शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएं .. मुझे आप सभी पाठकों की शुभकामनाओं की आवश्‍यकता है !!

ब्‍लॉग जगत में आने के बाद महीने में 20 - 25 पोस्‍ट ठेल देने वाली मैं अचानक कुछ दिनों से कुछ भी नहीं लिख पा रही हूं। 2011 में होनेवाली इस प्रकार की व्‍यस्‍तता का कुछ अंदाजा तो मझे पहले से था , पर एकाएक लिखना इतना कम हो जाएगा , ऐसा भी नहीं सोंचा था। ब्‍लॉग जगत से जुडाव इस हद तक हो चुका है कि व्‍यस्‍तता के बावजूद एक बार डैशबोर्ड खोलकर कम से कम उन सारे ब्‍लॉग्‍स के अपडेट अवश्‍य देख लेती हूं , जिनकी मैं अनुसरणकर्ता हूं , भले ही टिप्‍पणी कर पाऊं या नहीं। यहां तक कि ईमेल में आनेवाले लिंकों , बज्‍ज की पोस्‍टों और ट्विटर तक को सरसरी निगाह से देखे बिना नहीं रह पाती। ऐसे व्‍यस्‍तता भरे समय में सारे एग्रीगेटरों के बंद होने से चाहे नए ब्‍लॉगरों और अन्‍य पाठकों को जो भी असुविधाएं हो रही हों , मुझे तो ये सहूलियत ही दे रहे हैं। चिट्ठा जगत के द्वारा स्‍वागत के लिए नए चिट्ठों के न आने से जहां एक ओर उन्‍हें पढकर उनके स्‍वागत करने से छुट्टी मिली हुई है , वहीं दूसरी ओर ब्‍लॉग4वार्ता में वार्ता न लगाने तक का बहाना मिल गया है। थोडी फुर्सत मिलते ही सोंचा , अपने नियमित पाठको को अपनी स्थिति से अवगत ही करा दूं।

अभी घर में चहल पहल का वातावरण है , कॉलेज की शीतकालीन छुट्टियों की वजह से दोनो बच्‍चे घर में मौजूद हैं , गांव तथा इस इलाके में अन्‍य कई तरह के कार्य के सिलसिले में एक महीने से पापाजी भी दिल्‍ली से आकर इसी इलाके में रह रहे हैं। पापाजी के सभी बच्‍चों में अपने गांव से सबसे निकट मैं ही हूं , इसलिए मम्‍मी ने उनकी पूरी जिम्‍मेदारी मुझे दे रखी है। ठंड के महीने में बुजुर्गो को अधिक देख रेख की आवश्‍यकता होती है , इसलिए मम्‍मी के निर्देशानुसार पापाजी काम के सिलसिले में सुबह से शाम तक या एक दो दिन कहीं रह जाएं , पर उनका असली बसेरा मेरे यहां ही है। 1999 से पापाजी के दिल्‍ली में निवास करने के बाद उनके साथ रहने का बहुत कम मौका मिला , इसलिए न सिर्फ ज्ञानार्जन के लिए उनके इस सान्निध्‍य के पल पल का उपयोग कर रही हूं , बल्कि उन्‍हें अब इस बात के लिए मना भी लिया है कि अब अपनी सेवा के लिए वे मुझे भी बेटों बहूओं से कम समय नहीं दें। यह बात और है कि इतनी उम्र के बावजूद शारीरिक तौर पर वे बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ हैं और उन्‍हें किसी प्रकार की सेवा की आवश्‍यकता नहीं।

दिन कटते देर नहीं लगती , देखते ही देखते बच्‍चों के आए हुए 15 दिन व्‍यतीत हो गए , वैसे ही 4-5 दिन और व्‍यतीत हो जाएंगे , फिर बच्‍चे वापस अपने जीवन के सपनों को पूरा करने के लिए चले जाएंगे और मैं रह जाऊंगी अपने कार्यक्रमों को सफल बनाने में। गजब की महत्‍वाकांक्षा का युग है , किसी रिश्‍ते का अच्‍छे से सुख भी नहीं ले पाते हम। चूंकि छोटा 2010 में 12वीं पास कर आगे की पढाई के लिए बाहर जानेवाला था , मैने काफी दिनों से 2011 के लिए कई महत्‍वाकांक्षी कार्यक्रम बना रखे थे। ऐसे समय में पापाजी का मुझे समय देने का निर्णय मुझे बडा सुख पहुंचाने वाला है। अभी हमलोग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' से संबंधित अपने ज्ञान के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम के बारे में चिंतन कर रहे हैं , इससे संबंधित सारे बिखरे हुए लेखन को सुव्‍यवस्थित करने में कुछ समय लगेगा। साथ ही इस कार्यक्रम में आनेवाली आर्थिक समस्‍या को भी हल करने की कोशिश है। जैसा कि मेरा अनुमान है , जुलाई 2010 या जनवरी 2011 तक हमलोग अपने सोंचे हुए कार्य को अवश्‍य मूर्त्‍त रूप दे पाएंगे।

भले ही मेरे जीवन का लक्ष्‍य एक (समाज से ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करना और ग्रहों के मानव जीवन पर पडने वाले प्रभाव को स्‍थापित करना) ही हो , पर तीन चार वर्षों में मेरा काम करने का ढंग खुद ब खुद परिवर्तित हो जाया करता है। पर जिन जगहों पर मेरा संबंध बन चुका , उससे व्‍यस्‍तता के बावजूद दूरी नहीं बन पाती। इस तरह ब्‍लॉग जगत से दूर रह पाना मेरे लिए मुश्किल है , हालांकि अब पहले की तरह बहुत पाठकों के व्‍यक्तिगत प्रश्‍नों का जबाब मैं नहीं दे सकती। फिर भी अभी भी लग्‍न राशिफल के ब्‍लॉग को नियमित तौर पर अपडेट कर रही हूं , मोल तोल में शेयर बाजार की साप्‍ताहिक भविष्‍यवाणी का कॉलम लगातार अपडेट हो रहा है। अपने वादे के अनुसार 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' में तिलियार ब्‍लॉगर मीट की रिपोर्ट का पहला भाग काफी दिन पहले ही लिखा जा चुका था , पर दूसरे भाग के लिखे जाने में हो रही देर की वजह से मैने उसे प्रकाशित नहीं किया था। पर बाद में यह सोंचकर प्रकाशित किया कि शायद प्रकाशित हो जाने के बाद दूसरी कडी लिखी जा सके।

यदि सबकुछ सामान्‍य रहा तो 2011 के अपने व्‍यस्‍त कार्यक्रम के मध्‍य भी समय निकालकर प्रत्‍येक सप्‍ताह अपने ब्‍लॉग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' और 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' को अपडेट करने की अवश्‍य कोशिश करूंगी , ताकि माह में छह आठ पोस्‍ट आप सबों को अवश्‍य पढने को मिल जाए। आप सभी पाठकों के लिए आनेवाला वर्ष 2011 बहुत सुख और सफलता युक्‍त हो , ऐसी कामना करती हूं । मैं भी अपने लक्ष्‍य में कामयाब हो सकूं , इसके लिए मुझे आप सभी पाठकों की शुभकामनाओं की आवश्‍यकता है !!

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

इतने सारे चिट्ठाकारों से मुलाकात का वह दिन भुलाया जा सकता है ??

मेरे द्वारा रोहतक के तिलयार झील की यात्रा पर एक विस्‍तृत रिपोर्ट का इंतजार न सिर्फ ब्‍लॉगर बंधुओं को , वरन् ज्‍योतिषीय रूचि के कारण मेरे ब्‍लॉग को पढने वाले अन्‍य पाठकों और मित्रों को भी है। जब एक फोन पर इस रिपोर्ट का इंतजार कर रहे अपने पाठक को बताया कि व्‍यस्‍तता के कारण इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने में कुछ देर हो रही है , तो उन्‍होने कहा कि इतनी देर भी मत कीजिए कि आप बहुत कुछ भूल ही जाएं। मैने उन्‍हे कहा कि एक सुखद यात्रा वर्षों भूली नहीं जा सकती , वैसी ही यात्राओं में तिलयार यात्रा भी एक है , भला इतने सारे ब्‍लोगरों से मुलाकात का वह दिन इतनी जल्‍द भुलाया जा सकता है ??

पहली बार सुनने पर रोहतक में होने वाली इस ब्‍लॉगर मीट की तिथि 21 नवंबर मुझे जंची नहीं थी , क्‍यूंकि ज्‍योतिषीय दृष्टि से उससे पहले ग्रहों की स्थिति मनोनुकूल नहीं थी , आसमान में ग्रहों की क्रियाशीलता कुछ इस ढंग की थी कि लोगों को किसी न किसी कार्यक्रम में व्‍यस्‍त रखने का यह एक बहाना बन सकती थी। बहुत प्रकार के कार्यों के उपस्थित हो जाने से इस प्रकार की तिथियों के कार्यक्रमों में इच्‍छा के बावजूद आमंत्रित कम संख्‍या में ही पहुंच पाते हैं। हां , 21 नवंबर को पूर्णिमा होने के कारण कार्यक्रम की सफलता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता था , इसलिए मुझे वहां पहुंचने की इच्‍छा तो थी ।

जब निर्मला कपिला जी से मैने रोहतक ब्‍लॉगर मीट के बारे में बात की , तो उन्‍होने कहा कि यदि मेरा कार्यक्रम निश्चित हो , तभी वो चलेंगी। इतने ब्‍लॉगरों के साथ साथ उनसे मिलने का बहाना बडी मुश्किल से मिल रहा था , मैं इंकार नहीं कर सकती थी।  पर तिथि को देखते हुए मन में अंदेशा अवश्‍य बना हुआ था कि कोई आवश्‍यक पारिवारिक या अन्‍य कार्य न उपस्थित हो जाए , छोटे मोटे कार्यक्रमों को तो अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम से टाला जा सकता है , यह सोंचकर मैने मित्रों और परिवारवालों के मध्‍य अपनी रोहतक यात्रा की खबर सबसे पहले प्रचारित प्रसारित कर दी। इससे एक फायदा हुआ कि बंगाल में एक दीदी के लडके का विवाह 22 नवंबर को था , दीदी के फोन आने पर मैने उन्‍हें तत्‍काल कह दिया कि मैं विवाह में न पहुंचकर 24 को 'बहू भात' में वहां पहुंचुंगी। मेरे कार्यक्रम की जानकारी मिलने पर दिल्‍ली से मेरे पास आ रहे पापाजी ने भी 20 नवंबर का रिजर्वेशन रद्द करवाकर मेरे साथ ही दिल्‍ली से आने का कार्यक्रम बनाया।

बोकारो से दिल्‍ली और दिल्‍ली से रोहतक जाने का मेरा कार्यक्रम निश्चित हो चुका था , पर 12 नवंबर को होनेवाले छठ के बाद बिहार झारखंड से लौटने वालों की भीड में मेरे लिए रिजर्वेशन मिलना कठिन था। मैने रेलवे की वेबसाइट पर एक एक कर सभी ट्रेनों की स्थिति देखी , कहीं भी व्‍यवस्‍था नहीं दिखाई पडी। 12 नवंबर को छठ होने के कारण बर्थ अवश्‍य उपलब्‍ध थे , पर छठ के मौके पर ट्रेन में बैठे रहना मुझे जंच नहीं रहा था। दूसरे दिनों में निकलने के लिए धनबाद से किसी प्रकार व्‍यवस्‍था जरूर हो सकती थी , पर उतनी दूर जाकर ट्रेन पकडना मुझे पसंद नहीं था। इसलिए मैने दिल्‍ली के लिए 12 नवंबर का ही रिजर्वेशन करवा लिया। रिजर्वेशन के वक्‍त लोअर बर्थ की उपलब्‍धता नहीं थी , इसलिए मैने मिडिल बर्थ में ही अपना रिजर्वेशन कराया। पर रेलवे की व्‍यवस्‍था की पोल इसी से खुल जाती है कि रातभर मेरे नीचे वाली बर्थ बिल्‍कुल खाली पडी रही।

कुछ दिन पूर्व से ही खराब चल रही मेरी तबियत ऐन दिल्‍ली प्रस्‍थान के वक्‍त ही खराब हो गयी। पर दवा वगैरह लेकर अपनी तबियत को सामान्‍य बनाया और दिल्‍ली के लिए निकल पडी। चलते समय तक यह मालूम हो चुका था कि 13 नवंबर को शाम के वक्‍त कनॉट प्‍लेस में भी एक ब्‍लॉगर मीट का आयोजन है। मेरी गाडी का समय 1 बजे दिन में ही दिल्‍ली में था , पर देर होने की वजह से शाम 4 बजे ही वहां पहुंच सकी। मेट्रो से आते वक्‍त राजीव चौक में उतरकर कनॉट प्‍लेस जाने और सबसे मिलने की इच्‍छा थी , पर पहले से ही गडबड तबियत 22 घंटे के सफर के बाद और खराब हो गयी थी। रही सही कसर दूसरे दिन रेलवे वालों ने एसी ऑफ करके पूरी कर दी थी, कई यात्रियों के शिकायत दर्ज कराने पर भी एसी ऑन नहीं हुआ। स्‍लीपर बॉगी में होती तो कम से कम खिडकी खुले होने से ताजी हवा तो मिलती , बंद बॉगी में एसी बंद होने से चक्‍कर आ रहा था। कुछ दिन पूर्व ऐसी स्थिति में कुछ यात्रियों में डेंगू या स्‍वाइन फ्लू फैलने के समाचार पढने को मिला था , इससे दिमाग तनावग्रस्‍त था , ऐसे में घर पहुंचकर ही राहत मिल सकती थी ।

दिल्‍ली में भी मुझे कई काम निबटाने थे , पर तबियत बिगडी होने की वजह से कुछ भी न हो पाया। ललेकि तीन भतीजे भतीजियों की मासूम शैतानियों के कारण सप्‍ताह भर का समय व्‍यतीत होते देर न लगी।  पर जैसा संदेह था , इन दिनों ब्‍लॉग जगत से कुछ ऐसी घटनाएं सुनने को मिली , जिससे स्‍पष्‍ट हुआ कि कार्यक्रम में सम्मिलित हो रहे लोगों में से कुछ वहां नहीं पहुंच सकेंगे। इससे मन में काफी असंतोष बना रहा , पर दिल्‍ली तक आ चुकी थी , तो रोहतक तो पहुंचना ही था। रोहतक में तिलियार झील में ब्‍लॉगर मीट रखी गयी थी , निर्मला कपिला जी से संपर्क किया तो उन्‍होने बताया कि वे राजीव तनेजा जी के साथ आ रही हैं। मैने भी राजीव तनेजा जी को ही संपर्क किया , माता जी के स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर तनेजा दंपत्ति अस्‍पताल के चक्‍कर काट रहे थे। पापाजी तैयार नहीं थे कि मैं अकेली अनजान रास्‍ते पर जाऊं , मैने अपने एक भाई का गुडगांव का कार्यक्रम रद्द करवाकर उसे अपने साथ चलने को तैयार किया , पर 20 की शाम को तनेजा जी ने कहा कि वे चलते वक्‍त मुझे ले लेंगे।

21 नवंबर को सुबह नांगलोई में मेट्रो स्‍टेशन के पास राजीव तनेजा जी , संजू तनेजा जी और निर्मला कपिला जी से मिलने का मौका मिला। तनेजा दंपत्ति से तो मैं पहले भी मिल चुकी थी , पर निर्मला कपिला जी से यह पहली मुलाकात थी। उनकी कहानियों लेखों , कविताओं और खासकर टिप्‍पणियों ने मेरे हृदय पर एक छाप छोड दी थी , इसलिए उनसे मिलने की मेरी दिली तमन्‍ना थी , कार से उतरकर उन्‍होने मुझे गले लगा लिया। इस सुखद अहसास को मैं जीवनभर नहीं भूल सकती। हमलोगों ने ब्‍लॉग जगत से जुडी बाते करते हुए ही एक डेढ घंटे का सफर तय किया और थोडी ही देर में मंजिल आ गयी। क्‍या हुआ तिलियार ब्‍लॉगर मीट में , यह जानिए अगली कडी में , इसके लिए आपलोगों को कितना इंतजार करना पड सकता है , नहीं बता सकती।

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

मध्‍य दिसंबर 2010 से लोगों पर स्‍वक्षेत्री बृहस्‍पति का प्रभाव आंशिक हो जाएगा !!

ज्‍योतिष में रूचि रखने वाले बहुत सारे लोगों को यह मालूम होगा कि सौरमंडल का सबसे विशाल ग्रह गुरू मई के पहले सप्‍ताह से ही मीन राशि में है। यूं तो इस राशि में बृहस्‍पति स्‍वक्षेत्रीय होता है , और इसलिए अधिकांश लोगों के लिए यह सुखद फल लेकर ही आता है , पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की मानें तो यह अपनी राशि में होने के बाद भी सबको शुभ फल से संयुक्‍त नहीं कर सकता। अपनी राशि में आने के बाद दिन ब दिन बृहस्‍पति के स्‍थैतिक शक्ति में हो रही वृद्धि बहुतों के लिए खुशी का कारण अवश्‍य बनी, पर कुछ के समक्ष परेशानी और दबाब उपस्थित करने वाली भी रही। खासकर 23 जून 2010 से लेकर जुलाई के अंतिम सप्‍ताह तक यह कुछ लोगों की मन:स्थिति को सुखद बनाने में कामयाब रही , तो कुछ तनाव झेलने को भी विवश हुए। इस तरह इस एक महीनें में लोग बृहस्पति के कारण उत्पन्न होनेवाले कार्य में उलझे रहें। चूंकि बहस्पति धनु और मीन राशि का स्वामी है इसलिए धनु और मीन राशि से संबंधित कार्यों में ही सुख या दुख की अधिक संभावना बनीं।

इस दौरान 1934 , 1946 , 1958 , 1970 , 1982 ,1993 और 2005 में जन्‍म लेनेवाले उत्साहित होकर कार्य में जुटे रहें। एक महीनें तक कार्य अच्छी तरह होने के पश्चात जुलाई के मध्‍य में किसी न किसी प्रकार के व्यवधान के उपस्थित होने से कार्य की गति कुछ धीमी अवश्‍य पड गयी और मध्‍य सितंबर 2010 तक काम लगभग रुका हुआ सा महसूस हुआ , पर उसके बाद ही काम के शुरू किए जाने के लिए आशा की कोई किरण दिखाई पडी। मध्‍य नवंबर के बाद ही स्थगित कार्य पुन: उसी रुप में या बदले हुए रुप में उपस्थित होकर गतिमान हुआ। दिसंबर के मध्‍य तक यह कार्य अपने निर्णयात्मक मोड़ पर पहुंच जाएगा। बृहस्पति के कारण होनेवाले इस निर्णय से भी इन लोगों को खुशी होगी। किसी खास संदर्भ में सफलता से इनका उत्‍साह बढा रहेगा।
किन्तु इस दौरान 1932 , 1944 , 1956 , 1968 , 1980 ,1992 और 2004 में जन्‍म लेनेवाले में जन्म लेने वाले लोग बृहस्पति की इस विशेष स्थिति से कष्‍ट या तकलीफ महसूस कर रहे होंगे। वे निराशाजनक वातावरण में कार्य करने को बाध्य होंगे। मध्‍य जुलाई के बाद कार्य के असफल होने से या किसी प्रकार की अनिश्चितता के कारण उन्हें तनाव का सामना करना पड रहा होगा। सितंबर के मध्‍य तक उनके समक्ष किकर्तब्‍यविमूढावस्‍था की स्थिति बनी रहेगी। मध्‍य नवंबर के बाद निराशाजनक वातावरण में ही स्थगित कार्य पुन: उसी रुप में या बदले हुए रुप में उपस्थित होकर गतिमान हुआ होगा और दिसंबर के मध्‍य तक अपने निर्णयात्मक मोड़ पर पहुंच जाएगा। बृहस्पति के कारण होनेवाले इस निर्णय से भी इन लोगों को कष्‍ट पहुंचेगा। किसी खास मुद्दे को लेकर वर्षभर इनकी परेशानी बनी रह सकती है।
गोचर के इस बृहस्‍पति के कारण तुला राशि वाले शुभ प्रभाव तथा सिंह राशि वाले बुरा प्रभाव महसूस कर रहे हैं। कुछ हद तक अक्‍तूबर माह में जन्‍म लेनेवालों के लिए बृहस्‍पति की यह स्थिति शुभ प्रभाव देने वाली रही , जबकि अगस्‍त माह में जन्‍म लेनेवाले इसके बुरे प्रभाव से युक्‍त रहे होंगे। मीन राशि के इस बृहस्‍पति का प्रभाव अप्रैल 2011 तक भी थोडा बहुत तो दिखाई दे ही सकता है , पर दिसंबर के बाद इसके प्रभाव में , चाहे वो सुखद हो या दुखद अवश्‍य कमी आएगी।
गोचर में चल रहे मीन राशि के इस बृहस्‍पति के कारण विभिन्‍न लग्‍नवाले अलग अलग संदर्भों को लेकर परेशान रहे होंगे। मेष लग्‍नवाले भाग्‍य , धर्म या खर्च से संबंधित, वृष लग्‍नवाले हर प्रकार के लाभ , रूटीन और जीवनशैली , मिथुन लग्‍नवाले घर गृहस्‍थी , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर , कर्क लग्‍नवाले धर्म , भाग्‍य ,प्रभाव , सिंह लग्‍नवाले अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , रूटीन या जीवनशैली , कन्‍या लग्‍नवाले माता पक्ष  , छोटी या बडी संपत्ति , घर गृहस्‍थी, तुला लग्‍नवाले भाई , बहन या अन्‍य बंधु , खर्च और बाहरी संदर्भ, वृश्चिक लग्‍नवाले धन , कोष , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , धनु लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य , माता पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति, मकर लग्‍नवाले भाई , बहन या अन्‍य बंधु खर्च और बाहरी संदर्भ, कुंभ लग्‍नवाले से धन , कोष के मामलों और मीन लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर से संबंधित मामलों को लेकर अच्‍छे या बुरे रूप में प्रभावित हो रहे हैं।



रविवार, 5 दिसंबर 2010

हममें से हर कोई प्रकृति के अभिन्‍न अंग हैं ...संगीता पुरी

हममें से हर कोई प्रकृति के अभिन्‍न अंग हैं और संपूर्ण पारिस्थितिक संतुलन की आवश्‍यकताओं के अनुरूप हमारा अपना स्‍वभाव है। इसलिए लाख चाहते हुए भी हम अपने स्‍वभाव को नहीं बदल पाते। प्रकृति हर क्षेत्र में और हर मौसम में हमारी आवश्‍यकताओं के अनुरूप ही खाने पीने की व्‍यवस्‍था करती है। भूख लगने पर हम खाना और प्‍यास लगने पर हम पानी ही नहीं पीते , जब हमारे शरीर को खास वस्‍तु की आवश्‍यकता होती है , तो हम उस ओर भी आकर्षित होता है। मेडिकल साइंस भी मानता है कि हमारी जीवनशैली सहज रहे , तो हम अपने शरीर की आवश्‍यताओं के अनुरूप ही भोजन लेते हैं। 

मनुष्‍य के जीवन में तो कृत्रिमता इतनी अधिक हो गयी है कि वह आज उपयोगी बातों को भी स्‍वीकार करने से परहेज करता है। पर प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी आवश्‍यकता को अंतर्मन में कहीं न कहीं महसूस करता है। झारखंड प्रदेश ने प्राकृतिक चिकित्‍सा के विकास के लिए जब काम शुरू किया , तो इन्‍होने जंगली जानवरों के व्‍यवहार पर ध्‍यान देना आरंभ किया। जब जानवर ठंड से परेशान होते हैं , तो किन खास औषधीय वनस्‍पतियों का प्रयोग करते हैं और जब उनके पेट में गडबडी होती है , तो किन खास वनस्‍पतियों का प्रयोग , इन सबके नि‍रीक्षण से प्राकृतिक चिकित्‍सा पद्धति को विकसित करने में बडी सफलता मिली।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ग्रहों के प्रभाव को कम या अधिक करने के लिए कलर थेरेपी के महत्‍व को स्‍वीकार करता है। कुछ समय पूर्व ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में रंगों की अहम् भूमिका की जानकारी देते हुए मैने एक पोस्‍ट लिखा था जिसमें लिखा गया था कि यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए। 

अपने अध्‍ययन में हमने पाया है कि जन्‍मकालीन ग्रहों के कमजोर रहने पर जिस रंग की आवश्‍यकता शरीर को अधिक होती है , वह रंग हमारी पसंद बन जाता है। जिनका जन्‍मकालीन चंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग अधिक पसंद आते हैं ,जबक‍ि जन्‍मकालीन मजबूत ग्रहों से संबंधित रंग हमारी पसंद में नहीं होते। इस तरह प्रकृति खुद ही हमें ग्रहों के प्रभाव से सुरक्षा दे देती है।

कभी कभी जो ग्रह जन्‍मकाल में मजबूत होते हैं , वे भी गोचर में कमजोर चलते हैं और इस कारण अस्‍थायी तौर पर कभी एकाध वर्ष , कभी एकाध महीने कभी एकाध सप्‍ताह और कभी दो ढाई दिनों तक उससे संबंधित समस्‍याओं को झेलने को जातक मजबूर होता है। ऐसी स्थिति में जातक उन रंगों का प्रयोग नहीं कर पाता , जो उनके लिए बेहतर होते हैं। ग्रहों की किरणों को परावर्तित करने वाले रंगों का प्रयोग कर हम संबंधित ग्रहों के बुरे प्रभाव से बच सकते हैं। इस आधार पर सभी लग्‍नवाले अलग अलग प्रकार की समस्‍याओं से बचने के लिए भिन्‍न रंगों का प्रयोग कर सकते हैं , यह प्रयोग तब तक न करें , जब तक आप इन संदर्भों के अत्‍यधिक तनाव से न गुजर रहे हों।  ...........

मेष लग्‍नवाले माता पक्ष , किसी भी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु बांधव या किसी प्रकार के झंझट से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , धन , परिवार और घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , भाग्‍य , धर्म या खर्च से संबंधित से समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर , हर प्रकार के लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


वृष लग्‍नवाले भाई , बहन और अन्‍य बंधु बांधवों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , घर गृहस्‍थी , खर्च या बाहरी संदर्भों की समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , धन , परिवार , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई के मामले से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , माता पक्ष , किसी प्रकार की छोटी बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , हर प्रकार के लाभ के मामले , रूटीन और जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , भाग्‍य , धर्म , पितापक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


मिथुन लग्‍नवाले धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , लाभ , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , माता पक्ष , हर प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , खर्च से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , बांधवो से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , घर गृहस्‍थी , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , भाग्‍य , धर्म , रूटीन , जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


कर्क लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य या आत्‍म विश्‍वास से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई या कैरियर , पिता या सामाजिक पक्ष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , खर्च या बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , माता पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति या लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , धर्म , भाग्‍य ,प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , घर गृहस्‍थी  , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


सिंह लग्‍नवाले खर्च या बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , माता पक्ष , किसी प्रकार  की छोटी या बडी अचल संपत्ति या भाग्‍य से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , धन या लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य या आत्‍म से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , घर गृहस्‍थी , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


कन्‍या लग्‍नवाले लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , भाई , बहन , अन्‍य बंधु , रूटीन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , भाग्‍य , धर्म , धन या कोष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , खर्च या बाहरी संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , माता पक्ष  , छोटी या बडी संपत्ति , घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई या प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


तुला लग्‍नवाले पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , घर गृहस्‍थी , धन कोष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाई बहन या अन्‍य बंधु , खर्च और बाह्य संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , रूटीन और जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , खर्च और बाहरी संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , माता पक्ष  , छोटी या बडी संपत्ति , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


वृश्चिक लग्‍नवाले भाग्‍य , धर्म से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍म विश्‍वास या प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , लाभ या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , घर गृहस्‍थी , खर्च और बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , पिता पक्ष , सामाजिक  पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , धन , कोष , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , माता पक्ष , छोटी या बडी किसी प्रकार की संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


धनु लग्‍नवाले रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , खर्च या बाहरी संदर्भ  कैरियर , पिता या सामाजिक पक्ष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , घर गृहस्‍थी  , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , लाभ और प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , भाग्‍य या धर्म से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , माता पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , धन , कोष , भाई बहन या अन्‍य बंधु से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


मकर लग्‍नवाले घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , माता पक्ष , छोटी या बडी संपत्ति के मामले और लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाग्‍य , धर्म या प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु खर्च और बाहरी संदर्भ  और बाहरी संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


कुंभ लग्‍नवाले प्रभाव की कमजोरी या झंझट के बढोत्‍तरी से बचने के लिए सफेद रंग का , भाई बहन , या अन्‍य बंधु बांधवों , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का ,  किसी प्रकार की संपत्ति या भाग्‍य से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का ,  धन और लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , खर्च और बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।


मीन लग्‍नवाले अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , या अन्‍य माहौल से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , भाग्‍य , धर्म , धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , माता पक्ष , छोटी या बडी संपत्ति , घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , रूटीन और जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , लाभ , खर्च और बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।





रविवार, 28 नवंबर 2010

मैं तिलयार झील खासकर निर्मला कपिला जी से मिलने गयी थी !!

17 दिनों बाद आज अपने ब्‍लॉग को अपडेट करने का मौका मिला है , इतने दिनों में विषय की कमी नहीं , कहां से शुरू करूं और कहां समाप्‍त। मौसम की भविष्‍यवाणी करूं या राजनीति की , लग्‍न राशिफल लिखूं या शेयर बाजार का आकलन करूं , हमारे पाठकों को सबका इंतजार रहता है। इसके अलावे 21 नवंबर को हुए तिलयार झील के ब्‍लॉगर मिलन के सुखद पलों को भी आप सबों से बांटने की इच्‍छा है। दिल्‍ली से बोकारो लौटने के बाद भी एक विवाह के सिलसिले में तीन चार दिनों तक व्‍यस्‍तता बनी ही रही। इस समय कुछ लेखन तो न हो सका , पर दो दिनों में मैने पोस्‍टों को पढा और ब्‍लॉग4वार्ता लगायी , कल रात लग्‍न राशिफल और शेयर बाजार के बारे में आकलन भी किया।

मौसम के बारे में तो कुछ दिन पूर्व ही जानकारी दे चुकी हूं कि ग्रहीय स्थिति के प्रतिकूल होने से दिसंबर के पहले सप्‍ताह में ही ठंढ के बढने की संभावना है। खासकर 6 और 7 दिसंबर का ग्रहीय योग यत्र तत्र बादल , बारिश , कुहासा , आंधी , तूफान और बर्फबारी का माहौल बनाएगा , जिसके कारण आम जन जीवन अस्‍त व्‍यस्‍त रहेगा। 6 और 7 दिसंबर का यह योग राजनीति में भी माहौल को गरम रख सकता है , शेयर बाजार में भी उल्‍लेखनीय परिवर्तन ला सकता है। इस समय के आसपास बहुत सारे कार्यों में लोगों की व्‍यस्‍तता बनी रहेगी , बहुत परिणाम भी निकलकर सामने आएंगे।

तिलियार झील की ब्लॉगर बैठक के बारे में आप सबों को तो बहुत जानकारी मिल गयी होगी , पर आपसे अपने अनुभव साझा करने की इच्‍छा है, थोडी निश्चिंति से ही लिख पाऊंगी। हो सकता है , इसे 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' नामक अपने ब्‍लॉग में प्रकाशित करूं। अभी तो काम बहुत सारे हैं और समय कम , इसलिए क्षमा चाहूंगी। बस इतना कह सकती हूं कि जिनको आप पढते आए हैं , उन सबसे मिलना बहुत ही सुखद अहसास देता है। वास्‍तव में , मैं इस बार खासकर निर्मला कपिला जी से मिलने गयी थी और मुझे सबसे अधिक खुशी उनसे मिलकर हुई। राज भाटिया जी ने हमें मिलवाया , इसके लिए उनको शुक्रिया कहना चाहूंगी । इस चित्र में आप भी देखिए .....

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

अब कंप्‍यूटर ही मेरे बचपन के शौक को पूरा करेगा !!

मेरे घर में पहली गाडी मेरे होश संभालने से पूर्व से ही थी , पर दूसरी गाडी के खरीदे जाने की खुशी की धुधली तस्‍वीर अभी भी है। क्‍यूं न हो , उस वक्‍त मैं छह वर्ष की थी और माना जाता है कि इस उम्र की खास घटनाओं के प्रभाव से मस्तिष्‍क जीवनभर अछूता नहीं होता। इन दोनो एम्‍बेसडर गाडियों के बाद हमारे परिवार की गिनती गांव के खास परिवारों में होने लगी थी। जिस तरह आज के बच्‍चों को घर के सभी फोन और मोबाइल नं याद रहते हैं , हम बचपन में खुद भी अपनी गाडी के नंबर रटा और भाई बहनों को रटाया करते। बाबूजी की गाडी का नंबर ‘BRW 1016’ पापाजी के गाडी का नंबर ‘BRW 1658’ भले ही पापाजी से छोटे तीनो भाइयों को हमलोग चाचा और उनके अपने बच्‍चे पापा कहा करते हों , पर बडे दोनो भाई अभी तक पूरे घर के बाबूजी और पापाजी ही हैं। कहीं किसी प्रकार के धार्मिक आयोजन होने पर दादी जी और फिल्‍मों या अन्‍य कार्यक्रम के सिलसिले में मम्‍मी या चाची कहीं बाहर जाती। हम बच्‍चों को तो प्रत्‍येक में शामिल रहना ही था।

पूरे परिवार के सदस्‍यों को गाडी में बैठाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान की ओर सुरक्षित ढंग से ले जाने में ड्राइवर की भूमिका मनोमस्तिष्‍क पर बचपन से ही प्रभाव डाला करती। पूरे ध्‍यान संकेन्‍द्रण से गाडी की गति को तेज और धीमा करना और समयानुसार स्‍टेयरिंग को बाये और दायें घुमाना हमें बच्‍चों का ही खेल लगता। कोई गाडी आगे निकलती तो हम आगे बढने के लिए ड्राइवर अंकल को परेशान करते और जब हमारी गाडी किसी से आगे बढती तो खास विजयी अंदाज में चिल्‍लाते। ऐसे में दस बारह वर्ष की उम्र में ही गाडी चलाने का शौक मुझपर हावी होता जा रहा था। यूं तो सरकारी नियम के हिसाब से गाडी चलाने के लिए मेरी उम्र बहुत कम थी , इसलिए लाइसेंस मिलने का कोई सवाल ही न था , पर घरवालों ने मेरे मैट्रिक की परीक्षा ठीक ढंग से पास कर लेने पर गाडी चलाना सिखाने का वादा कर दिया था।

पर वाह रे भाग्‍य का खेल , मेरे मैट्रिक पास करने से पूर्व ही गाडी खुद असहाय होकर दरवाजे पर लग गयी थी, वो गाडी सीखने में मेरी मदद क्‍या करती ?  परिवार वालों के अति विश्‍वास और ड्राइवरों के विश्‍वासघात ने मात्र 8 और 10 वर्ष पुरानी गाडी के कल पुर्जो में ऐसी गडबडी कर दी थी कि 1977 के बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की टिकट पर खडे मेरे चाचाजी के चुनाव प्रचार तक तो किसी तरह गाडी ने साथ दिया , पर उसके बाद वह सडक पर चलने लायक नहीं रही। मैं मन लगाकर पढाई करती हुई 1978 में फर्स्‍ट डिविजन से मैट्रिक पास भी कर लिया था , आशा और विश्‍वास के साथ विश्‍वकर्मा पूजा और दीपावली में दोनो कार की साफ सफाई और पूजा भी करती रही कि किसी दिन यह फिर जीवित होगी। पर कुछ दिनों तक यूं ही पडी हुई उस कार परिवारवालों के द्वारा औने पौने मूल्‍य में यह सोंचकर बेच दिया गया कि उन्‍हें ठीक करने में होनवाले खर्च की जगह एक नई गाडी आ जाएगी , पर मेरे विवाह के वक्‍त तक नई गाडी नहीं आ सकी और मेरा गाडी सीखने का सपना चूर चूर हो गया।

मेरे विवाह के वक्‍त ससुराल में सिर्फ स्‍कूटर और मोटरसाइकिल था , घर में कई बार गाडी लेने का कार्यक्रम अवश्‍य बना , पर वो खरीदा तब गया , जब मैं अपने बच्‍चों को लेकर बोकारो आ चुकी थी। वहां कभी दो चार दिनों के लिए जाना होता था , इसलिए हाथ आजमाने से भी कोई फायदा नहीं था। कभी पारिवारिक कार्यक्रम में उसका उपयोग भले ही मैने कर लिया हो , पर मेरे अपने व्‍यक्तिगत कार्यक्रम में बस , ट्रेन या टैक्‍सी ही सहयोगी बनी रही। बोकारो स्‍टील सिटी में जहां खुद के रहने की इतनी समस्‍या हो , एक गाडी लेकर अपना जंजाल बढाने का ख्‍याल कभी दिल में नहीं आया , इसलिए बैंको या अन्‍य फायनांस कंपनियों द्वारा दी जा रही सुविधाओं का लाभ उठाने से भी परहेज करती रही।

बचपन का शौक तब पूरा हुआ जब मैने कंप्‍यूटर खरीदा , कंप्‍यूटर में तरह तरह के कार वाले गेम इंस्‍टॉल कर घंटों चलाती। हाल के वर्षों में कंप्‍यूटर पर कार चलाना बंद कर दिया था। इच्‍छा थी कि घर वापस लौटने से पहले बोकारो स्‍टील में कार चलाना सीख लूं, पर घर के लोग इस पक्ष में नहीं। दरअसल मैं जिस कॉलोनी में रहने जा रही हूं , उसका फैलाव मात्र दो तीन किलोमीटर के अंदर है, कॉलोनी के अंदर कार की आवश्‍यकता पडती नहीं। कॉलोनी से बाहर जाने वाला रास्‍ता कोयला ढोने वाले ट्रकों के कारण इतना खराब है कि बिना अच्‍छे ड्राइवर के उसमें चला नहीं जा सकता। ऐसे में मेरे ड्राइविंग सीखने से का कुछ भी उपयोग नहीं है, इसलिए मैने ड्राइविंग सीखने का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है। अब मेरे ड्राइविंग के शौक को जीवनभर कंप्‍यूटर ही पूरा कर सकता है , इसलिए दो चार कार गेम और इंस्‍टॉल करने जा रही हूं।

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

कर्मकांड और ज्‍योतिष बिल्‍कुल अलग अलग विधा है !!

कुछ अनजान लोगों को मैं अपने प्रोफेशन ज्‍योतिष के बारे में बताती हूं , तो एक महिला के ज्‍योतिषी होने पर उन्‍हें आश्‍चर्य होता है। क्‍यूंकि उनकी जानकारी में एक ज्‍योतिषी और गांव के पंडित में कोई अंतर नहीं है , जो उनके बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बनाता है , विभिन्‍न प्रकार के शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त्‍त देखता है , घर में पूजा पाठ करता है , विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलान करता है , लग्‍न निकालता है , कोई सामान खोने पर उसकी वापसी की दिशा बताता है। उसके पास एक पंचांग होता है ,‍ जिसमें हर काम के उपयुक्‍त तिथि और कर्मकांड की विधियां दी हुई है। पर चूंकि जनसामान्‍य को इन बातों की जानकारी नहीं है , इसलिए पंडित लोगों के लिए ज्ञानी है,  उनसे पूछे बिना कोई काम नहीं करते। कभी किसी महिला की इस पेशे में उपस्थिति नहीं देखी , इसलिए उनका आश्‍चर्यित होना स्‍वाभाविक है।

हमारे गांव में ज्‍योतिषीय सलाह लेने  दूर दूर से लोग पापाजी के पास आया करते। पापाजी की अंधभक्‍तों से कभी नहीं बनी , चाहे वो परंपरा के हों या विज्ञान के। प्रारंभ से अबतक वे तार्किक बुद्धिजीवी वर्ग से ही ग्रहों के स्‍वभाव और उसके अनुसार उसके प्रभाव की विवेचना करते रहें। उनकी लोकप्रियता में कमी का यही एक बडा कारण रहा। पर घर के बाहर हमेशा गाडी खडी होने से गांव के लोगों को बडा आश्‍चर्य होता। धीरे धीरे लोगों को मालूम हुआ कि ये पंडित है , इसलिए लोग इनके पास आया करते हैं। फिर तो गांव वाले लोग भी अपनी समस्‍याएं लेकर आने लगे। किसी की बकरी खो गयी है , किसी का बेटा चला गया है , कोई व्रत करे तो किस दिन , कोई विवाह करे तो किससे और कौन से दिन ??

गांव के किसी भी व्‍यक्ति को पापाजी 'ना' नहीं कह सकते थे , पर उनके पीछे इतना समय देने से उनके अध्‍ययन मनन में दिक्‍कत आ सकती थी। हम सभी भाई बहन भी ऊंची कक्षाओं में पढ रहे थे , किसी को भी उन्‍हें समय देने की फुर्सत नहीं थी। ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति को देखने के लिए जो पंचांग िपापाजी  उपयोग में लाते , उसी में सबकुछ लिखा होता , पापाजी ने आठ वर्षीय छोटे भाई को पंचांग देखना सिखला दिया था। दो चार वर्षों तक मेरा छोटा भाई ही इनकी समस्‍याओं को सुलझाता रहा , क्‍यूंकि इसमें किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी नहीं करनी पडती थी। हजारो वर्ष पूर्व जिस आधार पर पंचांग बनाए जाते थे , जिस आधार पर शकुन , मुहूर्त्‍त , दिशा ज्ञान आदि होता था , आजतक उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है , इसमें कितनी सच्‍चाई और कितना झूठ है , इसकी भी कभी जांच नहीं की गयी है। अंधभक्ति में लोग पंडितों की बातों को आजतक सत्‍य मानते आ रहे हैं , आठ वर्ष के बच्‍चे की बातों को भी सत्‍य समझते रहें।

प्राचीन काल में गांव के पंडितों का संबंध सिर्फ कर्मकांड से था , क्रमश: बालक के जन्‍म का रिकार्ड रखने के लिए जन्‍मकुंडली बनाने का काम भी उन्‍हें सौंप दिया गया। पर ज्‍योतिषीय गणना का काम और किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी तो ऋषि मुनियों के अधीन था। हां उन्‍होने कुछ पुस्‍तके जरूर लिखकर इन पंडितों को दी , जिनके आधार पर बालक की जन्‍मकुंडली  बनाने के बाद बच्‍चे के आनेवाले जीवन के बारे में कुछ बातें लिखी जा सकती थी। पर समय सापेक्ष भविष्‍यवाणी करने के लिए बडे स्‍तर पर गाणितिक अध्‍ययन मनन की आवश्‍यकता होती है , जिसकी परंपरा भारतवर्ष में उन ऋषि मुनियों के बाद समाप्‍त हो गयी। यही कारण है कि आज तक समाज में ज्‍योतिष और कर्मकांड को एक ही चीज समझा जाता है , दोनो को हेय नजर से देखा जाता है।

उस समय से लोगों के मन में जो भ्रम बना , वो अभी तक दूर नहीं हो पा रहा है। एक ज्‍योतिषी के रूप में मुझे समझने के बाद जन्‍मकुंडली बनवाने , मुहूर्त्‍त देखने , जन्‍मकुंडली मिलाने तथा अन्‍य कर्मकांडों की जानकारी के लिए मेरे पास लोग फोन किया करते हैं। कुछ लोग पूछते हैं कि बिना संस्‍कृत के आप ज्‍योतिष का काम कैसे कर सकती है ?? भले ही हर ज्ञान विज्ञान किसी न किसी रूप में एक दूसरे से सहसंबंध बनाते हों , पर लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि कर्मकांड और ज्‍योतिष में फर्क है। दोनो के विशेषज्ञ अलग होते हैं , सामान्‍य तौर पर कोई जानकारी भले ही दूसरे विषय की दी जा सकती है , पर विशेष जानकारी के लिए लोग को संबंधित विषय के विशेष जानकारी रखने वालों से ही संपर्क करना उचित है। मैं ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन करती हूं और उसी आधार पर पृथ्‍वी में होनेवाली घटनाओं का समय से पूर्व आकलन करती हूं। कर्मकांड की जानकारी या अपने या अपने बच्‍चे की जन्‍मकुंडली का चक्र तो लोग किसी पंडित से प्राप्‍त कर सकते हैं , पर संबंधित व्‍यक्ति के वर्तमान भूत और भविष्‍य के बारे में कुछ जानकारी की आवश्‍यकता हो , तब मुझसे संपर्क किया जाना चाहिए।

इसे भी पढिए ....
अब कंप्‍यूटर ही मेरे शौक को पूरा करेगा !!

बुधवार, 10 नवंबर 2010

छठ सिर्फ श्रद्धा और आस्‍था का त्‍यौहार है .. इसमें दिखावटीपना कुछ भी नहीं !!

बिहार और झारखंड का मुख्‍य त्‍यौहार है छठ , अभी चारो ओर इसकी धूम मची है। ब्‍लॉग में भी दो चार पोस्‍ट पढने को मिल ही जा रहे हैं।  लोग छठ की खरीदारी में व्‍यस्‍त है , पडोस में मेहमानों की आवाजाही शुरू हो गयी है।  दूर दूर से इसके खास धुन पर बने गीत सुनने को मिल ही रहे हैं , फिर भी वर्ष में एक बार इसकी सीडी निकालकर दो तीन बार अवश्‍य चला लिया करती हूं। छठ के बाद फिर सालभर  इस गाने को नहीं बजाया जाता है , पडे पडे सीडी खराब भी तो हो जाएगी। गीत सुनते हुए न जाने कब मन बचपन में छठ की पुरानी यादों में खो जाता है।

कहते हैं , हमारे पूर्वज 150 वर्ष पूर्व ही पंजाब से आकर बोकारो जिले के पेटरवार नाम के गांव में बस गए थे।  इनके नाम से गांव में एक 'खत्री महल्‍ला' कहलाने लगा था। आर्सेलर मित्‍तल ने अब अपने स्‍टील प्रोजेक्‍ट के लिए इस स्‍थान को चुनकर अब इसका नाम औद्योगिक शहरों में शुमार कर दिया है! हमलोगों के जन्‍म तक तो कई पीढियां यहां रह चुकी थी , इसलिए यहां की सभ्‍यता और संस्‍कृति में ये पूरे रच बस चुके थे। पर छठ का त्‍यौहार कम घरों में होता था और कुछ क्षेत्रीय लोगों तक ही सीमित था , खासकर उस समय तक हममें से किसी के घर में नहीं मनाया जाता था। सब लोग छठ मैय्या के नाम पर एक सूप या जोडे सूप के मन्‍नत जरूर रखते थे , उसकी खरीदारी या तैयारी भी करते , पर अर्घ्‍य देने या दिलवाने के लिए हमें किसी व्रती पर निर्भर रहना पडता था।

हमारे मुहल्‍ले में दूसरी जाति के एक दो परिवार में यह व्रत होता था , खरना में तो हमलोग निश्चित ही खीर और पूडी या रोटी का प्रसाद खाने वहीं पहुंचते थे। माना जाता है कि खरना का प्रसाद जितना बंटे , उतना शुभ होता है , इसलिए बच्‍चों के लिए रखकर बाकी पूरे मुहल्‍ले का गाय का दूध व्रती के घर चला जाता था । कभी कभार हमारा मन्‍नत वहां से भी पूरा होता। पर अधिकांश वर्ष हमलोग दादी जी के साथ अपनी एक दीदी के दोस्‍त के घर जाया करते थे। एक दिन पहले ही वहां हमलोग चढावे के लिए खरीदे हुए सामान और पैसे दे देते। दूसरे दिन शाम के अर्घ्‍य के दिन नहा धोकर घर के गाय का ताजा दूध लेकर अर्घ्‍य देने जाते थे।

वहां सभी लोग प्रसाद के रख रखाव और पूजा की तैयारी में लगे होते थे। थोडी देर में सब घाट की ओर निकलते। कुछ महिलाएं और बच्‍चे दंडवत करते जाते , तो कुछ मर्द और बच्‍चे माथा पर प्रसाद की टोकरी लिए हुए । प्रसाद के सूप में इस मौसम में होने वाले एक एक फल मौजूद होते हैं , साथ में गेहूं के आटे का ठेकुआ और चावल के आटे का कसार भी।  बाकी सभी लोग पूरी आस्‍था में तथा औरते छठ का विशेष गीत गाती हुई साथ साथ चलती। हमारे गांव में कोई नदी नहीं , इसलिए पोखर पर ही छठ मनाया जाता। घाट पर पहुंचते ही नई सूती साडी में व्रती तालाबों में डुबकी लगाती , फिर हाथ जोडकर खडी रहती। सूर्यास्‍त के ठीक पहले व्रती और अन्‍य लोग भगवान को अर्घ्‍य देते। हमारे यहो सभी मर्द लडके भी उस वक्‍त तालाब में नहाकर अर्घ्‍य देते थे। महीने या सप्‍ताह भर की तैयारी के बाद कार्यक्रम थोडी ही देर में समाप्‍त हो जाता था। पर आधी पूजा तो सुबह के लिए शेष ही रह जाती थी।

पहले ठंड भी बहुत पडती थी , सूर्योदय के दो घंटे पहले घाट में पहुंचना होता है , क्‍यूंकि वहां पूरी तैयारी करने के बाद आधे घंटे या एक घंटे व्रती को जल में खडा रहना पडता है। इसलिए सूर्योदय के ढाई घंटे पहले हमें अपने घर से निकलना होता। वहां जाने का उत्‍साह इतना अधिक होता कि हमलोग अंधेरे में ही उठकर स्‍नान वगैरह करके वहां पहुंच जाते। वहां तैयारी पूरी होती , दो तीन दिन के व्रत और मेहनत के बाद भी व्रती के चेहरे पर एक खास चमक होती थी। शाम की तरह ही सारा कार्यक्रम फिर से दुहराया जाता , उसके बाद प्रसाद का वितरण होता , फिर हमलोग घर वापस आते।

विवाह के दस वर्ष बाद तक संतान न होने की स्थिति में खत्री परिवार की दो महिलाओं ने पडोसी के घरों में जाकर इस व्रत को शुरू किया और सूर्य भगवान की कृपा कहें या छठी मैय्या की या फिर संयोग ... दोनो के ही बच्‍चे हुए , और बाद में हमारे मुहल्‍ले में भी कई परिवारों में धूमधाम से यह व्रत होने लगा। इसलिए अब हमारे मुहल्‍ले के लोगों को इस व्रत के लिए गांव के दूसरे छोर पर नहीं जाना पडता है,  उन्‍हे पूरे मुहल्‍ले की हर संभव मदद मिलती है। बचपन के बाद अभी तक कई जगहों की छठ पूजा देखने को मिली ,  हर स्‍थान पर इस व्रत और पूजा का बिल्‍कुल एक सा परंपरागत स्‍वरूप है , यह सिर्फ श्रद्धा और आस्‍था का त्‍यौहार है .. इसमें दिखावटीपना कुछ भी नहीं।

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

भूकम्‍प का ग्रह योग 16 नवंबर 2010 को सर्वाधिक प्रभावी होगा !!

मनुष्‍य के जीवन में प्राकृतिक आपदाओं में सर्वाधिक क्षति पहुंचाने वाली दुर्घटना भूकम्‍प ही है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण भू-पट्टियों में लगातार हो रही गति के कारण पृथ्वी की प्लेटों का खिसकना ही है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी के अंदर लावा भी ज्वालामुखी वाले क्षेत्रों में भूकम्‍प लाने में जिम्‍मेदार होती है। धरती के भीतर चल रही भूगर्भीय प्रक्रियाओं के कारण हर सैकेंड लगभग तीन भूकम्प ग्लोब के किसी न किसी कोने पर सिस्मोग्रॉफ के जरिए अनुभव किए जाते हैं , पर इनमें से दो प्रतिशत भूकम्प सतह पर महसूस होते हैं । इनमें से लगभग 100 भूकम्प हर साल रिक्टर पैमाने पर दर्ज होते हैं, पर इनमें से दो चार भूकम्‍प जानमाल का भारी नुकसान करते हैं , जिसके कारण भूकम्‍प का नाम ही इतना भयावह प्रतीत होता है।

29 सितंबर 2010 के पोस्‍ट में ही मैने एक खास ग्रहयोग के कारण नवंबर के मध्‍य में एक विनाशकारी भूकम्‍प की आशंका जतायी थी। इसके खास तिथि , समय और क्षेत्र की जानकारी देते हुए नवंबर के प्रथम सप्‍ताह में ही एक और लेख का वादा आपसे किया था। वैसे तो इस योग के फलीभूत होने की संभावना एक सप्‍ताह पूर्व से एक सप्‍ताह पश्‍चात तक कभी भी हो सकती है , पर काफी अध्‍ययन के बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ इस नतीजे पर पहुंचा है कि यह योग 16 नवंबर को भारतीय समय के अनुसार दिन के साढे तीन बजे अत्‍यधिक प्रभावी रहेगा। इसलिए इस तिथि और समय के आसपास भूकम्‍प की आशंका बढ जाती है।

मैने अपने पूर्व के आलेखों में स्‍पष्‍टत: कहा है कि अभी तक के रिसर्च के आधार पर तिथि की जितनी जानकारी हुई है , उतना दावा समय के बारे में नहीं किया जा सकता। और क्षेत्र के बारे में तो हमारा रिसर्च अभी बिल्‍कुल प्रारंभिक दौर से गुजर रहा है , आक्षांस के बारे में तो हम बिल्‍कुल ही दावा नहीं कर सकते , पर एक खास आधार का पता चलने के कारण देशांतर रेखा का कुछ अनुमान कर पाने की हिम्‍मत कर पाते हैं। हमारे हिसाब से भूकम्‍प के आने की संभावना 51 डिग्री पूर्व और 21 डिग्री पश्चिम के आसपास मानी जा सकती है। यदि इसके क्षेत्र को थोडा विस्‍तार दिया जाए , तो कहा जा सकता है कि 41 डिग्री से 61 डिग्री पूर्व तथा 11 डिग्री पश्चिम से 31 डिग्री पश्चिम में भूकम्‍प की संभावना हो सकती है। दोनो ही स्‍थानों में इस भूकम्‍प का समय भिन्‍न भिन्‍न हो सकता है।

दोनो ही हिसाब से हमारा देश पूर्ण तौर पर सुरक्षित दिख रहा है , यह हमारे लिए बडी राहत की बात है। हालांकि देश के पचिमी हिस्‍से में रहनेवालों के प्रभावित होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जहां तक हमारी गणना का सवाल है , यह छोटे मोटे भूकंप के लिए नहीं होता । कम से 6 रिक्टर से ऊपर की तीव्रता वाले भूकम्प के ही बारे में कहा जाता है , जो विनाशकारी होते हैं, खासकर जहां-जहां जनसंख्या का घनत्व अधिक है उन क्षेत्रों में भूकम्प आ जाने से अधिक जन-धन की हानि होने की आशंका बनी रहती है। अपने गणना के आधार पर हमारा मानना है कि 16 नवंबर को भूकम्‍प आएगा तो यह बडा भयावह होगा , यदि एक दो दिन पूर्व और पश्‍चात् हो , तो थोडी राहत की बात अवश्‍य हो सकती है। भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है जिसे जब इतने बडे बडे वैज्ञानिक नहीं रोक सकते , तो हम इसका दावा कैसे कर सकते हैं ? परन्तु अन्‍य विज्ञानों के तरह ही पूर्वानुमानों और संकेतों को निरंतर कुछ वर्षों तक विकसित किया जाए , तो इसके आधार पर हम इससे होने वाले जान-माल के नुकसान को कम जरूर कर सकते हैं । आइए ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि जान माल की कम से कम क्षति हो।

रविवार, 7 नवंबर 2010

कैसा रहेगा अगले सप्‍ताह का शेयर बाजार ??

जब एक महीने से तेज गति से चलते हुए शेयर बाजार को विराम लग रहा था, सेंसेक्‍स और निफ्टी में थोडी सी बढत भी बिकवाली का दबाब पैदा कर रही थी , निवेशकों के समक्ष थोडी आशंका बनी हुई थी, 22 अक्‍तूबर को अपने पोस्‍ट में मैने लिखा था कि  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सिद्धांतों की माने , तो अभी आनेवाले समय में शेयर बाजार के सकारात्‍मकता को लेकर बडी दुविधा नहीं दिखाई दे रही। खासकर अभी 8 नवंबर तक बाजार फिर एक नई ऊंचाई हासिल करेगा। कल 8 नवंबर आने को ही है और पिछले सप्‍ताह ही शेयर बाजार ने लगभग 900 प्‍वाइंट्स की बढत हासिल कर ली है

पिछले सप्‍ताह 1 नवंबर को मैने लिखा कि 1 और 2 नवंबर की तुलना में 3 , 4 और 5 नवंबर शेयर बाजार के लिए बेहतर रहेगा , ग्रहों का प्रभाव 3 और 4 नवंबबर को मेटल सेक्‍टर के लिए खास रहेगा , इसलिए कोल इंडिया के शेयरों को अच्‍छा रिस्‍पांस मिलना चाहिए। 5 नवंबर आई टी, रियल्‍टी और बैंकिंग जैसे कुछ सैक्‍टरों को प्रभावित करने वाले होंगे। इन तीनों दिनों में सेंसेक्‍स और निफ्टी ने बडी़ बढ़त हासिल की , खासकर मेटल सेक्‍टर में बहुत अच्‍छी बढत हुई और दिवाली के दिन मुहूर्त ट्रेडिंग के दौरान सेंसेक्स 21000 के आकंडे को पार करने में कामयाब रहा। 

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की माने तो बाजार में आने वाले दिनों में बढत को लेकर बडी शंका नहीं दिखाई देती लेकिन पिछले सप्‍ताह वाली बात भी अभी लौटकर नहीं आनेवाली। 8 नवंबर तक बाजार की स्थिति बहुत ही मजबूत दिखती है, इसलिए आने वाले सप्‍ताह का पहला दिन शेयर बाजार के लिए मनोनुकूल होगा। इस दिन ऑयल और गैस सैक्‍टर में बडी़ बढ़त देखने को मिलेगी। इसके साथ ही आईटी और रियलटी जैसे सूचकांक भी बढत लिए रहेंगे। खासकर बाजार की शुरूआत अच्‍छे ढंग की होगी। पर 10 , 11 , 12 और 13 नवंबर को बाजार से बडी उम्‍मीद नहीं रखी जा सकती। कुछ शेयर या सैक्‍टर बढते हुए दिखेंगे, तो कुछ में घटत की भी संभावना बनेगी और इस तरह मिला जुला कारोबार होने की संभावना है। हां, लगभग प्रतिदिन बाजार शुरूआती दौर में जितना तेज रहेगा,वैसा अंत तक देखने को नहीं मिलेगा। सप्‍ताह के अंत तक कुछ उतार चढाव यानी 100–200 अंकों की घटत या बढत से इनकार नहीं किया जा सकता।

कुछ पाठको , जिन्‍हें हमारे द्वारा किए गए एक सप्‍ताह के आकलन से दूरस्‍थ प्‍लानिंग करने में सुविधा नहीं महसूस होती है , की इच्‍छा को ध्‍यान में रखते हुए , पूरे नवंबर भर के शेयर बाजार का आकलन किया जा चुका है। प्रतिमाह इस प्रकार का आकलन किया जा सकता है। सशुल्‍क उसे प्राप्‍त करने की इच्‍छा रखनेवाले हमारे ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं।   

काली पूजा के कुछ चित्र देखिए ..........

कार्तिक अमावस्या की शाम को घर घर होने वाली लक्ष्‍मी पूजा के साथ ही रात्रि में काली पूजा की भी बहुत महत्ता है। एंसी मान्‍यता है कि देवों में सबसे पराक्रमी और शक्तिशाली मां काली देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं। मां काली की पूजा से वे सभी सभी नकारात्मक प्रवृतियां दूर होती हैं ,  जो धार्मिक प्रगति और यश प्राप्ति में बाधक हैं। बोकारो में हमारी कॉलोनी मे हुए काली पूजा के कुछ चित्र देखिए .....................




गुरुवार, 4 नवंबर 2010

पहले जन्‍म या फिर भाग्‍य . . विश्‍लेषण के लिए कम से कम 100 अस्‍पतालों का आंकडा चाहिए !!

पहले अंडा या मुर्गी , ये फैसला तो आज तक न हो सका है और न हो पाएगा , पर इसी तर्ज पर कुछ दिनों से एक महत्‍वपूर्ण विषय पर मैं चिंतन कर रही थी , जन्‍म के आधार पर भाग्‍य निश्चित होता है या भाग्‍य के निश्चित होने पर जन्‍म की तिथि निश्चित होती है। संयोग से उसी आसपास पापाजी भी बोकारो पहुंच गए , हमेशा की तरह ही इस बार भी मेरे प्रश्‍नों की झडी तैयार थी। पर जहां पहले मैं मेरे प्रश्‍नों की झडी से वे ऊब से जाया करते , हाल के वर्षों में वे किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचने से पहले मेरे अनुभव का भी ख्‍याल रखते हैं। वर्षों के अनुभव और चार दिनों तक हुई गंभीर बहस के बाद हमलोग इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि बच्‍चे का स्‍वभाव और उसकी जीवन यात्रा पहले से तय होती है , उसी के अनुसार उसके जन्‍म लेने का समय तय होता है। दरअसल गर्भावस्‍था के दौरान ही बच्‍चे की मां और बच्‍चे की परिस्थितियों और जन्‍म के पश्‍चात बनने वाली बच्‍चे की जन्‍मकुंडलियों में समानता को देखते हुए हमने ऐसा समझा।

अभी तक ज्‍योतिष शास्‍त्र ये मानता आया है कि भूण के बनने के हिसाब से बच्‍चों का भाग्‍य निश्चित नहीं होता , जन्‍म के बाद बच्‍चे जो प्रथम श्‍वास ग्रहण करते हैं, उसी वक्‍त ब्रह्मांड में मौजूद ग्रहों का प्रभाव किसी बच्‍चे पर  पडता है , जिससे उसका स्‍वभाव और उसकी जीवनयात्रा निश्चित होती है , जिसे जन्‍मकुंडली में देखा जा सकता है। इस आधार पर बालारिष्‍ट रोगों का कारक ग्रह चंद्रमा यदि जन्‍म के वक्‍त कमजोर हो , तो जन्‍म के बाद बच्‍चे के स्‍वास्‍थ्‍य में गडबडी आती है। पर अध्‍ययन के क्रम में कई कुंडलियों में हमने पाया कि जन्‍म के वक्‍त रहनेवाले कमजोर चंद्रमा के कारण या तो घर की आर्थिक स्थिति गडबड थी या माता पिता के द्वारा किसी प्रकार की लापरवाही हुई , जिसके कारण गर्भावस्‍था के दौरान ही कई बच्‍चों  के शा‍रीरिक विकास में बाधा उपस्थित हुई थी ।

 ऐसा महसूस करने पर हमलोगों ने खास विशेषतावाले 100 बच्‍चों की माताओं से बात चीत की। जन्‍मकुंडली के हिसाब से बच्‍चों के जिन जिन पक्षों को मजबूत होना चाहिए था , वे उनकी गर्भावस्‍था के दौरान उनकी माताओं के द्वारा महसूस किए गए। गर्भावस्‍था के दौरान लगभग सभी महिलाओं ने अपने व्‍यवहार में ये विशेषताएं पायी थी , जो उनके बच्‍चों में बाद में देखने को मिली। हमारे ग्रंथों में माता के व्‍यवहार का बच्‍चों पर प्रभाव के बारे में चर्चा है , पर हमने महसूस किया कि अलग अलग बच्‍चें के स्‍वभाव के हिसाब से माता के व्‍यवहार या स्‍वास्‍थ्‍य या मानसिक क्रियाकलापों में अंतर देखने को मिला। पर हमलोग इस प्रकार के रिसर्च के बिल्‍कुल प्रारंभिक दौर में थे , इसलिए इस निष्‍कर्ष को लेकर दावा नहीं कर सकते थे , चिंतन अवश्‍य बना हुआ था , पर यह भ्रम था या हकीकत , समझ में नहीं आ रहा था।

पर यह भ्रम पिछले शनिवार यानि 23 अक्‍तूबर को हकीकत में बदल गया। घटना यह हुई कि कुछ दिन पहले ही बोकारो से मेरी एक महिला मित्र अपनी गर्भवती पुत्री के पास दिन पूरे होने के लगभग दिल्‍ली पहुंच गई थी। उसकी पुत्री एक दिन पहले से ही अस्‍पताल में भर्ती थी , इसकी खबर लगते ही मैने दो बजे आसपास उनसे बात की। वो काफी घबडायी हुई थी , बिटिया को पांच घंटे पूर्व ही लेबर रूम ले जाया गया था , पूरे परिवार के लोग जमा थे और अंदर से कोई खबर भी नहीं आ रही थी। जब भी भविष्‍य अनिश्चित सा लगता है , मुझसे लोग भविष्‍य के बारे में जानना चाहते हैं। माता पिता जानना चाह रहे थे कि इसमें कितनी देर हो सकती है।

फोन रखने के बाद मैने पंचांग निकाला , पूर्णमासी का दिन था और साढे पांच बजे से साढे सात बजे के मध्‍य चांद पूर्वी दिशा में उदय होने वाला था। उस वक्‍त बच्‍चे का जन्‍म हो , तो जन्‍मकुंडली में लग्‍नचंदा योग बनेगा , इस योग के बारे में कहा जाता है कि इसमें जन्‍म लेने वाला बच्‍चा पूरे परिवार का लाडला और प्‍यारा होता है। लग्‍नचंदा योग यदि पूर्णिमा के दिन बनें , तो इसकी बात ही अलग होती है। वैसे तो अपने माता पिता के लिए हर बच्‍चा प्‍यारा ही होता है , पर जिस बच्‍चे का जन्‍म होनेवाला था , वह दादाजी और नानाजी दोनो के घर का पहला बच्‍चा था , उसके अतिरिक्‍त लाड प्‍यार में कोई संशय नहीं था। मेरे मन से सारा भ्रम हट गया , इस बच्‍चे का जन्‍म साढे पांच से साढे सात के मध्‍य लग्‍नचंदा योग में ही हो सकता है , यही वजह है कि लेबर रूम में इतनी देर हो रही है।

मेरा ध्‍यान दिल्‍ली की ओर ही लगा रहा , सात बजे सूचना मिली कि पंद्रह मिनट पहले बच्‍चे का जन्‍म हो चुका है , जच्‍चा और बच्‍चा दोनो ही स्‍वस्‍थ हैं , बच्‍चे का वजन 4 किलो है। मतलब एक निश्चित समय पर बच्‍चे का जन्‍म लेना तय था , और उसी ग्रहस्थिति के हिसाब से उसका पूरा विकास हो चुका था। इस घटना के बाद मेरा भ्रम तो बिल्‍कुल मिट चुका है , पर इसे और निश्चित करने के लिए मैं एक सर्वे करना चाहती हूं। इसके लिए कम से कम देशभर के 100 अस्‍पतालों से पूरे दिसंबर 2010 के दौरान जन्‍म लेने वाले सारे बच्‍चों का जन्‍म विवरण , उनका वजन , उनके जन्‍म से पहले और बाद का स्‍वास्‍थ्‍य , उनके माता पिता , दादा दादी या नाना नानी के बेटे बेटियों , नाती नातिनियों और पो‍ते पोतियों में उनका कौन सा स्‍‍थान है ,  इसके बारे पूरी जानकारी चाहती हूं , मैने इस दिशा में अपने नजदीकी डॉक्‍टरों और अस्‍पतालों से बात शुरू कर दी है , क्‍या आप पाठकों में से भी कोई मेरी मदद कर सकते हैं ??

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

कौन सा व्‍यवसाय किया जाए ??

अभी हाल में एक भाई ने बहुत खुश होकर बताया कि उसने कई प्रोडक्‍टों की एजेंसी ले रखी है , बाजार में उन वस्‍तुओं की अच्‍छी खपत है और अब भविष्‍य के लिए उसे सोंचने की आवश्‍यकता नहीं। उत्‍सुकता वश मैने उसे पूछा कि‍ वे कौन कौन से प्रोडक्‍ट हैं ?? शायद उसे सबसे अधिक फायदा शायद कोल्‍ड ड्रिंक्‍स और पानी की बोतलों से आ रहा था , उसके मुहं से इन्‍हीं दोनो का नाम पहले निकला । सुनते ही मैं ऐसे सोंच में पड गयी कि बाद में उसने और कई प्रोडक्‍टों का क्‍या नाम बताया , वो भी सुन न पायी और उसके चुप्‍प होते ही उसे जीवन में नैतिक मूल्‍यों को धारण करने का लेक्‍चर देने लगी।

वो तर्क करने में मुझसे बीस ही निकला। उसने बताया कि पानी और कोल्‍ड ड्रिंक्‍स की बोतल को बेचना तो वह एक मिनट में छोड सकता है , जब मैं उसे बताऊं कि बाजार में कौन सा प्रोडक्‍ट सही है। दूध में केमिकल की क्‍या बात की जाए , पेण्‍ट का घोल तक मिलाया जाता है। मधु , च्‍यवणप्राश तक में एंटीबायोटिक और पेस्टिसाइड की बात सुनने में आ ही गयी है। जितनी सब्जियों है , उसमें आक्सीटोसीन के इंजेक्‍शन दिए जाते हैं , जिससे सब्जियां जहरीली हो जाती हैं। गाय तक को तेज इंजेक्‍शन देकर उसके सारे शरीर का दूध निचोड लिया जाता है , नकली मावा , नकली मिठाई , नकली घी। पैकिंग के चाकलेटों और अन्‍य सामानों में कीडे मकोडे , किस चीज का व्‍यवसाय किया जाए ??

सुनकर उसकी मां यानि चाची खेतों के ऊपज तक के शुद्ध नहीं रहने की चर्चा करने लगी। गांव के परंपरागत सारे बीज समाप्‍त हो गए हैं और हर वर्ष किसान को सरकारी बीज खरीदने को बाध्‍य होना पडता है। विशेष ढंग से विकसित किए गए उस बीज में प्राकृतिक कुछ भी नहीं , उसमें गोबर की खाद नहीं चल सकती , रसायनिक खाद का ही इस्‍तेमाल करना पउता है , सिंचाई की सुविधा हो तो ठीक है , नहीं तो पौधों में प्रतिरोधक क्षमता बिल्‍कुल भी नहीं होती , देखभाल में थोडी कमी हो तो मर जाते हैं। हां, सबकुछ ठीक रहा तो ऊपज अवश्‍य होती है , पर न तो पुराना स्‍वाद है और न ही पौष्टिकता।

 इस तरह के बातचीत से लोगों को कितनी निराशा होती होगी , इसका अनुमान आप लगा सकते हैं। शरीर को कमजोर कर , प्रकृति को कमजोर कर हम यदि विकसित होने का दावा करते हैं , तो वह हमारा भ्रम ही तो है। पाश्‍चात्‍य की नकल करते हुए इस अंधे विकास की दौड में किसी को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। एलोपैथी दवाओं का तो और बुरा हाल है , एक बार किसी बीमारी की दवा लेना शुरू करो , भाग्‍य अच्‍छा होगा , तभी उस दवा के कुप्रभाव से आप बच सकते हैं। इन दवाओं और जीवनशैली की इन्‍हीं खामियों के कारण 40 वर्ष की उम्र का प्रत्‍येक व्‍यक्ति दवाइयों पर निर्भर हो जाता है। हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति तथा ज्ञान ने अपने स्‍वास्‍थ्‍य के साथ साथ प्रकृति के कण कण के बारे में सोंचने को बाध्‍य करती है। इसलिए जितनी जल्‍द हमलोग परंपरागत जीवनशैली की ओर लौट जाएं , उतना ही अच्‍छा है।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

मध्‍य दोपहर में ग्रहों का प्रभाव बी एस ई पर गंभीर रूप से देखने को मिला ...

2006 से मैने शेयर बाजार के आंकडों का विश्‍लेषण करना शुरू किया है , ग्रहों से इसका तालमेल बिठाती आ रही हूं , मैने पाया है कि ग्रहों का प्रभाव शेयर बाजार पर भी पडता है , हालांकि मैं इसे स्‍पष्‍ट नहीं देख पाती , पर किसी न किसी प्रकार के संकेत अवश्‍य मिल जाते हैं। पिछले लेख में मैने दो वर्षों से मैं हर सप्‍ताह शेयर बाजार के बारे में भविष्‍यवाणी करते हुए मोल तोल में कॉलम लिखती आ रही हूं और अगले सप्‍ताह लगभग वैसी ही परिस्थितियों देखा करती हूं।


मैने अपने ब्‍लॉग पर पिछले सप्‍ताह के संकेत की चर्चा की थी। मेरे लिखे अनुरूप ही 25 अक्‍टूबर को बाजार की शुरूआत मजबूती से हुई। निवेशक पूरे उत्‍साह में थे और थोडी देर तक सभी सैक्‍टरों में लिवाली होती रही। भले ही 26 अक्‍टूबर को शुरूआत में दलाल स्‍ट्रीट में ये हाल न रहा हो लेकिन अंत के बारे में मैने जैसा लिखा था, सप्‍ताह के प्रत्‍येक दिन लगभग दोपहर तक बाजार दायरे में ही कारोबार करते दिखे, लेकिन दोपहर बाद शॉर्ट कवरिंग की वजह और खासकर 27 अक्‍टूबर को आखिरी घंटे बाजार में सीरीज की एक्सपायरी की वजह से बाजार में चौतरफा बिकवाली देखी गई।


जैसा कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के हिसाब से साप्‍ताहिक बंद सकारात्‍मक होना था।  तीन दिनों से जारी गिरावट 29 अक्‍टूबर के कारोबार के अंतिम घंटे में थम ही गई और निवेशकों की ब्लूचिप कंपनियों में लिवाली और बैंकिंग तंत्र में मुद्रा आपूर्ति बढ़ाने के रिजर्व बैंक के उपायों के बल पर सेंसेक्स 91 अंक मजबूत होकर सेंसेक्स 20 हजार के मनोवैज्ञानिक स्तर के ऊपर चला गया एवं निफ्टी ने भी छह हजार के स्तर को पार कर गया। यहां तक कि मेरे लिखे अनुरूप बाजार में कमजोरी के बावजूद 27,  28 और 29 अक्‍टूबर को ऑयल और गैस सैक्‍टर में बडी बढत देखने को मिली, यानी ग्राफ की ऊंचाई को छोडकर मेरे बाकी सारे संकेत सही थे।


पर जैसा कि मैन‍े पिछले सप्‍ताह ही लिखा था , अभी 8 नवंबर तक बाजार फिर एक नई ऊंचाई हासिल करेगा , अभी बाजार में गिरावट के कोई चांस नहीं। हां , उसके बाद छोटे मोटे करेक्‍शन जरूर देखे जा सकते हैं। शेयर बाजार में आने वाले सप्‍ताह में भी कुल मिलाकर स्थिति अच्‍छी दिख रही है ,  लेकिन ग्रहों के हिसाब से भारतीय बाजार का समय कुछ जोड तोड वाला अवश्‍य है । इस सप्‍ताह भी साप्‍ताहिक बाजार खुलने के पूर्व ही मैने मोल तोल में आनेवाले सप्‍ताह के शेयर बाजार के बारे में भविष्‍यवाणी कर दी थी। अपने ब्‍लॉग में कल शाम इसे लगाने का मन बनाया था , पर कुछ तकनीकी गडबडी के कारण सफलता न मिली। 


मोल तोल के आलेख में मैने लिखा था कि 1 या 2 नवंबर को पूंजीगत या उपभोक्‍ता वस्‍तुओं के शेयरों में कुछ कमजोरी दलाल स्‍ट्रीट के रौनक को कम कर सकती है। इसका खास प्रभाव मध्‍य दोपहर में देखने को मिलेगा। हालांकि आज बाजार तेज होकर खुला , पर ग्रहों का प्रभाव उपभोक्‍ता वस्‍तुओं पर अवश्‍य दिखा है , बाकी सेक्‍टर की तुलना में  FMCG में कम बढत देखी जा रही है। पर आश्‍चर्य तो मुझे इस बात पर हुआ कि जैसा मैने लिखा था , मध्‍य दोपहर में ग्रहों का प्रभाव बी एस ई पर गंभीर रूप से देखने को मिला , तकनीकी गडबडी की वजह से इसे पौने तीन घंटे कारोबार ही बंद करना पडा। 



मोल तोल के इस सप्‍ताह के आलेख में 3 , 4 और 5 नवंबर को इसकी तुलना में शेयर बाजार के बेहतर होने की बात लिखी गयी है। ग्रहों का प्रभाव 3 और 4 नवंबबर को मेटल सेक्‍टर के लिए खास रहेगा , इसलिए कोल इंडिया के शेयरों को अच्‍छा रिस्‍पांस मिलना चाहिए। 5 नवंबर आई टी, रियल्‍टी और बैंकिंग जैसे कुछ सैक्‍टरों को प्रभावित करने वाले होंगे। लेकिन इन दिनों में भी दोपहर बाद का समय शेयर बाजार के प्रतिकूल होने से सेंसेक्‍स और निफ्टी में कुछ गिरावट अवश्‍य दर्ज की जा सकती है। लेकिन बिल्‍कुल अंत का समय कुछ राहत देने वाला अवश्‍य हो सकता है।


कुछ पाठकों, जिन्‍हें हमारे द्वारा किए गए एक सप्‍ताह के आकलन से दूरस्‍थ कार्यक्रम बनाने में सुविधा महसूस नहीं होती है, की इच्‍छा को ध्‍यान में रखते हुए, पूरे नवंबर भर के शेयर बाजार का आकलन किया जा चुका है। प्रतिमाह इस प्रकार का आकलन किया जा सकता है। सशुल्‍क उसे प्राप्‍त करने की इच्‍छा रखने वाले ईमेल से संपर्क कर सकते हैं।

भूल सुधार .. LOCKED BY HINDI BLOG TIPS

आशीष खंडेलवाल जी ने अपनी एक पोस्‍ट में रचनाओं को चोरी से बचाने के लिए कुछ टिप्‍स दिए थे , जिससे टेक्‍सट कॉपी नहीं किया जा सकता था। इसका प्रयोग कुछ दिन मैने भी किया था , फिर किसी सज्‍जन के अनुरोध पर अपने लेखों के प्रयोग करने की सुविधा देने के लिए हटाना पडा । पर कुछ दिनों से मैने कई ब्‍लॉग्‍स पर जब भी कुछ शब्‍दों को सेलेक्‍ट करने की कोशिश की है , ऐसा दृश्‍य पाया है ......



मतलब कि वह स्‍वामी जी के तोते की तरह अपनी कहता भी है और आपको कॉपी करने भी दे देता है। आपको नहीं मालूम तो सुन लीजिए , स्‍वामी जी का तोता शिकारी के बिछाए गए जाल में फंसकर स्‍वामी जी द्वारा रटाए गए पाठों को कैसे दोहरा रहा था ....

शिकारी आएगा , जाल बिछाएगा . लोभ से उसमें फंसना मत !!

भूल सुधार कर लें आशीष खंडेलवाल जी !!

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

बच्‍चों के पालन पोषण की परंपरागत पद्धतियां ही अधिक अच्‍छी थी !!

बचपन की गल्तियों में मार पडने की बात तो लोग भूल चुके होंगे , आज के बच्‍चों को डांट फटकार भी नहीं की जाती। माता पिता या अन्‍य बडे किसी काम के लिए मना कर दिया करते हैं , तो बच्‍चों का नाराज होना स्‍वाभाविक है। पर यदि शुरूआती दौर में ही उनको गल्तियों में नहीं टोका जाए और उनकी आदतों पर ध्‍यान नहीं दिया जाए , तो आगे वे अनुशासन में नहीं रह पाते। भले ही बचपन में लाड प्‍यार अधिक पाने वाले बच्‍चे अपने आत्‍मविश्‍वास के कारण हमें सहज आकर्षित कर लेते हों , तथा डांट फटकार में जीने वाले बच्‍चे सहमे सकुचाए होने से हमें थोडा निराश करते हों, पर वह बचपन का तात्‍कालिक प्रभाव है। कहावत है 'आती बहू जन्‍मता बच्‍चा' जैसी आदत रखोगे , वैसे ही रहेंगे वो। सही ढंग से यदि अनुशासित रखने के क्रम में जिन बच्‍चों को जितनी अधिक रोक टोक होती है , उसके व्‍यक्तित्‍व का उतना ही बढिया विकास होता है और वह जीवन में उतना ही सफल होता है।

आरंभिक दौर में हर आनेवाली पीढी पिछले पीढी को विचारों में कहीं न कहीं कमजोर मानती है, क्‍यूंकि उसका ज्ञान अल्‍प होता है। जैसे जैसे उम्र और ज्ञान का दौर बढता जाता है , पुरानी पीढी द्वारा कही गयी बातों में खासियत दिखाई देने लगती है। जब मैं रोटी बेलना सीख रही थी , तो गोल न बेलने पर मम्‍मी टोका करती , जब गोल बेलना सीख गयी , तो रोटी के न सिंकने को लेकर टोकाटोकी करती। रोटी के न फूलने पर उन्‍हें संतुष्टि नहीं होती , चाहे सेंकने के क्रम में दोनो ओर से रोटी को जला भी क्‍यूं न डालूं। उनका डांटने का क्रम तबतक जारी रहा , जबतक मैं बिल्‍कुल मुलायम रोटियां न बनाने लगी। मुझे मम्‍मी का टोकना बहुत बुरा लगता, मुझे लगता कि वे जानबूझकर टोका टोकी करती हैं , इतना सेंकने पर रोटी कच्‍चा कैसे रह सकता है ? बाद में समझ में आया कि भाप का तापमान खौलते पानी से भी बहुत अधिक होता है , इसलिए रोटी फूलने पर वह बाहर के साथ साथ अंदर से भी सिंकती होगी। सिर्फ रोटी बनाने में ही नहीं अन्‍य कामों को वे जितनी सफाई से किया करती , मुझसे ही वैसी ही उम्‍मीद रखती।इसका फायदा यह हुआ कि जिम्‍मेदारी के साथ हर काम को सफाई से करना तो सीखा ही , आगे भी सीखने की ललक बनी रही। मुझे किसी भी परिस्थिति में कहीं भी समायोजन करने में दिक्‍कत नहीं आती।

आज कुछ स्‍कूलों की अच्‍छी पढाई की वजह से भले ही शिक्षा और कैरियर को युवा गंभीरता से लेते हैं , पर बाकी मामलों में आज की पीढी अपने अभिभावकों से सिर्फ प्‍यार पाकर बहुत बिगड गयी है। माता पिता अपने कैरियर की चिंता में व्‍यस्‍त बच्‍चों को स्‍वास्‍थ्‍य तक का ख्‍याल नहीं रख रहे , लेकिन उसकी उल्‍टी सीधी जिद जरूर पूरी कर रहहे हैं। उन्‍हें कभी डांट फटकार नहीं पडती , उनका पक्ष लेकर दूसरे के बच्‍चों और पडोसी तक को डांट देते हैं। अपने बच्‍चों पर गजब का विश्‍वास होता है उनका , उनकी गल्‍ती स्‍वीकारने को कतई तैयार नहीं होते। आज के अभिभावक बिल्‍कुल नहीं चाहते कि बच्‍चें के आसपास के वातावरण में ऐसी कोई बात हो , जिससे उनके दिमाग पर बुरा प्रभाव पडे। अपने को कष्‍ट में रखकर भी बच्‍चों के सुख की ही चिंता करते हैं। वैसे बच्‍चे जब युवा बनते हैं , अपने सुख के आगे किसी के कष्‍ट की उन्‍हें कोई फिक्र नहीं होती , यहां तक कि अपने माता पिता के प्रति जिम्‍मेदारी का भी उन्‍हें कोई ख्‍याल नहीं रहता। इसके अतिरिक्‍त समस्‍याओं से जूझने की युवाओं की प्रतिरोधक क्षमता समाप्‍त होती जा रही है और जिस दिन भी उसके सम्‍मुख समस्‍याएं आती हैं , वो इसे नहीं झेल पाते हैं। ज्‍योतिषियों और मनोचिकित्‍सक के पास मरीजों की बढती हुई संख्‍या इसकी गवाह है।  

अपने पालन पोषण की गलत नीतियों के कारण ही आज के सभी अभिभावक अपने बाल बच्‍चों के द्वारा अपनी देख रेख की उम्‍मीद ही छोड चुके हैं। यदि किसी ने बच्‍चों को अपनी जिम्‍मेदारी का अहसास कराते हुए अपने बच्‍चों का पालन पोषण किया भी है , तो वैवाहिक संबंध बनाते वक्‍त उनसे चूक हो जाती है। जिम्‍मेदारी के प्रति पार्टनर के गंभीर न होने से भी आज के समझदार युवा के समक्ष एक अलग मुसीबत खडी हो जाती है। माता पिता या अपने सुख में से एक को चुनने की उसकी विवशता होती है , उसे आंखे मूंदकर किसी एक को स्‍वीकार करना है। अपना सुख चुने या माता पिता का , कोई भी सबको सं‍तुष्टि नहीं दे पाता , स्थिति वैसी की वैसी ही बनी रह जाती है। यदि तबतक बच्‍चे हो गए हों , तो माता पिता को छोडकर मजबूरन उन्‍हें स्‍वार्थी बनना पडता है। आनेवाले समय में रिश्‍तों की और भयावह स्थिति उपस्थित होनेवाली है , ऐसी दशा में सभी अभिभावको से निवेदन है कि वे बच्‍चे को अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति ,परिवार और समाज के प्रति जिम्‍मेदार बनने की सीख दें। हममें से कोई भी समाज से अलग नहीं है , हम जैसा बोएंगे , वैसा ही तो काटेंगे और बोने और काटने का यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा, जो आनेवाले युग के लिए बहुत बुरा होगा।

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

अब मौसम की गडबडी दिसंबर के पहले सप्‍ताह में ही दिखती है !!

अभी नवंबर की शुरूआत भी नहीं हुई कि गुलाबी ठंड की दस्तक हो गयी है। बीते दो दिनों से मौसम में सुबह से शाम तक ठंडक का ही माहौल रहा है। तापमान में गिरावट आने से भोर में हल्की ठंड पड़ने लगी है , ऐसे में लोगों का ध्‍यान है कि पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष ठंड जल्‍द पड गयी है , नवंबर में मौसम सुहावना नहीं रह पाएगा , हो सकता है कडकडाती ठंड का भी सामना करना पडे। 

इधर दो दिनों में कुछ ग्रह स्थिति मौसम के पक्ष में नहीं थी , इसलिए कुछ अधिक ही ठंड का अहसास हो रहा है , पर आनेवाले समय में ठंड के बढते जाने के आसार नही। पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के नियमों की माने तो भले ही नवंबर का महीना ठंड का महीना है , इसलिए गुलाबी ठंड लोगों को महसूस होती रहे , पर कडकडाती ठंड का सामना करने को लोग तभी मजबूर होते हैं ,जब तेज हवाएं चल रही हो, आसमान में बादल बनें हों , यत्र तत्र बारीश के छींटे पड रहे हों या पहाडी प्रदेशों में बर्फ गिर रहे हों। पर अभी आनेवाले समय में ऐसे कोई हालात नहीं दिख रहे।

 6 और 7 दिसंबर 2010 को कुछ ग्रहों की खास स्‍िथति भारत के मौसम में गडबडी लाने में जिम्‍मेदार होगी। इसके प्रभाव से तेज हवाएं चलेंगी , आसमान में बादल बनेंगे, यत्र तत्र बारिश , बर्फ गिरने की घटनाएं होगी , मैदानी क्षेत्रों में कुहरे से यातायात क्षेत्र खासा प्रभावित होगा , जिससे जन जीवन अस्‍त व्‍यस्‍त होगा। ऐसे में तापमान घटने से कडकडाती ठंड होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसका प्रभाव एक सप्‍ताह पहले से देखा जा सकता है। पर 6 और 7 दिसंबर को इसका प्रभाव सबसे अधिक देखने को मिलेगा , उससे पूर्व ठंड के बढने के कोई आसार नहीं दिखते।

6 या 7 दिसंबर के बाद मौसम में थोडी राहत अवश्‍य होगी , पर ठंड बढने का सिलसिला जारी रहेगा , छोटे रूप में मौसम की खराबी 20 दिसंबर के आसपास भी नजर आएगी , उस समय यत्र तत्र बारिश के कारण जनजीवन अस्‍तव्‍यस्‍त बना रहेगा। खेतों के फसलों , खासकर इस समय की सब्जियों वगैरह को भी नुकसान पहुंच सकता है। यही समय फसलों के खलिहान में बने होने का भी है , इसलिए किसानों को इन्‍हें लेकर भी तनाव बना रहेगा। मौसम की खराबी थोडी कम और अधिक होते हुए जनवरी के मध्‍य तक जाएगी। 10 और 11 जनवरी को बडे रूप में एक बार मौसम की खराबी , जिसमें तेज हवाओं से लेकर बारिश , आंधी और बर्फ गिरना सब शामिल है , के बाद ही अचानक ठंड से छुटकारा मिलेगा।