता है।

 एक मनोचिकित्‍सक उम्र के इस दौर को किसी भी प्रभाव से जोड सकता है। पर सिर्फ शारीरिक और मानसिक परिवर्तन की दौर से गुजरने के कारण  ही  किशोरों का16 से 20 वर्ष की उम्र तक  यह व्‍यवहार अपनी चरम सीमा पर नहीं होता , हमारा अध्‍ययन इस बात की पुष्टि करता है कि इस वक्‍त शनि के खास ज्‍योतिषीय प्रभाव के कारण जातक के समक्ष एक अलग प्रकार की परिस्थिति उपस्थित होती है। यदि आप अपनी जन्‍मतिथि में 16 और 20 वर्ष जोड दें , तो बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे , जो ऐसा नहीं पाएंगे कि कोई गल्‍ती न करने के बावजूद इन चार वर्षों के मध्‍य का कोई ढाई वर्ष खासकर 17 वां , 18 वां या 19 वां वर्ष आपने किसी खास तरह की गडबड परिस्थिति में गुजारे हैं। लगातार किसी परीक्षा में मन मुताबिक परिणाम न आना , शारीरिक अस्‍वस्‍थता का बने रहना या पिता या माता से किसी विचारों का विरोध जैसी कुछ बातों के निरंतर बने रहने के कारण अधिकांश जगहों पर शनि के प्रभाव की पुष्टि इस तरह हो जाएगी।

जो बच्‍चे पढाई लिखाई के क्षेत्र में नहीं हैं , उनसे कोई बडा अपराध इन्‍हीं दिनों में हो जाता है , जिसके कारण उनका पूरा जीवन बेकार हो जाता है। इसके अलावे आज के बच्‍चों और अभिभावकों की पढाई लिखाई के प्रति मानसिकता के कारण विद्यार्थियों के लिए यह उम्र तो और भी कष्‍टकर हो गया है। इसी उम्र के दौरान के कोई तीन वर्ष दसवीं , ग्‍यारहवी और बारहवीं की पढाई के साथ ही साथ किसी अच्‍छे कॉलेज में नामांकण कराने के भी होते हैं , इसलिए उनका दबाब भी बहुत अधिक होता है। वैसे तो हर कॉलेज में सीट कम होने के कारण किशोरों के समक्ष मनोनुकूल परिणाम की संभावना कम ही रहती है और अधिकांश को समझौता करते हुए ही अपनी पढाई को आगे ले जाना होता है। पर इस दौरान कुछ छात्र ऐसे होते हैं , जिनको बहुत बडा समझौता करना पडता है। हमेशा से अच्‍छे अच्‍छे स्‍कूलों और विभिन्‍न कोचिंग सेंटरों में टॉपर रहे किशोरों को अपनी आशा के विपरीत छोटे छोटे कॉलेजों मे दाखिला लेने को विवश होना पडता है।

व्‍यवहारिक कारण से ऐसा क्‍यूं होता है , इसे मैं परिभाषित नहीं कर सकती। लाखों की संख्‍या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों में से किस अव्‍यवस्‍था के कारण ऐसे परिणाम आ जाते हैं , प्रतियोगिता की परीक्षाओं में पारदर्शिता न होने के कारण कह पाना मुश्किल है ।अब पहले वाली बात तो रही नहीं ,पिछले वर्ष छत्‍तीसगढ के मेडिकल इंटरेंस की परीक्षा में टॉप करने वाले विद्यार्थी ने परीक्षा ही नहीं दी थी , पिछले वर्ष ही होहल्‍ले के कारण झारखंड इंजीनियरिंग की परीक्षा का परिणाम भी दुबारा निकालना पडा, इन सब बातों को देखते हुए कुछ प्रतिशत खामियों से इंकार नहीं किया जा सकता। सामान्‍य बच्‍चे थोडी कमी बेशी के साथ आगे बढ भी जाएं , पर बहुत ही परेशान हालत में अधिकांश प्रति‍भा संपन्‍न किशोरों को ही दंश झेलते हुए मैने अपने पास आते देखा है।

अभी फिर से सभी कॉलेजों के लिए इंटरेंस की परीक्षाओं के फॉर्म भरे जा रहे हैं। अपने अनुभव के आधार पर मेरा विद्यार्थियों से अनुरोध है कि वे अधिक से अधिक जगहों पर फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने का प्रयास करें। कौन सी परीक्षा देते वक्‍त आपकी मन:स्थिति कैसी रहेगी और परीक्षा अच्‍छी हो जाने के बाद भी कौन सा परिणाम कितना अच्‍छा या बुरा होगा , इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यदि आप सामान्‍य विद्यार्थी हैं , तो आप कुछ निश्चिंत रह भी सकते हैं , पर असाधारण प्रतिभा है आपमें तो आपको और सतर्क रहने की आवश्‍यकता है। अधिक से अधिक फॉर्म भरें और कहीं भी दाखिला लेकर अपनी पढाई पूरी करें। प्रतिभा किसी का मुहंताज नहीं होती , समय आने पर अपनी प्रतिभा से आप अपनी जगह बना ही लेंगे , समय एक जैसा नहीं होता , आशा है मेरे संकेत को आप समझ चुके होंगे।

रिजल्‍ट होने के बाद विकल्‍पों का चुनाव करते वक्‍त भी किशोरों को बहुत सावधानी रखनी चाहिए , जिसकी जानकारी देते हुए मैं एक पोस्‍ट परीक्षा परिणामों के बाद लिखूंगी !!




विद्यार्थी अधिक से अधिक फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने की कोशिश करें!!

मनुष्‍य के शारीरिक मानसिक विकास की चर्चा करने के क्रम में एक 'टीन एजर' बात अवश्‍य आ जाती है। यह शब्‍द 13 से 19 वर्ष तक के किशोरों के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। शारीरिक विकास के मामले में यह उम्र तो विशेष है ही , मानसिक संतुलन बनाए रखने में भी इस उम्र की बडी भूमिका होती है। इसी उम्र में जब कोई बच्‍चे सा काम करे , तो तुरंत फटकार मिलती है कि वे अब बच्‍चे नहीं रहे और जब बडे जैसा व्‍यवहार करते करने जा रहे होते , उन्‍हें टोका जाता है कि वे अभी बच्‍चे हैं।यदि अभिभावक समझदार हों और उनके साथ उनका दोस्‍ताना व्‍यवहार हो , तो भी इस समय बच्‍चों का व्‍यवहार सचमुच अजीब सा हो जाता है। कभी कभी तो अपनी पढाई लिखाई सबकुछ भूलकर वे ऐसी संगति में आ जाते हैं , बुरी आदतें अपना लेते हैं कि बच्‍चों को देखकर भी ताज्‍जुब हो सकता है।

 एक मनोचिकित्‍सक उम्र के इस दौर को किसी भी प्रभाव से जोड सकता है। पर सिर्फ शारीरिक और मानसिक परिवर्तन की दौर से गुजरने के कारण  ही  किशोरों का16 से 20 वर्ष की उम्र तक  यह व्‍यवहार अपनी चरम सीमा पर नहीं होता , हमारा अध्‍ययन इस बात की पुष्टि करता है कि इस वक्‍त शनि के खास ज्‍योतिषीय प्रभाव के कारण जातक के समक्ष एक अलग प्रकार की परिस्थिति उपस्थित होती है। यदि आप अपनी जन्‍मतिथि में 16 और 20 वर्ष जोड दें , तो बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे , जो ऐसा नहीं पाएंगे कि कोई गल्‍ती न करने के बावजूद इन चार वर्षों के मध्‍य का कोई ढाई वर्ष खासकर 17 वां , 18 वां या 19 वां वर्ष आपने किसी खास तरह की गडबड परिस्थिति में गुजारे हैं। लगातार किसी परीक्षा में मन मुताबिक परिणाम न आना , शारीरिक अस्‍वस्‍थता का बने रहना या पिता या माता से किसी विचारों का विरोध जैसी कुछ बातों के निरंतर बने रहने के कारण अधिकांश जगहों पर शनि के प्रभाव की पुष्टि इस तरह हो जाएगी।

जो बच्‍चे पढाई लिखाई के क्षेत्र में नहीं हैं , उनसे कोई बडा अपराध इन्‍हीं दिनों में हो जाता है , जिसके कारण उनका पूरा जीवन बेकार हो जाता है। इसके अलावे आज के बच्‍चों और अभिभावकों की पढाई लिखाई के प्रति मानसिकता के कारण विद्यार्थियों के लिए यह उम्र तो और भी कष्‍टकर हो गया है। इसी उम्र के दौरान के कोई तीन वर्ष दसवीं , ग्‍यारहवी और बारहवीं की पढाई के साथ ही साथ किसी अच्‍छे कॉलेज में नामांकण कराने के भी होते हैं , इसलिए उनका दबाब भी बहुत अधिक होता है। वैसे तो हर कॉलेज में सीट कम होने के कारण किशोरों के समक्ष मनोनुकूल परिणाम की संभावना कम ही रहती है और अधिकांश को समझौता करते हुए ही अपनी पढाई को आगे ले जाना होता है। पर इस दौरान कुछ छात्र ऐसे होते हैं , जिनको बहुत बडा समझौता करना पडता है। हमेशा से अच्‍छे अच्‍छे स्‍कूलों और विभिन्‍न कोचिंग सेंटरों में टॉपर रहे किशोरों को अपनी आशा के विपरीत छोटे छोटे कॉलेजों मे दाखिला लेने को विवश होना पडता है।

व्‍यवहारिक कारण से ऐसा क्‍यूं होता है , इसे मैं परिभाषित नहीं कर सकती। लाखों की संख्‍या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों में से किस अव्‍यवस्‍था के कारण ऐसे परिणाम आ जाते हैं , प्रतियोगिता की परीक्षाओं में पारदर्शिता न होने के कारण कह पाना मुश्किल है ।अब पहले वाली बात तो रही नहीं ,पिछले वर्ष छत्‍तीसगढ के मेडिकल इंटरेंस की परीक्षा में टॉप करने वाले विद्यार्थी ने परीक्षा ही नहीं दी थी , पिछले वर्ष ही होहल्‍ले के कारण झारखंड इंजीनियरिंग की परीक्षा का परिणाम भी दुबारा निकालना पडा, इन सब बातों को देखते हुए कुछ प्रतिशत खामियों से इंकार नहीं किया जा सकता। सामान्‍य बच्‍चे थोडी कमी बेशी के साथ आगे बढ भी जाएं , पर बहुत ही परेशान हालत में अधिकांश प्रति‍भा संपन्‍न किशोरों को ही दंश झेलते हुए मैने अपने पास आते देखा है।

अभी फिर से सभी कॉलेजों के लिए इंटरेंस की परीक्षाओं के फॉर्म भरे जा रहे हैं। अपने अनुभव के आधार पर मेरा विद्यार्थियों से अनुरोध है कि वे अधिक से अधिक जगहों पर फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने का प्रयास करें। कौन सी परीक्षा देते वक्‍त आपकी मन:स्थिति कैसी रहेगी और परीक्षा अच्‍छी हो जाने के बाद भी कौन सा परिणाम कितना अच्‍छा या बुरा होगा , इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यदि आप सामान्‍य विद्यार्थी हैं , तो आप कुछ निश्चिंत रह भी सकते हैं , पर असाधारण प्रतिभा है आपमें तो आपको और सतर्क रहने की आवश्‍यकता है। अधिक से अधिक फॉर्म भरें और कहीं भी दाखिला लेकर अपनी पढाई पूरी करें। प्रतिभा किसी का मुहंताज नहीं होती , समय आने पर अपनी प्रतिभा से आप अपनी जगह बना ही लेंगे , समय एक जैसा नहीं होता , आशा है मेरे संकेत को आप समझ चुके होंगे।

रिजल्‍ट होने के बाद विकल्‍पों का चुनाव करते वक्‍त भी किशोरों को बहुत सावधानी रखनी चाहिए , जिसकी जानकारी देते हुए मैं एक पोस्‍ट परीक्षा परिणामों के बाद लिखूंगी !!




गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

लोकतंत्र मूर्खों का ही शासन तो है .. चुनाव परिणाम से अचंभा कैसा ??

कुछ दिनों से झारखंड में सारे नेता , उनके भाई बंधु और चुनाव के बहाने कुछ कमाई कर लेने वाले लोग विधान सभा चुनाव की गहमा गहमी में  जितना व्‍यस्‍त थे , बुद्धि जीवी वर्ग उतना ही चिंतन में उलझे थे। झारखंड को समृद्ध समझते हुए बिहार से अलग करने के बाद इतने दिनों की शासन व्‍यवस्‍था में इस प्रदेश में आम जन तो समृद्ध नहीं हो सके थे , इस कारण उनकी चिंता जायज थी। कम से कम चुनाव परिणाम तो उनके पक्ष में आना ही नहीं चाहिए था , जिनकी बदौलत राज्‍य की स्थिति इतनी खराब हुई थी। हालांकि विकल्‍प का खास अभाव सारे देश में मौजूद है , तो झारखंड में कोई सशक्‍त विकल्‍प की संभावना का कोई सवाल ही नहीं , फिर भी चुनाव परिणाम को देखकर कुछ अचंभा हो ही जाता है।

वैसे यदि पूरी कहानी समझ में आए , तो अचंभे वाली कोई बात नहीं है। यूं भी लोकतंत्र को मूर्खों का शासन ही कहा गया है। जिस देश में जनता मूर्ख हो उस देश में तो खासकर लोकतंत्र मूर्खों का ही शासन बन जाता है। अधिकांश अनपढ और राजनीति से बेखबर रहनेवाले लोग भला मतदान का महत्‍व क्‍या समझेंगे ? विभिन्‍न समाजसेवियों का काम राजनीतिक सही ढंग से जनता को आगाह कर जनता के मध्‍य राजनीतिक चेतना को बनाए रखना होता था , पर न तो सच्‍चे समाजसेवी रह गए हैं और न ही प्रचारक । हमलोग भी सामाजिक या राजनीतिक रूप से कोई जबाबदेही न लेकर सिर्फ कलम चलाना जानते हैं । विभिन्‍न एन जी ओ भी अपने मुख्‍य उद्देश्‍य से कोसों दूर है। चुनाव के वक्‍त नेता और उसके प्रचारक घूम घूम कर उन्‍हें गुमराह करते हैं और जिस राजनीतिक पार्टी का मार्केटिंग जितना अच्‍छा होता है , वे उतने वोट प्राप्‍त कर लेते हैं।

अभी भी झारखंड में अधिक आबादी गरीबों और अशिक्षितों की ही है। मैने दो चार मुहल्‍ले में मतदान के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की। कहीं भी कोई मुद्दा नहीं मिला , जिन्‍होने आकर मीठी मीठी बातें की , दुख सुख में साथ निभाने का वादा भर किया , कुछ नोट हाथ में दिए , पूरे मुहल्‍ले के वोट उसी को मिल गए। बिना जाने बूझे कि वो जिसे वोट दे रहे हैं , वो कौन है , किस चरित्र का है , किस पार्टी का है और उनके लिए क्‍या करेगा ? उनके मुहल्‍ले में न तो पढाई लिखाई की कोई व्‍यवस्‍था है और न ही कोई किसी प्रकार का ज्ञान देनेवाला है , बेचारे आराम से पैसों के बदले वोट गिरा आते हैं। जहां दस रूपए प्राप्‍त करने के लिए उन्‍हें एक घंटे की जी तोड मेहनत करनी पडती हो , वहां एक वोट गिराने में मुफ्त के एक समय खाने का प्रबंध भी हो जाए तो कम तो नहीं । इसके साथ मुहल्‍ले के एक दो लागों को कुछ काम के लिए भी पैसे मिल जाते हैं , गरीबों को और क्‍या चाहिए ,
जय लोकतंत्र !!




क्‍या कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार मेरी कुछ मदद कर सकते हैं ??

'ज्‍योतिष' विषय पर लिखे जा रहे मेरे इस ब्‍लॉग पर ज्‍योतिष के अलावे भी बहुत सामग्रियां पोस्‍ट की जा चुकी हैं , जो मिल जुलकर खिचडी हो गयी हैं।चूंकि उस समय मेरा और कोई दूसरा ब्‍लॉग नहीं था, मेरी मजबूरी थी कि मैने सारे आलेखों को यहीं पोस्‍ट कर दिया। पर अब मैने अपना एक और ब्‍लॉग बना लिया है , इसमें मौजूद ज्‍योतिष से इतर आलेखों को नए ब्‍लॉग पर टिप्‍पणियों सहित ले जाना चाहती हूं। क्‍या यह संभव हो सकता है , कृपया कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार इसकी जानकारी देने का कष्‍ट करें।




क्‍या कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार मेरी कुछ मदद कर सकते हैं ??

'ज्‍योतिष' विषय पर लिखे जा रहे मेरे इस ब्‍लॉग पर ज्‍योतिष के अलावे भी बहुत सामग्रियां पोस्‍ट की जा चुकी हैं , जो मिल जुलकर खिचडी हो गयी हैं।चूंकि उस समय मेरा और कोई दूसरा ब्‍लॉग नहीं था, मेरी मजबूरी थी कि मैने सारे आलेखों को यहीं पोस्‍ट कर दिया। पर अब मैने अपना एक और ब्‍लॉग बना लिया है , इसमें मौजूद ज्‍योतिष से इतर आलेखों को नए ब्‍लॉग पर टिप्‍पणियों सहित ले जाना चाहती हूं। क्‍या यह संभव हो सकता है , कृपया कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार इसकी जानकारी देने का कष्‍ट करें।




मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

नई पीढी करोडों को एक एक सिक्‍के देती हुई अपने लिए करोड की व्‍यवस्‍था नहीं कर सकती ??

इस पृथ्‍वी पर मनुष्‍य का अवतरण भी तो अन्‍य जीवों की तरह ही हुआ होगा , जहां प्रकृति ने सभी पशु पक्षियों को सिर्फ अपनी आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए आवश्‍यक दिमाग प्रदान किया है , वहीं मनुष्‍य को ऐसी विलक्षण मस्तिष्‍क भेंट की है, जिसके कारण वह प्रकृति में मौजूद सारे रहस्‍यों को समझने और उनका सहारा लेकर अपने जीवन को सहज बनाने में प्रयासरत रहा। एक एक पशु पक्षी के कमजोरियों का पता कर उन्‍हें वश में करने और उनकी मजबूती से अपने जीवन को मजबूत बनाने का क्रम निरंतर चलता रहा। हजारों वर्षों के नियमित अध्‍ययन और मनन का परिणाम है हमारी ये जीवन शैली , जिसपर आज हम नाज करते हैं। प्राचीन भारत में कला और विज्ञान तथा गणित के हर क्षेत्र का इतना विकास हमारे पूर्वजों की महत्‍वाकांक्षाओं का ही परिणाम है ।

अन्‍य जीव जंतुओं की तरह ही आदिम मानव रहे हमारे पूर्वजों का क्रमश: सभ्‍य होते हुए इतने संगठित होकर जीवन यापन करने को देखते हुए एक बात तो साबित होती है कि मनुष्‍य स्‍वभावत: बहुत ही महत्‍वाकांक्षी होता है। वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्‍ट नहीं रहना चाहता और अपने को , अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए प्रयास जारी रखता है। वैसे अलग अलग व्‍यक्ति उम्र के अलग अलग भाग में और जीवन के अलग अलग पक्ष को लेकर महत्‍वाकांक्षी होते हैं। व्‍यक्ति के महत्‍वाकांक्षा के जन्‍म लेने के पीछे भी कोई बडी वजह होती है। यदि सबकुछ कमजोर होते हुए भी सामान्‍य ढंग से चलता रहे , तो व्‍यक्ति महत्‍वाकांक्षी नहीं बन पाते हैं , पर किसी भी क्षेत्र में असामान्‍य परिस्थितियों के उपस्थित होने से जीवन बुरे ढंग से प्रभावित होता है , तो व्‍यक्ति उस संदर्भ में महत्‍वाकांक्षी बन जाता है। व्‍यक्ति उस खामी को समाप्‍त कर सबके जीवन को आसान बनाने की कोशिश में जुट जाता है।

इस प्रकार आजतक महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्ति समाज के लिए वरदान बनकर सामने आते रहे हैं , पर आज अन्‍य शब्‍दों के साथ ही साथ महत्‍वाकांक्षा की भी परिभाषा बदल गयी है। आज का महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्ति बहुत स्‍वार्थी होता जा रहा है , जो समाज के लिए घातक है। प्राचीन काल में प्रकृति के असीमित संसाधनों की रक्षा करते हुए और अतिरिक्‍त सामग्रियों का प्रयोग करते हुए , सभी जीव जंतुओं की रक्षा करते हुए और उसके गुणों से फायदा उठाते हुए और संपूर्ण मानव जाति के कल्‍याण की कामना से महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्ति कार्यक्रम बनाते थे। हालांकि मध्‍ययुग में विदेशियों के आक्रमण के फलस्‍वरूप  उनके शासन काल के दौरान हमारा संपूर्ण ज्ञान , हमारी संपूर्ण व्‍यवस्‍था छिन्‍न भिन्‍न हो गयी , पर आजादी के समय महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्तियों ने पुन: अपने स्‍वार्थों का त्‍याग कर , जीवन हथेली पर रखते हुए , मौत को आगोश में लेते हुए देश को आजादी दिलाने में बडी भूमिका निभायी।

संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि हमारी महत्‍वाकांक्षा ऐसी होनी चाहिए , जिससे प्रकृति की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए , इसके सारे जीव जंतुओं का कल्‍याण करते हुए मनुष्‍य के जीवन को अधिक से अधिक सुख सुविधा संपन्‍न बनाए , महत्‍वाकांक्षा ऐसी कभी नहीं होनी चाहिए , जो प्रकृति को तहस नहस करते हुए , सारे जीव जंतुओं का विनाश करते हुए अपनी मानव जाति के हित तक की चिंता न करते हुए सिर्फ अपने जीवन को अधिक सुख सुविधा संपन्‍न बनाएं । पर यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि आज महत्‍वाकांक्षा का यही रूप देखने को मिल रहा है , पढाई भी इसी की हो रही है , करोडों लोगों की जेब से एक एक सिक्‍के निकालकर अपने लिए एक करोड बना लेने की शिक्षा तक आज  नई पीढी को दी जा रही है , जबकि उन्‍हें यह शिक्षा दिए जाने की आवश्‍यकता है कि कि वे करोडों के जेब में एक एक सिक्‍के डालते हुए अपने लिए करोड की व्‍यवस्‍था भी कर सकें।

पूरे एक महीने मिला मुझे अपने गुरू का सान्निध्‍य : धन्‍य धन्‍य हो गयी मैं !!

भारतीय संस्‍कृति में प्राचीन काल से ही पिता का विशेष महत्व है। वाल्मीकि(रामायण, अयोध्या काण्ड) में कहा गया है ... 





न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्‌।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिपा॥
(यानि पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।)
दूसरी ओर यहां गुरू की महिमा भी कम नहीं आंकी गयी है ...
गुरू गोविन्‍द दोऊ खडे काके लागूं पायं।
बलिहारी गुरू आपनो गोविंद दियों बताए।।
यानि गुरू के पद को ईश्‍वर के बराबर महत्‍व दिया गया है। 

जब पिता और गुरू दोनों का अलग अलग इतना महत्‍व हो , उनकी तुलना बडे बडे धर्म और ईश्‍वर से की जाती हो और जब पिता ही किसी के गुरू बन जाएं, तो उसका स्‍थान स्‍वयमेव सबसे ऊंचा हो जाता है। इस दृष्टि से मेरे पिता श्री विद्या सागर महथा जी मेरे लिए ईश्‍वर से कम नहीं। मेरा रोम रोम उनका ऋणी माना जा सकता है, पर समाज की ऐसी व्‍यवस्‍था में मात्र पुत्री होने के कारण मैं इस कर्ज को किसी तरह नहीं उतार सकती। इसके अतिरिक्‍त ज्‍योतिष के क्षेत्र में किए गए उनके अध्‍ययन के कारण उनके चरित्र के सैकडों पहलुओं में से किसी एक का भी चित्रण ब्‍लॉग जगत में मौजूद बहुतों को नहीं पच पाएगा और मैं इस पवित्र पोस्‍ट को विवादास्‍पद नहीं बनाना चाहती। इसलिए चाहते हुए भी एक शिष्‍य के रूप में उनकी प्रतिभा, उनके संयमित जीवन, उनके सीख और उनके ज्ञान की चर्चा यहां नहीं करना चाहूंगी। समय आने पर सबके गुण अवगुण सामने आ ही जाते हैं। पर इतना अवश्‍य कहना चाहूंगी कि छह माह की उम्र में हुए चेचक से इनका स्‍वास्‍थ्‍य इतना बुरा हो गया था , इनके शरीर को इतना कष्‍ट था कि इनकी मुक्ति के लिए मेरी दादी जी इन्‍हें खुशी से बारंबार देवी मां को सौंपती थी कि वे इसे ले जाएं। पर देवी मां ने दादी जी की बात न मानकर हमारा बडा कल्‍याण किया, क्‍यूंकि इन्‍होने प्रकृति के एक बडे रहस्‍य को उजागर किया है , जिसे मैं 2011 के शुरूआत में दुनिया के सामने रखूंगी।
पूरे एक महीने के झारखंड प्रवास के बाद पिताजी वापस कल लौट गए , इस दौरान अधिकांश समय उन्‍होने बोकारो में ही व्‍यतीत किया , कहीं भी जाते , दो चार दिनों में पुन: मेरे यहां वापस हो जाते। विवाह के बाद मायके जाने पर ही कभी मुझे इतने दिनों तक साथ रहने का मौका मिला हो , पर इस बार मेरे घर पर उन्‍होने इतना समय दिया , वो मेरे जीवन में पहली बार हुआ। अपनी छह संतान में जितना स्‍नेह उन्‍होने मुझे दिया है , शायद ही किसी को मिला हो। मुझे तो यह देखकर ताज्‍जुब होता है कि सांसारिक सफलता की ओर कम ध्‍यान रहने के बावजूद बचपन से अभी तक की मेरी एक एक बात उन्‍हें याद रहती है। 

सात महीने की उम्र में पेट के बल चलती हुई साफ सुथरे घर में एक सरसों के दाने पर मेरी न सिर्फ दृष्टि ही गयी थी , उसे मैंने अपनी उंगलियों से पकड भी लिया था। डेढ वर्ष की उम्र में पलंग से अपने पैरों को नीचे कर तुतलाते हुए 'दिल' 'दिल' कहकर स्‍वयं के गिर जाने की उन्‍हें धमकी दिया करती थी। तीन वर्ष की उम्र में मैने हिंदी अक्षरों को पहचानना शुरू कर दिया था और 'फ' 'ल' 'फल' , 'च' 'ल' 'चल' पढना शुरू कर दिया था। चार वर्ष की उम्र में न सिर्फ 'ताली ताली तू तू तलती , दो हल डाली डाली फिरती' जैसी तुतलाती जुबान से 'कोयल रानी' की पूरी कविता सुनाया करती थी , वरन् 'छोटी चिडियां' नाम की कहानी को कंठस्‍थ कर लिया था और एक एक अर्द्धविराम , पूर्ण विराम पर जरूरत के अनुसार ठहराव के साथ लोगों को सुनाया करती थी। एक मां के लिए ये सब यादें स्‍वाभाविक है , पर पहली बार अपने पिता को मैने अपने जीवन की इतनी बातें याद रखते देखा है। मेरे मानसिक विकास पर कितनी पैनी निगाह थी उनकी ??

अध्‍यापन के अतिरिक्‍त भी मेरे पीछे उन्‍होने जितनी मेहनत की , अन्‍य भाई बहनों पर कभी उतना ध्‍यान नहीं दिया। अपने मामाजी के यहां से ग्रेज्‍युएशन करने के बाद मुझे बी एड कर लेने की सलाह दी गयी , पर मैने अर्थशास्‍त्र में स्‍नातकोत्‍तर की पढाई करने का फैसला किया। मेरे परिवार‍ में पहले किसी बहन ने गांव के स्‍कूल से मैट्रिक करने से अधिक पढाई नहीं की थी। पहली बार मेरे दादा जी और दादी जी मुझे हॉस्‍टल में डालने को तैयार नहीं थे। सो मैने एडमिशन लेकर घर में ही एम ए की पढाई करने का निश्‍चय किया। घर में ही दो वर्षों तक तैयारी की और फार्म भी भर लिया। एक एक पेपर की परीक्षा हर पांचवें दिन होनी थी। प्रत्‍येक परीक्षा से एक दिन पहले दोपहर के बाद वे मेरे साथ रांची के लिए निकलते , रातभर वहां कहीं ठहरते , सुबह परीक्षा देने के बाद अपने गांव वापस लौटते। यहां तक कि मैं चार घंटे परीक्षा भवन में होती , तो शहर में कई रिश्‍तेदार होने के बाद भी वे कहीं न जाते। उतनी देर भी वे गेट के बाहर ही टहलते रहते , इस भय से कि कहीं लडकों ने वॉक आउट किया तो ये कहां जाएगी। अन्‍य भाई बहनों पर इतना ध्‍यान देते मैने उन्‍हें कभी नहीं देखा।

अध्‍ययन मनन में विश्‍वास रखने वाले पिता जी का पद या अर्थोपार्जन के लिए पढाई लिखाई करने पर विश्‍वास नहीं था और यही कारण है कि सिर्फ अध्‍ययन मनन नहीं , वरन्  मौलिक चिंतन में मेरे लगे होने से वे अपनी परंपरा को जीवित देखकर मुझसे खुश बने रहें। वैसे तो ज्ञान का खजाना ही है उनके पास , जब भी मिलना होता है , उनकी उपस्थिति में सिर्फ कुछ न कुछ जानने और सीखने में ही मेरा ध्‍यान लगा होता है। 
ज्‍योतिष के बारे में तो उनसे चर्चा होनी ही थी , पर इस बार ज्‍योतिष के अलावे ब्‍लॉग जगत के बारे में भी बहुत बातें हुईं। मेरे आलेखों को पढकर, मेरे विचारों को समझकर और भविष्‍य के मेरे कार्यक्रमों को सुनकर काफी खुश और संतुष्‍ट होकर उन्‍होने यहां से विदाई ली। इस दुनिया से वे काफी निराश है , जो आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों को ही महत्‍व देते हें और किसी ज्ञान पिपासु , कलाकार और मेहनतकशों को भी बेकार समझते हैं।  वे एक बेहतर दुनिया का स्‍वप्‍न देखते हैं , पर सैद्धांतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अत्‍यधिक भावुकता होने तथा व्‍यवहारिकता की कमी से अपने सपने को पूरा नहीं कर पाते। वे मुझमें बडी उम्‍मीद देखते हैं , शायद मैं उनका सपना पूरा कर सकूं। 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके पापा जी अभी पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है और अभी भी दिन रात चिंतन में लगे हैं। मैं उनके स्‍वस्‍थ और दीर्घजीवी होने की कामना करती हूं !!




पूरे एक महीने मिला मुझे अपने गुरू का सान्निध्‍य : धन्‍य धन्‍य हो गयी मैं !!

भारतीय संस्‍कृति में प्राचीन काल से ही पिता का विशेष महत्व है। वाल्मीकि(रामायण, अयोध्या काण्ड) में कहा गया है ... 





न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्‌।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिपा॥
(यानि पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।)
दूसरी ओर यहां गुरू की महिमा भी कम नहीं आंकी गयी है ...
गुरू गोविन्‍द दोऊ खडे काके लागूं पायं।
बलिहारी गुरू आपनो गोविंद दियों बताए।।
यानि गुरू के पद को ईश्‍वर के बराबर महत्‍व दिया गया है। 

जब पिता और गुरू दोनों का अलग अलग इतना महत्‍व हो , उनकी तुलना बडे बडे धर्म और ईश्‍वर से की जाती हो और जब पिता ही किसी के गुरू बन जाएं, तो उसका स्‍थान स्‍वयमेव सबसे ऊंचा हो जाता है। इस दृष्टि से मेरे पिता श्री विद्या सागर महथा जी मेरे लिए ईश्‍वर से कम नहीं। मेरा रोम रोम उनका ऋणी माना जा सकता है, पर समाज की ऐसी व्‍यवस्‍था में मात्र पुत्री होने के कारण मैं इस कर्ज को किसी तरह नहीं उतार सकती। इसके अतिरिक्‍त ज्‍योतिष के क्षेत्र में किए गए उनके अध्‍ययन के कारण उनके चरित्र के सैकडों पहलुओं में से किसी एक का भी चित्रण ब्‍लॉग जगत में मौजूद बहुतों को नहीं पच पाएगा और मैं इस पवित्र पोस्‍ट को विवादास्‍पद नहीं बनाना चाहती। इसलिए चाहते हुए भी एक शिष्‍य के रूप में उनकी प्रतिभा, उनके संयमित जीवन, उनके सीख और उनके ज्ञान की चर्चा यहां नहीं करना चाहूंगी। समय आने पर सबके गुण अवगुण सामने आ ही जाते हैं। पर इतना अवश्‍य कहना चाहूंगी कि छह माह की उम्र में हुए चेचक से इनका स्‍वास्‍थ्‍य इतना बुरा हो गया था , इनके शरीर को इतना कष्‍ट था कि इनकी मुक्ति के लिए मेरी दादी जी इन्‍हें खुशी से बारंबार देवी मां को सौंपती थी कि वे इसे ले जाएं। पर देवी मां ने दादी जी की बात न मानकर हमारा बडा कल्‍याण किया, क्‍यूंकि इन्‍होने प्रकृति के एक बडे रहस्‍य को उजागर किया है , जिसे मैं 2011 के शुरूआत में दुनिया के सामने रखूंगी।
पूरे एक महीने के झारखंड प्रवास के बाद पिताजी वापस कल लौट गए , इस दौरान अधिकांश समय उन्‍होने बोकारो में ही व्‍यतीत किया , कहीं भी जाते , दो चार दिनों में पुन: मेरे यहां वापस हो जाते। विवाह के बाद मायके जाने पर ही कभी मुझे इतने दिनों तक साथ रहने का मौका मिला हो , पर इस बार मेरे घर पर उन्‍होने इतना समय दिया , वो मेरे जीवन में पहली बार हुआ। अपनी छह संतान में जितना स्‍नेह उन्‍होने मुझे दिया है , शायद ही किसी को मिला हो। मुझे तो यह देखकर ताज्‍जुब होता है कि सांसारिक सफलता की ओर कम ध्‍यान रहने के बावजूद बचपन से अभी तक की मेरी एक एक बात उन्‍हें याद रहती है। 


सात महीने की उम्र में पेट के बल चलती हुई साफ सुथरे घर में एक सरसों के दाने पर मेरी न सिर्फ दृष्टि ही गयी थी , उसे मैंने अपनी उंगलियों से पकड भी लिया था। डेढ वर्ष की उम्र में पलंग से अपने पैरों को नीचे कर तुतलाते हुए 'दिल' 'दिल' कहकर स्‍वयं के गिर जाने की उन्‍हें धमकी दिया करती थी। तीन वर्ष की उम्र में मैने हिंदी अक्षरों को पहचानना शुरू कर दिया था और 'फ' 'ल' 'फल' , 'च' 'ल' 'चल' पढना शुरू कर दिया था। चार वर्ष की उम्र में न सिर्फ 'ताली ताली तू तू तलती , दो हल डाली डाली फिरती' जैसी तुतलाती जुबान से 'कोयल रानी' की पूरी कविता सुनाया करती थी , वरन् 'छोटी चिडियां' नाम की कहानी को कंठस्‍थ कर लिया था और एक एक अर्द्धविराम , पूर्ण विराम पर जरूरत के अनुसार ठहराव के साथ लोगों को सुनाया करती थी। एक मां के लिए ये सब यादें स्‍वाभाविक है , पर पहली बार अपने पिता को मैने अपने जीवन की इतनी बातें याद रखते देखा है। मेरे मानसिक विकास पर कितनी पैनी निगाह थी उनकी ??


अध्‍यापन के अतिरिक्‍त भी मेरे पीछे उन्‍होने जितनी मेहनत की , अन्‍य भाई बहनों पर कभी उतना ध्‍यान नहीं दिया। अपने मामाजी के यहां से ग्रेज्‍युएशन करने के बाद मुझे बी एड कर लेने की सलाह दी गयी , पर मैने अर्थशास्‍त्र में स्‍नातकोत्‍तर की पढाई करने का फैसला किया। मेरे परिवार‍ में पहले किसी बहन ने गांव के स्‍कूल से मैट्रिक करने से अधिक पढाई नहीं की थी। पहली बार मेरे दादा जी और दादी जी मुझे हॉस्‍टल में डालने को तैयार नहीं थे। सो मैने एडमिशन लेकर घर में ही एम ए की पढाई करने का निश्‍चय किया। घर में ही दो वर्षों तक तैयारी की और फार्म भी भर लिया। एक एक पेपर की परीक्षा हर पांचवें दिन होनी थी। प्रत्‍येक परीक्षा से एक दिन पहले दोपहर के बाद वे मेरे साथ रांची के लिए निकलते , रातभर वहां कहीं ठहरते , सुबह परीक्षा देने के बाद अपने गांव वापस लौटते। यहां तक कि मैं चार घंटे परीक्षा भवन में होती , तो शहर में कई रिश्‍तेदार होने के बाद भी वे कहीं न जाते। उतनी देर भी वे गेट के बाहर ही टहलते रहते , इस भय से कि कहीं लडकों ने वॉक आउट किया तो ये कहां जाएगी। अन्‍य भाई बहनों पर इतना ध्‍यान देते मैने उन्‍हें कभी नहीं देखा।


अध्‍ययन मनन में विश्‍वास रखने वाले पिता जी का पद या अर्थोपार्जन के लिए पढाई लिखाई करने पर विश्‍वास नहीं था और यही कारण है कि सिर्फ अध्‍ययन मनन नहीं , वरन्  मौलिक चिंतन में मेरे लगे होने से वे अपनी परंपरा को जीवित देखकर मुझसे खुश बने रहें। वैसे तो ज्ञान का खजाना ही है उनके पास , जब भी मिलना होता है , उनकी उपस्थिति में सिर्फ कुछ न कुछ जानने और सीखने में ही मेरा ध्‍यान लगा होता है। 
ज्‍योतिष के बारे में तो उनसे चर्चा होनी ही थी , पर इस बार ज्‍योतिष के अलावे ब्‍लॉग जगत के बारे में भी बहुत बातें हुईं। मेरे आलेखों को पढकर, मेरे विचारों को समझकर और भविष्‍य के मेरे कार्यक्रमों को सुनकर काफी खुश और संतुष्‍ट होकर उन्‍होने यहां से विदाई ली। इस दुनिया से वे काफी निराश है , जो आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों को ही महत्‍व देते हें और किसी ज्ञान पिपासु , कलाकार और मेहनतकशों को भी बेकार समझते हैं।  वे एक बेहतर दुनिया का स्‍वप्‍न देखते हैं , पर सैद्धांतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अत्‍यधिक भावुकता होने तथा व्‍यवहारिकता की कमी से अपने सपने को पूरा नहीं कर पाते। वे मुझमें बडी उम्‍मीद देखते हैं , शायद मैं उनका सपना पूरा कर सकूं। 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके पापा जी अभी पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है और अभी भी दिन रात चिंतन में लगे हैं। मैं उनके स्‍वस्‍थ और दीर्घजीवी होने की कामना करती हूं !!




रविवार, 20 दिसंबर 2009

एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष में दिलचस्‍पी रखने वाले दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ??

भिन्‍न भिन्‍न वर्षों में भी किसी खास तिथि को जन्‍मलेने वालों की कुंडली में सूर्य की स्थिति बिल्‍कुल उसी स्‍थान पर होती है। इस एकमात्र सूर्य की स्थिति को ध्‍यान में रखते हुए ग्रंथों में जातक के फलाफल के बारे में बहुत कुछ लिखा मिलता है , जिसकी चर्चा ज्‍योतिषी बहुत दावे से किया करते हैं। इस आधार पर , चाहे वो ज्‍योतिषी हो या न्‍यूमरोलोजिस्‍ट और वे जिस भी विधा से भविष्‍यवाणी किया करते हों , यह पोस्‍ट उनकी विधा को विवादास्‍पद अवश्‍य बना रही है , जिसमें अलग अलग वर्षों में ही सही ,अरविंद मिश्रा जी के और मेरे एक ही दिन जन्‍म लेने की सूचना सारे ब्‍लॉग जगत को दी गयी है। पाठकों की जिज्ञासा स्‍वाभाविक है कि एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष जैसे विरोधाभासी विषय में जुनून से हद तक की दिलचस्‍पी रखने वाले यानि भिन्‍न भिन्‍न स्‍वभाव के दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ?

मनुष्‍य मूलत: बहुत ही स्‍वार्थी होता है और किसी ऐसी व्‍यवस्‍था को पसंद नहीं करता , जिससे उसे अधिक समझौता करना पडे। इस कारण वह अपने जैसे स्‍वभाव के लोगों से मित्रता , संबंध और रिश्‍ते रखना चाहता है। कभी कभी वह इतना समर्थ होता है या उसके संयोग इतना काम करते हैं कि वह ऐसा करने में सफल हो जाता है , पर यदि शत प्रतिशत मामलों में यही प्रवृत्ति रहे , तो कुछ ही दिनों में विचारों के आधार पर ही तरह तरह के गुट बनेंगे , पारस्‍परिक मित्रता से लेकर , विवाह शादी तक अपने ही गुटों में होंगी और उसमें आनेवाली अगली पीढी भी उन्‍हीं विचारों को पसंद करेगी। इस हालत में विचारों से विरोध रखनेवाले बिल्‍कुल गैर हो जाएंगे और   अधिक शक्तिमान की मनमानी चलेगी। पर प्रकृति हमेशा एक औसत व्‍यवस्‍था में सबों को ले जाने की प्रवृत्ति रखती है , ताकि हर प्रकार के लोगों का एक दूसरों के विचारों से जोर शोर से टकराव हो और परिणामत: एक समन्‍वयवादी विचारधारा का जन्‍म हो, जिसके बल पर आगे का युग और प्रगतिशील बन सके। एक ही दिन में दो भिन्‍न विचारों वाले व्‍यक्ति का जन्‍म प्रकृति की ऐसी ही व्‍यवस्‍था में से एक हो सकती है।

यदि एक ज्‍योति‍षी की हैसियत से इस प्रश्‍न का जबाब दिया जाए तो यह बात कही जा सकती है कि विभिन्‍न कुंडलियों में सूर्य अलग अलग भाव का स्‍वामी होता है , इस कारण अलग अलग लग्‍न के अनुसार जातक पर सूर्य के प्रभाव का संदर्भ बदल जाता है , इस कारण आवश्‍यक नहीं कि दोनो का सूर्य एक हो तो दोनो के अध्‍ययन का विषय भी एक ही हो। सूर्य किसी के अध्‍ययन को प्रभावित कर सकता है , तो किसी के पद प्रतिष्‍ठा के माहौल को और किसी के घर गृहस्‍थी को। इसलिए इसके एक जैसे फल नहीं दिखाई पड सकते हैं। यदि ऐसा भी मान लिया जाए कि एक ही तिथि को जन्‍म लेनेवाले दो व्‍यक्ति एक ही लग्‍न के हों और सूर्य का प्रभाव दोनो के अध्‍ययन के विषय पर ही पडता हो , तो यह आवश्‍यक है कि दोनो में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐसी रूचियां रहेंगी। ऐसी स्थिति में एक के विज्ञान के विषयों और एक के ज्‍योतिष पढने की संभावना तभी बन सकती है , जब ज्‍योतिष को भी विज्ञान का ही एक विषय मान लिया जाए।

पर अभी ज्‍योतिष को विज्ञान मानने में बडी बडी बाधाएं हैं । और इस कारण पाठकों के मन में यह भ्रांति है कि ज्‍योतिष को पढनेवाले अंधविश्‍वासी ही हैं , तभी मन में ऐसे प्रश्‍न जन्‍म लेते हैं। भले ही ज्‍योतिष इस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि इसे पूर्ण विज्ञान मान लिया जाए , पर वैज्ञानिक रूचि रखनेवाले जातक भी इसमें हमेशा से रहे हैं। इसमें से अंधविश्‍वासों को ढूंढ ढूंढकर अलग करने और इसके वैज्ञानिक पक्ष को इकट्ठे करने का काम करते जाया जाए , तो ज्‍योतिष को विज्ञान में बदलते देर नहीं लगेगी। पापा जी के 40 वर्षों के नियमित रिसर्च के बाद मैं भी इसी दिशा में प्रयासरत हूं और बहुत जल्‍द समाज के समक्ष ज्‍योतिष को विज्ञान के रूप में मान्‍यता दिलवाना मेरा लक्ष्‍य हैं। अरविंद मिश्रा जी ने नियंता के इस संकेत को स्‍वीकार कर लिया है कि विज्ञान और ज्योतिष का सहिष्णु साहचर्य रहे , आप सभी भी स्‍वीकार करेंगे , ऐसा मुझे विश्‍वास है।




एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष में दिलचस्‍पी रखने वाले दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ??

भिन्‍न भिन्‍न वर्षों में भी किसी खास तिथि को जन्‍मलेने वालों की कुंडली में सूर्य की स्थिति बिल्‍कुल उसी स्‍थान पर होती है। इस एकमात्र सूर्य की स्थिति को ध्‍यान में रखते हुए ग्रंथों में जातक के फलाफल के बारे में बहुत कुछ लिखा मिलता है , जिसकी चर्चा ज्‍योतिषी बहुत दावे से किया करते हैं। इस आधार पर , चाहे वो ज्‍योतिषी हो या न्‍यूमरोलोजिस्‍ट और वे जिस भी विधा से भविष्‍यवाणी किया करते हों , यह पोस्‍ट उनकी विधा को विवादास्‍पद अवश्‍य बना रही है , जिसमें अलग अलग वर्षों में ही सही ,अरविंद मिश्रा जी के और मेरे एक ही दिन जन्‍म लेने की सूचना सारे ब्‍लॉग जगत को दी गयी है। पाठकों की जिज्ञासा स्‍वाभाविक है कि एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष जैसे विरोधाभासी विषय में जुनून से हद तक की दिलचस्‍पी रखने वाले यानि भिन्‍न भिन्‍न स्‍वभाव के दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ?

मनुष्‍य मूलत: बहुत ही स्‍वार्थी होता है और किसी ऐसी व्‍यवस्‍था को पसंद नहीं करता , जिससे उसे अधिक समझौता करना पडे। इस कारण वह अपने जैसे स्‍वभाव के लोगों से मित्रता , संबंध और रिश्‍ते रखना चाहता है। कभी कभी वह इतना समर्थ होता है या उसके संयोग इतना काम करते हैं कि वह ऐसा करने में सफल हो जाता है , पर यदि शत प्रतिशत मामलों में यही प्रवृत्ति रहे , तो कुछ ही दिनों में विचारों के आधार पर ही तरह तरह के गुट बनेंगे , पारस्‍परिक मित्रता से लेकर , विवाह शादी तक अपने ही गुटों में होंगी और उसमें आनेवाली अगली पीढी भी उन्‍हीं विचारों को पसंद करेगी। इस हालत में विचारों से विरोध रखनेवाले बिल्‍कुल गैर हो जाएंगे और   अधिक शक्तिमान की मनमानी चलेगी। पर प्रकृति हमेशा एक औसत व्‍यवस्‍था में सबों को ले जाने की प्रवृत्ति रखती है , ताकि हर प्रकार के लोगों का एक दूसरों के विचारों से जोर शोर से टकराव हो और परिणामत: एक समन्‍वयवादी विचारधारा का जन्‍म हो, जिसके बल पर आगे का युग और प्रगतिशील बन सके। एक ही दिन में दो भिन्‍न विचारों वाले व्‍यक्ति का जन्‍म प्रकृति की ऐसी ही व्‍यवस्‍था में से एक हो सकती है।

यदि एक ज्‍योति‍षी की हैसियत से इस प्रश्‍न का जबाब दिया जाए तो यह बात कही जा सकती है कि विभिन्‍न कुंडलियों में सूर्य अलग अलग भाव का स्‍वामी होता है , इस कारण अलग अलग लग्‍न के अनुसार जातक पर सूर्य के प्रभाव का संदर्भ बदल जाता है , इस कारण आवश्‍यक नहीं कि दोनो का सूर्य एक हो तो दोनो के अध्‍ययन का विषय भी एक ही हो। सूर्य किसी के अध्‍ययन को प्रभावित कर सकता है , तो किसी के पद प्रतिष्‍ठा के माहौल को और किसी के घर गृहस्‍थी को। इसलिए इसके एक जैसे फल नहीं दिखाई पड सकते हैं। यदि ऐसा भी मान लिया जाए कि एक ही तिथि को जन्‍म लेनेवाले दो व्‍यक्ति एक ही लग्‍न के हों और सूर्य का प्रभाव दोनो के अध्‍ययन के विषय पर ही पडता हो , तो यह आवश्‍यक है कि दोनो में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐसी रूचियां रहेंगी। ऐसी स्थिति में एक के विज्ञान के विषयों और एक के ज्‍योतिष पढने की संभावना तभी बन सकती है , जब ज्‍योतिष को भी विज्ञान का ही एक विषय मान लिया जाए।

पर अभी ज्‍योतिष को विज्ञान मानने में बडी बडी बाधाएं हैं । और इस कारण पाठकों के मन में यह भ्रांति है कि ज्‍योतिष को पढनेवाले अंधविश्‍वासी ही हैं , तभी मन में ऐसे प्रश्‍न जन्‍म लेते हैं। भले ही ज्‍योतिष इस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि इसे पूर्ण विज्ञान मान लिया जाए , पर वैज्ञानिक रूचि रखनेवाले जातक भी इसमें हमेशा से रहे हैं। इसमें से अंधविश्‍वासों को ढूंढ ढूंढकर अलग करने और इसके वैज्ञानिक पक्ष को इकट्ठे करने का काम करते जाया जाए , तो ज्‍योतिष को विज्ञान में बदलते देर नहीं लगेगी। पापा जी के 40 वर्षों के नियमित रिसर्च के बाद मैं भी इसी दिशा में प्रयासरत हूं और बहुत जल्‍द समाज के समक्ष ज्‍योतिष को विज्ञान के रूप में मान्‍यता दिलवाना मेरा लक्ष्‍य हैं। अरविंद मिश्रा जी ने नियंता के इस संकेत को स्‍वीकार कर लिया है कि विज्ञान और ज्योतिष का सहिष्णु साहचर्य रहे , आप सभी भी स्‍वीकार करेंगे , ऐसा मुझे विश्‍वास है।