शनिवार, 23 जनवरी 2010

आज के पूंजीपतियों को अपना दृष्टिकोण थोडी उदारता का बनाना होगा चाहिए !!






अति प्राचीन काल में कंद मूल खाते , गुफाओं में रहते ,वृक्ष की छाल लपेटते हुए लोगों को धीरे धीरे समझ में आ गया था कि इस धरती पर प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के सही उपयोग से उनके लिए भोजन की व्‍यवस्‍था बहुत कठिन नहीं है, बहुत कम लोग भी मेहनत कर कुल जनसंख्‍या के लिए इसका प्रबंध कर सकते हैं। ऐसी सोंच विकसित होने के बाद बाकी जनसंख्‍या को भोजन के अलावे मनुष्‍य की अन्‍य मुख्‍य जरूरतों जैसे वस्‍त्र ,आवास , वस्‍त्र , सुरक्षा जैसे जरूरी कार्यों में लगाकर एक पूरा समाज बनाया गया। क्रमश: सभ्‍य होते हुए मनुष्‍य की आवश्‍यकताएं बढती चली गयी और हर प्रकार के कार्य को संभालने के लिए उस क्षेत्र की विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को जिम्‍मेदारी दी गयी। उन सभी प्रकार के काम में लगे लोगों के लिए भोजन की व्‍यवस्‍था करना खेतिहरों की जिम्‍मेदारी होती थी।

 इसलिए भूस्‍वामी के घर में भले ही अनाज का ढेर दिखाई देता था , पर उसमें समाज के सभी वर्गों की हिस्‍सेदारी होती थी। यही कारण था कि मनुष्‍य की दूसरी आवश्‍यकताओं को पूरी करने वालों को अपने प्रतिदिन के भोजन या अन्‍य आवश्‍यकताओं के बारे में कुछ भी सोंचने की आवश्‍यकता नहीं होती थी। गृहस्‍थों को विभिन्‍न प्रकार के कर्मकांडों के बहाने से समाज के सभी वगों की जरूरत महसूस करवायी जाती थी और प्रत्‍येंक घर से उनके काम के बदले दिया जाने वाला अनाज वर्षभर यहां से वहां घूमता हुआ सभी वर्गों की आवश्‍यकताओं को पूरी करता था। उदार गृहस्‍थों , जिसमें भूमिपति, पूंजीपति और बलवान लोग शामिल थे को अपना सारा अनाज गंवा देने का कोई भय नहीं था , क्‍यूंकि वे जानते थे कि अगले वर्ष अनाज फिर से उनके पास आ जाएगा, उन्‍हें प्रकृति पर विश्‍वास था। अपनी आवश्‍यकताओं के प्रति निश्चिंत होने से समाज के सभी वर्ग के लोग अपने काम में और निष्‍णात होते जा रहे थे , इसी कारण प्राचीन भारत में इतने प्रकार की कलाएं विकसित हुईं।

पर इस उदार पीढी के बाद क्रमश: नौकरों चाकरों की बढती हुई भीड के मध्‍य गृहस्‍थों की  सुविधाभोगी अपने को 'तेज' कहने वाली पीढी ने कमान अपने हाथों में ली, जो अपने घर के सारे अनाज पर अपनी मिल्कियत समझने लगे। समाज के विभिन्‍न वर्गो को उनके कार्यों के लिए अनाज का इतना बडा हिस्‍सा देना उन्‍हें स्‍वीकार्य नहीं हुआ । उस अनाज में समाज के सभी वर्गों का हिस्‍सा मानने से उन्‍होने इंकार करना आरंभ किया ।  इस पीढी ने कर्मकांडों में कटौती करना , मजदूरों से अधिक से अधिक काम करवाना, कलाकारों को उनकी कला के पूरी कीमत नहीं देना , अपने को ऊंचा और उन्‍हें नीचा समझना आरंभ किया । इनकी बचत करने की प्रवृत्ति जैसे जैसे बढती गयी , समाज के अन्‍य वर्गों का नुकसान होना शुरू हुआ। जहां एक ओर कई वर्षों का अनाज सड रहा था , वहीं दूसरी ओर गरीबों के बच्‍चों को भूखों मरने की नौबत आ गयी थी। शुरूआती दौर में घर में अनाज की मात्रा की कमी के कारण वे अपने घर के गहने जेवर और बरतन तक बेचने को मजबूर हुए। फिर जब घर में कुछ न बचा , तो धीरे धीरे न सिर्फ वे ही भूमिपति, पूंजीपति और बलवान गृहस्‍थों के शोषण के शिकार होते चले गए, वरन् उनके बच्‍चे भी उन्‍हीं के बनाए जाल में फंसते चले गए। अपनी आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी न कर पाने के कारण उनके जीवन स्‍तर में तेज गति से गिरावट आयी। इस तरह समाज के कमजोर वर्ग और कमजोर होते चले गए और इसका प्रभाव उनके काम पर भी पडा। उनकी कला में पहले वाली खासियत नहीं रह गयी। 

उसके बाद से आजतक तो लोगों की सुख सुविधा के लिए नए नए उपकरण भी इजाद होने लगी , जिससे लोगों का लालच और बढता चला गया और आज पूर्ण तौर पर सुविधा भोगी संस्‍कृति ने गरीब और अमीर वर्ग के मध्‍य बडा फासला बना दिया है। वास्‍तव में , चाहे कोई भी युग हो, कोई भी व्‍यापार हो , अपने 'लाभ' को प्राथमिकता देते हुए ही एक व्‍यापारी आगे बढता है , पर व्‍यवसाय का मुख्‍य लक्ष्‍य जनहित का होता है। आज के व्‍यापारियों की तरह स्‍वार्थ में अंधे होकर 'कोई भी' रास्‍ता उठाना एक व्‍यापारी के लिए उचित नहीं , इसलिए इससे परहेज करना चाहिए। अपने खर्चों में अधिक से अधिक कटौती कर सामान्‍य जनता के लिए सारी संभावनाओं को नष्‍ट कर देना एक सफल व्‍यवसायी का लक्ष्‍य नहीं होना चाहिए। अंधाधुंध पैसे कमाने के लिए आज प्रोफेशनल तक को इसी प्रकार की शिक्षा मिल रही है और बिना सोंचे समझे लगातार विकास का क्रम बनाए रखने के लिए कुछ भी किया जा रहा है , उसका फल आज भी कमजोर वर्ग की जनता को भुगतना पड रहा है। किसी कंपनी के पास क्‍या कहा जाए , एक व्‍यक्ति तक के पास करोडो अरबो रूपए और लाखों जनता को दो जून की रोटी में भी दिक्‍कत , आज का यह सच हो गया है। मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सारे संसाधनों का आ जाना समाज के लिए बिल्‍कुल उचित नहीं , इसी का बुरा परिणाम कई सामाजिक समस्‍याओं के रूप में हमें देखने को मिल रहा है। आज के पूंजीपतियों को अपना दृष्टिकोण थोडी उदारता का बनाना होगा , तभी समाज के सभी वर्गों का कल्‍याण हो सकता है। देश के स्‍थायी आर्थिक विकास के लिए ये सबसे महत्‍वपूर्ण बात है , पर आज इसे सोंचनेवाला कोई भी नहीं। आज गरीबों का तो भगवान ही मालिक रह गया है !!






शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

27 जनवरी से 4 फरवरी 2010 तक का ग्रहयोग भी मौसम के बिल्‍कुल प्रतिकूल है !!

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के द्वारा मौसम से संबंधित भविष्‍यवाणियां करने के क्रम में हमारी एक नजर दूर तक फैली होती है तो दूसरी नजर नजदीक तक। एक ही व्‍यक्ति के द्वारा हर प्रकार के काम को करने की ये विवशता ही समझें कि हम दूरबीन का प्रयोग करते हुए हर स्‍थान के पत्‍थरों की सही माप नहीं ले पाते हैं। जिस प्रकार रास्‍ते में चलते वक्‍त हमें दूर के बडे बडे पत्‍थर ही दिखाई पडते हैं , पर नजदीक जाने पर छोटे छोटे पत्‍थर भी हमारी दृष्टि से नहीं बच पाते , बिल्‍कुल वैसी ही दृष्टि हम मौसम का अनुमान करने वक्‍त रखते हैं। यही कारण है कि मैं मौसम के बारे में एक भविष्‍यवाणी दो तीन महीने पहले और एक बिल्‍कुल निकट में करती हूं।

प्रवीण जाखड जी को जबाब देने के क्रम में 3 अक्‍तूबर को ही मैने मध्‍य दिसंबर में देश के मौसम के खराब होने की सूचना दे दी थी, जिसे 10 दिसंबर को मैने पुन: दुहराया था। पर तबतक मौसम विभाग का पूर्वानुमान आ चुका था, इसलिए दिनेशराय द्विवेदी जी को मेरी सूचना उनकी नकल लगी और उन्‍होने मुझे भारत के मौसम खराब होने का दो महीने बाद का डेट मांगा , जिसके लिए मैने उन्‍हें 3 - 4 फरवरी की तिथि दी थी। 3 फरवरी के दस दिन पहले पुन: इसकी सूचना पाठकों को देनी मैं आवश्‍यक समझती हूं , जिसके कारण आज मौसम के बारे में मेरा पोस्‍ट लिखना आवश्‍यक था। पर कल प्रवीण शाह जी की टिप्‍पणी भी मिली , जिसमें उन्‍होने मुझसे पूछा ...

आदरणीय संगीता जी,
यहाँ पर आपने भविष्यवाणी की है कि 6 जनवरी से ही थोडी राहत मिलनी शुरू हो जाएगी , जबकि 16 जनवरी के बाद ठंड से काफी राहत मिलेगी। 
अभी तो उत्तर भारत भीषण शीत लहर से त्रस्त है...इस काफी राहत को मिलते-मिलते काफी देर नहीं हो गई ?



उनको भी मैने लिखा कि कल के पोस्‍ट में आपको इसका जबाब मिल जाएगा , इसलिए आज पोस्‍ट लिखना अधिक आवश्‍यक था। दरअसल जाडे के इस मौसम में मौसम खराब रहने वाली जो बडी ग्रहीय बाधा थी , वह 16 दिसंबर तक ही थी , इसलिए मैने उसकी चर्चा की थी और उसके बाद बहुत स्‍थानों पर मौसम में सुधार होता देखा गया। पर 18 जनवरी से 22 जनवरी तक मौसम को बाधित करने वाली एक छोटी बाधा पुन: आकर उपस्थित हो गयी , जिसके कारण पुन: मौसम में गडबडी आयी , जिसपर मेरा ध्‍यान पहले नहीं जा सका। इस दृष्टि से 23 जनवरी से यानि कल से मौसम में सुधार आ जाना चाहिए। 


अब चलती हूं मौसम से संबंधित अगली भविष्‍यवाणी की ओर, 3-4 फरवरी के जिस योग के बारे में चर्चा मैने 9 दिसंबर 2009 को ही कर रखा है , अब वह बहुत निकट है और इसका प्रभाव मुझे 26 जनवरी से ही पडता दिखाई दे रहा है , जो 3-4 फरवरी 2010 तक अपनी चरम सीमा पर रहेगा। इस कारण अब 6 या 7 फरवरी के बाद ही मौसम में कुछ बदलाव आने की संभावना दिखती है। हमेशा की तरह इस ग्रह योग का प्रभाव पूरे विश्‍व में जहां तहां तहां पडता ही है , उत्‍तर भारत के अधिकांश राज्‍यों को भी मैं इससे प्रभावित होते देखा करती हूं। इसलिए दो तीन दिनों में भले ही ठंड में थोडी कमी दिखाई दे , पर 4 फरवरी तक उत्‍तर भारत को स्‍थायी तौर पर राहत मिलने की बात मुझे नहीं दिखाई देती। शायद यही कारण है प्रवीण शाह जी कि इस काफी राहत को मिलते-मिलते काफी देर होती जा रही है !!



हम कैसे कह सकते हें कि काम करना हमारे हाथ में है !!

जिस ब्रह्मांड में इतने बडे बडे पिंड एक खास पथ पर निरंतर चल रहे हों , वहां किसी व्‍यक्ति के द्वारा यह स्‍वीकार नहीं किया जाना कि हम सब अपने शरीर में स्थित उर्जा के अनुसार ही कार्य कर पाते हैं, मुझे अजूबा लगता है। हम सभी जानते हैं कि इस दुनिया में कोई भी व्‍यक्ति दूसरे के समान नहीं होता है। जन्‍म लेने के बाद की बात कौन कहे , गर्भ में ही हर बच्‍चे का स्‍वरूप और विकास भिन्‍न प्रकार का होता है । हर महीने उनका स्‍वास्‍‍थ्‍य भिन्‍न होता है , उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भिन्‍न होती है , उसका क्रियाकलाप अलग तरह का होता है। जन्‍म लेने के बाद तो सबकी परिस्थितियां अलग होती ही हैं, उसी के अनुरूप सबके क्रियाकलाप होते हैं।

गीता में कहा गया है ...
कर्मण्य एवाधिकारस ते मा फलेषु कथा चन 

इस बात को मानना ही चाहिए , मैं भी मानती हूं , पर क्‍या हम सब चाहे भी तो एक जैसा काम कर सकते हैं। हमारे आसपास का माहौल भिन्‍न होता है , हम उसी के अनुरूप अपना क्रियाकलाप रख सकते हैं। हमारी अपनी प्रकृति भी बिल्‍कुल भिन्‍न होती है , ये भी हमारे क्रिया कलाप पर बुरा प्रभाव डालती है। फिर हमारे वश में क्‍या रह जाता है ??

एक बच्‍चा जब जन्‍म लेता है तो उसके संपूर्ण शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकास के लिए सबसे पहले माता और फिर पिता की आवश्‍यकता पडती है , उनका साथ न मिले तो इस विकास के बाधित होने की पूरी संभावना रहती है। इसके अलावे किसी के छोटे भाई बहन उसे स्‍वच्‍छंद माहौल देते हैं , तो किसी को अपने भाई बहन से पिटाई खा खाकर आधे होने की नौबत आती है। कोई अभिभावक के साथ किसी बात की जिद करता है तो उसका सारा जिद पूरा हो जाता है और दूसरा उसी जिद के कारण घर पहुंचकर दो चार बार ऐसी पिटाई खाता है कि उसकी जिद करने की आदत ही समाप्‍त हो जाती है। इस तरह अपने आप सबके अंदर सारे गुण और अवगुण विकसित होते रहते हैं। 

बडे होने पर एक किशोर का मानसिक विकास न सिर्फ उसकी आई क्‍यू और पढने की क्षमता पर निर्भर करता है , वरन् इसके लिए हमारे गुरू , शिक्षक और विद्यालय के साथ साथ माता और पिता दोनो की बडी भूमिका होती है। किसी का सारा माहौल मनोनुकूल होता है और खेल खेल में बौद्धिक विकास की पूरी संभावना बन जाती है , तो कोई परिस्थिति की गडबडी के कारण पूरे विद्यार्थी जीवन माथापच्‍ची करते ही व्‍यतीत कर देता है। न तो विद्यालय का माहौल या पढाई का कोर्स उसे रास आता है और न ही शिक्षक या माता पिता के पढाने का ढंग। ऐसी हालत में वह कर्म करे तो किस प्रकार ??

इसी प्रकार कैरियर के माहौल और वैवाहिक संबंधों पर भी वातावरण का प्रभाव तय है। आप सामने जैसा माहौल देखते हैं , जैसी आपकी रूचि होती है , आप वैसा ही तालमेल बना पाते हैं। इसका अर्थ यह है कि कर्म करने में आप कभी भी स्‍वतंत्र नहीं होते, कोई भी काम लाचारी में ही करते हैं। यह बात अलग है कि काम के सफल हो जाने पर इसका श्रेय आपको दिया जाए या असफल होने पर सारा दोष आप ही झेलने को विवश हों , पर सच तो यह है कि काम करने की प्रेरणा हमें अपने अंतर्मन से मिलती तो है , पर उसे पूरा करने में परिस्थितियों का हाथ होता है , जिसमे हमारा वश बिल्‍कुल भी नहीं । फिर हम कैसे कह सकते हें कि काम करना हमारे हाथ में है ??






गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मेरे ज्‍योतिषीय विचारों पर तर्क वितर्क करने के लिए पाठकों को मेरे ब्‍लॉग पर आना चाहिए !!








कल 'नया जमाना' नाम के एक ब्‍लॉग में जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी को एक लेख ज्योतिषी के फलादेश की कला और राजनीति पढने को मिली , जिसमें ज्‍योतिष शास्‍त्र के बारे में इस प्रकार जानकारी थी ... 

फलित ज्योतिष मासकल्चर का अंग है। देखने में अहिंसक किन्तु वैचारिक रूप से हिंसक विषय है। सामाजिक वैषम्य,उत्पीडनलिंगभेद,स्त्री उत्पीडन और वर्णाश्रम व्यवस्था को बनाए रखने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।ग्रह और भाग्य के बहाने सामाजिक ग्रहों  की सृष्टि में अग्रणी है। फलित ज्योतिष स्वभावत:लचीला एवं उदार है। 'जो मांगोगे वही मिलेगाके जनप्रिय नारे के तहत प्रत्येक समस्या का समाधान सुझाने के नाम पर व्यापक पैमाने पर जनप्रियता हासिल करने में इसे सफलता मिली है।

इस आलेख को पढने के बाद मैने निम्‍न प्रतिक्रिया दी थी ..

ज्‍योतिष शास्‍त्र हमारे ऋषि मुनियों द्वारा विकसित किया गया शास्‍त्र है .. जिन्‍हें आज भी वैज्ञानिक माना जाता है .. किसी भी ज्ञान का दोष नहीं दिया जा सकता .. दोष कालांतर में उस ज्ञान के गलत हाथों मं जाने से होता है .. विस्‍तार से पढे आइए जानते हैं .. फलित ज्योतिष आखिर क्‍या है ??.... एक सांकेतिक विज्ञान या मात्र अंधविश्वास !!

ग्रहों के प्रभाव को दिखाते हुए मैने यह आलेखलिखा है .. इसमें कोई गोल मोल बातें नहीं हैं .. स्‍पष्‍ट भविष्‍यकथन है .. पर मात्र तीन पाठकों ने इस बात से सहमति दिखाई .. असहमति किसी ने भी नहीं .. क्‍या हिन्‍दी ब्‍लॉगर , उनके भाई , बहन , मित्र , बेटे और बेटियों में किसी ने 1981 में जन्‍म नहीं लिया होगा .. ज्‍योतिष के प्रति लोगों की यही उपेक्षा दिन ब दिन इसकी गिरती हुई हालत के लिए जिम्‍मेदार है !!

दूसरे ही दिन पुन: इसी ब्‍लॉग पर जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी का एक आलेख ज्योतिषी के तर्क और अविवेकवाद नामक एक पोस्‍ट पढने को मिली, जिसमें मैने ये कमेंट किए ...

असल में ज्योतिष मनोबल बढ़ाने का यह आदिम शास्त्र है।

जनप्रिय मिथ है कि यदि ग्रहों का सही ढ़ंग से फलादेश हो तो सामाजिक जीवन में आनेवाली बाधाओं को सहज ही संभाला जा सकता है।

ज्‍योतिष के बारे में इतना लिखने से पहले आपने इसका कितने दिनों तक अध्‍ययन किया है ??

इसपर जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी ने जानकारी दी कि ...

संगीता जी, मैंने 14 साल ज्योतिषशास्त्र पढ़ा है। सिद्धान्त ज्योतिषाचार्य हूँ।सर्वोच्च अंक थे मेरे। भारत के श्रेष्ठतम ज्योतिष शिक्षकों से बाकायदा अकादमिक शिक्षा ली है।

मुझे यह जानकर बहुत अच्‍छा लगा , सचमुच विषय के जानकारों से तर्क करना सार्थक लगता है , मैने लिखा ....

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी,आपने ज्‍योतिष का इतने दिनों तक अध्‍ययन किया है .. आप ज्‍योतिष शास्‍त्र के इतने अच्‍छे जानकार हैं .. उम्‍मीद रखती हूं आप सकारात्‍मक ढंग से तर्क वितर्क करेंगे .. मैने आपके पिछले आलेख मे एक आलेख का लिंक दिया था .. उसमें ज्‍योतिष के शुरूआत से लेकर अभी तक की स्थिति को स्‍पष्‍टत: समझाया गया है .. उस आलेख के बारे में आपकी क्‍या टिप्‍पणी है .. कृपया अगले पोस्‍ट में उल्‍लेख करें .. ताकि मैं समझ सकूं कि मैं कहां पर गलत हूं .. और हां , अपने लिखे उस आलेख के लिंक को मेरे ईमेल पर प्रेषित करें .. क्‍यूंकि इन दिनों मैं ब्‍लॉग जगत से दूर हूं !

जाकिर अली 'रजनीश' जी और अरविंद मिश्रा जी जैसे ज्‍योतिष विरोधियों को तो उक्‍त दोनो आलेखों को देखकर गदगद होना ही था। जाकिर जी ने 'तस्‍लीम' नामक ब्‍लॉग में भी इस आलेख को स्‍थान दिया, जिसमें उन्‍होने कहा ...

ज्योतिष को लेकर ब्लॉग जगत में अक्सर उठापटक चलती रहती  है। ज्योतिष के बारे में जो भी प्रश्न उठाए जाते हैं, उसपर तथाकथित ज्योतिषी सबसे पहले यही सवाल दागते हैं कि आपने कितना ज्योतिष पढ़ा है। इसके आगे सारे सवाल, सरे तर्क अनदेखे/बेमानी कर दिये जाते हैं और जनता उस भेड़चाल में शामिल हो जाती है।
कल सहसा डा0 जगदीश्वर चतुर्वेदी के ब्लॉग 'नया ज़माना' पर उनके ताजे आलेख 'ज्योतिषी के तर्क और अविवेकवाद' पर नजर पड़ी। डा0 चतुर्वेदी ने सम्‍पूर्णानन्‍द सं.वि‍.वि‍. से सि‍द्धान्‍त ज्‍योति‍षाचार्य की डिग्री प्राप्त की। उनके ताज़े लेख पर बहस चल रही है। ज्योतिष की इस चर्चा को आगे बढ़ाने के ‍लिए उनके एक अन्य आलेख 'ज्योतिषी के फलादेश की कला और राजनीति' लेख को यहाँ पर पुन: साभार प्रस्तुत किया जा रहा है।

ज्‍योतिष के स्‍वस्‍थ तर्क से मुझे क्‍या तकलीफ हो सकती थी , मैने भी टिप्‍पणी की ....

चूंकि चतुर्वेदी जी ज्‍योतिष के जानकार हैं .. उनसे होनेवाली बहस अवश्‍य सार्थक हो सकती है .. ज्‍योतिष की कई कमजोरियो को मैने भी अपने ब्‍लॉग में उजागर किया है .. विभिन्‍न प्रकार के राजयोग, कुंडली मिलान , विंशोत्‍तरी दशा पद्धति , ग्रहों के प्रभाव को परिवर्तित करने का दावा , ग्रहणों का प्रभाव तथा कालसर्प योग आदि को हमलोग निश्चित तौर पर ज्‍योतिष में अंधविश्‍वास के रूप में लेते हैं .. पर इसका अर्थ यह नहीं कि ज्‍योतिष गलत है या ग्रहों का प्रभाव हमपर नहीं पडता है .. जिस प्रकार धर्म का सही स्‍वरूप आज खो गया है .. और धर्म की ऊंचाइयों पर बैठे लोग धर्म को सही ढंग से परिभाषित नहीं कर पा रहे .. उसी प्रकार ज्‍योतिष का सही स्‍वरूप भी खो गया है और ज्‍योतिष को सही ढंग से लोग परिभाषित नहीं कर पा रहे हैं .. इसका अर्थ यह नहीं कि ज्‍योतिष गलत है।

नियमित तौर पर मेरा ब्‍लॉग पढने वाले मेरी इन बातों को समझ सकते हैं , पर जिन्‍होने कभी मेरा बलॉग नहीं पढा , उन्‍हें मेरा स्‍वर तो बदला बदला लगेगा ही , कुन्‍नु जी की टिप्‍पणी को देखें ...

Sangeeta ji swar badle badle se lag rahe hain.

हमारा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' बिल्‍कुल वैज्ञानिक है और वह पारंपरिक ज्‍योतिष से काफी हटकर और स्‍पष्‍ट है , यह मैं अपने ब्‍लॉग में बारंबार समझा चुकी हूं , इसके बावजूद 'नया जमाना' में एक पाठक की टिप्‍पणी देखें ....

ab inconvenienti ने कहा

अब मिला शेर को सवाशेर.... देखते हैं अब मैडम क्या गत्यात्मक तर्क वितर्क करती हैं? 

इन सब बातों को पढने के बाद इस आलेख को प्रकाशित करने का मेरा उद्देश्‍य पाठको को यह जानकारी देना है कि किसी भी ब्‍लॉग में मैं उस पोस्‍ट से सहमति या असहमति रखते हुए एक टिप्‍पणी देने के अधिकार और कर्तब्‍य दोनो का पालन करती हूं ,उस पोस्‍ट के लेखक को भी मेरी टिप्‍पणी के संबंध में अपनी स्थिति को स्‍पष्‍ट करना चाहिए। मैं अपने विषय पर इतनी गंभीर तो अवश्‍य हूं कि किसी भी प्रकार के तर्क वितर्क कर सकूंपर मेरे अपने विचारों के साथ किसी को तर्क वितर्क करना हो तो उसे मेरे ब्‍लॉग पर आना होगा। मैं प्रवीण जाखड जी के ब्‍लॉग पर तर्क वितर्क के दौरान अपनी ये बातें स्‍पष्‍ट कर चुकी हूं,इसलिए कोई भी यह उम्‍मीद न रखें कि मैं उनके ब्‍लॉग पर जाकर तर्क वितर्क करूंगी !!












चेहरे , शरीर और कपडों की साफ सफाई के लिए कितनी परंपरागत पद्धतियां हैं !!

आज हर स्‍तर के टूथपेस्‍ट , डिटरजेंट , फेस वाश और साबुन से बाजार भरा पडा है , इसकी इतनी बडी मात्रा में खरीद और बिक्री हो रही है , जिससे हमारे दांत , चेहरे , शरीर और कपडों की सफाई हो रही है, जो प्राचीन काल से अबतक लोगों के द्वारा साफ सफाई के लिए न जाने कितने प्रयोग किए जाने का परिणाम हैं। आज पैकेट में बिकने वाली मुल्‍तानी मिट्टी फेस पैक के रूप में प्रयोग की जाती है , पर प्राचीन काल में भी खेतों में यत्र तत्र बिखरी चिकनी मिट्टी का प्रयोग चेहरे की सफाई के लिए किया जाता था। इसके अलावे चेहरे की सफाई के लिए तरह तरह के उबटन लगाए जाने की परंपरा थी , उबटन चेहरे की मालिश करते हुए सारी गंदगी को हटाने में समर्थ होता था।

चिकनी मिट्टी से धुले बाल तो रेशम से मुलायम हो जाया करते थे। बाल को धोने के लिए सरसों या अन्‍य तिलहनों के तेल निकालने के बाद के बचे भाग का प्रयोग किया जाता था , जिसे बिहार में 'खल्‍ली' कहा जाता है। इसके अलावे आंवले और शिकाकाई के उपयोग से अपने बालों को स्‍वस्‍थ रखने में मदद ली जाती थी। विभिन्‍न दालों के बेसन और दही को भी बालों की सुरक्षा हेतु उपयोग किया जाता था। इन परंपरागत पद्धतियों से अपने शरीर और बाल की सफाई की जाती थी।

ग्रामीण परिवेश में कोयले या लकडी के चूल्‍हे और अन्‍य धूप धूल में काम करती महिलाओं को अपने तन बदन साफ रखने के लिए धुलाई के लिए विभिन्‍न प्रकार के प्राकृतिक ब्रश भी उपलब्‍ध थे। विभिन्‍न पेडो , खासकर औषधिय पेडों की पतली टहनी को दांतों से चबाकर उसका उपयोग दतवन के रूप में दांतो की सफाई के लिए किया जाता था , यह बात तो आप सबों को मालूम होगी । इसी प्रकार बीज के लिए रखे गए  नेनुए , लौकी या झींगी जैसे सब्जियों के बीज निकालने के बाद जो झिल्‍ली बची रह जाती थी , उसका उपयोग हाथ पैरों की गंदगी को निकालने के लिए ब्रश के रूप में किया जाता था। घर बनाने के लिए प्रयोग किए जानेवाले खपडे के टूटे हुए हिस्‍से या ईंट के टुकडे से पैरों के एडी की सफाई की जाती थी।

रेशमी और ऊनी कपडे तो उच्‍च वर्गीय लोगों के पास ही होते थे , जिन्‍हे धोने के लिए रीठे की ही आवश्‍यकता होती थी। सूती वस्‍त्रों को धोने के लिए सोडे का प्रयोग कब शुरू हुआ , मै नहीं बता सकती। पर उससे पहले बंजर खेतों के ऊपर जमी मिट्टी , जिसे 'रेह' कहा जाता था , को निकालकर उससे सूती कपडे धोए जाते थे , उस मिट्टी में सोडे की प्रधानता होने से उससे धुले कपडे बहुत साफ हो जाते थे। अभी भी ग्रामीण महिलाएं अपने सूती वस्‍त्रों की सफाई में इसी पद्धति का इतेमाल करती हैं। इस प्रकार की सफाई में बहुत अधिक पानी की आवश्‍यकता पडती थी , पर नदी , तालाबों की प्रचुरता से इस काम को कर पाना मुश्किल नहीं होता था, आजकल इस पद्धति में थोडी दिक्‍कत अवश्‍य हो जाया करती है।

 गरम पानी में इस मिट्टी को डाल कर उससे सूती कपडों को साफ कर पाना अधिक आसान होता था , मिट्टी और तेल तक की गंदगी आराम से साफ हो जाया करती थी। कई स्‍थानों में केले के सूखे तने और पत्‍तों को जलाकर उसके राख से कपडों की सफाई की जाती थी। हमारे यहां आम या इमली की लकडी को जलाने पर जो राख बचता था , उसे सुरक्षित रखा जाता था और लूंगी , धोती , साडी से लेकर ओढने बिछाने तक के सारे सूती कपडे इसी राख से धोए जाते थे। इस राख से सफाई करने पर कई दिनों की जमी गंदगी और अन्‍य तरह के दाग धब्‍बे तक दूर हो जाया करते थे। आज भी ओढने बिछाने या अन्‍य प्रकार के गंदे वस्‍त्रो को धोने के लिए इस राख का उपयोग किया जाता है। आज नदियो और तालाबों में पानी की कमी और कम मूल्‍यों में सामान्‍य डिटरजेंटों की बिक्री होने के कारण सफाई की ये परंपरागत पद्धतियां समाप्‍त हो गयी हैं।



बुधवार, 20 जनवरी 2010

आपका जन्‍म 1954 या 1955 में फरवरी से अगस्‍त के मध्‍य तो नहीं हुआ था ??

अपने पिछले आलेख कहीं आपका जन्‍म जनवरी - फरवरी 1981 में तो नहीं हुआ था ??'
में मैने लिखा है कि  किस तरह मई 1998 से मई 2000 के मध्‍य मेरे पास आनेवाले परेशान किशोरों की भीड ने मुझे उस बात की पुन: याद दिला दी, जो दस वर्ष पूर्व अपने अध्‍ययन के दौरान मेरे मन में आयी। उन परेशान नवयुवकों को अभी कोई दिशा भी नहीं मिल पायी थी कि 1954 और कुछ ही दिनों बाद 1955 में जन्‍म लेनेवाले बुजुर्गों की परेशानी का भी सिलसिला शुरू हो गया। इस बात की थोडी संभावना तो हमें थी , पर भिन्‍न उम्र अंतराल के मध्‍य दो वर्षों के अंदर इतने विकट रूप में आई ये समस्‍याएं हमारे अध्‍ययन और चिंतन के पश्‍चात एक नए सूत्र के प्रतिपादन के लिए काफी थी। इन दोनो स्थिति को मिलाकर समझने का प्रयास किया , तो फिर से कई सूत्र मिल गए। और इन सूत्रो के आधार पर आगे बहुत सारी संभावना का सही ढंग से अनुमान लगाने में मदद मिली।

आपको यह जानकर ताज्‍जुब होगा कि ठीक किशोरों की तर्ज पर ही इन प्रौढों में से 1954 में जन्‍म लेनेवाले प्रौढ भी जून 2000 से जून 2002 तक और 1955 में जन्‍म लेने वाले जून 2001 से जून 2003 तक ग्रहों के प्रभाव से बहुत अधिक परेशान रहें। सारी परिस्थितियां मनोनुकूल होते हुए भी किसी खास मुद्दे को लेकर इतना बडा संकट उपस्थित हो गया था कि वे दो वर्षो तक भयानक तनाव में रहे। खासकर जिनका जन्‍म इन वर्षों में फरवरी से अगस्‍त के मध्‍य हुआ था , वे अधिक बडे संकट से गुजर रहे थे। इसके बाद फिर उनके समक्ष उतने बडे रूप में परेशानी नहीं दिखी और जीवन काफी ठीक हो गया । कुछ लोगों की परिस्थितियां अवश्‍य वहीं से बिगडनी आरंभ हुई और वे अभी तक समझौता भी कर रहे हैं , पर इसके बावजूद आज की तुलना में वो दिन बहुत भयावह था , इससे इंकार नहीं कर सकते।

वास्‍तव में जिस पृथ्‍वी पर हम निवास कर रहे हैं , उसके सापेक्ष आसमान में सारे ग्रहों की भिन्‍न भिन्‍न स्थिति बन रही है। उसी में से कोई स्थिति किसी व्‍यक्ति के लिए शुभ प्रभाव डालने वाली और कोई स्थिति किसी व्‍यक्ति के लिए अशुभ प्रभाव डालने वाली होती है। जैसे ही आसमान के ग्रहों का आपके जीवन पर शुभ प्रभाव शुरू हो जाता है , आपके सामने मनोनुकूल घटनाएं घटने लगती है , इसके विपरीत जैसे ही आसमान में ग्रहों का आपके जीवन पर विपरीत प्रभाव आरंभ होता है , विपरीत परिस्थितियों से जूझने को आप मजबूर होते हैं। कभी कभी यह प्रभाव बिल्‍कुल मामूली अंतर वाला होता है , इसलिए इसे हम नहीं समझ पाते , पर कभी कभी आसमान में खास ग्रहों की स्थिति किसी खास समयांतराल में जन्‍म लेनेवालों के लिए बडा संकट ले आती है , और ताज्‍जुब की बात तो यह है कि इसे पहचानने के लिए आपको जन्‍मकुंडली देखने तक की आवश्‍यकता नहीं पडती। हमारे लिए तो ऐसा अनुमान लगाना और भी आसान होता है।





मंगलवार, 19 जनवरी 2010

मेरी समझ से इस देश में छूआछूत की भावना इस तरह फैली होगी ??

आज भारत के परंपरागत नियमों को संदेहास्‍पद दृष्टि से देखने वाले अक्‍सर जाति प्रथा के विरोध में या खासकर छूआछूत के विरोध में हल्‍ला किया करते हैं। पर लोगों ने कभी चिंतन मनन करने की कोशिश नहीं की कि छूआछूत की भावना अपने देश में क्‍यूं आयी होगी। मैं स्‍पष्‍टत: कहना चाहूंगी कि मेरे गांव में हर जाति , हर धर्म के लोग बडे प्रेम से रहते हैं । छोटी से छोटी जाति भी एकजुट होकर किसी बात के विरोध में अनशन कर सकती है कि वो किसी कर्मकांड में इस जाति के लोगों का काम नहीं करेगी , तो बडी बडी जाति के लोगों के पसीने छूट जाते हैं। यदि ये मान्‍यता कहीं पर मुझे नहीं मिलती है , तो इसका जबाबदेह मैं विदेशी आक्रमण के दौरान हमारी सामाजिक स्थिति को छिनन भिन्‍न करने  की उनकी कोशिश को ही मानती हूं। स्‍वस्‍थ ग्रामीण पृष्‍ठभूमि में अपने जीवन का अधिकांश समय व्‍यतीत करने के कारण मैने स्‍पष्‍टत: परंपरागत नियमों के गुण दोषों पर ध्‍यान दिया है। समय समय पर आनेवाले हमारे हर पर्व त्‍यौहार मे अपने शरीर की क्‍या , घर द्वार, आंगन गोशाले से लेकर सारे बरतनों तक की विशेष तौर पर सफाई के नियम से यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि हमारे पूर्वज सफाई पसंद थे। उन्‍हें अच्‍छी तरह मालूम था कि अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य और सुखी होने के लिए स्‍वच्‍छता पहली शर्त है।

प्रतिदिन के रूटीन में भी साफ सफाई का विशेष ध्‍यान था , प्रतिदिन अपने घर, द्वार , आंगन , गोशाले की सफाई जहां अपने पर्यावरण को स्‍वस्‍थ जीवन जीने के लायक बनाती थी , वहीं सुबह सवेरे  शौच ,  दतुअन , स्‍नान किया जाना और बिना नहाए धोए न तो रसोई बनाना और न खाना भी स्‍वस्‍थ परंपरा ही थी। किसी किटाणु के संक्रमण का भय प्राचीन काल में इतना था कि लोग रसोई में जूत्‍ते पहनकर नहीं जाया करते थे। यहां तक कि शौच से आने के बाद कपडे बदलकर रसोई में जाया जाता था। काफी समय तक किसी गंभीर बीमारी का अचूक इलाज विकसित नहीं किया गया होगा , जिसके कारण वैसे बीमारी से ग्रस्‍त रोगियों को भी अपने परिवार से अलग रखा जाता था , यहां तक कि कुत्‍ते के काटने पर भी उसे काफी दिनों तक अलग रखा जाता था , यहां तक कि कई रोगियों के लिए अलग बरतनों का प्रयोग होता था, जो कि अनेक स्‍थानों पर अभी भी चलता है। चेचक निकलने की स्थिति में भी रोगी को एक अलग कमरे में रखकर उसकी भरपूर सेवा सुश्रुसा की जाती थी। ये सब नियम रोगों को फैलने से बचाने के लिए थे।

आज मेडिकल साइंस के विकसित होने पर पढे लिखे लोगों को इन नियमों की कोई आवश्‍यकता नहीं दिखती , पर मुझे ऐसा नहीं लगता , क्‍यूंकि भारत की बहुत बडी आबादी अभी भी एलोपैथी के इलाज में असमर्थ है और वैसी जगहों पर साफ सफाई बनाए रखकर बहुत सारी बीमारियों से बचा जा सकता है। जो एलोपैथी के हर संभव इलाज की सामर्थ्‍य रखते हैं , उनके लिए भी इन नियमों के पालन की आवश्‍यकता है , क्‍यूंकि एलोपैथी की दवाओं का अधिक प्रयोग जहां एक बीमारी को ठीक करता है , वहीं कई नई बीमारियां जन्‍म लेती है, जो पूर्ण तौर पर लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य का नुकसान करने में समर्थ है। आखिर बीमारियों को फैलने से बचाने के लिए ही तो बाजार में विभिन्‍न प्रकार के मास्‍क बिक रहे हैं , जो आज के पेशेवरों द्वारा इस्‍तेमाल किए जाते हैं। जहां ये इस्‍तेमाल नहीं किए जाते हैं , वहां कई क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को किसी खास प्रकार के बीमारी से ग्रस्‍त देखा जाता है।

लेकिन पुराने किसी भी पेशे में लगे व्‍यक्ति के लिए किसी प्रकार की ऐसी सुविधा नहीं रही होगी। ऐसे लोग खुद भी काम करने के बाद साफ सुथरे होकर ही परिवार के सम्‍मुख आते रहे होंगे , ताकि परिवार में भी बीमारी न फैले। हमारे यहां बच्‍चों को जन्‍म देने के समय मदद के लिए जो दाइयां आती थी , वो न सिर्फ उसमें मदद करती थी , प्रसवोपरांत शरीर को पुन: पुरानी स्थिति में लाने के लिए भी उसके पास कई उपाय थे , उसके द्वारा की जाने वाली शरीर की मालिश और अन्‍य उपायों से महिलाएं काफी राहत महसूस करती थी। जब तक महिलाएं सौर गृह में होती , उनसे आराम से सेवा सुश्रुसा करवाती, पर सौर गृह से निकलने के बाद स्‍नान से पहले ही इन दाइयों से तेल लगवाना होता था । ऐसा इसलिए क्‍यूंकि वे कई घरों में इस प्रकार का काम करती थी , जिसके कारण प्रसूता को इन्‍फेक्‍शन का भय बना रहता था।  पर जब धीरे धीरे जाति के आधार पर पूरे परिवार के लिए वो काम निश्चित हुआ होगा , तो धीरे धीरे विभिन्‍न पेशों में लगे व्‍यक्ति को किसी बीमारी से ग्रस्‍त होने का भय जाता रहा होगा। इसी कारण लोग उन्‍होने स्‍वच्‍छता से रहना बंद कर दिया होगा , जिसके कारण लोग उनसे परहेज बनाने लगे होंगे , जो धीरे धीरे छूआछूत जैसी सामाजिक रूढि में बदल गया होगा।

कहीं आपका जन्‍म जनवरी - फरवरी 1981 में तो नहीं हुआ था ??

हमारे घर में 1890 से लेकर 1980 तक का 90 वर्षीय पंचांग मौजूद था , जिसके कारण अति वृद्ध व्‍यक्ति की भी जन्‍मकुंडली बनाने में हमें कोई दिक्‍कत नहीं आती थी, जिनका जन्‍म विवरण मौजूद हो। 1980 के कुछ वर्ष पूर्व ही 1980 से 2000 तक की 20 वर्षीय पंचांग भी हमारे पास आ गयी थी। यह वहीं समय था , जब मेरी ज्‍योतिष में थोडी बहुत रूचि जगने लगी थी। इस नए पंचांग को लेकर मैं इसके आंकडों से उलझी रहती , कई प्रकार के प्रश्‍न मन में उठते और सबको हल करने की कोशिश करती। गणित विषय में रूचि तो है ही ,  उसके आंकडों को ग्राफ में बदलना भी मेरा शौक रहा है। 1990 के आसपास मैने इस 20 वर्षीय पंचांग के आंकडों को देखकर ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति को निकालकर उसे ग्राफिकल रूप देना शुरू किया। इस काम में सबसे पहला वर्ष 1981 था , इसलिए इसके एक एक ग्रहों की स्थिति को याद रहना स्‍वाभाविक था। उसी वक्‍त इस वर्ष जन्‍म लेनेवाले बालकों के लिए उसकी किशोरावस्‍था के समय को परेशानी में देखकर मुझे थोडा भय हुआ। पर समय के साथ इस बात को मैं भूल गयी।

पर मई 1998 से मई 2000 के मध्‍य मेरे पास आनेवाले परेशान किशोरों की भीड ने मुझे उस बात की पुन: याद दिला दी। उस समय अपने माता पिता के साथ आनेवाले सभी दुखी किशोरों का जन्‍म 1981 , खासकर इसके पूर्वार्द्ध और खासकर इसी वर्ष जनवरी फरवरी में हुआ था। इनमें साधारण और असाधारण दोनो तरह के बच्‍चे थे , जो अचानक बडी समस्‍याओं से गुजरने लगे थे। अपनी उतनी पुरानी सोंच को उस समय फलीभूत होता देख मैं तो आश्‍चर्य चकित थी। मैने अपनी ग्राफ वाली डायरी को निकाला और देखकर सबों को समझाया कि 2005 के बाद कैरियर के वक्‍त उन्‍हें कोई परेशानी नहीं रहेगी , इसलिए अभी के किसी कष्‍ट और असफलता पर ध्‍यान न दें और आराम से अपनी ग्रेज्‍युएशन पूरी करें। 2005 के बाद उनमें से अधिकांश की ओर से सूचना मिल गयी कि वे कैरियर के मामले में सही जा रहे हैं और जुलाई 2007 से मई 2008 के मध्‍य वे अपनी स्थिति से बिल्‍कुल संतुष्‍ट थे।

इनलोगों के बारे में भविष्‍यवाणी करने के लिए मुझे कुंडली तक को देखने की आवश्‍यकता नहीं थी। क्‍यूंकि ये बिल्‍कुल सामान्‍य समस्‍या से गुजर रहे थे , जो 1981 के ग्रहों का प्रभाव था , चाहे उनका लग्‍न-नक्षत्र कोई भी हो , कुंडली कुछ भी बनें। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की यही विशेषता मुझे खासी आकर्षित करती है, जिसमें जातक के जन्‍म समय में मिनट और सेकण्‍ड की गडबडी से सारी भविष्‍यवाणियों के गलत होने का कोई भय नहीं होता।  इन दोनों बातों को मैं भूल चुकी थी , पर आज इधर उधर ढूंढते हुए वहीं पुरानी डायरी मेरे हाथ में पुन: आ गयी , जिसमें ग्रहों की शक्ति के आधार पर 1981 से लेकर 2000 तक का ग्राफ खींचा गया है। उसे उठाया तो सबसे पहले मुझे पहला पन्‍ना ही दिख गया , जिसमे 1981 के ग्रहों की स्थिति थी। अब मुझे मेरे लिए एक पोस्‍ट की सामग्री मिल गयी थी , सो इसे लिख ही डालना आवश्‍यक था।

अपने पाठकों को मैं जानकारी देना चाहूंगी कि 1981 में , खासकर इसके पूर्वार्द्ध में और इससे भी सूक्ष्‍म देखा जाए तो जनवरी और फरवरी 1981 में जन्‍मलेने वाले सारे लोग मई 1998 से लेकर मई 2000 तक बिल्‍कुल विपरीत परिस्थितियों को झेलने को विवश हुए , इस परेशानी के मूल में कोई भी कारण हो सकता है , पर इस दौरान जो जीवन उन्‍होने जीया , वो काफी कष्‍टकर था । जो उन्‍होने झेला , उसे उनके और उनके अभिभावक के सिवा कोई और नहीं समझ सकता है , प्रकृति की इस मार को ये 2005 के बाद अपने कैरियर के सुखद होने पर ही भूल सके। मई 2000 के बाद थोडी राहत तो मिली , पर पूरा सुधार 2005 के बाद ही हो पाया। जुलाई 2007 से मई 2008 के मध्‍य इनके कैरियर में एक उछाल आया , जिससे आगे की जीवनयात्रा आसान हो गयी है। अब थोडी बहुत समस्‍या दिखाई भी पडे , तो वो पूर्ण तौर पर प्रभाव डालने में अक्षम रहेगी , इतना इनके लिए बहुत संतोषजनक है , वैसे पूरी परिस्थिति कुंडली देखने के बाद ही स्‍पष्‍ट हो सकती है।





सोमवार, 18 जनवरी 2010

जल्‍द अपने बच्‍चों को 'रंग बिरंगी' सब्‍जी खिलाएं .. अब मौसम समाप्‍त होने वाला है !!

हम सभी जानते हैं कि मनुष्‍य के जीवन में स्‍वास्‍थ्‍य का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है और इसे बनाए रखने के लिए भारत के हर प्रदेश की हमारी थाली सक्षम है। पर आजकल की व्‍यस्‍तता में जहां खाना बनाने में महिलाएं भी शार्टकट के प्रयास में होती हैं , वही बच्‍चे की रूचि भी रेडीमेड खानों में बढती जा रही है। हरी सब्जियां तो शायद ही आज के बच्‍चे पसंद से खाते हों। ऐसे में जरूरत होती है , बच्‍चों को बहाने से फायदेमंद खाना खिलाया जाए। कुछ दिन पहले मैने एक पोस्‍ट किया था जिसमें जेली के बहाने बच्‍चों को आंवला खिलाने के बारे में लिखा था और आंवले की जेली बनाने की विधि भी दी थी। आज बिना मसाले की एक रंग बिरंगी सूखी सब्‍जी बनाने की जानकारी दे रही हूं , जो बच्‍चों के लिए बहुत पौष्टिक है। खासकर जाडे के दिन में यह सब्‍जी इसलिए बनायी जा सकती है , क्‍यूंकि अभी बाजार में तरह तरह की सब्जियों मिल रही हैं। इसे बनाने के बाद तबतक  बार बार 'रंग बिरंगी सब्‍जी' की चर्चा करें, जबतक बच्‍चे उससे ललच नहीं जाएं , क्‍यूंकि बच्‍चे मन से कोमल होते हैं और उसपर उन घटनाओं का बहुत अधिक प्रभाव पडता है , जिन्‍हें बारंबार देखते या सुनते हैं।

आप बराबर मात्रा में आलू , प्‍याज , फूलगोभी , फ्रेंचबीन , गाजर , लाल चुकंदर , शिमला मिर्च , मटर के दाने और टमाटर या इसी प्रकार की सब्जियों को छीलकर इसके पतले पतले टुकडे करें । कडाही में तेल या रिफाइंड डालकर हरे मिर्च के बडे टुकडे डालें , ताकि बच्‍चों के लिए परोसने के पहले इसे हटाया जा सके , क्‍यूंकि एक दिन भी मिर्च लग गयी तो मनोवैज्ञानिक तौर पर इसका बुरा प्रभाव पडेगा। इसके अतिरिक्‍त कुछ दाने मेथीदाने के डाले। उसमें प्‍याज और गोभी डालकर तेज आंच पर थोडी देर चलाने के बाद मटर , टमाटर और शिमला मिर्च जैसे जल्‍द गलनेवाली सब्जियों को छोडकर बाकी सारे डालकर बिना मसाले के सिर्फ नमक और हल्‍दी डालकर इसे गलने छोड दें । जब ये गल जाए , तो बची सब्जियां डालकर ढंक ढंक कर तेज आंच पर इस तरह भूने की वे सिर्फ गलें , पर एक दूसरे से बिल्‍कुल मिक्‍स न हों। सभी सब्जियों के टुकडे अलग अलग दिखाई पडते रहें। मिर्च और मसाला न होने से तथा बनने के बाद सुंदर दिखने से इसे बच्‍चे खाना पसंद करते हैं और इसकी पौष्टिकता का तो आप अनुमान कर ही सकते हैं। तो जल्‍दी करें , रंग बिरंगी सब्जियों का मौसम समाप्‍त जो होने वाला है।




रविवार, 17 जनवरी 2010

फलित ज्योतिष आखिर क्‍या है ??..एक सांकेतिक विज्ञान या मात्र अंधविश्वास !!


आसमान के विभिन्‍न भागों में विभिन्‍न ग्रहों की स्थिति के कारण पृथ्‍वी पर या पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन फलित ज्‍योतिष कहलाता है। यह विज्ञान है या अंधविश्वास, इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है। परंपरावादी और अंधविश्वासी विचारधारा के लोग,जो कई स्थानों पर ज्योतिष पर विश्वास करने के कारण धोखा खा चुकें हैं , भी इस शास्त्र पर संदेह नहीं करते। वे ज्‍योतिष को मानते हुए सारा दोषारोपण ज्योतिषी पर कर देते  है। दूसरी ओर वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत ज्‍योतिष को जीवनभर न मानने वाले व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं।

ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मै सरकार ,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानती हूं। इन्होने आजतक ज्योतिष को न तो अंधविश्वास ही सिद्ध किया और न ही विज्ञान ? सरकार यदि ज्योतिष को अंधविश्वास समझती तो जन्मकुंडली बनवाने या जन्मपत्री मिलवाने के काम में लगे ज्योतिषियों पर कानूनी अड़चनें आ सकती थी। यज्ञ हवन करवाने या तंत्र-मंत्र का प्रयोग करनेवाले ज्योतिषियों के कार्य में बाधाएं आ सकती थी। सभी पत्रिकाओं में राशि-फल के प्रकाशन पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ , मद्यपान , बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। मैं पूछती हूं , आखिर क्यों ??

क्या सरकार ज्योतिष को विज्ञान समझती है ? नहीं, अगर वह इस विज्ञान समझती तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, सेमिनार आदि का आयोजन होता तथा विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। परंतु आजतक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए तो लगभग सभी पत्रिकाएं यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, इंटरव्यू , भविष्यवाणियॉ आदि निकालती रहती है पर जब आजतक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका, जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया तो फिर ऐसे लेखों या समाचारों का क्या औचित्य ? पत्रिकाओं के विभिन्न लेखों हेतु किया जानेवाला ज्योतिषियों कें चयन का तरीका ही गलत है । उनकी व्यावसायिक सफलता को उनके ज्ञान का मापदंड समझा जाता है , लेकिन वास्तव में किसी की व्यावसायिक सफलता उसकी व्यावसायिक योग्यता का परिणाम होती है ,न कि विषय-विशेष की गहरी जानकारी। इन सफल ज्योतिषियों का ध्यान फलित ज्योतिष के विकास में न होकर अपने व्यावसायिक विकास पर होता है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा ज्योतिष विज्ञान का प्रतिनिधित्व करवाना पाठकों को कोई संदेश नहीं दें पाता है।

जो ज्योतिषी ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध कर सकें , उन्हें ही अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए या एक प्रतियोगिता में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान देकर सभी ज्योतिषियों से उस जन्मपत्री का विश्लेषण करवाना चाहिए । उसकी पूरी जिंदगी कें बारे में जो ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी कर सके उसे ही अखबारों ,पत्रिकाओं में स्थान मिलना चाहिए। परंतु ज्योतिषियों की परीक्षा लेने के लिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया ,फलस्वरुप ज्योतिष की गहरी जानकारी रखनेवाले समाज के सम्मुख कभी नहीं आ सके और समाज नीम-हकीम ज्योतिषियों से परेशान होता रहा। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ लोग और कुछ संस्थाएं ऐसी है , जो ज्योतिष विज्ञान के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे ज्योतिष से संबंधित बातों को सुनने में रुचि कम और उपहास में रुचि ज्यादा रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में समन्वयवादिता की कमी भी आजतक ज्योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध कर पायी है।

ज्योतिष विज्ञान की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए यह कहा जाता है कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, किन्तु ज्योतिष शास्त्र यह मानता है कि पृथ्वी स्थिर है और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। जब यह परिकल्पना ही गलत है तो उसपर आधारित भविष्यवाणी कैसे सही हो सकती है ? पर बात ऐसी नहीं है । जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं , वह चलायमान होते हुए भी हमारे लिए स्थिर है , ठीक उसी प्रकार , जिस प्रकार हम किसी गाड़ी में चल रहे होते हैं , वह हमारे लिए स्थिर होती है और किसी स्टेशन पर पहुंचते ही हम कहते हैं , `अमुक शहर आ गया।´ जिस पृथ्वी में हम रहतें हैं , उसमें हम स्थिर सूर्य के ही उदय और अस्त का प्रभाव देखते हैं। इसी प्रकार अन्य आकाशीय पिंडों का भी प्रभाव हमपर पड़ता है। पृथ्वी से कोई कृत्रिम उपग्रह को किसी दूसरे ग्रह पर भेजना होता है तो पृथ्वी को स्थिर मानकर ही उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की दूरी निकालनी पड़ती है। जब यह सब गलत नहीं होता तो ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानते हुए उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की गति पर आधारित फल कैसे गलत हो सकता है ?

ज्योतिष की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सौरमंडल में सूर्य तारा है , पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं । इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी महत्वहीन है। इसके उत्तर में मेरा यह कहना है कि अलग अलग विज्ञान में एक ही शब्द का अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकता हैं । अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में व्यक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। प्राचीन खगोल शास्त्रियों को इन बातों की जानकारी थी , तभी तो सबकी सटीक गणना के सूत्र विकसित किए जा सके थे , किन्तु फलित ज्योतिष पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंडल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है । सूर्य, चंद्र , बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी , उसके जड़-चेतन और मानव-जाति पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को 'ग्रह' यानि पृथ्‍वी के जड चेतन पर प्रभाव डालनेवाला कहा जाता है। ग्रहों की इस शास्त्र में यही परिभाषा दी गयी है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।

तीसरा तर्क यह है कि ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रह माना गया है , जबकि ये ग्रह नहीं हैं । ये तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले यह जानकारी आवश्यक है कि राहू और केतु हैं क्या ? पृथ्वी को स्थिर मानने से पृथ्वी के चारो ओर सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण-पथ बन जाता है। पृथ्वी के चारो ओर चंद्रमा का एक परिभ्रमण पथ है ही । ये दोनो परिभ्रमण-पथ एक दूसरे को दो विन्दुओं पर काटते हैं । अतिप्राचीनकाल में ज्योतिषियों को मालूम नहीं था कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंडों पर पड़ने से ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं। जब ज्योतिषियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते देखा, तो वे इसके कारण ढूंढ़ने लगे। दोनो ही समय इन्होने पाया कि सूर्य, चंद्र, पृथ्वी एवं सूर्य, चंद्र के परिभ्रमण-पथ पर कटनेवाले दोनो विन्दु लम्बवत् हैं।

बस उन्होने समझ लिया कि इन्हीं विन्दुओं के फलस्वरुप खास अमावस्या को सूर्य तथा पूर्णिमा की रात्रि को चंद्र आकाश से लुप्त हो जाता है। उन्होने इन विन्दुओं को महत्वपूर्ण पाकर इन विन्दुओं का नामकरण `राहू´ और `केतु´ कर दिया। इस स्थान पर उन्होने जो गल्ती की, उसका खामियाजा ज्योतिष विज्ञान अभी तक भुगत रहा है ,क्योंकि राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड हैं ही नहीं और हमलोग ग्रहों की जिस उर्जा से भी प्रभावित हो---गुरुत्वाकर्षण, गति, किरण या विद्युत-चुम्बकीय शक्ति, राहू और केतु इनमें से किसी का भी उत्सर्जन नहीं कर पाते। इसलिए इनसे प्रभावित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यही कारण है कि राहू और केतु पर आधारित भविष्यवाणी सही नहीं हो पाती। मेरे इस तर्क से परंपरागत ज्‍योतिषी आहत भी हो सकते हैं , पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के जनक श्री विद्या सागर महथा जी ने अपने 45 वर्षों के शोध में कहीं भी राहू केतु का प्रभाव नहीं पाया।

चौथा तर्क यह है कि सभी ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में विविधता क्यों होती है ? हम सभी जानते हैं कि कोई भी शास्त्र या विज्ञान क्यों न हो कार्य और कारण में सही संबंध स्थापित किया गया हो तो निष्कर्ष निकालने में कोई गल्ती नहीं होती। इसके विपरित यदि कार्य और कारण में संबंध भ्रामक हो तो निष्कर्ष भी भ्रमित करनेवाले होंगे। ज्योतिष विज्ञान का विकास बहुत ही प्राचीन काल में हुआ। उस काल में कोई भी शास्त्र काफी विकसित अवस्था में नहीं था।सभी शास्त्रों और विज्ञानों में नए-नए प्रयोग कर युग के साथ-साथ उनका विकास करने पर बल दिया गया , पर अफसोस की बात है कि ज्योतिष विज्ञान अभी भी वहीं है जहॉ से इसने यात्रा शुरु की थी । महर्षि जैमिनी और पराशर के द्वारा ग्रह शक्ति मापने और दशाकाल निर्धारण के जो सूत्र थे ,उसकी प्रायोगिक जॉच कर उन्हें सुधारने की दिशा में कभी कार्य नहीं किया गया।

अंधविश्वास समझते हुए ज्योतिष-शास्त्र की गरिमा को जैसे-जैसे धक्का पहुंचता गया, इस विद्या का हर युग में ह्रास होता ही गया। फलस्वरुप यह 21वीं सदी में भी घिसट-घिसटकर ही चल रहा है। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में अंतर का कारण कार्य और कारण में पारस्परिक संबंध की कमी होना है। ग्रह-शक्ति निकालने के लिए मानक-सूत्र का अभाव है , इसके कुल 10-12 सूत्र हैं ,सभी ज्योतिषी अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं। दशाकाल निर्धारण का एक प्रामाणिक सूत्र है , पर उसमें एक साथ जातक के चार-चार दशा चलते रहतें हैं-एक महादशा, दूसरी अंतर्दशा, तीसरी प्रत्यंतर दशा और चौथी सूक्ष्म महादशा। इतने नियमों को यदि कम्प्यूटर में भी डाल दिया जाए , तो वह भी सही परिणाम नहीं दे पाता है , तो पंडितों की भविष्यवाणी में अंतर होना तो स्वाभाविक है। सभी ज्योतिषी अलग अलग दशा को महत्वपूर्ण मान लें तो सबके कथन में अंतर तो आएगा ही ।

अगला तर्क यह है कि आजकल सभी पत्रिकाओं में राशिफल की चर्चा रहती है। एक राशि में जन्म लेनेवाले लाखों लोगों का भाग्य एक जैसा कैसे हो सकता है ? यह वास्तव में आश्चर्य की बात है , किन्तु यह सच है कि किसी ग्रह का प्रभाव एक राशि वालो पर एक जैसा पडता है , उससे भी अधिक एक लग्न के लाखों करोड़ों लोगों पर किसी ग्रह का एक जैसा फल देखा गया है। `एक जैसा फल´ से एक स्वभाव वाले फल का बोध होगा ,न कि मात्रा में समानता का । मात्रा का स्तर तो उसकी जन्मकुंडली एवं अन्य स्तर पर निर्भर करता है ,जैसे किसी खास समय किसी लग्न के लिए धन का लाभ एक मजदूर के लिए 50-100 रु का तथा एक बड़े व्यवसायी के लिए लाखों-करोड़ों का हो सकता है। लेकिन अधिकांश लोगों को अपने लग्न या चंद्र राशि तक की जानकारी नहीं होती , वे पत्रिकाओं में निकलनेवाले राशिफल को देखकर भ्रमित होते रहते हैं।

अगला तर्क यह है कि किसी दुर्घटना में एक साथ सैकड़ों हजारो लोग मारे जाते हैं ,क्या सभी की कुंडली में ज्योतिषीय योग एक-सा होता है ? इस तर्क का यह उत्तर दिया जा सकता है कि ज्योतिष में अभी काफी कुछ शोध होना बाकी है , जिसके कारण किसी की मृत्यु की तिथि बतला पाना अभी संभव नहीं है ,पर दुर्घटनाग्रस्त होनेवालों के आश्रितों की जन्मकुंडली में कुछ कमजोरियॉ --संतान ,माता ,पिता ,भाई ,पति या पत्नी से संबंधित कष्ट अवश्य देखा गया है । किसी दुर्घटना में एक साथ इतने लोगों की मृत्यु प्रकृति की ही व्यवस्था हो सकती है वरना ड्राइवर या रेलवे कर्मचारी की गल्ती का खामियाजा उतने लोगों को क्यों भुगतना पड़ता है ,उन्हें मौत की सजा क्यों मिलती है, जो बड़े-बड़े अपराधियों को बड़े-बड़े दुष्कर्म करने के बावजूद नहीं दी जाती। कल हेति में हुई दुर्घटना के कारण में तो आपने ग्रहों का प्रभाव देखा।

इसी तरह गणित की सुविधा के लिए किए गए आकाश के 12 काल्पनिक भागों के आधार पर भी ज्योतिष को गलत साबित करने की दलील दी जाती है। यदि इसे सही माना जाए तो आक्षांस और देशांतर रेखाओं पर आधारित भूगोल को भी गलत माना जा सकता है। आकाश के इन काल्पनिक 12 भागों की पहचान के लिए इनकें विस्तार में स्थित तारासमूहों के आधार पर किया जानेवाला नामकरण पर किया जानेवाला विवाद का भी कोई औचित्य नहीं हैं , क्योंकि आकाश के 360 डिग्री को 12 भागों में बॉट देने से अनंत तक की दूरी एक ही राशि में आ जाती है।

पूजा-पाठ या ग्रह की शांति से भाग्य को बदल दिए जाने की बात भी वैज्ञानिको के गले नहीं उतरती है। हमारे विचार से भी ऐसा कर पाना असंभव दिखता है। किसी बालक के जन्म के समय की सभी ग्रहों सहित आकाशीय स्थिति के अनुसार जो जन्मकुंडली बनती है, उसके अनुसार उसके पूरे जीवन की रुपरेखा निश्चित हो जाती है , ऐसा हमने अपने अनुभव में पाया है। पूजा पाठ या ग्रह-शांति से भाग्य में बदलाव लाया जा सकता , तो प्राचीन काल से इसका सर्वाधिक लाभ पंडित वर्ग के लोग ही उठाते और समाज के अन्य वर्गों की तरक्की में रुकावटें आती।

लेकिन यह सत्य है कि पूजा-पाठ, यज्ञ-जाप, मंगला-मंगली, मुहूर्त्‍त आदि अवांछित तथ्यों एवं हस्‍तरेखा , हस्‍ताक्षर विज्ञान , तंत्र- , जादू-टोना, भूत-प्रेत, झाडफूंक , न्‍यूमरोलोजी , फेंगसुई, वास्तु, टैरो कार्ड, लाल किताब आदि ज्‍योतिष से इतर विधाओं के भी ज्‍योतिष माने जाने से ही ज्योतिष विज्ञान की तरक्की में बाधा पहुंची है। ज्योतिष विज्ञान ग्रहों की स्थिति का मात्र पृथ्‍वी के जड चेतन से संबंध रखता मूलत: संकेतों का विज्ञान है , यह बात न तो ज्योतिषियों को और न ही जनता को भूलनी चाहिए। किन्तु जनता ज्योतिषी को भगवान बनाकर तथा ज्योतिषी अपने भक्तों को बरगलाकर फलित ज्योतिष के विकास में बाधा पहुंचाते आ रहे हैं। इस अनुच्‍छेद में लिखी गयी बातों से भी परंपरागत ज्‍योतिषी इत्‍तेफाक नहीं रख सकते हैं।

हर विज्ञान में सफलता और असफलता साथ-साथ चलती है। मेडिकल साइंस को ही लें। हर समय एक-न-एक रोग डॉक्टर को रिसर्च करने को मजबूर करते हैं। किसी परिकल्पना को लेकर ही कार्य-कारण में संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, पर सफलता पहले प्रयास में ही मिल जाती है, ऐसी बात नहीं है। अनेकानेक प्रयोग होते हैं , करोड़ों-अरबों खर्च किए जाते हैं, तब ही सफलता मिल पाती है । भूगर्भ-विज्ञान को ही लें, प्रारंभ में कुछ परिकल्पनाओं को लेकर ही कि यहॉ अमुक द्रब्य की खान हो सकती है , कार्य करवाया जाता था ,परंतु बहुत स्थानों पर असफलता हाथ आती थी। धीरे-धीरे इस विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि किसी भी जमीन के भूगर्भ का अध्ययन कम खर्च से ही सटीक किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजने के लिए अरबों रुपए खर्च कर तैयार किए गए उपग्रह के नष्ट होने पर वैज्ञनिकों ने हार नहीं मानी। उनकी कमजोरियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारने का प्रयास किया गया तो अब सफलता मिल रही है। उपग्रह से प्राप्त चित्र के सापेक्ष की जानवाली मौसम की भविष्यवाणी नित्य-प्रतिदिन सुधार के क्रम में देखी जा रही है।

मानव जब-जब गल्ती करते हैं , नई-नई बातों को सीखते हैं ,तभी उनका पूरा विकास हो पाता है , परंतु ज्योतिष-शास्त्र के साथ तो बात ही उल्टी है , अधिकांश लोग तो इसे विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं , सिर्फ खामियॉ ही गिनाते हैं और जो मानते हैं , वे अंधभक्त बने हुए हैं । इन दोनो में से किसी के द्वारा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' का विकास नहीं होने वाला। यदि कोई ज्योतिषी सही भविष्यवाणी करे तो उसे प्रोत्साहन मिले न मिले ,उसके द्वारा की गयी एक भी गलत भविष्यवाणी का उसे व्यंग्यवाण सुनना पड़ता है। इसलिए तो अभी तक ज्योतिषियों को इस राह पर चलना पड रहा हैं , जहॉ चित्त भी उनकी और पट भी उनकी ही हो। यदि उसने किसी से कह दिया, `तुम्हे तो अमुक कष्ट होनेवाला है , पूजा करवा लो ,यदि उसने पूजा नहीं करवाई और कष्ट हो गया,तो ज्योतिषी की बात बिल्कुल सही। यदि पूजा करवा ली और कष्ट हो गया तो `पूजा नहीं करवाता तो पता नहीं क्या होता´ । यदि पूजा करवा ली और कष्ट नहीं हुआ तो `ज्योतिषीजी तो किल्कुल कष्ट को हरनेवाले हैं´ जैसे विचार मन में आते हैं। हर स्थिति में लाभ भले ही पंडित को हो , फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी धक्का पहुंचता आ रहा है।

किन्तु लाख व्यवधानों के बावजूद भी प्रकृति के हर चीज का विकास लगभग निश्चित होता है, प्रकृति का यह नियम है कि जिस बीज को उसने पैदा किया , उसे उसकी आवश्यकता की वस्तु मिल ही जाएगी । देख-रेख नहीं होने के बावजूद प्रकृति की सारी वस्तुएं प्रकृति में विद्यमान रहती ही है। बालक जन्म लेने के बाद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी मॉ पर निर्भर होता है। यदि मॉ न हों , तो पिता या परिवार के अन्य सदस्य उसका भरण-पोषण करते हैं। यदि कोई न हो , तो बालक कम उम्र में ही अपनी जवाबदेही उठाना सीख जाता है।

 एक पौधा भी अपने को बचाने के लिए कभी टेढ़ा हो जाता है , तो कभी झुक जाता है। लताएं मजबूत पेड़ों से लिपट कर अपनी रक्षा करती हैं । कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सबकी रक्षा किसी न किसी तरह हो ही जाती है और ऐसा ही ज्योतिष शास्त्र के साथ हुआ। आज जब सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं ज्योतिष विज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपना रही है, सभी परंपरागत ज्योतिषी राहू , केतु और विंशोत्तरी के भ्रामक जाल में फंसकर अपने दिमाग का कोई सदुपयोग न कर पाने से तनावग्रस्त हैं , वहीं दूसरी ओर ज्योतिष विज्ञान का इस नए वैज्ञानिक युग के अनुरुप गत्यात्मक विकास हो चुका है। `गत्यात्मक ज्योतिषीय अनुसंधान केन्द्र´ द्वारा ग्रहों के गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति को निकालने के सूत्र की खोज के बाद आज ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन चुका है ।

जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए दो वैज्ञानिक पद्धतियों `विद्यासागर दशा पद्धति´ और `विद्या सागर गोचर प्रणाली´ का विकास किया गया है , जिसके द्वारा कोई भी व्‍यक्ति अपने जन्‍म विवरण के द्वारा अपने पूरे जीवन के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र प्राप्त कर सकते हैं। इस दशा-पद्धति के अनुसार शरीर में स्थित सभी ग्रंथियों की तरह सभी ग्रह एक विशेष समय ही मानव को प्रभावित करते हैं। जन्म से 12 वर्ष तक की अवधि में मानव को प्रभावित करनेवाला मन का प्रतीक ग्रह चंद्रमा है , इसलिए ही बच्चे सिर्फ मन के अनुसार कार्य करतें हैं ,इसलिए अभिभावक भी खेल-खेल में ही उन्हें सारी बातें सिखलाते हैं। 12 वर्ष से 24 वर्ष तक के किशोरों को प्रभावित करनेवाला विद्या , बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक ग्रह बुध होता है, इसलिए इस उम्र में बच्चों में सीखने की उत्सुकता और क्षमता काफी होती है।

24 वर्ष से 36 वर्ष तक के युवकों को प्रभावित करनेवाला शक्ति-साहस का प्रतीक ग्रह मंगल होता है, इसलिए इस उम्र में युवक अपने शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करते हैं । 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक के प्रौढ़ों को प्रभावित करनेवाला युक्तियो का ग्रह शुक्र है , इसलिए इस उम्र में अपनी युक्ति-कला का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है । 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र के व्यक्ति को प्रभावित करनेवाला ग्रह समस्त सौरमंडल की उर्जा का स्रोत सूर्य है, इसलिए इस उम्र के लोगों पर अधिकाधिक जिम्मेदारियॉ होती हैं, बड़े-बड़े कार्यों के लिए उन्हें अपने तेज और धैर्य की परीक्षा देनी पड़ती है। 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र को प्रभावित करनेवाला धर्म, न्याय का प्रतीक ग्रह बृहस्पति है, इसलिए यह समय सभी प्रकार के जवाबदेहियों से मुक्त होकर धार्मिक जीवन जीने का माना गया है। 72 वर्ष से 84 वर्ष तक की अतिवृद्धावस्था को प्रभावित करनेवाला सौरमंडल का दूरस्थ ग्रह शनि है। इसी प्रकार 84 से 96 तक यूरेनस , 96 से 108 तक नेपच्यून और 108 से 120 वषZ की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव माना गया है।

इस दशा-पद्धति के अनुसार यदि पूर्णिमा के समय बच्चे का जन्म हो तो बचपन में स्वास्थ्य की मजबूती और प्यार-दुलार का वातावरण मिलने के कारण उनका मनोवैज्ञानिक विकास काफी अच्छा होता हैं। इसके विपरित, अमावस्या के समय जन्म लेनेवाले बच्चे में स्वास्थ्य या वातावरण की गड़बड़ी से मनोवैज्ञानिक विकास बाधित होते देखा गया है। बच्चे के जन्म के समय बुध ग्रह की स्थिति मजबूत हो तो विद्यार्थी जीवन में उन्हें बौद्धिक विकास के अच्छे अवसर मिलते हैं । विपरित स्थिति में बौद्धिक विकास में कठिनाई आती हैं। जन्म के समय मंगल मजबूत हो तो 24वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक कैरियर में मनोनुकूल माहौल प्राप्त होता है। विपरीत स्थिति में जातक अपने को शक्तिहीन समझता है।

जन्म के समय मजबूत शुक्र की स्थिति 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक सारी जवाबदेहियों को सुचारुपूर्ण ढंग से अंजाम देती हैं, विपरीत स्थिति में , काम सुचारुपूर्ण ढंग से नहीं चल पाता है। इसी प्रकार मजबूत सूर्य 48 वर्ष से 60 वर्ष तक व्यक्ति के स्तर में काफी वृद्धि लाते हैं, किन्तु कमजोर सूर्य बड़ी असफलता प्रदान करते हैं। जन्मकाल का मजबूत बृहस्पति से व्यक्ति का अवकाश-प्राप्त के बाद का जीवन सुखद होता हैं।विपरीत स्थिति में अवकाश प्राप्‍त करने के बाद उनकी जवबदहेही खत्म नहीं हो पाती हैं। मजबूत शनि के कारण 72 वर्ष से 84 वर्ष तक के अतिवृद्ध की भी हिम्मत बनी हुई होती है, जबकि कमजोर शनि इस अवधि को बहुत कष्टप्रद बना देते हैं। इन ग्रहों का सर्वाधिक बुरा प्रभाव क्रमश: 6ठे, 18वें, 30वें, 42वें ,54वें, 66वें और 78वें वर्ष में देखा जा सकता है।

इसी प्रकार 'विद्यासागर गोचर पद्धति' के द्वारा हम आज आसमान की विभिन्‍न स्थिति का पृथ्‍वी या व्‍यक्ति पर पडने वाले प्रभाव को देखते हुए उसके एक एक वर्ष , एक एक माह, एक एक दिन और दो दो घंटे तक की स्थिति का अकलन कर पाते हैं। 'गत्यात्मक ज्योतिष' की खोज के पश्चात् किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में संकेत देना असंभव तो नहीं , मुश्किल भी नहीं रह गया है , क्योंकि व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करने में बड़ा अंश विज्ञान के नियम का होता है , छोटा अंश ही सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या पारिवारिक होता है या व्यक्ति खुद तय करता है।

वास्तव में , हर कर्मयोगी आज यह मानते हैं कि कुछ कारकों पर आदमी का वश होता है , कुछ पर होकर भी नहीं होता और कुछ कुछ पर तो होता ही नहीं । व्यक्ति का एक छोटा निर्णय भी गहरे अंधे कुएं में गिरने या उंची छलांग लगाने के लिए काफी होता है। इतनी अनिश्चितता के मध्य भी अगर ज्योतिष भविष्य में झांकने की हिम्मत करता आया है तो वह उसका दुस्साहस नहीं, वरण् समय-समय पर किए गए रिसर्च के मजबूत आधार पर उसका खड़ा होना है। और जिस दिन वैज्ञानिक इस बात को समझ जाएंगे , फलित ज्‍योतिषियो के साथ मिलकर काम करेंगे , ज्‍योतिष दिन दूनी रात चौगुनी तरक्‍की करेगा । और उसके बाद कल बिल्‍कुल अंधेरा नहीं होगा , कल को समझने के लिए हमारे पास सत्‍यापित सिद्धांतों के द्वारा निकाला गया संकेत होगा , पर सरकारी , गैर सरकारी और अर्द्ध सरकारी किसी भी संगठन और आम जनों के सहयोग न मिलने से इसमें देर हो रही है , देर होती रहेगी , इसमें कोई संदेह नहीं है !!