शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

गिरीश बिल्‍लौरे जी के द्वारा ली गयी मेरी पॉडकास्‍ट इंटरव्‍यू का दूसरा भाग सुनें !!

कई दिन पूर्व गिरीश बिल्‍लौरे जी के द्वारा ली गयी इंटरव्‍यू के पहले भाग का लिंक मैने आपलोगों को दिया था । आज दूसरे भाग का लिंक भी दे रही हूं , कृपया सुने और उचित प्रतिक्रिया देने का कष्‍ट करें !!

घुंघराले बालों वाली गोरी खूबसूरत कन्‍या बारंबार मेरी अंतरात्‍मा को झकझोर रही है !!

अपने लक्ष्‍य के प्रति मैं जितनी ही गंभीर रहती हूं और सफलता के लिए जितना ही प्रयत्‍न करती हूं , अपने सुख की चिंता उतनी ही कम रहती है। मुझे न तो ईश्‍वर से , न अपने परिवार से और न ही जान या पहचानवालों से कोई शिकायत रहती है। मुझपर बडा से बडा कष्‍ट भी आ जाए , तो मैं उन दीन दुखियों के बारे में सोंचती हूं , जिनके हिस्‍से कष्‍ट ही कष्‍ट आया। ऐसे बहुत सारे लोग हैं , जिनके कष्‍ट को देखने के बाद अपने कष्‍ट बहुत छोटे लगते हैं। जिनके जीवन को मैने काफी नजदीक से देखा है , उसमें सबसे अधिक कष्‍ट पाने वाले दो परिवार की कहानी मैने इस और इस आलेख में प्रेषित की है। इनकी चर्चा करने के बाद 19 वर्ष की एक घुंघराले बालों वाली गोरी खूबसूरत कन्‍या निरीह भाव से बारंबार मेरी अंतरात्‍मा को झकझोर रही है कि क्‍या उससे दुखी भी इस दुनिया में कोई हो सकता है, जो मैने उसे इन दोनो के स्‍थान पर नहीं रखा ??

हालांकि अब उसकी उम्र 42 वर्ष की हो चुकी है , उसके जीवन का बहुत हिस्‍सा अभी बाकी है , शायद कोई सुखात्‍मक मोड आए , यही सोंचकर मैने इसे तीसरे स्‍थान में रखा है , पर कहीं से कोई भी सकारात्‍मक उम्‍मीद नहीं दिखती है। मेरे चेहरे के सामने उसका वही रूप आ रहा है , जिसे मैने उसके विवाह के पूर्व ही देखा था । बचपन से ही उसके प्‍यारे रूप को देखती आ रही थी, उसके लंबे चौडे परिवार में पांच बुआ थी , जिसमें से दो विवाह के बाद भी अपने बच्‍चों को लेकर पिता के घर में ही रहा करती थी। उसमें से एक परित्‍यक्‍ता और दूसरी विधवा थी , बाकी तीन बुआ की शादी भी नहीं हुई थी, उसी में से एक मेरी दोस्‍त थी। उसके पिताजी का नहाते वक्‍त डैम में डूबकर प्राणांत हो चुका था और वह अपनी विधवा मां के साथ अपने दादाजी के घर में रहा करती थी। दिनभर इतने बडे परिवार की सेवा टहल में व्‍यस्‍त मां से वह कितने प्‍यार की उम्‍मीद रख सकती थी ? पर लाचारों के दिन भी तो कट ही जाते हैं । धीरे धीरे तीनों बुआ का विवाह भी हो गया और वह घर में इकलौती रह गयी। बडे होने के बाद अपनी दोस्‍त यानि मेरी छोटी बहन के साथ मैने उसे देखा तो देखती ही रह गयी थी। अपनी मां की प्रतिमूर्ति उसकी सुंदरता की प्रशंसा भी कैसे करूं ?

फिर कुछ ही दिनों में मालूम हुआ कि घर के सारे लोग मिलकर उसके विवाह की तैयारी कर रहे थे। जानकर बहुत खुशी हुई , सुदर और स्‍मार्ट तो थी ही , एक सरकारी स्‍कूल के बहुत सुंदर और स्‍मार्ट शिक्षक से उसका विवाह तय हो गया। दादाजी और मामाजी , फूफाजी और अन्‍य सभी रिश्‍तेदार उसके विवाह में कुछ न कुछ मदद करने को तैयार थे। बहुत धूमधाम से उसका विवाह हुआ था , यहां तक कि गांव में पहली बार उसके विवाह में ही शादी की वीडियो रिकार्डिंग हुई थी , उनकी जोडी को देखकर गांववालों की खुशी का ठिकाना न था। खुशी खुशी वह ससुराल में रहने लगी और गुडिया जैसी एक कन्‍या को जन्‍म दिया। पर उस परिवार की खुशी को भी ग्रहण लग गया, उसके पति ने तबियत खराब होने पर अस्‍पताल की शरण ली तो डॉक्‍टरों ने उसे किसी गंभीर बीमारी से पीडित पाया । इलाज के दौरान ही उसकी मौत हो गयी और मात्र 22 वर्ष की उम्र में अपनी मां के समान ही एक बेटी को लेकर वह पूरी जिंदगी काटने को लाचार हुई। उसकी मां के लिए तो यह बहुत अच्‍छा हुआ कि ये सब देखने के पहले ही स्‍वर्ग सिधार गयी थी , पर बेटी के लिए यह और बुरा हुआ , जीवन भर बुरी से बुरी परिस्थिति में रोने के लिए उसे मां की गोद भी नसीब नहीं हो सकी। यहां भी पति की नौकरी पर उसके भाई ने ही अधिकार जमाया।

वो अकेली ससुरालवालों के साथ समायोजन कर किसी तरह जीवन की गाडी खींचती चली गयी। जिसका पति साथ न हो , उस भारतीय स्‍त्री की मुसीबत का अंदाजा कोई भी लगा सकता है। जीवनभर जो कहानी उसकी मां के साथ हुई थी , वही इसे भी झेलने को मजबूर होना पडा। मां को तो कभी कभार मन बहलाने को एक मायका भी था , पर बेटी के हिस्‍से से तो वह सुख भी प्रकृति ने छीन लिया था। आज अपनी मां और नानी से भी सुंदर उसकी बेटी बिल्‍कुल सयानी हो चुकी है , इंटर में पढ रही है। उसे बेटी के विवाह की चिंता है , मेरी बहन यानि अपनी सहेली से एक अच्‍छा सा लडका ढूंढने को कह रही है। ईश्‍वर से मेरी प्रार्थना है , उसका कष्‍ट यहीं से दूर करे , उसे बेटे समान एक दामाद दे दे , उसे ढेर सारी खुशियां दे , ताकि मेरे द्वारा बनायी गयी लिस्‍ट से वे दोनो बाहर हो जाएं । आशा है , आप सब भी उनके लिए प्रार्थना करेंगे।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

हाथ कंगल को आरसी क्‍या .. फिर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के मौसम के सिद्धांत की सत्‍यता की बारी आएगी !!

3 और 4 फरवरी को मौसम से संबंधित मेरे द्वारा की गयी भविष्‍यवाणी सही हुई या गलत , इसका फैसला करना आसान तो नहीं । मध्‍य प्रदेश , छत्‍तीसगढ और राजस्‍थान में जैसा मौसम देखने को मिला  , वो सामान्‍य नहीं था और इस कारण इन प्रदेशों में रहनेवाले लोग मेरी भविष्‍यवाणी को सही मान रहे हैं , तो दूसरी ओर दिल्‍ली, उत्‍तर प्रदेश और उसके उसके आसपास के लोग पूरी धूप का आनंद लेते हुए इसे गलत भी कह रहे हैं। भविष्‍यवाणी पूर्ण तौर पर सही हुई , ऐसा मैं भी स्‍वीकार नहीं कर सकती , पर तिथि का प्रभाव दिख जाने से ग्रहयोग का प्रभाव तो दिख ही गया है और इसे हल्‍के में नहीं लिया जाना चाहिए। ज्‍योतिष में शोध की अनंत संभावनाएं हैं और भविष्‍य को देखने का थोडा भी ज्ञान हमें असत्‍य से सत्‍य की ओर , अंधकार से प्रकाश की ओर तथा अनिश्चित से निश्चितता की ओर ले जा सकता है।


अभी तक ज्‍योतिष के पूर्ण विकास न होने के बहुत सारे कारण है , जिसमे से एक मुख्‍य कारण इसका जमाने के साथ परिवर्तनशील नहीं होना है और इसके लिए हम भारतीय पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं , जिन्‍होने बाद में ज्‍योतिष में कोई रिसर्च ही नहीं किया। दूसरों ने कह दिया कि हमारी परंपराएं गलत हैं , ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है तो हम आंख, कान सब मूंदे इसे गलत मानते जा रहे हैं, किसी के कुछ कहने का हमपर कोई असर ही नहीं हो रहा। वो तो भला हो हमारे पूर्वजों का , जिन्‍होने हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था इतनी चुस्‍त दुरूस्‍त बनायी थी, प्राचीन ज्ञान और परंपरा को संभाले जाने के लिए इतने सशक्‍त प्रयास हुए थे कि बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा लाख चाहते हुए भी उसे तोडा नहीं जा सका। हां, विभिन्‍न मुद्दों को लेकर भ्रांतियां अवश्‍य बन गयी हैं, लेकिन व्‍यवस्‍था टस से मस नहीं हो रही, क्‍युंकि अधिकांश भारतीयों को, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान, सिक्‍ख हों या ईसाई या फिर किसी भी जाति के, अपनी सभ्‍यता और संस्‍कृति के बारे में उन्‍हें अच्‍छी तरह पता है। इससे अच्‍छी संस्‍कृति कहीं हो ही नहीं सकती, बस इसे सही दिशा देने की आवश्‍यकता है। विदेशी आक्रमणों के दौरान आयी लाख कमजोरियों के बावजूद भी हमारी परंपराओं को और ज्‍योतिष को जिन लोगो ने मात्र धरोहर की तरह भी संभाले रखा, उनका हमें शुक्रिया अदा करना चाहिए , क्‍यूंकि उन्‍हीं के कारण हम इनकी कमजोरियों को दूर कर इसे आगे बढा सकते हैं। पर इस देश से इन्‍हें उखाड फेकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल सकती है। ज्‍योतिष को सत्‍य दिखलाते हुए प्रमाण हम आगे भी देते ही रहेंगे।


गूगल सर्च में 'आंधी बारिश' लिखकर न्‍यूज में सर्च करें, 12 जनवरी 2010 के आसपास के 13 खबर मिलेंगे और 4 फरवरी 2010 के एक स्‍थान पर 13 और दूसरे स्‍थान पर 3 खबर मिलेंगे, दोनो ही दिनों की तिथियों के बारे में मैने मौसम के लिए खास ग्रह स्थिति बतायी थी , तेज हवा और बारिश की संभावना जतायी थी और इतना ही 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को प्रमाणित करने के लिए काफी है। आनेवाले दिनों में बडे रूप में मौसम में अचानक बदलाव लाने वाली तिथियां 6 और 7 अप्रैल 2010 है , कृपया इसे अपनी डायरी में नोट कर लें। गर्मियों के दिन होने के बावजूद ऐसी ही आंधी आएगी, आसमान में बादल बनेंगे और कहीं तेज बारिश होगी , तो कहीं छींटे भी पडेंगे। इस प्रकार का मौसम कम से कम 9 अप्रैल तक बना रह सकता है , वैसे 11 अप्रैल तक भी उम्‍मीद दिखती है। इस बार लांगिच्‍यूड या लैटिच्‍यूड की चर्चा नहीं कर रही हूं, क्‍यूंकि चक्रवाती तूफान कहीं से शुरू होकर कहीं तक भी फैल सकता है। इस तरह अप्रैल में एक बार फिर से 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सिद्धांतों की परीक्षा की बारी आएगी। भला हाथ कंगन को आरसी क्‍या ??





अंतहीन कष्‍टों का जीवन झेलने का मजबूर एक दंपत्ति

पिछले दिनों अपनी एक पोस्‍ट में  मैने बताया था कि लेखक का नजरिया ही किसी कहानी को सुखात्‍मक या दुखात्‍मक बनाता है। जीवन के सुखभरे समय में जब कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो उसे सुखात्‍मक और जीवन के दुखभरे समय में कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो नो दुखात्‍मक बनता है। पर जीवन में कभी कभी किसी के जीवन का अंतिम समय अंतहीन कष्‍टों का बन जाता है , उसे सुखात्‍मक बनाया ही नहीं जा सकता। इसी सिलसिले में मैने  इस पोस्‍ट में मैने उस महिला की चर्चा की थी , जिसे अपने जीवन में सर्वाधिक कष्‍टप्रद जीवन झेलते देखा है । मैने जिनलोगों के जीवन को निकट से देखा है , उसमें दूसरे नंबर पर एक दंपत्ति को रखा जा सकता है।



उक्‍त दंपत्ति भी गांव के ही सही , पर अच्‍छे गृहस्‍थ परिवार के थे , उनके दो बेटे और तीन बेटियां थी। दोनों में से किसी को कोई बुरी आदत नहीं थी, पर किसी न किसी बीमारी या कुछ अन्‍य खर्च की वजह से धीरे धीरे सारे जमीन बिकते चले गए और जबतक बच्‍चे बडे हुए , वे लोग काफी गरीबी का जीवन गुजार रहे थे। गांव में रहते हुए लडकियों को मिडिल पास ही करवाया था , पर दोनो काफी सुंदर थी। सरकारी नौकरी कर रहे एक स्‍मार्ट लडके को उनकी बडी बेटी पसंद आ गयी। बिना दहेज के लडके ने अपनी ओर से पूरा खर्च और व्‍यवस्‍था करते हुए उससे ब्‍याह रचाया ही , दो चार वर्षों बाद एक संभ्रांत परिवार के अन्‍य लडके को ढूंढकर अपनी साली की शादी करवा दी। वह अपने ससुरालवालों को हर संभव मदद भी किया करता था। उसके बाद उनका जीवन कुछ राहत भरा हो गया।

दोनो बेटियों के तीन तीन बच्‍चे हुए , पर बेटियों के रंग रूप की तरह उनका भाग्‍य सुंदर न रहा। राजी खुशी कुछ दिन ही वे खुशी से रह पाए होंगे कि छोटे छोटे तीन बच्‍चों को छोडकर बडे दामाद चल बसे। बडी बेटी पर मुसीबत का पहाड टूट पडा , बेटी के ससुराल वाले बहू के नौकरी के पक्ष में नहीं थे , क्‍यूंकि वह उतनी पढी लिखी नहीं थी। उसे कंपनी में पति के जगह पर चपरासी की ही नौकरी मिल सकती थी , जो उनकी प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न बन रहा था। ससुरालवालों के दबाब में नौकरी दमाद के छोटे भाई को दे दी गयी। धीरे धीरे इस कष्‍ट से उन्‍होने समझौता किया और नाति नातिनों और अन्‍य बच्‍चों से भरे पूरे घर को देखकर ही खुश होते रहे। छोटे दामाद की आर्थिक स्थिति उतनी अच्‍छी न थी , इसलिए छोटी बेटी की ओर से भी चिंता बनी ही रही।

पर धीरे धीरे समय आराम से व्‍यतीत होता गया और शहर में रह रहे सभी नाती नातिने पढलिखकर अच्‍छे अच्‍छे जगहों पर पहुंच गए। छोटी बेटी का विवाह भी किसी तरह मिलजुलकर कर ही दिया गया , इस तरह उनका अपना सारा कष्‍ट जाता रहा। इन तीनो बेटियों के अलावे उनके दो बेटे थे , जिसमें से एक अपाहिज था , इसलिए उन्‍हें उससे कोई उम्‍मीद तो थी नहीं। एक बडे बेटे के सहारे जिंदगी की बाकी गाडी खींचने को वे तैयार थे। असुविधाओं के मध्‍य बेटा अच्‍छी तरह पढाई तो नहीं कर सका था, कोई व्‍यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी का भी अभाव था , इसलिए उसे एक सेठ के यहां काम करने को भेज दिया गया। बचपन से अपनी स्थिति को कमजोर देख रहा बेटा बहुत ही महत्‍वाकांक्षी होता जा रहा था। इसलिए उसने सेठ के यहां बहुत मन लगाकर पूरी जबाबदेही से काम करना शुरू किया , जिसके कारण शीघ्र ही वह अपने मालिक का प्‍यारा बन गया।

मालिक करोडपति थे , अच्‍छा खासा फर्म था उनका , बेटे को हर तरह की सुविधा दी गयी थी। उसके स्‍थायित्‍व और व्‍यवहार को देखते हुए उसका विवाह भी हो गया और एक बिटिया रानी ने जन्‍म भी ले लिया। जीवन भर के कष्‍ट के बाद उक्‍त दंपत्ति के जीवन की गाडी एक बार‍ फिर सही दिशा में मुड गयी थी , जिसे देखकर वे लोग कुछ शांति का अनुभव कर रहे थे , पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। बिटिया रानी एक वर्ष की भी नहीं होगी कि एक रात दुकान से घर लौटते वक्‍त किसी के द्वारा अपने मालिक पर चलायी गयी गोली का शिकार वह बन गया था और तत्‍काल घटनास्‍थल पर ही उसने दम तोड दिया था। भले ही अपनी जान देकर मालिक को बचाकर उसने नमक की कीमत चुका दी हो , पर माता के दूध की कीमत न चुका सका था। उसके माता पिता एक बार फिर अपनी विधवा बहू और अनाथ पोती को अपने अंतहीन आंसुओं के साथ संभालने को मजबूर थे। जहां छोटी मोटी समस्‍या में हम सब इतने परेशान हो जाते हैं , उन्‍होने जीवनभर इतनी तकलीफ कैसे झेली होगी और आगे भी झेलने को बाध्‍य हैं !!

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

मेरी भविष्‍यवाणी में जगह का अंतर , थोडी देर , तीव्रता में कमी क्‍या हुई .. विरोधियों के तो बल्‍ले बल्‍ले ही हो गए !!










मेरे ब्‍लॉग को नियमित तौर पर पढनेवाले पाठक इस बात से अवश्‍य परिचित हो गए होंगे कि मैं ज्‍योतिष के सैद्धांतिक आलेख नहीं लिखा करती। जहां एक ओर ज्‍योतिष में समाहित अवैज्ञानिक तथ्‍यों का भी मैं रहस्‍योद्घाटन करती हूं , वहीं ज्‍योतिष के वैज्ञानिक स्‍वरूप के व्‍यवहारिक प्रयोग की भी चर्चा करती हूं। ज्‍योतिष पर लोगों का विश्‍वास बनाने के लिए मैं हमेशा तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणियां किया करती हूं , जिसमें तुक्‍का का कोई सवाल ही नहीं उठता। सटीक हुई भविष्‍यवाणियां मेरे सिद्धांत की प्रामाणिकता को स्‍पष्‍ट करते हुए मेरे आत्‍म विश्‍वास में जितनी बढोत्‍तरी करती है , गलत होने वाली भविष्‍यवाणियां भी उस सिद्धांत में अपवाद को ढूंढकर मेरे 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को और सटीक बनाती है। इसलिए भविष्‍यवाणियों के सही और गलत होने से मेरे आत्‍म विश्‍वास पर कोई अंतर नहीं पडता , किसी भी विज्ञान में अपवाद न हो , तो फिर उसका विकास ही रूक जाएगा। 

3 और 4 फरवरी की ग्रहस्थिति के कारण भारत में उपस्थित होनेवाली परिस्थितियों , चाहे वो मौसम का हो , राजनीति का हो या फिर शेयर बाजार का , मैने जो भी आकलन किया था , परिस्थितियां वैसी नहीं बन सकी । यह जहां ज्‍योतिष प्रेमियों के लिए आहत वाली खबर होगी , विरोधियों के तो बल्‍ले बल्‍ले ही हो गए। वैसे जहां तक मेरा मानना है , मेरी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने पर कई बार ज्‍योतिष प्रेमी खुश होते हैं , तो कभी कभार विरोधियों को भी खुश होने की थोडी जगह तो मिलनी ही चाहिए। शेयर बाजार और राजनीतिक उथल पुथल के बारे में मेरी भविष्‍यवाणियां यदा कदा गलत हुई हैं , इसलिए सिद्धांतों की सटीकता पर कुछ संदेह बना हुआ है। 

पर मौसम के मामलों में ऐसा पहली बार हुआ है , इससे यही समझा जा सका है कि शायद अपवाद का जो कारक हो , वह बहुत वर्षों बाद इस वर्ष आया हो। अपवाद का कारण अभी तक भी समझ में नहीं आया , इसकी खोज जारी है। हालांकि छत्‍तीसगढ से कल रात से ही मौसम बिगडने की सूंचना ब्‍लॉग पर प्रकाशित की गयी है , पर यदि उसका प्रभाव एक दो दिन में उत्‍तरी भारत के अधिकांश हिस्‍सों पर पड जाता है , तब ही मैं अपनी भविष्‍यवाणी को सटीक समझूंगी , अन्‍यथा मैं उसे सटीक बनाने के प्रयास में ही लगी रहूंगी। अभी भी मुझे ग्रहों के प्रभाव पर विश्‍वास है , मौसम को प्रभावित करने वाले ग्रह स्थिति के आधार पर 2010 के पूरे वर्षभर के मौसम का खाका खींचते हुए एक आलेख का वादा मैने पाठकों से किया था , जिसे कुछ ही दिनों में अवश्‍य प्रेषित करूंगी। एक भविष्‍यवाणी के गलत होने से मैं कैसे मान लूं कि ग्रहों का प्रभाव मौसम पर नहीं पडता !


मुझे तो मालूम था ही कि मेरी गलती के कारण ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता पर सवाल उठाए जाएंगे। ज्‍योतिष की यही तो विडंबना है, सटीकता पर कोई पीठ थपथपाए या नहीं, गल्‍ती पर ध्‍यानाकर्षण स्‍वाभाविक है और यही ज्‍योतिष जैसे दैवी ज्ञान के पतन का कारण भी, अब ढाई वर्षो में तीन बार विरोधियों को ऐसा मौका मिला है। सब समय समय की बात होती है , 16 जनवरी को मेरे द्वारा दी गयी तिथि को भूकम्‍प के आ जाने से वे लोग उलूल जुलूल तर्क दे रहे थे और मैं आत्‍मविश्‍वास से भरी हुई थी। आज उनका आत्‍म विश्‍वास बढा हुआ है और मैं जो भी जबाब दूंगी, वह उलूल जुलूल तर्क होगा, बेहतर होगा कि चुप ही रहा जाए।


वैसे कोई भी क्षेत्र अपवाद से अछूता नहीं, अंतरिक्ष विज्ञान भी कल्‍पना चावला जी की मौत का जिम्‍मेदार है। प्रतिदिन डॉक्‍टर के द्वारा हजारों मरीजों के जान बचाए जा रहे हैं तो उन्‍हीं के द्वारा लापरवाही या अज्ञानता के कारण कुछ मौत के मुंह में भी ढकेले जा रहे हैं। विज्ञान के विकास से जितना सुख सुविधा मनुष्‍यों को मिली है , उससे कम ह्रास भी नहीं हुआ है। यहां तक कि ग्रहों के खराब रहने से बडे से बडे क्रिकेटर फॉर्म में नहीं होते, इतिहास की पुस्‍तकों में बडे से बडे राजाओं पर भी ग्रहों का प्रभाव देखा गया है ,  'महाभारत' भी गवाह है‍ कि अर्जुन जैसे पराक्रमी धनुर्धारी को एक आदिवासी भील से पराजित होना पडा था, जो प्रमाणित करता है कि समय बडा बलवान होता है। 


वैसे इस पोस्‍ट के लिखने और प्रकाशित होने तक बहुत जगहों पर आंधी और बारिश की खबर आ चुकी है , हां मेरे हिसाब से इस योग की तीव्रता जितनी होनी चाहिए थी , अभी तक नहीं दिखाई पडी है , वैसे अभी भी 4 फरवरी को पूरा होने में 6 घंटे बाकी है और इतने कम साधनों के मध्‍य एक दो दिन के एरर की छूट मुझे मिलनी चाहिए, विभिन्‍न हिस्‍सों में आंधी पानी के ये रहे सबूत ...
http://lalitdotcom.blogspot.com/2010/02/3-4.html
http://navbharattimes.indiatimes.com/delhiarticleshow/5511670.cms
http://www.bhaskar.com/2010/01/13/100113145501_188297.html
http://www.bhaskar.com/2010/01/24/100124034555_coldwave.html
http://www.bhaskar.com/2010/02/04/100204120602_249694.html
http://www.bhaskar.com/2010/02/04/100204015734_252326.html


बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

एक मजदूर के घर में कैसे बनी खीर ??

एक मजदूर के घर में कई दिनों से घर में खीर बनाने का कार्यक्रम बन रहा था , पर किसी न किसी मजबूरी से वे लोग खीर नहीं बना पा रहे थे। बडा सा परिवार , आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी करना जरूरी था , खीर बनाने के लिए आवश्‍यक दूध और चीनी दोनो महंगे हो गये थे। बहुत कोशिश करने के बाद कई दिनों बाद उन्‍होने आखिरकार खीर बना ही ली। खीर खाकर पूरा परिवार संतुष्‍ट था , उसकी पत्‍नी आकर हमारे बरामदे पर बैठी। आज पूरे परिवार ने मन भर खीर खाया था , यहां तक कि उसके घर आनेवाले दो मेहमानों को भी खीर खिलाकर विदा किया था।

हमारे घरवालों को आश्‍चर्य हुआ , कितना खीर बनाया इनलोगों ने ?
पूछने पर मालूम हुआ कि उनके घर में एक किलो चावल का खीर बना था।
यह हमारे लिए और ताज्‍जुब की बात थी , दूध कितना पडा होगा ?
मालूम हुआ .. 1 किलो।
अब हमारी उत्‍सुकता बढनी ही थी ..चावल गला कैसे ?
उसमें दो किलो पानी डाला गया।
अब इतनी मात्रा में खीर बनें तो चीनी तो पर्याप्‍त मात्रा में पडनी ही है , पूछने का कोई सवाल नहीं !!

इस बात से आपको हंसी तो नहीं आ रही, जरूर आ रही होगी
पर सोंचिए यदि हमने उस मजदूर को उसकी मजदूरी के पूरे पैसे दिए होते ,
तो वह ऐसी खीर तो न खाता  !
इस प्रकार जैसे तैसे जीवनयापन करने को तो बाध्‍य नहीं होता !
इसी प्रकार धीरे धीरे उसका जीवन स्‍तर गिरता गया होगा और हम अपने स्‍तर पर नाज कर रहे हैं !
क्‍या स्‍वीकार करने की हिम्‍मत है आपको ??




आज का दिन शेयर बाजार के लिए सर्वाधिक बुरा रह सकता है !!

अगस्‍त 2007 के बाद शेयर बाजार पर ग्रहों के पडने वाले प्रभाव के विश्‍लेषण के बाद अपने अनुभवों के आधार पर नवम्‍बर 2008 के बाद से ही मैं ग्रहों की सप्‍ताह भर की स्थिति को देखते हुए शेयर बाजार की साप्‍ताहिक स्थिति का आकलन करते हुए  मोल तोल के लिए साप्‍ताहिक कॉलम लिखती आ रही हूं। इस आकलन में कितने प्रतिशत की सत्‍यता रहती है , ये तो मेरे नियमित पाठक ही बता सकते हैं , पर यह बात अवश्‍य है कि अत्‍यधिक काम की भीड के कारण होनेवाले समयाभाव में कभी कभार कॉलम लिखना बंद भी हो जाता है। जनवरी 2010 में भी पहले सप्‍ताह आलेख लिखने के बाद अभी तक यह बंद ही रहा है।

27 दिसंबर 2009 को मोल तोल में प्रकाशित किए गए आलेख में मैने लिखा था .......
इस प्रकार वर्ष 2009 आर्थिक मामलों में एक यादगार वर्ष बन गया है। मंदी का भय भी वर्ष के समाप्‍त होते होते खत्‍म हुआ। नौकरियों में फिर से रौनक आ गई है। यहां तक कि अप्रैल में किसी तिथि को कुछ अस्‍थाई ग्रहीय योगों को देखकर मैं थोडी सशंकित भी रही, उनमें से भी बहुत जगह मुझे निराश नहीं होना पडा और दिसंबर तक मैने कहीं भी ग्रहों को कमजोर देखते हुए शेयर बाजार के बारे में बडी निराशाजनक भविष्‍यवाणी नहीं की थी। और उसी के अनुरूप पूरे वर्ष तेजी का बाजार निवेशकों को काफी लुभाता रहा है। अभी भी बाजार में जितने संकेत दिख रहे हैं, उनमें सकारात्मक बातें ही ज्यादा हैं। यहां तक कि तकनीकी रूप से छोटी अवधि के लिए ज्यादातर संकेतक मौजूदा तेजी कायम रहने का इशारा कर रहे हैं, लेकिन मुझे जनवरी 2010 में ऐसा नहीं दिखाई दे रहा। जनवरी 2010 में बाजार की स्थिति थोडी अनिश्चितता की बनेगी और इसकी शुरूआत अगले सप्‍ताह से ही आरंभ हो सकती है।


फिर उसके बाद मोल तोल के लिए आलेख लिखने का मुझे मौका न मिल सका। पर जनवरी के अंत तक की बात क्‍या करूं , कल 2 फरवरी के शेयर बाजार की भी 27 दिसंबर 2009 की शेयर बाजार की स्थिति से तुलना की जाए , तो उसकी स्थिति सचमुच ही बहुत ही कमजोर दिखाई पड रही है। इस दृष्टि से आज यानि 3 फरवरी का दिन शेयर बाजार के लिए सर्वाधिक कमजोर दिखता है। इसलिए सेंसेक्‍स और निफ्टी में आज सबसे बडी गिरावट की संभावना दिखती है। 4 फरवरी को भी बाजार सामान्‍य तौर पर कुछ कमजोर भी रह सकता है , पर उसके बाद तेजी की संभावना बनेगी, क्‍यूंकि आनेवाले समय में ग्रहों के आधार पर शेयर बाजार में बडे स्‍तर की गडबडी नहीं दिखती है। इसलिए निवेशकों को अधिक घबडाने की आवश्‍यकता नहीं है।




मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

बीटी बैगन की खेती के विरोध में यत्र तत्र विरोध .. क्‍या विचार हैं हमारे हिन्‍दी ब्‍लागरों के!!

हाल के दिनो में बीटी बैगन की खेती के विरोध में यत्र तत्र विरोध हो रहा है । ये बीटी बैगन क्‍या है , बता रहे हैं पवन कुमार अरविंद जी .....
बीटी बैगन- बैगन की सामान्य प्रजाति में आनुवंशिक संशोधन के बाद तैयार की गई नई फसल। आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें ऐसी फसले हैं, जिनके डीएनए में विशिष्ट बदलाव किए जाते हैं। अब तक ऐसे बदलाव सिर्फ प्राकृतिक हुआ करते थे, जिनके कारण आनुवंशिक बीमारियां होती हैं। लेकिन अब वैज्ञानिक भी प्रयोगशालाओं में आनुवंशिक बदलाव कर सकते हैं, ऐसे अधिकांश बदलाव जानलेवा होते हैं। हांलाकि, कुछ बदलाव जीव या फसलों में वांछित गुण भी पैदा कर सकते हैं। आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के जीन में इसी तरह के बदलाव किए जाते हैं। प्रायः फसलों की पैदावार और उनमें पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाता है।

इस लेख में अरविंद कुमार शर्मा जी भी जैनेटिकली माडिफाइड (जीएम) फसलों के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं ....
जीईएसी की वैधानिकता को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा है कि लोगों के हित व भावनाओं का सम्मान करना भी सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। कृषि मंत्री शरद पवार की हरी झंडी के बावजूद जयराम रमेश देश भर में जन अदालत आयोजित कर इस मुद्दे पर लोगों की राय ले रहे हैं। उत्तरी क्षेत्र से लेकर दक्षिणी हिस्से में बीटी बैगन का विरोध हो रहा है। चंडीगढ़, कोलकाता, हैदराबाद, भुवनेश्वर, अहमदाबाद और नागपुर में आयोजित जन अदालतों में बीटी बैगन को लेकर उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा है। इस दौरान जयराम रमेश को कहना पड़ा कि बीटी बैगन की व्यावसायिक खेती से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
कुसुम ठाकुर जी भी इस आलेख में बी टी बैगन के बारे में महत्‍वपूर्ण जानकारी प्रदान कर रही हैं ....
पिछले साल अक्टूबर में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा बीटी बैंगन को किसानों तक पहुंचाने का निर्णय लेते ही कार्यकर्ताओं और किसानों ने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया था। विरोध की वजह से सरकार को अपने निर्णय को स्थगित कर वैज्ञानिकों, कार्यकर्ताओं, किसानों और नागरिकों के साथ सार्वजनिक विचार-विमर्श शुरू करना पड़ा। इस खाद्य फसल बीज को किसानों में वितरित करने की मंजूरी जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) ने दी थी। वैसे तो दिल्ली सरकार सार्वजनिक विचार-विमर्श से दूर ही रही है, लेकिन सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर अपनी चिंताएं जताई हैं। एक रोचक बात यह है कि बीटी बैंगन का खुले आम विरोध करने वाले सभी राज्य गैर-कांग्रेस शासित हैं। दिल्ली इसमें एक मात्र अपवाद है।

इसी संदर्भ में अशोक पोडेय जी का
यह आलेख भी ज्ञानवर्द्धक है .... 
जब कृषि, उपभोक्‍ता व पर्यावरण जैसे विभागों के मंत्री ही बीटी बैगन के पक्ष में इतनी जोरदार दलीलें दे रहे हों तो माना जाना चाहिए कि भारत में उसकी वाणिज्यिक खेती को मंजूरी अब औपचारिकता भर रह गयी है। कभी-कभी तो यह संदेह भी होने लगता है कि कहीं पहले ही पूरा मामला फिक्‍स तो नहीं कर लिया गया है। गौरतलब है कि केन्‍द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की राष्ट्रीय खाद्य नियामक संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी पहले ही किसान संगठनों के कड़े विरोध के बावजूद बीटी बैगन को अंतिम मंजूरी दे चुकी है। कमेटी के कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था। कमेटी के सदस्य और जाने-माने वैज्ञानिक पीएम भार्गव ने मॉलिक्यूलर प्रकृति का मुद्दा उठाया, लेकिन अन्य सदस्यों ने उसे खारिज कर दिया। अब यह मामला केन्‍द्र सरकार के पास है तथा सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की स्‍वीकृति के बाद बीटी बैगन के बीज को बाजार में उतारा जा सकेगा।


बीटी बैगन के बारे में तारा फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित किया गया आलेख भी महत्‍वपूर्ण है ....
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार जीएम फसलों की संरचना सामान्य पौधों की कोशिकाओं में अलग किस्म का जीन जीवाणु, कीटाणु, मकड़ी, सूअर व कछुआ आदि से लिया जाता है। इसके कारण स्वास्थ्यव पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जीवित पौधा होने के कारण इसका पूरी तरह से नाश संभव नहीं है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इसका पेटेंट बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का होगा जिससे छोटे-छोटे किसानों को इन कम्पनियों पर निर्भर करना पड़ेगा। विकसित अनुवांशिक रूप से वर्धित महिको के बीटी बैगन का विकास हुए नौ साल हो गए हैं। महिको का दावा है कि इस बैगन में कीड़ों को समाप्त करने की क्षमता जीन क्राई 1 एसी है। कीड़ा लगने से 50 से 70 प्रतिशत बैगन की फसल बर्बाद हो जाती है। बीटी हाईब्रिड के प्रयोग से बैगन उत्पादन में 166 प्रतिशत की वृद्धि होगी। कम्पनी के अनुसार जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमिटी ने इसको पर्यावरण के लिए सुरक्षित माना है।


इस संदर्भ में संजय स्वदेश जी की रिपोर्ट भी बहुत ज्ञानवर्द्धक है ....
उत्तर अंबाझरी रोड स्थित आई.एम.ए. सभागृह बी.टी. बैगन की जनसुनवाई के दौरान खचाखच भरा हुआ था। इसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से आए वैज्ञानिक, किसान, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कई लोगों के तर्क सुनने के बाद पर्यावरण मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि बी.टी. बैंगन पर अपना निर्णय वे 15 फरवरी से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप देंगे। जनसुनवाई के दौरान अधिकतर लोगों ने बी.टी. बैंगन के विरोध में तर्क देते हुए इसे देसी बैंगन और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया। भारत में बी.टी. बैंगन के बीज बेचने वाली कंपनी कृभको के वैज्ञानिकों ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। विदर्भ के किसान नेता शरद जोशी ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक बीज पद्धति और उत्पादन में तकनीक का उपयोग आज जरूरत है। 


इस आलेख में पंकज अवधिया जी भी बता रहे हैं कि देशी बैगन स्‍वास्‍थ्‍य वर्द्धक है और  कैसे देशी बैगन को बढावा दिया जाये? 
मेरा उत्तर होगा “यह आप यानि उपभोक्ताओ पर निर्भर है। बाजार उपभोक्ताओ की माँग पर चलता है। यदि उपभोक्ता जहरीले बैगन लेने से मना कर दे तो मजाल है कि बाजार इसे उपभोक्ता के सामने परोसे। जब बाजार इंकार कर देगा तो किसान इसकी खेती बन्द करेंगे और देशी बैगन उगायेंगे। पर इसके लिये उपभोक्ताओ को एकजुट होना होगा और लम्बी जंग लडनी होगी। एक पूरी पीढी की जंग लगी सोच को बदलना होगा। बहुत विरोध का सामना भी करना पडेगा। इतनी आसानी से कैसे जहरीले बैगन पर से अन्ध-विश्वास हटेगा? पर उपभोक्ता यदि इसमे सफल होते है तो इसके बदले उन्हे रोगमुक्त जीवन मिलेगा और खुशहाल नयी पीढी मिलेगी। अब फैसला आपको करना है।




एक सुंदर कविता पढें ... हमारा कर्म किस तरह परिस्थितियों के नियंत्रण में होता है !!

अपने भाग्‍य पर विश्‍वास न करते हुए अक्‍सर आप सभी कर्मयोग की चर्चा करते हैं , पर क्‍या आप सबों को ऐसा नहीं लगता कि हमारा कर्म भी परिस्थितियों के नियंत्रण में होता है। काम करते वक्‍त , सोंचते वक्‍त , निर्णय लेते वक्‍त हम बहुत सी सीमाओं में बंधे होते हैं , इसी बात को समझाने के लिए बालाकृष्‍ण राव की सुंदर रचना ( नदी को रास्‍ता किसने दिखाया ?? ) आपके लिए प्रस्‍तुत है......


नदी को रास्‍ता किसने दिखाया ?
सिखाया था उसे किसने
कि अपनी भावना के वेग को
उन्‍मुक्‍त बहने दे ?
कि वह अपने लिए
खुद खोज लेगी
सिंधु की गंभीरता
स्‍वच्‍छंद बहकर ?

इसे हम पूछते आए युगों से,
और सुनते भी युगों से आ रहे उत्‍तर नदी का।
मुझे कोई कभी आया नहीं था राह दिखलाने,
बनाया मार्ग मैने आप ही अपना।
ढकेला था शिलाओं को,
गिरी निर्भिकता से मैं कई ऊंचे प्रपातों से,
वनों में , कंदराओं में,
भटकती , भूलती मैं
फूलती उत्‍साह सेप्रत्‍येक बाधा विघ्‍न को
ठोकर लगाकर , ठेलकर,
बढती गयी आगे निरंतर
एक तट को दूसरे से दूरतर करती।

बढी संपन्‍नता के
और अपने दूर दूर तक फैले साम्राज्‍य के अनुरूप
गति को मंद कर...
पहुंची जहां सागर खडा था
फेन की माला लिए
मेरी प्रतीक्षा में।
यही इतिवृत्‍त मेरा ...
मार्ग मैने आप ही बनाया।

मगर भूमि का है दावा,
कि उसने ही बनाया था नदी का मार्ग ,
उसने ही
चलाया था नदी को फिर
जहां , जैसे , जिधर चाहा,
शिलाएं सामने कर दी
जहां वह चाहती थी
रास्‍ता बदले नदी ,
जरा बाएं मुडे
या दाहिने होकर निकल जाए,
स्‍वयं नीची हुई
गति में नदी के
वेग लाने के लिए
बनी समतल
जहां चाहा कि उसकी चाल धीमी हो।
बनाती राह,
गति को तीव्र अथवा मंद करती
जंगलों में और नगरों में नचाती
ले गयी भोली भूमि को भूमि सागर तक

किधर है सत्‍य ?
मन के वेग ने
परिवेश को अपनी सबलता से झुकाकर
रास्‍ता अपना निकाला था,
कि मन के वेग को बहना पडा था बेबस
जिधर परिवेश ने झुककर
स्‍वयं ही राह दे दी थी ?
किधर है सत्‍य ????

क्‍या आप इसका जबाब देंगे ??????




सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

मैने अपने जीवन में जिस महिला को सर्वाधिक कष्‍टप्रद जीवन झेलते देखा है !!

ज्‍योतिष जैसे विषय से जुडे होने के कारण अपने को दुखी कहनेवाले और सुखी होने के लिए सलाह के लिए आनेवाले लोगों की मेरे पास कमी नहीं , पर मेरे विचार से ये सारे लोग दुखी नहीं होते। उनके पास जीवन के सारे सुख हैं ,  ये बडी बडी गाडियों में आते हैं , अच्‍छा जीवन जीते हैं , पर संतोष की कमी है , इसलिए अपने को दुखी मानते हैं। हर प्रकार के सुख , डिग्री और पद के साथ जीने की इन्‍हें बुरी आदत हो गयी है और उसमें से कोई भी कमजोरी उन्‍हें तनाव दे देती है। सिर्फ अपने कर्म पर भरोसा रखने वालों को भी आध्‍यात्मिक विश्‍वास वालों की तुलना में मैने अधिक दुखी पाया है , क्‍यूंकि हर वक्‍त कर्म से आप अपने जीवन को नहीं सुधार सकते , इस लंबे जीवन में बहुत कुछ अपने हाथ में नहीं होता , पर आध्‍यात्म पर विश्‍वास रखनेवालों को हर परिस्थिति को स्‍वीकारने और संतोष कर लेने की एक अच्‍छी आदत होती है। मैं तो बस यही मानती हूं कि अपने लक्ष्‍य के लिए जी जान से कोशिश करो , फिर भी वो नहीं मिले , तो उस वक्‍त समझौता कर लो और यह विश्‍वास रखो कि उससे बडी उपलब्धि आगे मिलनेवाली है।

कहा जाता है कि सबों का जीवन सुख और दुख का मिश्रण है। पर कभी कभी यह विचित्रता अवश्‍य देखने को मिलती है कि किसी के हिस्‍से में सिर्फ सुख ही सुख होता है और किसी के हिस्‍से में केवल कष्‍ट। यदि विज्ञान के कार्य कारण नियम के अनुसार इसका कारण ढूंढा जाए तो हमारे हिस्‍से कुछ भी नहीं लगेगा , पर आध्‍यात्‍म के अनुसार हमारा जीवन कई कई जन्‍मों के हमारे कर्म का फल है , भले ही इसका प्रमाण न हो , पर कार्य कारण नियम के अनुसार हमें मिलनेवाले हर सुख दुख का हिसाब तो इससे मिल ही जाता है। इतना ही नहीं , आध्‍यात्‍म पर विश्‍वास हमारे कर्म को नियंत्रित भी करता है और हमारे अंदर सद्गुणों का विकास कर हमें चरित्रवान भी बनाता है। आध्‍यात्‍म के इस विशंषता के आगे तर्क कहीं भी नहीं टिकता ।

अपने अभी तक के अनुभव में मैने अपने गांव की एक महिला को सबसे कष्‍टकर जीवन जीते पाया है , पर मैं ऐसा नहीं मान सकती कि उससे दुखी दुनिया में और कोई भी नहीं। पूरी दुनिया में न जाने कितनी महिलाएं और पुरूष किन किन जगहों पर घोर यातना का शिकार बने हुए हों,  पर मेरी नजर में आयी तीन चार दुखियारी महिला के मध्‍य यह सबसे दुखियारी मानी जा सकती है। सामान्‍य तौर पर संपन्‍न घर में जन्‍म लेनेवाली इस महिला , जिसकी चर्चा कर रही हूं , का विवाह भी एक संपन्‍न घराने के सरकारी नौकरी कर रहे इकलौते युवक से हुआ। दो बेटियां और एक बेटे ने भी जन्‍म लेकर उनके परिवार को सुखी बनाने में कोई कसर नहीं रहने दिया, यहां तक कि दो चार वर्षों तक उनका पालन पोषण और विकास भी अच्‍छे ढंग से हुआ , पर आगे की कहानी पढकर बात समझ में आएगी कि उनके लिए यह खुशी बिल्‍कुल क्षणिक थी।

पीढियों से उनके परिवार के सारे नहीं , पर कुछ बच्‍चे एक खास प्रकार की बीमारी से ग्रस्‍त देखे जाते थे। इस बीमारी में तीन चार वर्ष की उम्र में पोलियो की तरह पहले शरीर का कोई एक अंग काम करना बंद कर देता है ,खासकर पैर , फिर धीरे धीरे पूरा शरीर ही इसके चपेट में आ जाता है। हालांकि इस दौरान भी शारिरीक विकास में कोई कमी नहीं देखी जाती है और 20 वर्ष की उम्र तक बच्‍चे बिस्‍तर में पडे पडे युवा भी हो जाते हैं, पर युवावस्‍था ही इनका अंतिम समय होता है , 20 से 22 वर्ष की उम्र के आसपास इनकी मौत हो जाती है। पर इस दौरान मानसिक विकास तो बाधित होता ही है , बोलने और समझने की शक्ति भी समाप्‍त हो जाती है।  किसी भी डॉक्‍टर ने इसका कोई पुखता इलाज होने की बात नहीं कही। इस परिवार के अलावा हमारे पूरे गांव में इस प्रकार की बीमारी किसी भी परिवार में आजतक नहीं हुई , इसलिए इसे लोग जेनेटिक ही मानते हैं। हालांकि उनके परिवार में भी ये बीमारी बिल्‍कुल छिटपुट ढंग से कभी कभार ही किसी को हुई है, बाकी बच्‍चे बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ हैं। यहां तक कि उनके परिवार की बेटियों को भी ऐसे बच्‍चे नहीं होते हैं।

पर उक्‍त महिला के दुर्भाग्‍य को हमने काफी निकट से देखा है, एक एक कर उसके तीनों बच्‍चे इस गंभीर बीमारी के शिकार हो गए। नौकरी करनेवाले अपने पति को शहर में छोडकर बच्‍चों की तीमारदारी के लिए उन्‍हें गांव में रहना पडा। जहां बच्‍चों को एक दो वर्ष संभालना ही हमें इतना भारी काम महसूस होता है , उसने निराशाजनक परिस्थितियों में 20 वर्ष की उम्र तक तीन तीन बच्‍चों को कैसे संभाला होगा , यह सोंचने वाली बात है। खैर बिस्‍तर पर पडे अपने बच्‍चों की इतने दिनों तक सेवा सुश्रुसा करने के बाद एक एक कर तीनों चल बसे , उनसे निश्चिंत हुई ही होगी कि पति की बीमारी ने फिर उसका जीना मुश्किल किया। तीन चार वर्षों तक गंभीर इलाज और कई प्रकार के ऑपरेशन के बाद उसके पति भी चल बसे। आज अपने जीवन के अंतिम दिनों में वो बिल्‍कुल अकेली है , उसके जीवन की खुशियों को जबरदस्‍ती ढूंढा जाए तो इतना अवश्‍य मिलेगा कि वो रोजी रोटी के लिए दर दर की ठोकरें खाने को मुहंताज नहीं है। उसके घर में अनाज है और हाथ में पेशन के रूपए भी , पर जीवन में उसने जो झेला और आज जो तनाव भरा जीवन काट रही है, उसे सोंचकर भी मेरे रोंगटे खडे हो जाते हैं !!





क्‍या आपको भी विश्‍वास है कि देश के अधिकांश भाग में 3 और 4 फरवरी का मौसम बिगडा रहेगा ??!

काफी दिन पूर्व की बात है , मेरे बगीचे में काम करने वाले एक मजदूर ने किसी काम के लिए मुझसे 100 रूपए लिए और फिर काम पर आना ही बंद कर दिया। सामान्‍य तौर पर 100 रूपए के लिए अपनी रोजी रोटी की व्‍यवस्‍था को कोई समाप्‍त नहीं करता , पर इससे मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई थी , क्‍यूंकि मेरा मानना था कि मात्र 100 रूपए में मैने एक व्‍यक्ति को पहचान तो लिया था। पर जब मेरे भाई ने बताया कि इस प्रकार एक एक व्‍यक्ति को पहचानने में 100 - 100 रूपए खर्च किए जाएं , तो क्‍या करोडो लोगों को पहचाना जा सकता है ? तब मुझे अपनी गल्‍ती का अहसास हुआ और व्‍यक्तिगत की जगह सार्वजनिक तौर पर किसी भी विचार को समझने समझाने की भावना मन में आने लगी।

ज्‍योतिष के क्षेत्र में किए गए अपने अध्‍ययन और शोध के पश्‍चात् जब मैंने अपना ब्‍लॉग बनाकर लिखना आरंभ किया , तो व्‍यक्तिगत जानकारी के लिए बहुत सारे पाठकों ने मुझे अपने जन्‍म विवरण मेल किए। पर व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणियों के लिए मेरे पास अधिक सटीक आधार होने के बावजूद मैने एक एक व्‍यक्ति के लिए अपना समय जाया कर उनके बारे में भविष्‍यवाणी कर उन्‍हें विश्‍वास में लेने और 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की प्रामाणिकता को सिद्ध करने में दिलचस्‍पी न दिखाते हुए सामूहिक भविष्‍यवाणियों में अधिक मेहनत की। हर सामयिक मुद्दे पर मैने कुछ न कुछ भविष्‍यवाणियां करती रही और पाठकों की टिप्‍पणियों को देखकर शायद भ्रम पालती रही कि मेरे बहुत सारे प्रशंसक हैं। और इन भविष्‍यवाणियों में अधिक समय देने की वजह से व्‍यक्तिगत रूप से संपर्क करनेवाले पाठकों में से अधिकांश को मै जबाब भी नहीं दे पायी।

ठंड और कोहरे से परेशान लोगों की तकलीफों को देखते हुए हमेशा की तरह इस बार भी मैने मौसम से संबंधित भविष्‍यवाणियां की थी , जिसमें कहा था कि 3 और 4 फरवरी का विशेष ग्रहयोग मौसम को बुरी तरह प्रभावित करनेवाला है और इस तिथि के बाद ही ठंड और कोहरे की स्थिति में सुधार होगा। मैने इस बात की चर्चा दो महीने पहले कर दी थी। पर कई बार इस ग्रहयोग का असर एकाध सप्‍ताह पहले से भी देखा जाता है, इस कारण मैने 27 जनवरी से वैसे मौसम के बारे में बात की।  हाल में लिखे आलेख में मैने स्‍वीकारा था कि इसका प्रभाव 27 जनवरी से ही पडता दिखाई देगा। पर 27 जनवरी के बाद मौसम में सुधार होने लगा, पर कल 31 जनवरी तक भी मौसम सुधार के क्रम में ही था और इससे मेरी भविष्‍यवाणी को गलत माना गया।

दरअसल ज्‍योतिष में मौसम से संबंधित भविष्‍यवाणियों के लिए शुभ ग्रह और अशुभ ग्रहों की स्थिति को देखा जाता है। शुभ ग्रहों का संयोग मौसम को नम और ठंडा तथा अशुभ ग्रहों का संयोग वातावरण को गर्म और शुष्‍क बनाता है। 3 और 4 फरवरी को शुभ ग्रहों की खास स्थिति को देखते हुए ही मैने कहा था कि इस ग्रहयोग के व्‍यतीत हो जाने के बाद ही मौसम में सुधार आ सकता है। पर मेरा ध्‍यान इस बात पर थोडा भी नहीं गया कि 29 और 30 जनवरी को मंगल और चंद्र की स्थिति वातावरण को शुष्‍क बनाए रख सकती है। पर मेरी इस गल्‍ती से 3 और 4 फरवरी के शुभ ग्रहों का प्रभाव तो समाप्‍त नहीं हो सकता। आनेवाले 3 और 4 फरवरी को भारतवर्ष के अधिकांश भाग का , खासकर उत्‍तर भारत का मौसम बहुत गडबड रहेगा , इस बात पर मैं अभी भी डटी हुई हूं ।

वैसे इस दुनिया में हर जगह अपवाद मिलते हैं , पर ज्‍योतिष में अपवाद की कोई जगह नहीं। यदि दस भविष्‍यवाणियां सही हो जाएं तो ग्‍यारहवें का इंतजार और दुर्योग से ग्‍यारहवां गलत हो जाए तो भविष्‍यवाणी करना को सिक्‍के उछालना माना जाता है,  ब्‍लॉग जगत में मेरे आने के बाद से ही पाठक मेरे अध्‍ययन पर हमेशा प्रश्‍नचिन्‍ह लगाते आ रहे हैं। बारंबार मेरी तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणियों को देखने के बावजूद अपने को बुद्धिजीवी कहनेवाले वर्ग के पूर्वाग्रसित मस्तिष्‍क को देखकर मैं तो आश्‍चर्य ही कर सकती हूं। अपने को ऐसी स्थिति में पाकर दुनियाभर में अपने ज्ञान का , अपने अनुभव के प्रचार प्रसार का सपना धुधला सा होने लगता है , पर अपना अटल विश्‍वास पुन: आत्‍म विश्‍वास बढाता है , 3 और 4 फरवरी को मौसम के खराब न होने का कोई सवाल ही नहीं। मौसम से संबंधित मेरे आकलन पर अभी तक आपने पढते और देखते आए हैं, नीचे दिए गए पोल में भाग लें , क्‍या आप भी ऐसा ही मानते हैं  ??

क्‍या आपको भी विश्‍वास है कि देश के अधिकांश भाग में 3 और 4 फरवरी का मौसम बिगडा रहेगा ??
हां
नहीं
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