बुधवार, 14 अप्रैल 2010

इतने बडे ज्‍योतिषीय योग में भी बारिश नहीं होने का कारण मैं बढते हुए प्राकृतिक असंतुलन को मानती हूं !!

कल के पोस्‍ट में अपनी बात पाठकों को शायद मैं नहीं समझा सकी थी , इसलिए आज इसे पोस्‍ट कर रही हूं । भारतवर्ष में अधिक गर्मी के दिनों में भी समय समय पर बारिश होती है , पर तबतक तापमान में कमी नहीं आती , जबतक बारिश का कोई बडा योग उपस्थित नहीं होता है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार भारतवर्ष में गर्मी के दिनों में सामान्‍यतया दो बार ग्रहों की ऐसी खास स्थितियां बनती हैं , जो मौसम को प्रभावित करती हैं। 7 से 12 अप्रैल तक मौसम को प्रभावित करनेवाले ऐसे ही ग्रहयोग को देखते हुए ही मैने भारतवर्ष के मैदानी भागों में बडे स्‍तर पर बारिश के योग और उसके कारण तापमान में कमी आने की भविष्‍यवाणी की थी। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार यह एक सटीक योग था , जो पूरे विश्‍व के अधिकांश देशों में यत्र तत्र बारिश करवाने में जबाबदेह था , जिसके कारण जिन देशों में बरसात का मौसम हो , वहां बाढ का आना , जिन देशों में ठंड का दिन हो , वहां ठंड का बढना और जिन देशों में गर्मी का दिन हो , वहां तापमान में कमी से राहत आनी थी। अब पूरे विश्‍व में बीते सप्‍ताह क्‍या स्थिति रही , वो तो पूरे विश्‍व के ब्‍लॉगर बंधु ही बता सकते हैं , लेकिन ठीक 6 अप्रैल से 12 अप्रैल तक ब्राजील में ऐतिहासिक बाढ की चर्चा समाचार पत्रों में अवश्‍य पढने को मिली। पर मैने भारत वर्ष के लिए जो भविष्‍यवाणी की , वह सही नहीं हुई। (मैं इसे स्‍वीकार कर रही हूं , यह न कहा जाए कि ज्‍योतिषी अपनी गल्‍ती नहीं स्‍वीकारते।)

मौसम को प्रभावित करनेवाले 40 वर्षों से जांचे गए इतने बडे ग्रह योग में भी भारतवर्ष के मैदानी भागों में बारिश नहीं होने का कारण मैं बढते हुए प्राकृतिक असंतुलन को मानती हूं , पिछले वर्ष भी ऐसे ग्रहयोग में कम वर्षा होते देख मैने इस बात की चर्चा की थी। यदि आप इसे जबर्दस्‍ती की दलील मान रहे हों , तो मान सकते हैं , पर मैं ग्रह को ही सबकुछ नहीं मानती, कर्मफल भी तो लोगों को मिलना है (कर्मफल पर मेरा ग्रहों से कम विश्‍वास नहीं)। और यदि मेरी यह दलील सही है कि सचमुच ऐसा कर्मफल से ही हुआ और पर्यावरण को पहुंचे नुकसान की वजह से बारिश नहीं हो रही , तो फिर तबतक बडे स्‍तर पर बारिश नहीं होनी चाहिए , जबतक ग्रहों का वैसा ही दूसरा योग न आ जाए। जैसा कि मैने 29 मार्च के पोस्‍ट में ही लिखा था कि ग्रहों की वैसी स्थिति तो 18 मई के आसपास ही पुन: आ सकती है, क्‍यूंकि इससे पहले 29 अप्रैल तक का ग्रहयोग तो विश्‍वभर में सिर्फ उन्‍हीं स्‍थानों में बारिश कर तनाव उपस्थित करानेवाला है , जहां बरसात का मौसम चल रहा हो या फिर ठंड , कम से कम राहतवाले स्‍थान पर तो यह आनेवाला नहीं, क्‍यंकि मैने अपने आलेख में लिखा था कि 29 अप्रैल तक भारत में गर्मी अपनी चरम सीमा पर रहेगी। जाहिर है , भारत में बारिश होगी भी तो इतनी कम कि गर्मी घटे नहीं , बढ ही जाए, लोगों का कष्‍ट कमें नहीं , बढे ही।

इस तरह 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की प्रामाणिकता में तभी संदेह किया जाना चाहिए, जब 6 अप्रैल और 18 मई के अलावे भी किसी दिन बारिश होती है या फिर जब 18 मई के आसपास के सप्‍ताह में पुन: पूरे विश्‍व में अधिकांश जगहों पर मौसम खराब होते न देखा जाए, खासकर जहां बरसात का मौसम हो , वहां बाढ आने की स्थिति तक , जहां जाडे का मौसम हो , वहां बडी मात्रा में बर्फबारी तक तथा जहां भीषण गर्मी हो , वहां सुहावना मौसम लाने तक की स्थिति बननी चाहिए। मैं जब भी मौसम या शेयर बाजार से जुडी चर्चा करती हूं , तो वो एक खास ग्रहीय आधार को लेते हुए उसे तिथि के साथ संयुक्‍त करके करती हूं , ऐसा तुक्‍का नहीं लगाया जा सकता। पर मेरी सारी बातों को गौर करने के बजाय , समझने के बजाए कोई व्‍यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त हो प्रतिक्रियावादी बनकर 'ज्‍योतिष' को तुरंत अंधविश्‍वास कह दे , तो यह गलत हैं!

आई आई टी के प्रवेश परीक्षा का उदाहरण देते हुए मैं यह स्‍पष्‍ट करना चाह रही थी कि गल्‍ती विज्ञान के क्षेत्र में भी लोगों से होती है, ज्‍योतिष जैसे विषय को तो उपेक्षित ही छोडा गया हजारो वर्षों से , सो गल्‍ती होना स्‍वाभाविक है। जहां एक ओर पर्याप्‍त सुविधाओं के अभाव में ज्‍योति‍षियों के द्वारा भविष्‍यवाणी करने में गल्‍ती हो सकती है , वहीं जिनके लिए भविष्‍यवाणियां की जाएं , उनकी कार्यशैली का भी दोष भविष्‍यवाणी को गलत बनाने के लिए जबाबदेह होता है। व्‍यक्तिगत मामलों में भी मैं भी तो ग्रहयोग देखकर ही लोगों को सलाह दिया करती हूं , बुरा कुछ भी होना हो , वह प्रकृति की ओर से भले ही हो जाए , पर अच्‍छे फल प्राप्‍त करने के लिए 'उद्यमेन ही सिद्धंति कार्य:'।  इस प्रकार ग्रह और कर्म दोनो का महत्‍व हो जाता है।

जैसा कि पिछले आलेख में मैने बताया कि तीन चार दिनों तक डॉक्‍टर की दवा खाने के बाद तबियत ठीक न होने पर एक व्‍यक्ति झाडफूंक वाले के पास इसलिए जाता है क्‍यूंकि वह डॉक्‍टर को भगवान मानता है , झाडफूंक वाले को भगवान मानता है , यदि वह उसे सामान्‍य मनुष्‍य समझे , डॉक्‍टरी को पेशा समझे , तो अवश्‍य उसकी सारी बातों को तार्किक ढंग से सुनना चाहेगा। हम इस दृष्टि से देखते हैं तो हमें मालूम है कि डॉक्‍टर एक खास प्रक्रिया के अनुसार ही इलाज कर सकता है, इसलिए उसकी कमी बेशी को स्‍वीकार करते हैं। यही बात ज्‍योतिष के मामलों में भी आजतक होती आयी है। मैने इतने दिनों के अध्‍ययन में पाया है कि हमारी प्रवृत्ति और परिस्थितियां ग्रहों के द्वारा नियंत्रित होती हैं , पर सारे रहस्‍यों की जानकारी न होने से कभी कभार गल्‍ती तो होगी ही। यदि मुझे अध्‍ययेता समझे तो आप मेरी गल्‍ती को माफ कर सकते हैं , पर ज्‍योतिष को दैवी विषय बना दें , मुझे भगवान बना दे , तो  मेरी गल्‍ती नहीं माफ कर सकेंगे।

प्राचीन काल से अबतक ज्‍योतिष पर बिना किसी नियंत्रण के इतनी पुस्‍तके आती गयी , इसमें कौन से तत्‍व सही हैं और कौन से गलत , इसका आकलन भी कर पाना कठिन हैं। सबने अपने को ज्ञानी मानते हुए पुस्‍तके लिख दी है , इतने सारे नियमों को समझ पाना , सब नियमों का एक दूसरे से तालमेल बिठा पाना बहुत कठिन हो जाता है , यहां तक कि कंप्‍यूटर भी तालमेल नहीं बिठा पाता ,भविष्‍यवाणी करने में कठिनाई तो आएगी ही। पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इसे विज्ञान बनाने की बहुत कोशिश की है , आगे भी हमारी कोशिश ऐसे ही जारी रहेगी , पर पाठकों को पूर्वाग्रह से मुक्‍त होकर इसे पढना होगा। ज्‍योतिष को विकासशील से विकसित बनने में समय तो लगेगा , इससे भला कैसे इंकार किया जा सकता है।

13 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

ho sakata hai ...

sangeeta swarup ने कहा…

जहाँ बात संभावनाओं की होती है वहाँ विवाद होना संभावी है...आपका कार्य नि:संदेह प्रशसनीय है...आगे भी ऐसी जानकारी मिलती रहेगी....

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…
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निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

न तो कल कुछ खास समझ में आया और न ही आज आया!
इतनी माथापच्ची करने से तो अच्छा है कि ये कह दें - "सब अंधविश्वास है".
लेकिन आप इतनी महनत करती हैं तो इच्छा होती है कि ज़रा समझने का प्रयास करें. हो सकता है कुछ देर से ही सही लेकिन समझ में आने लगे.

Jandunia ने कहा…

ये असंतुलन कैसे दूर होगा

मनोज कुमार ने कहा…

आपका कार्य नि:संदेह प्रशसनीय है! हमें तो विश्वास है और आलेख रोचक लगा!

संगीता पुरी ने कहा…

निशांत मिश्र जी .. आपको इतनी दया दिखलाते हुए मेरे पोस्‍टों को पढने की आवश्‍यकता नहीं .. सिर्फ इसलिए कि मैं मेहनत करती हूं .. आप शौक से इसे अंधविश्‍वास कह सकते हैं .. मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

आज कहीं बारिश तो हुई है...

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

भयंकर गर्मी शुरू है,बारिश के संकेत जल्द न मिलने से स्थिति वाकई चिंतनीय है.

विष्णु बैरागी ने कहा…

क्षमा करें। आप स्थितियों को अपनी अनुकूलता से परिभाषित करती लग रही हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

संगीता जी!
आपकी बात 100 प्रतिशत सही है!

संगीता पुरी ने कहा…

भारतीय नागरिक जी,
बारिश तो कहीं हुई है .. पर मेरे दिए गए समय में होने से वो सुखद होती .. बाद में होने से वो कष्‍टकर हो गयी है .. जैसा कि मैने इस आलेख में लिखा भी है !!

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

जी हां द वेदर मेकर्स पढ़ना बहुत अप्रतिम अनुभव है।