रविवार, 24 जनवरी 2010

इस दुनिया में सबकुछ नियम से होता है .. संयोग या दुर्योग कुछ नहीं होते !!

इतने लंबे विकास के क्रम के बावजूद मानव जीवन में मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर लोगों के मन में भय के उपस्थित होने के कारण समाज में कई प्रकार की बुरी मान्‍यताएं , बुरी प्रथाएं आती जाती रही , ये तो विभिन्‍न उदाहरणों और कहानियों द्वारा हमारे सामने रखी जाती हैं , जिसे दूर करने के लिए समय समय पर हमारे समाजसेवियों ने संघर्ष भी किया , कई दूर भी हुईं , फिर भी आज भी कई मान्‍यताएं अच्‍छे और बुरे रूप में समाज में मौजूद हैं , इसे स्‍वीकारने में मुझे कोई आपत्ति नहीं। आज अन्‍य क्षेत्रों की तरह ही ज्‍योतिष जैसा पवित्र विषय भी बहुत सारे स्‍वार्थी लोगों के द्वारा अपने स्‍वार्थ की पूर्ति का एक साधन बन गया है , एक तो यहां सच्‍चे अध्‍येताओं की कमी भी है , जो  हैं भी तो उनके सामने कई प्रकार के प्रश्‍न मुहं बाए खडे हैं , समाधान की कोई जगह नहीं , इसके कारण आज के युग के हर विज्ञान के समानांतर इसमें अध्‍ययन नहीं हो पा रहा , जिससे इसकी कुछ कमियों को स्‍वीकारने में मुझे परहेज नहीं , पर हमारे वैदिककालीन ग्रंथों में चर्चित वेदों को नेत्र कहा जानेवाला ज्‍योतिष अंधविश्‍वास कैसे हो गया , यह आजतक तो मेरी समझ में नहीं आया।


जिस प्रकार एक ज्‍योतिषी किसी प्रयोगशाला में प्रयोग कर ग्रहों के प्रभाव को प्रमाणित करने में असमर्थ हैं , उसी प्रकार वैज्ञानिक भी ये स्‍पष्‍ट नहीं कर पाते कि ग्रहों का प्रभाव जड चेतन पर नहीं पडता है , यही कारण है कि लोगों की भ्रांति नहीं दूर हो पाती। जब किसी प्रकार की भ्रांति दूर ही न की जा सके , तो फिर पत्र पत्रिकाओं में या टी वी चैनलों में ज्‍योतिष के कार्यक्रमों का जनसाधारण के लिए कोई उपयोग नहीं रह जाता। हां , पाठकों के भ्रम के कारण , कि शायद इस बार कोई निष्‍कर्ष निकलकर सामने आए , चैनलों को उनके उद्देश्‍य के अनुरूप विज्ञापन के द्वारा बडे लाभ की व्‍यवस्‍था अवश्‍य हो जाती है। मीडिया को ही क्‍या दोष दिया जाए , आजतक सरकार या जनता ने भी कभी ज्‍योतिष की परीक्षा के लिए सार्थक कदम नहीं उठाए हैं, ज्‍योतिष की विवादास्‍पद स्थिति के यही सारे कारण है ।


हम सभी जानते हैं कि विदेशी आक्रमण के दौरान हमारे ज्ञान विज्ञान को बडे पैमाने पर नष्‍ट किया गया। आधे अधूरे ज्ञान को विकसित होने के लिए न तो कभी सरकार द्वारा कोशिश की गयी और न ही आम जनता द्वारा । अधकचरे ज्ञान के सहारे एक ज्‍योतिषी अपनी पूरी शक्ति का उपयोग भले ही कर ले , पर आज के युग के अनुरूप संसाधनों के अभाव को तो महसूस करता ही है। ज्‍योतिष को विज्ञान सिद्ध नहीं कर पाने में उसके सामने बहुत अधिक विवशताएं मानी जा सकती हैं , पर ग्रहों के प्रभाव को तो साबित कर ही सकता है , लेकिन उसे समझने के लिए वैज्ञानिकों के पास जो नजरिया होना चाहिए , वो नहीं होता। ज्‍योतिष जैसे विषय की बातचीत के क्रम में वे अपना वैज्ञानिक नजरिया तक भूल जाते हैं।


एक टी वी कार्यक्रम में प्रो यशपाल जी (विज्ञान में उनके महत्‍वपूर्ण योगदान के लिए मैं उनकी बहुत इज्‍जत करती हूं) का कहना था कि जीवनभर उन्‍हें ज्‍योतिषियो की आवश्‍यकता नहीं पडी , इसलिए उनका कोई महत्‍व नहीं है , ग्रहों के प्रभाव को वे नहीं मानते। एक वैज्ञानिक की इन बातों की तुलना मेरे गांव के उस वृद्धा से की जा सकती है , जो हमें सर्दी खांसी होने पर डॉक्‍टर के पास जाते देखकर हंसा करती थी और हमारे समझाने पर कहा करती थी कि इतनी लंबी उम्र में उन्‍हे डॉक्‍टर की कभी आवश्‍यकता नहीं पडी। अन्‍य वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ग्रहों के जितने प्रभाव को उन्‍होने ढूंढा है , उतने को ही वे मानते हैं , जब कोई और ढूंढा जाएगा तब फिर मानेंगे , अभी नहीं मान सकते। ये बात भी वैसी ही हास्‍यास्‍पद है , हमारे प्राचीन ज्ञान विज्ञान के कसौटी पर खरे उतरने के बाद भी उनके द्वारा ऐसी बाते कहा जाना विद्वता भरी भाषा तो नहीं कही जाएगी।


इस दुनिया में जो भी हो रहा है , किसी खास नियम के तहत् ही हो रहा है। प्रकृति में से हजारो लाखों करोडो नियम ढूंढे जा चुके और प्रतिदिन लाखों शोध इस बात को स्‍पष्‍ट कर रहे हैं कि इस दुनिया में कोई भी कार्य बिना नियम के नहीं होता है। एक एक बीज में निहित उर्जा जिस ढंग से पौधों , फूलों और और फलों के माध्‍यम से प्रस्‍फुटित होती है , उसे हम उसके बीज को देखकर पहले ही अनुमान लगा लेते हैं। पर कोई व्‍यक्ति अमीर के घर पैदा हुआ , कोई  गरीब के घर , कोई बडी आई क्‍यू के साथ इस दुनिया में आया और किसी में आई क्‍यू की कमी हुई , कोई सुखद पीरस्थितियों में जी रहा है तो कोई दुखद , किसी को दाम्‍पत्‍य का सुख , किसी को इससे कष्‍टकर समझौता या फिर किसी का जीवन साथी समझौते के भी काबिल नहीं। इन सारी बातों का हम अनुमान क्‍यूं नहीं लगा पाते ? क्‍या ये काम बिना नियम के हो रहे हैं ?


यदि हम ऐसा सोंचते हैं , तो यह भी हमारी अल्‍प बुद्धि ही मानी जाएगी । इस दुनिया में होनेवाली हर दुखद और सुखद घटनाओं को हम अपने कर्म से जोड देते हैं , जबकि कई जगहों पर हम कर्म से विपरीत फल की प्राप्ति होते देखते हैं। तब फिर हम इसे संयोग या दुर्योग से जोड देते हैं , अज्ञानता में और कर भी क्‍या सकते हैं ? लेकिन जब इस पूरी दुनिया में संयोग और दुर्योग का खेल कहीं देखने को नहीं मिलता , तो फिर हमारे जीवन में कैसे आ सकता है , जरूर इसके पीछे कुछ रहस्‍य है और बजाए इसे अस्‍वीकार करने के इसके रहस्‍य को ढूंढे जाने की आवश्‍यकता है । इस कार्य में सबका साथ बिल्‍कुल आवश्‍यक है , तभी बडे स्‍तर पर सफलता हाथ आ सकती है।




11 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

ज्‍योतिष जैसा पवित्र विषय भी बहुत सारे स्‍वार्थी लोगों के द्वारा अपने स्‍वार्थ की पूर्ति का एक साधन बन गया है
आपकी बातों से सहमत। बहुत ही तार्किक ढंग से विषय के विभिन्न पक्ष पर प्रकाश डाला गया है। आलेख पसंद आया।

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सत्य कथन,धन्यवाद.

महफूज़ अली ने कहा…

आज मन उदास है.... कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है...


इस दुनिया में सबकुछ नियम से होता है .. संयोग या दुर्योग कुछ नहीं होते !


इन पंक्तियों ने कुछ सहारा दिया.... बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट....



आभार.....

Kulwant Happy ने कहा…

हिन्दु धर्म ज्योतिषी विद्या को नहीं नकारा सकता, क्योंकि कंस अपनी बहन के बच्चों मुकता रहा, लेकिन अंतिम में सत्य क्या हुआ। ज्योतिषी की बात। सीता कहते हैं रावण की पुत्री थी, आखिर उसका विनाश भी वैसे ही हुआ, जैसे ज्योतिषों ने कहा, पन्नू की सस्सी और महीवाल की सोहनी इसके पुख्ता परिणाम हैं। मैं खुद भी, बेशक में विश्वास नहीं करता, लेकिन फिर भी जो जाने अनजाने में मुझे ज्योतिषों ने बताया वो सत्य हो रहा है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

नियम के बारे में तो मैं भी सहमत हूं. कोई न कोई प्रायिकता, क्रमचय-संचय लागू अवश्य होता है, लेकिन कैसे होता है इसका खोजा जाना बाकी है.

sangeeta swarup ने कहा…

जब तक अज्ञान की स्थिति रहती है भ्रम बना रहता है...लेकिन ज्योतिष विद्या को नकारना उचित नहीं है...मुझे तो हमेशा से यही लगता है की सब पूर्वनिश्चित होता है...हम प्रयत्न करते हैं लेकिन ज़रूरी नहीं है कि फल मिले...मैं इस बात को हमेशा याद रखती हूँ----- समय से पहले और भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता ...

आपका लेख पसन् आया..शुक्रिया

वन्दना ने कहा…

achcha lekh likha hai.

अन्तर सोहिल ने कहा…

"इस दुनिया में सबकुछ नियम से होता है"
सहमत हूं जी आप की बात से

प्रणाम

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत बढ़िया सार्थक लेख!

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

गणतन्त्र-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

ab inconvenienti ने कहा…

इसके कारण आज के युग के हर विज्ञान के समानांतर इसमें अध्‍ययन नहीं हो पा रहा, एक तो यहां सच्‍चे अध्‍येताओं की कमी भी है

आज तो हर घर में विज्ञान, कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में शिक्षित लोग मिल जायेंगे, और नब्बे प्रतिशत से अधिक हिन्दू ज्योतिष पर विश्वास करते हैं. पर आश्चर्य की कोई रिसर्च करने आगे नहीं आता? क्यों भला?

कोई तर्क हो तो रिसर्च भी करें, जैसे भूत-प्रेत, ईश्वर, देव दानव जैसी अतार्किक बातों का अस्तित्व प्रमाणित करने के लिए कोई रिसर्च नहीं करता, ज्योतिष के लिए भी कोई आगे नहीं आता. मैंने कितने ही इंजीनियरों को ज्योतिष में विश्वास रखते देखा है पर कोई इंजिनियर ज्योतिष को सटीक बनाने के लिए रिसर्च नहीं करता? क्यों?

संगीता पुरी ने कहा…

ab inconvenienti जी,

ज्‍योतिष में वो रिसर्च इसलिए नहीं करते , क्‍यूंकि उसकी रिसर्च को पहचान नहीं मिल सकती .. इस दुनिया में बाकी लोग तो ज्‍योतिष के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं !!