शनिवार, 24 अप्रैल 2010

2010 में किन तिथियों को प्राकृतिक या मानवकृत दुर्घटनाओं या अन्‍य आपदाओं की संभावनाएं बनेंगी ??

काफी अर्से से पृथ्‍वी पर आनेवाले भूकम्‍प , तूफान , ज्‍वालामुखी तथा  अन्‍य प्राकृतिक आपदाओं के वक्‍त आसमान में ग्रहों की स्थिति का अध्‍ययन करने के बाद कुछ खुलासे तो हुए , पर पृथ्‍वी पर आक्षांस और देशांतर रेखा के निर्धारण में अभी भी कठिनाई आ ही रही है , जिसके कारण उपयुक्‍त भविष्‍यवाणी करने में बाधा उपस्थित हो रही है। 2012 में आनेवाले प्रलय के बारे में हुए शोर शराबे के बाद प्राकृतिक आपदाओं के बारे में अधिक सूक्ष्‍मता से अध्‍ययन किया गया , इससे भी पृथ्‍वी पर प्राकृतिक आपदा वाले तिथियों के बारे में कुछ संकेत अवश्‍य मिले , लेकिन स्‍थान पर अभी भी निश्चितता न हो पाने से पूर्ण तौर पर रहस्‍य को उजागर कर पाना मुश्किल लग रहा है। हालांकि डेटाओं की कमी और ज्‍योतिष के क्षेत्र में अन्‍य विज्ञानों के सहयोग न मिल पाना भी इसकी एक मुख्‍य वजह है।


15 अप्रैल को लिखे आलेख में मैने बताया था कि पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में मंगलवार को आए चक्रवाती तूफान ने भारी तबाही मचायी है , यह मौसम को प्रभावित करने वाला ग्रहयोग नहीं है , यह तो प्राकृतिक आपदा लानेवाले योग के कारण हुआ है , जिसकी चर्चा मैं अपनी व्‍यस्‍तता के कारण न कर सकी थी। जहां मौसम के परिवर्तन के लिए जबाबदेह बारिश के योग के लिए शुभ ग्रहों की विशेष स्थिति को देखा जाता है , वहीं बडे स्‍तर पर आनेवाले तूफान , भूकम्‍प या अन्‍य प्राकृतिक आपदाओं के कारण ग्रहों की अति क्रियाशील स्थिति के साथ ही साथ विशेष प्रकार के योग होते है। यहां तक कि मानवीय गल्‍ती या दुष्‍टता के फलस्‍वरूप हुई कई प्रकार की घटनाओं में भी इन ग्रहयोगों की भूमिका होती है। 

प्रवीण शाह जी ने भी अपने एक आलेख में लिखा है कि मेरी 12 जनवरी की मेरी भूकम्‍प वाली भविष्‍यवाणी के सही होने के बाद दुनियाभर में अभी तक 32 भूकम्‍प आ चुके हैं , जिनमें कुछ में जान माल का भी नुकसान हुआ है। ये भूकम्‍प भी वैसे ही योगों में आया करता है , पर हर समय चर्चा कर पाना संभव नहीं है। पर खगोलशास्‍त्री और भूगर्भशास्‍त्री के साथ साथ ही फलित ज्‍येतिष के जानकार मिलकर रिसर्च करें कि उस खास ग्रहयोग का प्रभाव के किस क्षेत्र में बनने की उम्‍मीद है , तो शायद समस्‍या का समाधान जल्‍द निकल आए। 2010 के आनेवाले पूरे वर्षभर में पृथ्‍वी पर इस प्रकार की बुरी ग्रह स्थिति निम्‍न तिथियों को बनती है , जिसके कारण कई प्रकार के प्राकृतिक या मानवकृत दुर्घटनाओं या अन्‍य आपदाओं की संभावनाएं बनेंगी,.........

मई में 3 , 7, 9 , 12 , 14 ,21 , 23 , 29 , 30
जून में 3 , 6 , 12 , 17 , 19
जुलाई में 3 , 11 , 14 ,  23 , 31 
अगस्‍त में 4 , 10 , 11 , 12 , 13 , 21 , 23 , 26 , 27
सितम्‍बर में 7 , 8 , 11 , 19 , 23 , 24
अक्‍तूबर में 4 , 7 , 8 , 20 , 21 
नवम्‍बर में 5 , 6 , 7 , 16 , 17 , 19 , 20 , 28
दिसंबर में 2 , 5 , 7 , 10 , 14 , 15 , 19 , 29 , 30 , 31

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

ग्रहों का प्रभाव सिर्फ मुझे ही नजर क्‍यूं आता है ??


21 अप्रैल के आलेख में  मैने आनेवाले दो दिनों के लिए लिखा था कि आप संसार के किसी भी शहर में क्‍यूं न हो, उस शहर में सूर्योदय के समय में 5 घंटे 25 मिनट जोड दें। वहां से लेकर सवा दो घंटे तक आप काफी महत्‍वपूर्ण संदर्भों में उलझे रह सकते हैं। यह बात भी कुछ लोगों की समझ में नहीं आयी। मैं एक उदाहरण की सहायता से इसे स्‍पष्‍ट करने की कोशिश कर रही हूं। मेरे शहर में सूर्योदय 5 बजकर 45 मिनट में हुआ , इसमें 5 घंटे और 25 मिनट जोडने से 11 बजकर 10 मिनट होते हैं। यहां से सवा दो घंटे तक यानि 1 बजकर 25 मिनट तक 23 और 24 अप्रैल दोनो ही दिनों में मैं महत्‍वपूर्ण संदर्भों में उलझी रही। 


मैने यह भी लिखा था , अपने शहर में सूर्यास्‍त के समय में 4 घंटे जोड दें , उसके बाद के ढाई घंटे में आप किसी तनाव से गुजर सकते हैं , छोटी मोटी चिडचिडाहट पैदा करनेवाली भी कोई बात हो सकती है। कल यानि 22 अप्रैल को मेरे शहर में सूर्यास्‍त 6 बजकर 35 मिनट में हुआ , यहां से 4 घंटे जोड दिया जाए तो 10 बजकर 35 मिनट हो जाते हैं। यहां से ढाई घंटों तक किसी प्रकार के तनाव या छोटी मोटी चिडचिडाहट की बात मैने लिखी थी , ठीक सवा दस बजे से साढे बारह बजे तक हमारे कॉलोनी में यानि बोकारो के कॉपरेटिव कॉलोनी में 22 तारीख की रात के इस सवा दो घंटे में बिजली नहीं रही, लोगों के कार्य में परेशानी या बाधा तो आयी ही होगी। 


वैसे तो व्‍यक्तिगत अनुभवों के लिए ही मैने यह पोस्‍ट लिखा था , पर फिर भी इन दोनो व्‍यक्तिगत घटनाओं को ग्रह नहीं जोडते हुए एक और स्‍थान पर आपका ध्‍यान आकर्षित करना चाहूंगी। 22 अप्रैल को भारत के समयानुसार 5 बजकर 30 मिनट में सूर्योदय हुआ , इसमें 5 घंटे 25 मिनट जोडने से 10 बजकर 55 मिनट होते हैं। यहां से ढाई घंटों तक यानि 11 बजे से डेढ बजे तक शेयर बाजार में बहुत बडी तेजी देखने को मिली। तीन चार दिनों से बिल्‍कुल सामान्‍य या थोडे दबाब में रहने वाला बाजार रिलायंस के अच्छे नतीजों की उम्मीद से 11 बजे के बाद अचानक  चढने लगा था। पर ठीक ढाई घंटे के बाद  ग्रीस के कर्ज संकट की वजह से बाजार में अंतिम घंटे में बिकवाली का दबाब आया और फिर से बाजार सामान्‍य हो गया।




कारोबार के तीसरे घंटे में सेंसेक्स और निफ्टी शुरुआती गिरावट से उबर कर हरे निशान पर आ गये। धीरे-धीरे इन सूचकांकों के तेजी की रफ्तार बढ़ती गयी। दोपहर के कारोबार में काफी अच्छी तेजी आ गयी। बाजार की इस तेजी के पीछे रिलायंस इंडस्ट्रीज की अच्छी भूमिका रही। सेंसेक्स 17,778 और निफ्टी 5,332 तक चढ़ गये। दोपहर के कारोबार में बाजार में तेज उछाल के बारे में सीडी इक्विसर्च के निदेशक राजेश अग्रवाल का कहना है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के नतीजे कल आने वाले हैं। अच्छे नतीजे आने की उम्मीदों के चलते रिलायंस के शेयर में काफी तेजी आयी, जिससे बाकी बाजार भी तेज हो गया।

कारोबार के अंतिम घंटे में बाजार की दिशा ही बदल गयी। बाजार एकदम से फिसल गया और सेंसेक्स और निफ्टी ऊपरी स्तरो पर टिक नहीं पाये। आज के कारोबार में सेंसेक्स 305 अंक तक चढ़ गया था, लेकिन कारोबार के अंत में यह केवल 101 की मजबूती दर्ज कर सका। एनएसई निफ्टी ने भी आज के कारोबार में 87 अंक तक की उछाल दर्ज की पर आखिरकार यह 24 अंक की बढ़त के साथ बंद हुआ।

हालांकि  19 अप्रैल को ही मैने मोल तोल में अपना कॉलम लिखते वक्‍त स्‍पष्‍ट किया था  कि पूरे सप्‍ताह की अनिश्चितता के बाद ऑयल और गैस सेक्‍टर में बढत शुरू होने से सप्‍ताहांत में शेयर बाजार में रौनक बनेगी तथा सेंसेक्‍स और निफ्टी की स्थिति तेज रहेगी , पर ठीक इन्‍हीं ढाई घंटों में इस घटना के होने से ग्रहों के घंटे मिनट तक के प्रभाव की भी पुष्टि हो जाती है। अस्‍पताल में किसी मरीज की हालत बिगडने या किसी अन्‍य प्रकार के अंदेशे में रह रहे लोगों के फोन आने पर उनकी चिंता को दूर करने में मैं इसी प्रकार की सूक्ष्‍म गणना किया करती हूं , क्‍यूंकि ऐसी गणना कर पाना हर वक्‍त संभव नहीं है । इस पोस्‍ट को लिखने का उद्देश्‍य पाठकों को समुचित जानकारी देना ही है !! 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

झूठ और सच

झूठ के पांव होते ही नहीं हैं ,
कभी कहीं भी पहुंच सकता है।
पर बिना पांव के ही भला वह ,
फासला क्‍या तय कर सकता है ?

भटकते भटकते , भागते भागते ,
उसे अब तक क्‍या है मिला ?
मंजिल मिलनी तो दूर रही ,
दोनो पांव भी खोना ही पडा !!

सच अपने पैरों पर चलकर ,
बिना आहट के आती है।
निष्‍पक्षता की झोली लेकर ,
दरवाजा खटखटाती है।

न्‍याय, उदारता की इस मूरत को ,
इस कर्तब्‍य का क्‍या न मिला ?
हर युग में पूजी जाती है ,
हर वर्ग में इसे सम्‍मान मिला !!

सत्‍य पर कदम रखने वालों को,
कठिन पथ पे चलना ही पडेगा।
विघ्‍न बाधाओं पर चल चल कर,
मार्ग प्रशस्‍त करना ही पडेगा।

राम , कृष्‍ण , बुद्ध और गांधी को,
बता जीवन में क्‍या न मिला ?
आत्मिक सुख, शांति नहीं बस,
जीवन को अमरत्‍व भी मिला !!

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

पूरे दिनभर का 24 घंटा एक सा नहीं हुआ करता है !!

दो चार दिन पूर्व मैने अपने आलेख में लिखा था कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के अनुसार बहुत दूर की घटनाओं के आकलन में दो चार महीनों , कुछ दूर की घटनाओं के आकलन में दो चार दिनों और प्रतिदिन की घटनाओं के आकलन में पंद्रह से बीस मिनट की गल्‍ती ही होनी चाहिए। कुछ पाठक प्रतिदिन की घटनाओं के आकलन का अर्थ नहीं समझ सकें , जिनकी जिज्ञासा को देखते हुए मैं यह पोस्‍ट लिखना आवश्‍यक समझ रही हूं।

जिस प्रकार पूरे जीवन का हर वर्ष लोगों के लिए एक सा नहीं होता , वर्ष का 365 दिनों में से हर दिन एक सा नहीं होता , उसी प्रकार दिनभर का 24 घंटा एक सा नहीं हुआ करता है। गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के अनुसार एक ही दिन के विभिन्‍न घंटों में आप भिन्‍न भिन्‍न मन:स्थिति से गुजरते हैं , जिसका अनुमान लगाया जा सकता है। किसी खास घंटे में ही आप मजे ले रहे होते हैं , तो किसी खास घंटे में महत्‍वपूर्ण कार्यों में व्‍यस्‍तता भी होती है , किसी खास घंटे में आप तनाव भी झेल रहे होते हैं। भयंकर तनाव झेल रहे परिचित अक्‍सर ऐसे समयांतराल में फोन कर बैठते हैं , तब मैं उन्‍हें तात्‍कालिक राहत के लिए दो चार घंटे बाद का समय बताती हूं और सचमुच उनका तनाव उसी वक्‍त काफी कम हो जाया करता है।

अभी आसमान में दो दिनों तक एक खास ग्रहस्थिति चल रही है , जो बहुतों को किसी महत्‍वपूर्ण कार्य से संयुक्‍त कर सकती है, पर इस खास ग्रहस्थिति का प्रभाव अलग अलग घंटों में भिन्‍न भिन्‍न होता है। इसी के कारण आप आनेवाले 24 घंटों में से कुछ घंटों के बारे में अनुमान लगा सकते हैं। आप संसार के किसी भी शहर में क्‍यूं न हो, उस शहर में सूर्योदय के समय से 5 घंटे 25 मिनट जोड दें। वहां से लेकर सवा दो घंटे तक आप काफी महत्‍वपूर्ण संदर्भों में उलझे रह सकते हैं।

अभी जो योग चल रहा है , वो आपके तनाव को भी बढा सकता है , पर इसका समयांतराल अलग होगा। अपने शहर में सूर्यास्‍त के समय में 4 घंटे जोड दें , उसके बाद के ढाई घंटे में आप किसी तनाव से गुजर सकते हैं , छोटी मोटी चिडचिडाहट पैदा करनेवाली भी कोई बात हो सकती है। जैसे ही ढाई घंटे बीत जाएंगे आप थोडी राहत महसूस करने लगेंगे। हां पूर्ण तौर पर राहत देनेवाला या किसी प्रकार की खुशखबरी सुनानेवाला समय के लिए सूर्यास्‍त के समय में आपको पौने सात घंटे जोडने पडेंगे। इस आलेख में लिखे गए तथ्‍य को आप जांच सकते हैं , पर यह बीते 12 घंटों के साथ ही साथ आनेवाले 24 या 36 घंटों के लिए ही सार्थक होगा , क्‍यूंकि उसके बाद इस ग्रहयोग का असर कम हो जाएगा और आकलन में भिन्‍नता आएगी। पर मैं इसी तरह की गणना से लोगों के तनाव में राहत के लिए घंटे और मिनट तक की चर्चा किया करती हूं।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

आखिर 'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं क्‍यूं नहीं चलती हैं ??

वर्ष 2002 तक या उसके बाद भी मैं कुछ घरेलू पत्रिकाएं पढा करती थी। 2002 के दिसंबर माह में एक पत्रिका 'मेरी सहेली' के  साथ 'वेद अमृत' नाम की पत्रिका का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया था। उस छोटे संस्‍करण में नाम मात्र के कई लेख और कहानियां होने के बावजूद मैं इस पत्रिका के लक्ष्‍य को समझ गयी थी और अगले ही महीने इसक‍ा प्रवेशांक बाजार से मंगवा लिया था। प्रवेशांक पढने के बाद मेरी प्रतिक्रिया इन शब्‍दों में संपादक जी के पास पहुंची थी , जिसे उन्‍होने 'वेद अमृत' के फरवरी माह के अंक में 'आपके विचार' में प्रकाशित भी किया था .....

पिछले महीने मेरी सहेली के साथ वेद अमृत का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया उसे पढने के बाद वेद अमृत के प्रवेशांक को खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पायी। आज बाजार में फैली अधिकांश पत्रिकाएं धर्म , ज्ञान , ज्‍योतिष और वास्‍तु के नाम पर कुछ भी छापती जा रही है और कुछ पत्रिकाएं तो पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त होकर धर्म की टांग ही तोड देने को उद्दत हैं। ऐसी परिस्थितियों में आपके संपादकीय के समन्‍वयवादी दृष्टिकोण ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। शायद आपकी पत्रिका का लक्ष्‍य उन पुराने मोतियों को चुनकर पिरोकर वह माला तैयार करनी है , जो नयी पीढी के नए दृष्टिकोण के अनुरूप हों। सभी लेख संपादकीय में कहे गए लक्ष्‍य को पूरा करने में समर्थ हैं। शास्‍त्र को शस्‍त्र न बनाओ , सत्‍य की रक्षा , अभिशाप या वरदान जैसी कहानियां जहां कम उम्र के पाठकों तक को प्राचीन कथाओं के माध्‍यम से संदश देने में समर्थ हैं , वहीं जीवन पथ जैसी कहानी आज के युग की जरूरत। अन्‍य लेख भी जितने सहज ढंग से ज्ञान का भंडार मस्तिष्‍क में उंडेलते हैं , उसे देखकर आपकी पूरी टीम के लेखन और संपादन पर गर्व होता है।

सृष्टि निर्माता ,प्रकृति , अल्‍लाह या भगवान ... जो भी कह दिया जाए , पर एक नियम या व्‍यवस्‍था के आगे हम सब नतमस्‍तक हैं। कितने ही तरह की प्राकृतिक आपदाओं को हम आज के युग में भी नहीं रोक पाए हैं और जब भी किसी घटना पर हमारा वश नहीं चलता , उसे प्रकृति की इच्‍छा मान लेते हैं। आखिर यह कमजोरी हर मनुष्‍य के पास कभी कभी क्‍यूं उपस्थित होती हैं , जब किसी संयोग की कमी से उसका काम नहीं होता और कभी वहीं संयोग दूसरों को काम कर डालता है।

धर्म की उत्‍पत्ति कभी भी सार्वदेशिक और सार्वकालिक नहीं हुई। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही वह अनुपयोगी हो , पर जिस युग और देश में इसकी संहिताएं तैयार की जाती हैं , यह काफी लोकप्रिय होता है। यह बात अलग है कि धर्म हमेशा मध्‍यमवर्गीय लोगों की जरूरतों को घ्‍यान में रखकर बनाया जाता है , क्‍यूंकि उच्‍चवर्गीय लोगों की संख्‍या और निम्‍नवर्गीय लोगों की भी समस्‍याएं नाममात्र की होती हैं। सभ्‍यता और संस्‍कृति मध्‍यमवर्गीय लोगों से अधिक प्रभावित होती हैं, इसी कारण मध्‍यम वर्ग ही हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए कोई भी विकल्‍प तैयार किया जाए , तो उसे अपनाने के लिए पूर्ण तौर पर तैयार होता है। कालांतर में इसे ही उनका धर्म मान लिया जाता है।

धर्माचरण का नकल करनेवाले कुछ पाखंडियों , धोखेबाजों और कपटी लोगों की पोल कुछ ही दिनों में खुल जाती है , जबकि महात्‍मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , दयानंद सरस्‍वती , स्‍वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक  , चैतन्‍य महाप्रभु आदि अनेकानेक लोग धर्माचरण द्वारा युगों युगो तक पूजे जाते हैं। यदि उनके विचारों में अच्‍छाई नहीं होती , समाज के लिए सोंचने का संदेश नहीं होता  , तो ऐसा क्‍यूं होता ??

आज कुछ पुस्‍तको को व्‍यवस्थित करने के क्रम में मुझे वेद अमृत के सभी पुराने अंक मिले। फरवरी 2006 तक का अंक मेरे पास मौजूद है , जिसमें से प्रत्‍येक की कीमत मात्र 15 रूपए लिखी गयी है। उसके बाद के अंक भी कहीं पर छुपे हो सकते हैं , जो बाद में मिल जाए। पर इसके कुछ ही दिनों बाद वेद अमृत का प्रकाशन बंद हो गया, जाहिर सी बात है कि पत्रिकाएं बिक नहीं पा रही होंगी। इतने कम कीमत में बडों के लिए यह पत्रिका तो लाभप्रद थी ही , इसमें बाल जगत के अंतर्गत आनेवाली कहानी को मैं बच्‍चों को अवश्‍य पढाया करती थी , प्रत्‍येक में कुछ न कुछ संदेश छुपा होता था। समाज में कोई अच्‍छी शुरूआत हो और विद्वान लोगों द्वारा उसका यही हश्र हो , तो हमारे समाज के लोग तो भटकेंगे ही ।

आज के आर्थिक युग में लोगों की सोंच बिल्‍कुल बदल गयी है , विज्ञान के बडे बडे आविष्‍कारों का उपयोग करना मात्र उनका लक्ष्‍य हो गया है , साधन ही साध्‍य बन गया है। वे न तो खुद अच्‍छा साहित्‍य पढना चाहते हैं और न ही बच्‍चों को पढाना चाहते हैं।बाद में आनेवाली पीढी को दोष देते हम नहीं थकते। बस प्रोफेशनल सफलता ही हर बात का मापदंड बन गया है , लोगों ने अपने को इतना सिमटा लिया है कि जीवन के अंतिम चरणों में भी बिल्‍कुल अनुभवहीन दिखते हैं। आज धर्म को भले ही गलत मान लिया जाए और इसकी आवश्‍यकता को नकारा जाए , पर आज के युग में भी एक धर्मगुरू की आवश्‍यकता है ही , जो लोगों के भटकते दिलोदिमाग को शांत करने की कोशिश करे , ताकि पूरी दुनिया चैन से जी सके। सही कहा गया है , गुरू के बिना ज्ञान मुश्किल ही होता है।

आखिर 'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं क्‍यूं नहीं चलती हैं ??

वर्ष 2002 तक या उसके बाद भी मैं कुछ घरेलू पत्रिकाएं पढा करती थी। 2002 के दिसंबर माह में एक पत्रिका 'मेरी सहेली' के  साथ 'वेद अमृत' नाम की पत्रिका का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया था। उस छोटे संस्‍करण में नाम मात्र के कई लेख और कहानियां होने के बावजूद मैं इस पत्रिका के लक्ष्‍य को समझ गयी थी और अगले ही महीने इसक‍ा प्रवेशांक बाजार से मंगवा लिया था। प्रवेशांक पढने के बाद मेरी प्रतिक्रिया इन शब्‍दों में संपादक जी के पास पहुंची थी , जिसे उन्‍होने 'वेद अमृत' के फरवरी माह के अंक में 'आपके विचार' में प्रकाशित भी किया था .....

पिछले महीने मेरी सहेली के साथ वेद अमृत का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया उसे पढने के बाद वेद अमृत के प्रवेशांक को खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पायी। आज बाजार में फैली अधिकांश पत्रिकाएं धर्म , ज्ञान , ज्‍योतिष और वास्‍तु के नाम पर कुछ भी छापती जा रही है और कुछ पत्रिकाएं तो पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त होकर धर्म की टांग ही तोड देने को उद्दत हैं। ऐसी परिस्थितियों में आपके संपादकीय के समन्‍वयवादी दृष्टिकोण ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। शायद आपकी पत्रिका का लक्ष्‍य उन पुराने मोतियों को चुनकर पिरोकर वह माला तैयार करनी है , जो नयी पीढी के नए दृष्टिकोण के अनुरूप हों। सभी लेख संपादकीय में कहे गए लक्ष्‍य को पूरा करने में समर्थ हैं। शास्‍त्र को शस्‍त्र न बनाओ , सत्‍य की रक्षा , अभिशाप या वरदान जैसी कहानियां जहां कम उम्र के पाठकों तक को प्राचीन कथाओं के माध्‍यम से संदश देने में समर्थ हैं , वहीं जीवन पथ जैसी कहानी आज के युग की जरूरत। अन्‍य लेख भी जितने सहज ढंग से ज्ञान का भंडार मस्तिष्‍क में उंडेलते हैं , उसे देखकर आपकी पूरी टीम के लेखन और संपादन पर गर्व होता है।

सृष्टि निर्माता ,प्रकृति , अल्‍लाह या भगवान ... जो भी कह दिया जाए , पर एक नियम या व्‍यवस्‍था के आगे हम सब नतमस्‍तक हैं। कितने ही तरह की प्राकृतिक आपदाओं को हम आज के युग में भी नहीं रोक पाए हैं और जब भी किसी घटना पर हमारा वश नहीं चलता , उसे प्रकृति की इच्‍छा मान लेते हैं। आखिर यह कमजोरी हर मनुष्‍य के पास कभी कभी क्‍यूं उपस्थित होती हैं , जब किसी संयोग की कमी से उसका काम नहीं होता और कभी वहीं संयोग दूसरों को काम कर डालता है।

धर्म की उत्‍पत्ति कभी भी सार्वदेशिक और सार्वकालिक नहीं हुई। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही वह अनुपयोगी हो , पर जिस युग और देश में इसकी संहिताएं तैयार की जाती हैं , यह काफी लोकप्रिय होता है। यह बात अलग है कि धर्म हमेशा मध्‍यमवर्गीय लोगों की जरूरतों को घ्‍यान में रखकर बनाया जाता है , क्‍यूंकि उच्‍चवर्गीय लोगों की संख्‍या और निम्‍नवर्गीय लोगों की भी समस्‍याएं नाममात्र की होती हैं। सभ्‍यता और संस्‍कृति मध्‍यमवर्गीय लोगों से अधिक प्रभावित होती हैं, इसी कारण मध्‍यम वर्ग ही हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए कोई भी विकल्‍प तैयार किया जाए , तो उसे अपनाने के लिए पूर्ण तौर पर तैयार होता है। कालांतर में इसे ही उनका धर्म मान लिया जाता है।

धर्माचरण का नकल करनेवाले कुछ पाखंडियों , धोखेबाजों और कपटी लोगों की पोल कुछ ही दिनों में खुल जाती है , जबकि महात्‍मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , दयानंद सरस्‍वती , स्‍वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक  , चैतन्‍य महाप्रभु आदि अनेकानेक लोग धर्माचरण द्वारा युगों युगो तक पूजे जाते हैं। यदि उनके विचारों में अच्‍छाई नहीं होती , समाज के लिए सोंचने का संदेश नहीं होता  , तो ऐसा क्‍यूं होता ??

आज कुछ पुस्‍तको को व्‍यवस्थित करने के क्रम में मुझे वेद अमृत के सभी पुराने अंक मिले। फरवरी 2006 तक का अंक मेरे पास मौजूद है , जिसमें से प्रत्‍येक की कीमत मात्र 15 रूपए लिखी गयी है। उसके बाद के अंक भी कहीं पर छुपे हो सकते हैं , जो बाद में मिल जाए। पर इसके कुछ ही दिनों बाद वेद अमृत का प्रकाशन बंद हो गया, जाहिर सी बात है कि पत्रिकाएं बिक नहीं पा रही होंगी। इतने कम कीमत में बडों के लिए यह पत्रिका तो लाभप्रद थी ही , इसमें बाल जगत के अंतर्गत आनेवाली कहानी को मैं बच्‍चों को अवश्‍य पढाया करती थी , प्रत्‍येक में कुछ न कुछ संदेश छुपा होता था। समाज में कोई अच्‍छी शुरूआत हो और विद्वान लोगों द्वारा उसका यही हश्र हो , तो हमारे समाज के लोग तो भटकेंगे ही ।

आज के आर्थिक युग में लोगों की सोंच बिल्‍कुल बदल गयी है , विज्ञान के बडे बडे आविष्‍कारों का उपयोग करना मात्र उनका लक्ष्‍य हो गया है , साधन ही साध्‍य बन गया है। वे न तो खुद अच्‍छा साहित्‍य पढना चाहते हैं और न ही बच्‍चों को पढाना चाहते हैं।बाद में आनेवाली पीढी को दोष देते हम नहीं थकते। बस प्रोफेशनल सफलता ही हर बात का मापदंड बन गया है , लोगों ने अपने को इतना सिमटा लिया है कि जीवन के अंतिम चरणों में भी बिल्‍कुल अनुभवहीन दिखते हैं। आज धर्म को भले ही गलत मान लिया जाए और इसकी आवश्‍यकता को नकारा जाए , पर आज के युग में भी एक धर्मगुरू की आवश्‍यकता है ही , जो लोगों के भटकते दिलोदिमाग को शांत करने की कोशिश करे , ताकि पूरी दुनिया चैन से जी सके। सही कहा गया है , गुरू के बिना ज्ञान मुश्किल ही होता है।

रविवार, 18 अप्रैल 2010

मान्‍यताएं कब अंधविश्‍वास बन जाती हैं ??

सुपाच्‍य होने के कारण लोग यात्रा में दही खाकर निकला करते थे , माना जाने लगा कि दही की यात्रा अच्‍छी होती है।
देर से पचने के कारण यात्रा में कटहल की सब्‍जी का बहिष्‍कार किया जाता था , माना जाने लगा कि कटहल की यात्रा खराब होती है।
समय के साथ दही को शुभ माना जाने लगा और मान्‍यता बन गयी कि कुछ भी खाकर निकलो , यात्रा के वक्‍त छोटे से चम्‍मच से भी दही अवश्‍य खा लिया जाए तो यात्रा शुभ होगी।
यहां तक तो ठीक था , पर मान्‍यता धीरे धीरे अंधविश्‍वास बन गयी , जब गाडीवान् ने अपनी गाडी में कटहल को रखने से भी मना कर दिया , क्‍यूंकि इसकी यात्रा खराब होती है , कहीं गाडी का एक्‍सीडेंट न हो जाए !!