शुक्रवार, 11 जून 2010

जन जन तक ज्‍योतिष के ज्ञान को ले जाने का प्रयास - 1








मेरे द्वारा पत्र पत्रिकाओं में ज्‍योतिष से संबंधित जितने भी लेख छपे , वो सामान्‍य पाठकों के लिए न होकर ज्‍योतिषियों के लिए थे। यहां तक कि मेरी पुस्‍तक भी उन पाठकों के लिए थी , जो पहले से ज्‍योतिष का ज्ञान रखते थे।यही कारण है कि मैं ब्‍लॉग के पाठकों के लिए जनोपयोगी लेख जलखा करती हूं। इधर कुछ वर्षों से ज्‍योतिष में प्रवेश करने के लिए एक पुस्‍तक की मांग बहुत पाठकों द्वारा की जा रही है , क्‍यूंकि इसके बिना वे मेरी पुरानी पुस्‍तक को समझने में समर्थ नहीं हैं। वैसे तो ज्‍योतिष में प्रवेश करने के लिए बाजार में पुस्‍तकों की कमी नहीं , जिसका रेफरेंस मैं अपने पाठकों को देती आ रही हूं , पर अधिक वैज्ञानिक ढंग से पाठकों को ज्‍योतिष की जानकारी दी जा सके , इसलिए मैं इस ब्‍लॉग में खेल खेल में वैज्ञानिक ढंग से ज्‍योतिष की जानकारी देने का प्रयास रही हूं , आप सबों का साथ मिले तो मेरा प्रयास अवश्‍य सफल होगा।

हमारे लिए हमारी यह धरती कितनी भी बडी क्‍यूं न हो , पर इतने बडे ब्रह्मांड में इसकी स्थिति एक विंदू से अधिक नहीं है और इसके चारो ओर फैला है विस्‍तृत आसमान। हमारे ऋषि महर्षियों ने पृथ्‍वी को एक विंदू के रूप में मानते हुए 360 डिग्री में फैले आसमान को 30-30 डिग्री के 12 भागों में बांटा था। इन्‍ही 12 भागों को राशि कहा जाता है , जिनका नामकरण मेष , वृष , मिथुन , कर्क , सिंह , कन्‍या , तुला , वृश्चिक , धनु , मकर , कुंभ और मीन के रूप में किया गया है। यह ज्‍योतिष का एक मुख्‍य आधार है और इन्‍हीं राशियों तथा उनमें अनंत की दूरी तक स्थित ग्रहों के आधार पर ज्‍योतिष के सिद्धांतों की सहायता से भविष्‍यवाणियां की जाती है।

पर हमेशा से ही ज्‍योतिष विरोधी ज्‍योतिष के इस मुख्‍य आधार को ही गलत सिद्ध करने की चेष्‍टा करते हैं। उनका मानना है कि ज्‍योतिष पृथ्‍वी को अचल मानते हुए अपना अध्‍ययन शुरू करता है , जबकि पृथ्‍वी सूर्य के चारो ओर चक्‍कर लगाती है। विरोधी यह मानने की भूल करते हैं कि फलित ज्‍योतिष का विकास उस वक्‍त हुआ , जब लोगों को यह मालूम था कि पृथ्‍वी स्थिर है और सूर्य तथा अन्‍य तारे उसके चारो ओर चक्‍कर लगाती है। हमारे ऋषि मुनियों पर यह इल्‍जाम लगाना बिल्‍कुल गलत है कि उन्‍हे सत्‍य की जानकारी नहीं थी। जब उनके द्वारा विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर विभिन्‍न ग्रहों और खगोलिय स्थिति का एक एक घटी पल निकालना संभव हो चुका है , तब उनके बारे में कोई पूर्वाग्रह पालना उचित नहीं।

इस विषय पर मेरे अपने कुछ तर्क हैं। हमारी अपनी नजर या दृष्टि हमारे शरीर को स्थिर मानकर ही आसपास की परिस्थितियों या दृश्‍यों का अवलोकण करती है, चाहे हमारा शरीर गतिशील ही क्‍यूं न हो। हम सडक पर किसी के साथ चल रहे हों और उसकी गति अधिक हो जाए तो हम अपने को पीछे मानने लगते हैं , यह जानते हुए कि हम पीछे नहीं हैं, अपने घर से काफी आगे बढ चुके हैं। विपरीत स्थिति में हम उसे पीछे मानेंगे , इसका अर्थ यह है कि हम अपने शरीर को स्थिर मानते हुए ही आसपास का जायजा लेते हैं। इसलिए तो भौतिक विज्ञान में भी सापेक्षिक गति की अवधारणा है।

किसी भी वस्‍तु की सापेक्षिक गति हमारी इसी सोंच का परिणाम है। इसी प्रकार हम गाडी में बैठे हों तो न सिर्फ पेड पौघों को गतिशील देख आश्‍चर्यित होते हैं , वरन् यह भी कह बैते हैं कि ‘अमुक शहर , अमुक गांव या अमुक मुहल्‍ला आ गया’, जबकि वो शहर , गांव या मुहल्‍लावहां पहले से होता है। इसी नियम के तहत् जब हमें ब्रह्मांड और आकाश में बिखरे अगणित तारों का अध्‍ययन करना होता है , तो हम पृथ्‍वी को स्थिर और आसमान के सभी राशियों और ग्रहों तारों को गतिशील मान लेते हैं , जो अज्ञानता नहीं मानी जा सकती है।

16 टिप्‍पणियां:

Darshan Lal Baweja ने कहा…

माफ करना
विज्ञान को बेचना
या विज्ञान के सहारे कुछ परोसना नहीं नहीं धकेलना आज का रिवाज बना है
आप का ढंग वैज्ञानिक है न कि दृष्टिकोण

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अभी तो भूमिका ही है....अच्छा प्रयास है...खेल खेल में कुछ सीख पाने का....रोचक.

आचार्य जी ने कहा…

आईये पढें ... अमृत वाणी !

डॉ टी एस दराल ने कहा…

अच्छा प्रयास है । जारी रखें ।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

Aapka Trak pasand aayaa !

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

आपके तर्कों से सहमत हूँ ...आभार

कुमार राधारमण ने कहा…

Is this the beginning of a series?If yes,kindly make a separate LABEL for this series so that one could find all posts in a single click.Nice effort anyway.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

प्रतीक्षा है नई सीरीज की..

aarya ने कहा…

सादर वन्दे !
हमें इंतजार रहेगा उन जानकारियों का जिनसे हम या तो अनभिज्ञ हैं या गलत जानते हैं |
रत्नेश त्रिपाठी

महेश कुमार वर्मा : Mahesh Kumar Verma ने कहा…

ज्योतिष-शास्त्र के सिद्धांत को समझाने का नयी श्रृंखला प्रारंभ करने के लिए धन्यवाद. आशा है पाठक सापेक्षिक गति की बात को अच्छी तरह समझ गए होंगे. अपने श्रंखला में आप जिज्ञासावश पाठकों द्वारा आए पूरक प्रश्न व उनके उत्तर को भी शामिल करने की कृपा करेंगे. साथ ही मैं पाठकों से भी आग्रह करूँगा कि जब संगीता जी अब सिखाने के बात पर आ गयी है तो मन में उठने वाले हरेक प्रश्न को बेहिचक पूछें ठीक उसी तरह जिस प्रकार एक विद्यार्थी अपने शिक्षक से पूछता है. संगीता जी से आशा करूँगा कि वे सबों के प्रश्नों व शंकाओं का समाधान अच्छी तरह करेंगे.
शुभकामनाओं के साथ.

आपका
महेश

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मेरी भी शुभकामनाएँ स्वीकार करें!

ललित शर्मा ने कहा…

बेहतरीन आलेख

आभार

ब्लाग4 वार्ता प्रिंट मीडिया पर प्रति सोमवार

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

कृपया इस कक्षा के लिए दिन नियत करें जैसे ताऊ पहेली शनिवार को आती है |

vinay ने कहा…

अच्छा है,कुछ सीखने को मिलेगा ।

नीरज जाट जी ने कहा…

संगीता जी, अब फ़िर विरोधियों के कान खडे होने लगेंगे।
आज तो बिल्कुल ऐसा लगा कि हम किसी विज्ञान की कक्षा में बैठे हैं।
बहुत अच्छे।

हिमान्शु मोहन ने कहा…

प्रशंसनीय प्रयास