बुधवार, 14 जुलाई 2010

आसमान में शुक्र हमेशा क्‍यूं नहीं दिखाई देता ??

11 जुलाई को ललित शर्मा जी ने एक पोस्‍ट लगायी थी , जिसमें एक चित्र दिखाकर पूछा था कि हमने इस तारे की फ़ोटो ली, आप देख कर बताईए कि कौन सा तारा हो सकता है? हालांकि उस चित्र में तो स्‍पष्‍ट तौर पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था , फिर भी मैं समझ गयी कि यह शुक्र ही हो सकता है। मैने उसमें टिप्‍पणी की ...

सूर्य की परिक्रमा करने के क्रम में शुक्र जब सूर्य से नीचे और ऊपर होता है .. तो सालभर यह पृथ्‍वी से दिखाई नहीं देता .. पर जब वह पृथ्‍वी के बाएं हो जाता है .. तो सूर्यास्‍त के बाद पश्चिम में चमक बिखेरता है .. और जब दाएं हो जाता है तो सूर्योदय के पहले पूरब में भी चमकता है .. अभी वह पश्चिम में चमक रहा है .. इसकी चमक अभी अक्‍तूबर तक बढती चली जाएगी .. क्‍यूंकि वह पृथ्‍वी के निकट आने की दिशा में प्रवृत्‍त है .. दिसंबर से वह पूरब दिशा में चमकेगा .. क्‍यूंकि वहां से वह पृथ्‍वी से दूर होता जाएगा .. मार्च तक इसकी चमक क्रमश: कम होती जाएगी और धीरे धीरे सूर्य की चमक में इसकी चमक खो जाएगी !!


इससे पहले भी मै शुक्र की ऐसी ही स्थिति में चंद्रमा के साथ युति होने की एडवांस में खबर और उसके पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव की जानकारी देते हुए एक पोस्‍ट लिख चुकी हूं ।

दिनेश राय द्विवेदी जी को मेरी बात समझ में नहीं आयी , उन्‍होने टिप्‍पणी में लिखा ....

संगीता जी की उपरोक्त बात समझ नहीं आती है। शुक्र जब दृश्य में सूर्य के अत्यंत नजदीक आता है तो केवल 20 दिन के लगभग दिखाई नहीं देता तब हम उसे अस्त कहते हैं। यदि वह पश्चिम में अस्त होता है तो 20-22 दिन बाद पूरब में और पूरब में अस्त होने पर इतने ही दिन बाद पश्चिम में दिखाई देने लगता है। वे जो ऊपर-नीचे और दाएँ-बाएँ बता रही हैं उन का क्या अर्थ है यह तो वे ही बता सकती हैं।

वास्‍तव में ज्‍ज्‍योतिष का ज्ञान परंपरागत रूप से इस ढंग से हमारे पास आ रहा होता है कि हम सामान्‍य सी आकाशीय घटना को भी नहीं समझ पाते हैं , यही कारण है कि 'सीखें गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में मैं जन्‍मकुंडली के माध्‍यम से पूरे आकाशीय स्थिति को सिखलाने की कोशिश कर रही हूं। ललित जी के पोस्‍ट पर टिप्‍पणी के रूप में इसे समझाना आसान न था , इसलिए आसमान में शुक्र के पथ ABCD को दर्शाते हुए एक चित्र भी साथ पोस्‍ट कर रही हूं.....


जब हम पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए सूर्य की गति को प्रतिदिन एक डिग्री बढाते हुए देखते हैं , तो उसके साथ साथ शुक्र भी उसके सापेक्षिक गति के साथ आगे बढता जाता है। सूर्य की परिक्रमा करता हुआ वह अपने पथ में कहीं भी हो सकता है , अधिकांश समय सालभर नहीं तो कम से कम आठ दस महीने यह D विंदू के पास होता है , इसलिए वह पृथ्‍वी से दूर तो होता ही है , सूर्योदय के साथ उदित और सूर्यास्‍त के साथ अस्‍त होता है , इस कारण इसे आसमान में नहीं देखा जा सकता। थोडे दिन यह B विंदु के आसपास होता है , जब भले ही पृथ्‍वी के निकट होता है , पर तब भी पृथ्‍वी से देखने पर वह सूर्य की सीध में होता है , इसलिए सूर्य की चमक से इसे नहीं देखा जा सकता , यहां तक कि उन विंदुओं से थोडे अगल बगल होने पर भी उन्‍हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता , पर जब वह दाएं A विंदु के आसपास होता है तो उसके उदय के थोडी देर बाद सूर्योदय होता है , इस कारण इसे भोर में देखा जा सकता है , पर जब वह बाएं C विंदू के आसपास होता है तो सूर्यास्‍त के थोडी देर बाद तक आसमान में होता है और इसे देखा जा सकता है। दोनो ही बार ऐसा समय तीन चार महीनों के लिए आता है । आशा है , द्विवेदी जी के साथ साथ अन्‍य पाठकों की भी शंका दूर हो गयी होगी।

17 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको गर्ह-नक्षत्रों का खासा ज्ञान है!

संगीता पुरी ने कहा…

शीर्षक डालने के पहले ही यह पोस्‍ट पोस्‍ट हो गयी .. और लेख की पहली पंक्ति शीर्षक बन गयी .. अब सुधारने से भी कोई फर्क नहीं पड रहा ..

ललित शर्मा ने कहा…

आपकी वजह से हमारा भी नक्षत्र ज्ञान समृद्ध हो रहा है। आपने ग्रह की स्थिति स्पष्ट कर दी है। आशा है कि द्विवेदी जी की भी शंका का समाधान हो गया होगा।

राज भाटिय़ा ने कहा…

अजी हम तो हां जी हां जी कहने वालो मै है, हमे इस बारे´कुछ नही पता, लेकिन अब सही जानकारी मिल गई. धन्यवाद

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत अच्छा स्पष्ट किया है आपने ।
सच है हम भी ज्यादा कुछ नहीं जानते इस बारे में ।
आभार ।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी
और उपयोगी भी
आपके समझाने का ढंग भी निराला है।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

vinay ने कहा…

धन्यवाद संगीता जी,बहुत अच्छे प्रकार से समझाया ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कुछ कुछ समझने का प्रयास किया है..अच्छी जानकारी

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

एक सार्थक पोस्ट, बधाई।
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पॉल बाबा की जादुई शक्ति के राज़।
सावधान, आपकी प्रोफाइल आपके कमेंट्स खा रही है।

Shah Nawaz ने कहा…

अच्छी जानकारी!

अजय कुमार झा ने कहा…

अरे धत तेरे कि ...बताईये भला ..हमें लगा कि संगीता जी ने ये नई शुरूआत की है ..मसलन ये बताने वाली पोस्टें कि ...ललित जी ने एक पोस्ट लगाई ..वर्मा जी ने भी एक पोस्ट लगाई ..शर्मा जी ने चर्चा की ...तो लगे हाथ हम भी फ़टाफ़ट एक पोस्ट लगा कर संगीता जी को खबर कर देते ..कि अब एक हमारे लिए भी लगा दीजीए..।मगर यहां तो तारामंडल खुला हुआ है ...........हा हा हा ।

बहुत ही मेहनत से लिखी गई पोस्ट और ज्ञानवर्धक भी.........

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत ही ज्ञानवर्धक उम्दा प्रस्तुति....आभार

खामोश फ़लक ने कहा…

आज जब भी हम आकाश के नक्षत्रों पर दृष्टि डालते है तो वे हमें स्वर्ग की भाषा में रचे एक अज्ञात एंव प्रचीनतम पहेली के रूप में दिखाई देते है जिसकी गुत्थी मनुष्य न जाने कब से सुलझाने के प्रयासो में लगा हुआ है ताकि बह्मांड के अनगिन रहस्यों से पर्दा उठा सके. सो इस जानकारी को रोचक एव सहज रूप में सभी के लिए उपलब्ध कराने के प्रशंसनीय प्रयास के लिए बहुत बहुत बधाई.

सर्प संसार ने कहा…

रोचक जानकारी है, आभार।
................
नाग बाबा का कारनामा।
व्यायाम और सेक्स का आपसी सम्बंध?

veerubhai ने कहा…

aakhir kyon lok shruti paramparaa me shukr ko bhor kaa taaraa kahten hain ?
rakshaabandhan mubaarak bahnaa .
veerubhai .

संगीता पुरी ने कहा…

@veerubhai इसे भोर का ही नहीं .. शाम का तारा भी कहते हैं !!