सोमवार, 23 अगस्त 2010

दो वर्षों तक स्‍कूल में होनेवाली छुट्टियों का हमलोगों ने जमकर फायदा उठाया था !!

अभी तक आपने पढा .......  हर प्रकार के सुख सुविधायुक्‍त वातावरण होने के कारण हमलोग कुछ ही दिनों में आसानी से बोकारो में और बच्‍चे अपने नए स्‍कूल में एडजस्‍ट करने लगे थे। पर यहां रिश्‍तेदारों या परिचितों की संख्‍या बहुत कम थी , इसलिए कुछ ही दिनों में बोरियत सी महसूस होती। बच्‍चे अभी नीचली कक्षाओं में थे , इसलिए उनपर पढाई लिखाई का दबाब भी अधिक नहीं था , इसलिए समय काटना कुछ अधिक ही मुश्किल होता । खासकर सप्‍ताहांत में तो पुरानी यादें हमारा पीछा न छोडती और कुछ ही दिन व्‍यतीत होने पर ही हमलोग छुट्टियों का इंतजार करने लगते। एक दो वर्षों तक तो हमलोग स्‍कूल में दस बीस दिन की छुट्टियां होने पर भी कहीं न कहीं भागते , स्‍कूल खुलने से एक दिन पहले शाम को यहां पहुंचते।

डी पी एस  बोकारो में होनेवाली स्‍कूल की लंबी लंबी छुट्टियां भी हमारा काफी मदद कर देती थी। चाहे सत्रांत की छुट्टियां हो या गर्मियों की , चाहे दुर्गापूजा की छुट्टियां हो या दीपावली और छठ की या फिर बडे दिन की , डी पी एस में बडे ढंग से दी जाती। इस बात का ख्‍याल रखा जाता कि शुक्रवार को पढाई के बाद छुट्टियां हो और सोमवार को स्‍कूल खुले , इस तरह पांच दिन की छुट्टियों में भी बाहर जाने के लिए नौ दिन मिल जाते। वहां जूनियर से लेकर सीनियरों तक की सप्‍ताह में पांच दिन यानि सोमवार से शुक्रवार तक ही कक्षाएं होती थी और शनिवार रविवार को छुट्टियां हुआ करती थी। पूरे वर्ष के दौरान सप्‍ताह के मध्‍य किसी त्‍यौहार की छुट्टियां हो जाती तो शनिवार को कक्षा रखकर से समायोजित कर लिया जाता था। लेकिन लंबी छुट्टियों में कोई कटौती नहीं की जाती थी , हमें सत्रांत के पचीस दिन , गर्मी की छुट्टियों के चालीस दिन , दुर्गापूजा के नौ दिन और ठंड के चौदह दिनों की छुट्टियां मिल जाती थी।

वैसे तो हर सप्‍ताह में दो दिन छुट्टियों हो ही जाती थी , हालांकि उसका उपयोग शहर के अंदर ही किया जा सकता था। इसके अलावे वर्षभर में उपयोग में आनेवाली कुल 88 दिन की छुट्टियां कम तो नहीं थी। भले ही स्‍कूल के शिक्षकों ने अपनी सुविधा के लिए इस प्रकार की छुट्टी की व्‍यवस्‍था रखी हो , पर इसका हमलोगों ने  जमकर फायदा उठाया। छुट्टियों के पहले ही हमलोग कहीं न कहीं बाहर जाने की तैयारी करते , और बच्‍चों के स्‍कूल से आते ही निकल पडते। पर संयुक्‍त परिवार से तुरंत निकलकर यहां आने के बाद , और खासकर भतीजी के विवाह के बाद हम पर खर्च का इतना दबाब बढ गया था कि दूर दराज की यात्रा का कार्यक्रम नहीं बना पाते थे । पर बच्‍चों को दादी , नानी और अन्‍य रिश्‍तेदारों के घरो में घुमाते हुए हमने आसानी से दो तीन वर्ष बिता दिए।

13 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

आपके संस्मरण हमें उस वातावरण में ले चलता है जहां का आप वर्णन कर रही होती हैं।
बहुत अच्छी शैली।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढ़िया संस्मरण!

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…

बहुत बढिया संस्मरण चल रहा है संगीता जी

आभार

मैं और मेरा परिवेश ने कहा…

मैं आपका ब्लाग हमेशा से देखता आया हूं। यह बहुत अच्छा लगता है कि आप जैसे सीनियर ब्लागिस्ट और इतना अच्छा लिखने वाले लोग भी समय निकाल कर नये ब्लागर्स को उत्साहित करते हैं। ब्लाग जगत के लिये आपके इस महती प्रयास के लिये साधुवाद

कुमार राधारमण ने कहा…

कई बार सोचता हूँ,छुट्टी का दिन भी अगर कुछ करने में ही बीत गया,तो उसे छुट्टी मनाना कैसे कहा जाए?

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

रक्षाबंधन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं...

अरुणेश मिश्र ने कहा…

रोचक ।

vikram7 ने कहा…

एक भाई की तरफ से बहन को रक्षाबंधन के पावन पर्व की बधाई व शुभकामनाऐं

शिक्षामित्र ने कहा…

छुट्टियां अच्छा अवसर प्रदान करती हैं-अपने देश से परिचय का,खुद को रिफ्रेश करने का और किंचित अर्थों में- आत्म-साक्षात्कार का।

rashmi ravija ने कहा…

अच्छा चल रहा है संस्मरण...
रक्षाबंधन की शुभकामनाएं

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…


बेहतरीन और अच्छी पोस्ट
शुभकामनाएं

आपकी पोस्ट ब्लाग वार्ता पर

manav vikash vigyan aur adytam ने कहा…

nice