रविवार, 13 जून 2010

जन जन तक ज्‍योतिष के ज्ञान को ले जाने का प्रयास - 3

आज एक बार फिर से शीर्षक में परिवर्तन करते हुए पिछली कडी को आगे बढा रही हूं। हमारा सामना अक्‍सर कुछ वैसे लोगों से होता है , जो ऐसे तो कभी ग्रहों या ज्‍योतिष पर विश्‍वास नहीं करते , पर जब कभी लंबे समय तक चलने वाली किसी विपत्ति में फंसते हैं , ज्‍योतिष पर अंधविश्‍वास ही करने लगते हैं। ऐसी हालत में उनकी परेशानियां दुगुनी तिगुणी बढने लगती है ,अपनी समस्‍याओं में त्‍वरित सुधार लाने के लिए वे उस समय हम जैसों की अच्‍छी सलाह भी नहीं मानते। ज्ञान हर प्रकार के भ्रम का उन्‍मूलन करती है , ज्‍योतिष को जानने के बाद आप स्‍वयं सही निर्णय ले सकते हैं। यही सोंचकर मै अधिक से अधिक लोगों को खेल खेल में ज्‍योतिष सीखलाने की बात सोंच रही हूं , आप सबों का सहयोग मुझे अवश्‍य सफलता देगा।


पिछले लेखमाला में हमने सीखा कि ज्‍योतिष में पृथ्‍वी के सापेक्ष पूरे भचक्र का अवलोकण किया जाता है , साथ ही सूर्य के उदाहरण से समझने में सफलता मिली कि विभिन्‍न पिंड पृथ्‍वी सापेक्ष अपनी स्थिति के अनुरूप ही पृथ्‍वी पर प्रभाव डालते हैं। पहले ही लेख में चर्चा की गयी है कि पृथ्‍वी को स्थिर मानकर पूरे आसमान के 360 डिग्री को 12 भागों में बांटने से 30 - 30 डिग्री की 12 राशियां बनती है। आमान के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक को मेष , 30 डिग्री से 60 डिग्री तक को वृष , 60 डिग्री से 90 डिग्री तक को मिथुन , 90 डिग्री से 120 डिग्री तक को कर्क , 120 डिग्री से 150 डिग्री तक को सिंह , 150 से 180 डिग्री तक को कन्‍या , 180 से 210 डिग्री तक को तुला , 210 से 240 डिग्री तक को वृश्चिक , 240 से 270 डिग्री तक को धनु , 270 डिग्री से 300 डिग्री तक को मकर , 300 से 330 डिग्री तक को कुंभ तथा 330 से 360 डिग्री तक को मीन कहा जाता है।
 
हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के 0 डिग्री एक आधार को लेकर निश्चित किया गया था , पर कुछ ज्‍योतिष विरोधी हमारे ऋषि महर्षियों द्वारा आसमान के अध्‍ययन के लिए किए गए इस विभाजन को भी अवास्‍तविक मानते हैं , पर मेरे अनुसार यह विभाजन ठीक उसी प्रकार किया गया है , जिस प्रकार पृथ्‍वी के अध्‍ययन के लिए हमने आक्षांस और देशांतर रेखाएं खींची हैं। जिस प्रकार भूमध्‍य रेखा से ही 0 डिग्री की गणना की जानी सटीक है तथा देशांतर रेखाओं  की शुरूआत और अंत दोनो ध्रुवों पर करना आवश्‍यक है , उसी प्रकार आसमान में किसी खास विंदू से 0 डिग्री शुरू कर चारो ओर घुमाते हुए 360 डिग्री तक पहुंचाया गया है , हालांकि यह विंदू भी ज्‍योतिष में विवादास्‍पद बना हुआ है , जिसका कोई औचित्‍य नहीं। पृथ्‍वी की घूर्णन गति के कारण 24 घंटों में ये बारहों राशियां पूरब से उदित होती हुई पश्चिम में अस्‍त होती जाती है।
 
यूं तो ये बारहों राशियां और इनमें स्थित ग्रह हमारे लिए महत्‍वपूर्ण हैं , पर तीन राशियां सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण होती हैं। पहली, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय सूर्य होता है , वो उसकी सूर्य राशि कहलाती है। दूसरी, जिस राशि में बालक के जन्‍म के समय चंद्रमा होता है , वो उसकी चंद्र राशि कहलाती है। तीसरी, जिस राशि का उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता है, वह बालक की लग्‍न राशि कलाती है। एक महीने तक सूर्य एक ही राशि में होता है , इसलिए एक महीने के अंदर जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक सूर्य राशि में आ जाते हैं। ढाई दिनों तक चंद्रमा एक ही राशि में होता है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी लोग एक ही चंद्र राशि में आते हैं। दो घंटे तक एक ही लग्‍न उदित होती रहती है , इस दौरान जन्‍म लेने वाले सभी बच्‍चे एक ही लग्‍न राशि में आ जाते हैं।

21 टिप्‍पणियां:

Kajal Kumar ने कहा…

सही बात है विपत्तियों में फंसने वाले ही ज्योतिष पर विश्वास व अविश्वास करते हैं. वाक़ियों का काम यूं भी चल ही जाता है :)

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी है संगीता जी बधाई और शुभकामनायें इस शुभकाम के लिये।

संगीता पुरी ने कहा…

पर काजल जी .. कोई ये बता सकता है कि वो जीवन में कभी विपत्ति में नहीं फंसेगा .. इसलिए पहले ही ग्रहों के प्रभाव दुष्‍प्रभाव को अच्‍छी तरह समझ ले .. तो कम से कम व्‍यर्थ के तनाव और भटकाव से तो बच जाएगा .. प्रकृति के नियमों को समझ लेना ही तो ज्ञान है !!

sanu shukla ने कहा…

umda jankari ke liye dhanywad

वाणी गीत ने कहा…

विपत्ति पड़ने पर नास्तिकों को भी आस्तिक बनते देखा है ..सही कहा है आपने ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस सुन्दर अभियान के लिए शुभकामनाएँ!

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

कभी मैं भी ज्योतिष पर भरोसा नहीं करता था पर हमारे एक मित्र ने ज्योतिष सीख कर हमें अपनी ज्योतिषीय गणनाओं के सहारे कई सारी सही बातें बताकर ज्योतिष पर भरोसा करने को विवश कर दिया |
उनके द्वारा गणना कर एक बच्चे के स्वास्थ्य के बारे में बताई सही बातों को जल्द ही एक पोस्ट के माध्यम से सबके सामने लाऊंगा |

फ़िलहाल तो आपकी इस कक्षा में ज्ञान वर्धन कर रहे है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

वैसे भी विपत्ति में सोच समझ की शक्ति जवाब दे जाती है।

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी है शुभकामनायें इस शुभकाम के लिये।

hem pandey ने कहा…

एक बहुत अच्छी लेखमाला के प्रारम्भ करने हेतु साधुवाद. अभी तक का वर्णन सरल और बोधगम्य है. आशा है भविष्य में इस शंका का समाधान होगा कि एक ही समय में एक ही स्थान पर पैदा हुए जातकों की कुण्डली और भविष्य एक जैसा होगा कि नहीं.

सतीश सक्सेना ने कहा…

रुचिकर है संगीता जी !

vinay ने कहा…

सरल रूप से समझाया गया ज्योतिष,अच्छा लगा,बालक की सुर्य,चन्द्र और लग्न राशि का ग्यान तो मिला इसी सन्द्रभ में एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ,जैसे पारम्परिक ज्योतिष के बारे में कहा जाता है,यह चन्द्रमाँ की गति पर आधारित है,और अगंरेजी ज्योतिष सुर्य पर आधारित है,क्या गत्यातम्क ज्योतिष दोनो पर आधारित है? आपके लेख के अनुसार जो मुझे समझ में आया यह सभी ग्रहो की चाल पर आधारित है,क्या मेने सही समझा?
धन्यवाद ।

संगीता पुरी ने कहा…

विनय जी .. चाहे कोई भी ज्‍योतिष हो .. सभी ग्रहों की गति का महत्‍व है .. सिर्फ राशि के मामलों में महत्‍व कम या अधिक आंका जाता है .. जैसे कि पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषी सूर्य राशि को महत्‍व देते हैं .. परंपरागत ज्‍योतिषी चंद्र राशि को .. वैसे गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष लग्‍न राशि को अधिक महत्‍व देता है !!

vinay ने कहा…

धन्यवाद संगीता जी,अब आपके आगामी आलेख की प्रतिक्षा है ।

माधव ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी है संगीता जी बधाई और शुभकामनायें

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया तरीके से समझाया है..आभार.

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

ज्योतिष एक सूक्ष्म विग्यान है। सहज नही है समझना । अच्छा प्रयास है आपका। लोगों को इससे अवगत कराने का।

Darshan Lal Baweja ने कहा…

मे ना मानू चाहे लाठ बजा ल्यो जी
सूर्य व चन्द्र दोनों ग्रह है ??

राहू ने सूर्य को खा लिया
फिर तो मेरी भैंस ने कल चंद्रमा को खा लिया

संगीता पुरी ने कहा…

दर्शन लाल जी,
फलित ज्‍योतिष में पृथ्‍वी के जड चेतन को प्रभावित करने वाले पिंडों का नाम ग्रह है .. एक ही शब्‍द को अलग अलग जगहों पर अलग अलग अर्थ में प्रयोग किया जाता है .. इसमें कुछ भी गलत नहीं .. और यहां गाणितिक ढंग से ज्‍योतिष की व्‍याख्‍या की जा रही है .. मैने कहां लिखा है कि राहू ने सूर्य को खा लिया .. प्राचीन ज्‍योतिषियों को भी मालूम था कि सूर्य और चंद्र को राहू नहीं खाता है .. तभी तो ग्रहण का पूरा समय वो निकाल पाते थे .. कालांतर में समाज में फैली कई भ्रांतियों को ज्‍योतिष में घालमेल कर दिया .. और उसे ही ज्‍योतिष की सच्‍चाई मान ली गयी .. आप पूर्वाग्रह से मुक्‍त होकर मेरे आलेखों को पढे और तर्कसम्‍मत बातें करें .. मैं आपके हर प्रश्‍न का उत्‍तर देने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करूंगी .. यूं ही हंसनेवालों को मैं क्‍या समझा सकती हूं ??

yogesh pandey ने कहा…

आपकी जानकारी सराहनीय है

yogesh pandey ने कहा…

सराहनीय