शनिवार, 5 जून 2010

संगठन में ही बडी शक्ति है .. क्‍या आप इंकार कर सकते हैं ??

हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडने के बाद प्रतिवर्ष भाइयों के पास दिल्‍ली यानि नांगलोई जाना हुआ , पर इच्‍छा होने के बावजूद ब्‍लोगर भाइयों और बहनों से मिलने का कोई बहाना न मिल सका। इस बार दिल्‍ली के लिए प्रस्‍थान करने के पूर्व ही ललित शर्मा जी और अविनाश वाचस्‍पति जी के द्वारा मुझे जानकारी मिल गयी थी कि हमारे दिल्‍ली यात्रा के दौरान एक ब्‍लॉगर मीट रखी जाएगी। रविवार का दिन होने से 23 मई ब्‍लागर मीट के लिए उपयुक्‍त था , यह काफी पहले तय हो चुका था , पर स्‍थान के बारे में मुझे कोई जानकारी न थी।  आभासी दुनिया के लोगों को प्रत्‍यक्ष देखने और उनके विचारों से रू ब रू होने की कल्‍पना ही मन को आह्लादित कर रही थी। पर 20 तारीख तक यानि दिल्‍ली जाने के पंद्रह दिनों बाद तक मुझे ऐसी कोई सूचना नहीं मिल पायी थी, ब्‍लॉग मीट की बात कैंसिल तो नहीं हो गयी , यह सोंचकर मैं थोडी अनिश्चितता में थी।

23 मई को ही भाइयों को नांगलोई के जाट धर्मशाला में आयोजित एक कार्यक्रम के बारे में चर्चा करते सुना, तो वहां एक ब्‍लोगर मीट को आयोजित करने की मेरी भी इच्‍छा हो गयी। मेरे भाई ने इसमें पूर्ण तौर पर सहयोग देने का वादा किया। कार्यक्रम के बारे में जानने के लिए मैने अविनाश वाचस्‍पति जी को फोन लगाया , तो बातचीत में मालूम हुआ कि एम वर्मा जी के यहां 23 मई को ब्‍लॉगर मीट होना तय हुआ है , जिसमे कुछ ब्‍लोगरों का मिलना जुलना होगा। चूंकि राजीव तनेजा जी हमारे इलाके में थे , इसलिए मुझे वहां तक पहुंचाने की जिम्‍मेदारी राजीव तनेजा जी को दी गयी थी। कार्यक्रम के बारे में जानकर मेरी अनिश्चितता तो दूर हुई , पर जाट धर्मशाला के बडे हाल में अधिक से अधिक ब्‍लोगरों को बुलाया जाना और उनसे मिलना जुलना हो पाएगा , यह सोचते हुए मैने इस स्‍थल के बारे में अविनाश जी को जानकारी दे दी। अविनाश जी काफी खुश हुए , दूसरे ही दिन उन्‍होने इस हॉल में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन होने की घोषणा अपने ब्‍लॉग में कर दी।

22 मई की शाम मैं भाई के साथ इस स्‍थल के निरीक्षण के लिए गयी , तो फोन कर राजीव तनेजा जी  को बुलाया, थोडी ही देर में वहां एम वर्माजी भी पहुंचे। हम तीन ब्‍लॉगरों की मीटिंग 22 मई को ही हो गयी, पर हम तीन तिगाडा ने काम बिल्‍कुल भी नहीं बिगाडा। हमारे द्वारा तय किए गए ऊपर का हाल छोटा लगा , तो भाई ने नीचे के हाल में ब्‍लॉगर मीट की व्‍यवस्‍था कर दी। वैसे तो इस ब्‍लॉगर मीट में थोडी जिम्‍मेदारी लेने की मेरी भी इच्‍छा थी , पर अविनाश वाचस्‍पतिजी और राजीव तनेजा जी ने इस ब्‍लॉग मीट को सफल बनाने की पूरी जिम्‍मेदारी संभाल ली और हमें हर प्रकार के इल्‍जाम से बचा लिया। दिल्‍ली में हिंदी ब्‍लोगरों की भारी संख्‍या और ब्‍लॉगर मीट पर पोस्‍ट लिखे जाने के बाद अधिक लोगों के उपस्थित होने की उम्‍मीद में थी मैं , लेकिन जितने उपस्थित हुए , वो कम भी नहीं थी , क्‍यूंकि उन्‍हें समय काफी कम मिला। पर जूनियर हों या सीनियर , महिला हों या पुरूष , हिंदी ब्‍लॉगिंग के प्रति  प्रेम से सराबोर सभी लोगों ने ब्‍लॉगिंग के विभिन्‍न पहलुओं पर अपने कुछ न कुछ विचार अवश्‍य रखा।

मैने भी ब्‍लॉगिंग के मुद्दे पर अपना विचार रखा , चूंकि प्रत्‍येक व्‍यक्ति ऊपर से देखने में एक होते हुए भी अंदर से बिल्‍कुल अलग होते हैं , इसलिए इस दुनिया में घटने वाली सारी घटनाओं को विभिन्‍न कोणों से देखते हैं , जाहिर है , हम अलग कोण से लिखेंगे ही। भले ही कोई 'वाद' देश , काल और परिस्थिति के अनुसार सटीक होता हो , पर कालांतर में उसमें सिर्फ अच्‍छाइयां ही नहीं  रह जाती है। इसलिए ही समय समय पर हमारे मध्‍य विचारों का बडा टकराव होता है , उससे दोनो ही पक्ष में शामिल पाठकों या आनेवाली पीढी के समक्ष एक नया रास्‍ता खुलता है। ऐसा भी होता ही आया है कि भीड में भी समान विचारों वाले लोग छोटे छोटे गुट बना लेते हैं , कक्षा में भी  विद्यार्थियों के कई ग्रुप होते हैं , इसका अर्थ ये नहीं कि वे एक दूसरे पर पत्‍थर फेके। हमें समझना चाहिए कि जहां हमारे विचारों की विभिन्‍नता और वाद विवाद हिंदी ब्‍लॉगजगत को व्‍यापक बनाने में समर्थ है , वहीं एक दूसरे के प्रति मन की खिन्‍नता और आपस में गाली गलौज हिंदी ब्‍लॉग जगत का नुकसान कर रही है। मेरा अपना दृष्टिकोण है कि यदि हम संगठित नहीं हों तो हमारे ऊपर कभी भी आपत्ति आ सकती है और हमें विचारों की अभिव्‍यक्ति से संबंधित अपनी इस स्‍वतंत्रता को खोना पड सकता है। इसलिए संगठित बने रहने के प्रयास तो होने ही चाहिए !!

संगठन में ही बडी शक्ति है .. क्‍या आप इंकार कर सकते हैं ??

हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडने के बाद प्रतिवर्ष भाइयों के पास दिल्‍ली यानि नांगलोई जाना हुआ , पर इच्‍छा होने के बावजूद ब्‍लोगर भाइयों और बहनों से मिलने का कोई बहाना न मिल सका। इस बार दिल्‍ली के लिए प्रस्‍थान करने के पूर्व ही ललित शर्मा जी और अविनाश वाचस्‍पति जी के द्वारा मुझे जानकारी मिल गयी थी कि हमारे दिल्‍ली यात्रा के दौरान एक ब्‍लॉगर मीट रखी जाएगी। रविवार का दिन होने से 23 मई ब्‍लागर मीट के लिए उपयुक्‍त था , यह काफी पहले तय हो चुका था , पर स्‍थान के बारे में मुझे कोई जानकारी न थी।  आभासी दुनिया के लोगों को प्रत्‍यक्ष देखने और उनके विचारों से रू ब रू होने की कल्‍पना ही मन को आह्लादित कर रही थी। पर 20 तारीख तक यानि दिल्‍ली जाने के पंद्रह दिनों बाद तक मुझे ऐसी कोई सूचना नहीं मिल पायी थी, ब्‍लॉग मीट की बात कैंसिल तो नहीं हो गयी , यह सोंचकर मैं थोडी अनिश्चितता में थी।

23 मई को ही भाइयों को नांगलोई के जाट धर्मशाला में आयोजित एक कार्यक्रम के बारे में चर्चा करते सुना, तो वहां एक ब्‍लोगर मीट को आयोजित करने की मेरी भी इच्‍छा हो गयी। मेरे भाई ने इसमें पूर्ण तौर पर सहयोग देने का वादा किया। कार्यक्रम के बारे में जानने के लिए मैने अविनाश वाचस्‍पति जी को फोन लगाया , तो बातचीत में मालूम हुआ कि एम वर्मा जी के यहां 23 मई को ब्‍लॉगर मीट होना तय हुआ है , जिसमे कुछ ब्‍लोगरों का मिलना जुलना होगा। चूंकि राजीव तनेजा जी हमारे इलाके में थे , इसलिए मुझे वहां तक पहुंचाने की जिम्‍मेदारी राजीव तनेजा जी को दी गयी थी। कार्यक्रम के बारे में जानकर मेरी अनिश्चितता तो दूर हुई , पर जाट धर्मशाला के बडे हाल में अधिक से अधिक ब्‍लोगरों को बुलाया जाना और उनसे मिलना जुलना हो पाएगा , यह सोचते हुए मैने इस स्‍थल के बारे में अविनाश जी को जानकारी दे दी। अविनाश जी काफी खुश हुए , दूसरे ही दिन उन्‍होने इस हॉल में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन होने की घोषणा अपने ब्‍लॉग में कर दी।

22 मई की शाम मैं भाई के साथ इस स्‍थल के निरीक्षण के लिए गयी , तो फोन कर राजीव तनेजा जी  को बुलाया, थोडी ही देर में वहां एम वर्माजी भी पहुंचे। हम तीन ब्‍लॉगरों की मीटिंग 22 मई को ही हो गयी, पर हम तीन तिगाडा ने काम बिल्‍कुल भी नहीं बिगाडा। हमारे द्वारा तय किए गए ऊपर का हाल छोटा लगा , तो भाई ने नीचे के हाल में ब्‍लॉगर मीट की व्‍यवस्‍था कर दी। वैसे तो इस ब्‍लॉगर मीट में थोडी जिम्‍मेदारी लेने की मेरी भी इच्‍छा थी , पर अविनाश वाचस्‍पतिजी और राजीव तनेजा जी ने इस ब्‍लॉग मीट को सफल बनाने की पूरी जिम्‍मेदारी संभाल ली और हमें हर प्रकार के इल्‍जाम से बचा लिया। दिल्‍ली में हिंदी ब्‍लोगरों की भारी संख्‍या और ब्‍लॉगर मीट पर पोस्‍ट लिखे जाने के बाद अधिक लोगों के उपस्थित होने की उम्‍मीद में थी मैं , लेकिन जितने उपस्थित हुए , वो कम भी नहीं थी , क्‍यूंकि उन्‍हें समय काफी कम मिला। पर जूनियर हों या सीनियर , महिला हों या पुरूष , हिंदी ब्‍लॉगिंग के प्रति  प्रेम से सराबोर सभी लोगों ने ब्‍लॉगिंग के विभिन्‍न पहलुओं पर अपने कुछ न कुछ विचार अवश्‍य रखा।

मैने भी ब्‍लॉगिंग के मुद्दे पर अपना विचार रखा , चूंकि प्रत्‍येक व्‍यक्ति ऊपर से देखने में एक होते हुए भी अंदर से बिल्‍कुल अलग होते हैं , इसलिए इस दुनिया में घटने वाली सारी घटनाओं को विभिन्‍न कोणों से देखते हैं , जाहिर है , हम अलग कोण से लिखेंगे ही। भले ही कोई 'वाद' देश , काल और परिस्थिति के अनुसार सटीक होता हो , पर कालांतर में उसमें सिर्फ अच्‍छाइयां ही नहीं  रह जाती है। इसलिए ही समय समय पर हमारे मध्‍य विचारों का बडा टकराव होता है , उससे दोनो ही पक्ष में शामिल पाठकों या आनेवाली पीढी के समक्ष एक नया रास्‍ता खुलता है। ऐसा भी होता ही आया है कि भीड में भी समान विचारों वाले लोग छोटे छोटे गुट बना लेते हैं , कक्षा में भी  विद्यार्थियों के कई ग्रुप होते हैं , इसका अर्थ ये नहीं कि वे एक दूसरे पर पत्‍थर फेके। हमें समझना चाहिए कि जहां हमारे विचारों की विभिन्‍नता और वाद विवाद हिंदी ब्‍लॉगजगत को व्‍यापक बनाने में समर्थ है , वहीं एक दूसरे के प्रति मन की खिन्‍नता और आपस में गाली गलौज हिंदी ब्‍लॉग जगत का नुकसान कर रही है। मेरा अपना दृष्टिकोण है कि यदि हम संगठित नहीं हों तो हमारे ऊपर कभी भी आपत्ति आ सकती है और हमें विचारों की अभिव्‍यक्ति से संबंधित अपनी इस स्‍वतंत्रता को खोना पड सकता है। इसलिए संगठित बने रहने के प्रयास तो होने ही चाहिए !!

गुरुवार, 3 जून 2010

पूरे महीने दिलो दिमाग में दुर्घटनाओं का खौफ छाया रहा !!

पिछले आलेख में मैने बताया कि इस बार की दिल्‍ली यात्रा मेरे लिए बहुत ही सुखद रही, पर पूरे महीने दिलो दिमाग में दुर्घटनाओं का खौफ छाया रहा। 5 मई को बोकारो से प्रस्‍थान की तैयारी में व्‍यस्‍त 4 मई को मिली एक भयावह दुर्घटना की खबर ने मन मे जो भय बनाया , वह पूरे महीने दूर न हो सका। 25 मई को बेटे के बंगलौर से दिल्‍ली प्रस्‍थान करने से पहले मंगलौर में हुई विमान दुर्घटना और बोकारो आने से पूर्व स्‍टेशन में हुई भगदड से हुई मौत और बोकारो पहुंचने से पहले ज्ञानेश्‍वरी ट्रेन हादसे की खबर यह अहसास दिलाने में समर्थ हो गयी कि यात्रा के दौरान हम भाग्‍य और भगवान के भरोसे ही सुरक्षित हैं।

यात्रा के दौरान खासकर लौटते वक्‍त कहीं कहीं परिस्थितियां गडबड बनीं , पर ईश्‍वर की कृपा है कि उसका कोई दुष्‍परिणाम देखने को नहीं मिला। 29 मई को पुरूषोत्‍तम एक्‍सप्रेस से बोकारो लौटना था , ट्रेन की टाइमिंग थी .. 10 :20 रात्रि , चूंकि हम तीन मां बेटे पूरे सामान के साथ थे , इसलिए दो ऑटो वाले को  8 बजे रात्रि को आने को कहा गया था। आठ की जगह साढे आठ बज गए , पर ऑटो नहीं आया। हमने तुरंत दो रिक्‍शे से नांगलोई के लिए प्रस्‍थान किया। रात के नौ बजे हम नांगलोई से चले , ऑटो वाले से बार बार पूछते हुए कि दस बजे तक हमलोग पहुंच पाएंगे या नहीं ? 'यदि कहीं पर जाम न हो तो पहुंच जाएंगे , पर इस वक्‍त जाम रहती है' , ऑटोवाले का जबाब सुनकर हमलोग परेशान हो जाते थे , पर रास्‍ते में जाम क्‍या , कहीं लाल बत्‍ती भी नहीं मिली और हम पौने दस बजे स्‍टेशन पहुच चुके थे।

बिल्‍कुल शांत दिमाग से पूछ ताछ कर हम उस प्‍लेटफार्म पर उस स्‍थान पर पहुंचे , जहां पुरूषोत्‍तम की वह बोगी आने वाली थी , जिससे हमें जाना था । पर ट्रेन तो देर से आयी ही , बोगियां भी सूचना के विपरीत लगी हुई थी । अब प्‍लेटफार्म पर अफरातफरी का माहौल बन गया , इधर के यात्री उधर और उधर के यात्री इधर जाते दिखाई दे रहे थे। ट्रेन यदि देर से न खुलती , तो यहां भी एक दुर्घटना के होने की संभावना थी , पर सबों के आराम से बैठने के बाद ही ट्रेन खुली , जिससे राहत मिली। पर सुबह उठते ही ज्ञानेश्‍वरी ट्रेन हादसे की खबर मिली , जिससे पुन: एक बार मन:स्थिति पर बुरा प्रभाव पडा।

शाम 5 बजे के बाद बोकारो से काफी निकट गोमो स्‍टेशन से ट्रेन के चलने के बाद घर पहुंचने की खुशी में बडा खलल उस वक्‍त पहुंचा , जब हमें यह मालूम हुआ कि ज्ञानेश्‍वरी हादसे के बाद सुरक्षा कारणों से ट्रेन बोकारो से नहीं , वरन् दूसरे रास्‍ते से बंगाल की दिशा में चल चुकी है। गोमो में हो रहे इस एनाउंसमेंट के वक्‍त हमारा ध्‍यान बेटे के ए आई ट्रिपल ई के रिजल्‍ट की ओर था , जिसकी सूचना हमें तुरंत मिली थी। एनाउंसमेंट न सुन पाने के कारण आयी इस विकट परिस्थिति से लगभग आधे घंटे हम सब हैरान परेशान रहे , पर खैरियत थी कि एक छोटे से स्‍टेशन 'मोहदा' में गाडी रूकी , दो मिनट के इस स्‍टॉपेज में गाडी रूकने का अंदाजा होने से हम अपने सामान के साथ गेट पर तैयार ही थे , इसलिए हमने सारा सामान जल्‍दी जल्‍दी उतार लिया। वहां से हम बाहर आए , एक टैक्‍सी ली और पौने सात बजे हम बोकारो में थे। इस तरह इस यात्रा के दौरान कुछ कुछ असमान्‍य घटनाएं होती रहीं , पर कुशल मंगल अपने घर पहुंच गयी।

पूरे महीने दिलो दिमाग में दुर्घटनाओं का खौफ छाया रहा !!

पिछले आलेख में मैने बताया कि इस बार की दिल्‍ली यात्रा मेरे लिए बहुत ही सुखद रही, पर पूरे महीने दिलो दिमाग में दुर्घटनाओं का खौफ छाया रहा। 5 मई को बोकारो से प्रस्‍थान की तैयारी में व्‍यस्‍त 4 मई को मिली एक भयावह दुर्घटना की खबर ने मन मे जो भय बनाया , वह पूरे महीने दूर न हो सका। 25 मई को बेटे के बंगलौर से दिल्‍ली प्रस्‍थान करने से पहले मंगलौर में हुई विमान दुर्घटना और बोकारो आने से पूर्व स्‍टेशन में हुई भगदड से हुई मौत और बोकारो पहुंचने से पहले ज्ञानेश्‍वरी ट्रेन हादसे की खबर यह अहसास दिलाने में समर्थ हो गयी कि यात्रा के दौरान हम भाग्‍य और भगवान के भरोसे ही सुरक्षित हैं।

यात्रा के दौरान खासकर लौटते वक्‍त कहीं कहीं परिस्थितियां गडबड बनीं , पर ईश्‍वर की कृपा है कि उसका कोई दुष्‍परिणाम देखने को नहीं मिला। 29 मई को पुरूषोत्‍तम एक्‍सप्रेस से बोकारो लौटना था , ट्रेन की टाइमिंग थी .. 10 :20 रात्रि , चूंकि हम तीन मां बेटे पूरे सामान के साथ थे , इसलिए दो ऑटो वाले को  8 बजे रात्रि को आने को कहा गया था। आठ की जगह साढे आठ बज गए , पर ऑटो नहीं आया। हमने तुरंत दो रिक्‍शे से नांगलोई के लिए प्रस्‍थान किया। रात के नौ बजे हम नांगलोई से चले , ऑटो वाले से बार बार पूछते हुए कि दस बजे तक हमलोग पहुंच पाएंगे या नहीं ? 'यदि कहीं पर जाम न हो तो पहुंच जाएंगे , पर इस वक्‍त जाम रहती है' , ऑटोवाले का जबाब सुनकर हमलोग परेशान हो जाते थे , पर रास्‍ते में जाम क्‍या , कहीं लाल बत्‍ती भी नहीं मिली और हम पौने दस बजे स्‍टेशन पहुच चुके थे।

बिल्‍कुल शांत दिमाग से पूछ ताछ कर हम उस प्‍लेटफार्म पर उस स्‍थान पर पहुंचे , जहां पुरूषोत्‍तम की वह बोगी आने वाली थी , जिससे हमें जाना था । पर ट्रेन तो देर से आयी ही , बोगियां भी सूचना के विपरीत लगी हुई थी । अब प्‍लेटफार्म पर अफरातफरी का माहौल बन गया , इधर के यात्री उधर और उधर के यात्री इधर जाते दिखाई दे रहे थे। ट्रेन यदि देर से न खुलती , तो यहां भी एक दुर्घटना के होने की संभावना थी , पर सबों के आराम से बैठने के बाद ही ट्रेन खुली , जिससे राहत मिली। पर सुबह उठते ही ज्ञानेश्‍वरी ट्रेन हादसे की खबर मिली , जिससे पुन: एक बार मन:स्थिति पर बुरा प्रभाव पडा।

शाम 5 बजे के बाद बोकारो से काफी निकट गोमो स्‍टेशन से ट्रेन के चलने के बाद घर पहुंचने की खुशी में बडा खलल उस वक्‍त पहुंचा , जब हमें यह मालूम हुआ कि ज्ञानेश्‍वरी हादसे के बाद सुरक्षा कारणों से ट्रेन बोकारो से नहीं , वरन् दूसरे रास्‍ते से बंगाल की दिशा में चल चुकी है। गोमो में हो रहे इस एनाउंसमेंट के वक्‍त हमारा ध्‍यान बेटे के ए आई ट्रिपल ई के रिजल्‍ट की ओर था , जिसकी सूचना हमें तुरंत मिली थी। एनाउंसमेंट न सुन पाने के कारण आयी इस विकट परिस्थिति से लगभग आधे घंटे हम सब हैरान परेशान रहे , पर खैरियत थी कि एक छोटे से स्‍टेशन 'मोहदा' में गाडी रूकी , दो मिनट के इस स्‍टॉपेज में गाडी रूकने का अंदाजा होने से हम अपने सामान के साथ गेट पर तैयार ही थे , इसलिए हमने सारा सामान जल्‍दी जल्‍दी उतार लिया। वहां से हम बाहर आए , एक टैक्‍सी ली और पौने सात बजे हम बोकारो में थे। इस तरह इस यात्रा के दौरान कुछ कुछ असमान्‍य घटनाएं होती रहीं , पर कुशल मंगल अपने घर पहुंच गयी।

मंगलवार, 1 जून 2010

दिल को खुश करनेवाली रही यह दिल्‍ली-यात्रा

यूं तो पिछले तीन वर्षों से मई या जून महीने में मुझे दिल्‍ली में ही रहने की जरूरत पडती रही है , पर इस वर्ष की दिल्‍ली यात्रा बहुत खास रही । पूरे मई महीने दिल्‍ली में व्‍यतीत करने के बाद कल ही बोकारो लौटना हुआ है , इस दिल्‍ली यात्रा में बहुत रंग आते जाते दिखे , खट्टे मीठे अनुभवों से युक्‍त पूरे महीने की खास बातों की चर्चा आनेवाले पोस्‍ट में अवश्‍य करूंगी , आज संक्षेप में मीठे अनुभवों की चर्चा .....

 मम्‍मी , दोनो भाभियों और तीनों भतीजे भतीजियों का साथ ...


दिल्‍ली की ब्‍लॉगर मीट .....

                             

भतीजे का मुंडन ......


और खासकर छोटे बेटे के द्वारा आई आई टी और बिट्स पिलानी दोनो ही संस्‍थानों में इंजीनियरिंग की एक सीट प्राप्‍त कर पाने की सफलता .....
 


मेरे लिए इस बार की दिल्‍ली यात्रा दिल को खुश कर देने वाली सिद्ध हुई।

दिल को खुश करनेवाली रही यह दिल्‍ली-यात्रा

यूं तो पिछले तीन वर्षों से मई या जून महीने में मुझे दिल्‍ली में ही रहने की जरूरत पडती रही है , पर इस वर्ष की दिल्‍ली यात्रा बहुत खास रही । पूरे मई महीने दिल्‍ली में व्‍यतीत करने के बाद कल ही बोकारो लौटना हुआ है , इस दिल्‍ली यात्रा में बहुत रंग आते जाते दिखे , खट्टे मीठे अनुभवों से युक्‍त पूरे महीने की खास बातों की चर्चा आनेवाले पोस्‍ट में अवश्‍य करूंगी , आज संक्षेप में मीठे अनुभवों की चर्चा .....

 मम्‍मी , दोनो भाभियों और तीनों भतीजे भतीजियों का साथ ...


दिल्‍ली की ब्‍लॉगर मीट .....

                             

भतीजे का मुंडन ......


और खासकर छोटे बेटे के द्वारा आई आई टी और बिट्स पिलानी दोनो ही संस्‍थानों में इंजीनियरिंग की एक सीट प्राप्‍त कर पाने की सफलता .....
 


मेरे लिए इस बार की दिल्‍ली यात्रा दिल को खुश कर देने वाली सिद्ध हुई।