शनिवार, 17 जुलाई 2010

18 जुलाई से 4 अगस्‍त तक बहुत अच्‍छी बारिश नहीं हो पाएगी !!

जब से मैने चिट्ठा लिखना शुरू किया है , 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की दृष्टि से ग्रहों के आधार पर जो आनेवाला मौसम होना चाहिए , उसके बारे में मैं अक्‍सर आलेख लिखा करती हूं। वैसे नियमित तौर पर पढनेवाले पाठक ही समझते होंगे कि मेरा आकलन कितना सही रहता है। 29 मार्च को पोस्‍ट किए गए अपने आलेख में ही मैने लिखा था कि 24 जून के तुरंत बाद शुभ ग्रहों का प्रभाव आरंभ होगा , जिसके कारण बादल बनने और बारिश होने की शुरूआत हो सकती है , यदि नहीं तो कम से कम मौसम खुशनुमा बना रह सकता है। हमारी गणना के अनुरूप ही 24 जून के बाद ही आसमान में बादल दिखाई देने लगें तथा यत्र तत्र बारिश के छींटे पडने लगे। जुलाई के पहले और दूसरे सप्‍ताह में पूरे भारतवर्ष में थोडी बहुत बारिश होती ही रही। 


वैसे तो उस आलेख में मैने यह भी लिख दिया था कि इस वर्ष यानि 2010 में मौसम की सबसे अधिक बारिश 4 अगस्‍त के आसपास से शुरू होकर 19 सितम्‍बर के आसपास तक होगी। यह समय पूर्ण तौर पर खेती का है , इसलिए इस वर्ष किसानों को अवश्‍य राहत मिलनी चाहिए। लेकिन इतना स्‍पष्‍ट न कर सकी थी कि 4 अगस्‍त से पहले के पंद्रह बीस दिन बहुत अच्‍छी बारिश के नहीं होंगे। आप पाठकों को यह जानकर थोडा कष्‍ट पहुंचेगा कि 18 जुलाई के पहले के मौसम की तुलना में 18 जुलाई के बाद का मौसम कुछ कष्‍टकर दिख रहा है। 30 जुलाई को आसमान में बनने वाले अशुभ ग्रहों की खास स्थिति और उनकी गत्‍यात्‍मक शक्ति के कारण इस योग के 12 दिन पूर्व और पश्‍चात् मौसम गर्म हो सकता है। इसलिए 18 जुलाई से 12 अगस्‍त के आसपास तक बादल छितराए होंगे और बहुत अच्‍छी बारिश नहीं हो पाएगी। 


लेकिन चूंकि भारतवर्ष के लिए यह मौसम पूर्ण तौर पर बारिश का है , इसलिए 17 , 18 , 23 , 24 , 25 , 31 जुलाई और 1 या 2 अगस्‍त को खासग्रहयोग के कारण यत्र तत्र बारिश होती रहेगी और उसके कारण अन्‍य स्‍थानों का भी वातावरण सुखद दिखाई पडेगा , पर कुल मिलाकर बारिश इतनी भी नहीं होगी , जो कृषि या अन्‍य जरूरतों के लिए जल की पूर्ति कर सके। खासकर जहां फसलों की रोपाई जुलाई में ही होती है , वहां अधिक मुसीबत आएगी। भला का बरखा जब कृषि सुखाने ??


पर खुशी की खबर ये है कि 6 और 7 अगस्‍त को आसमान में शुभ ग्रहों की स्थिति बन रही है , जिसके कारण 4 अगस्‍त के बाद बारिश की प्रचुरता होनी चाहिए , जिससे अगस्‍त में रोपाई होने वाले स्‍थानों पर किसानों को राहत मिल सकेगी। यह ग्रहयोग अशुभ ग्रहों के योग के प्रभाव को कुछ कम कर सकता है। जैसा कि मैने पहले भी अपने आलेखों में लिखा है , 4 अगस्‍त से लेकर 19 सितंबर तक प्रचुर मात्रा में बारिश होगी , पर प्राकृतिक असंतुलन के मध्‍य इस बारिश का हर स्‍थान पर बंटवारा सही होगा , इसपर कुछ संदेह तो रह ही जाता है। लेकिन इस मध्‍य अधिकांश स्‍थानों पर बारिश की कमी नहीं होनी चाहिए। इस तरह खेतों में पानी के लिए अभी किसानों को कुछ और इंतजार करना पड सकता है। 

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

दृढसंकल्‍प के आगे भूत भी हार मान जाता है !!

दुनिया में भूत प्रेत के किस्‍सों की कमी नहीं , पहले चारो ओर जंगल थे , शाम होते ही अंधेरा फैल जाता था , सन्‍नाटे को चीरती कोई भी आवाज भयावहता उत्‍पन्‍न करती थी , वैसे में भय का बनना स्‍वाभाविक था। पर जैसे जैसे जंगल कटकर गांव बनते गए , भय समाप्‍त होता गया , इससे माना जाने लगा कि घर में होनेवाले पूजा पाठ और यज्ञ हवन के कारण भूत प्रेत भी जगह छोडकर पीछे होते गए। पर अभी तक की घटना में इतना तो अवश्‍य पाया है कि किसी के घर द्वार आंगन खलिहान में भूतों वाली कोई घटना घटी हो , तो उसमें भय का ही समावेश देखा गया है। इन सबसे दूर जंगल में या श्‍मशान में भूतों ने अपने होने का कभी दावा नहीं किया , कभी आमने सामने नहीं आए । वरना इतनी सडकें बनी , इतने रेलवे की पटरियां बिछी , कभी भी बडे स्‍तर पर बाधा नहीं उपस्थित किया , जबकि वहां न तो पूजा पाठ होता है और न ही यज्ञ हवन।

मेरे दादाजी के जीवन की एक घटना का उल्‍लेख करना चाहूंगी , बात सन् 1944 की होगी , तबतक उनके परिवार में दादीजी के अलावे चार पुत्र और एक पुत्री थी। उस समय वे अपने पिताजी के एक पुराने मकान में थे , जिसके आंगन में और कमरा बनाने की जगह नहीं थी। उन्‍होने दूसरी जगह एक मकान बनाने का मन बनाया , थोडे शौकीन मिजाज होने के कारण उन्‍हें बडे अहाते की जरूरत थी और उसमें मकान भी बनाना था , जिसके लिए उन्‍हें अधिक पैसों की आवश्‍यकता थी , जो तब उनके पास नहीं थे। तब उन्‍होने सस्‍ते में गांव के किनारे की उस जमीन को खरीदने का मन बनाया जो भूतों के डेरा के रूप में प्रसिद्ध था और उस खेत में रोपा और कटनी के लिए भी मजदूर दिन रहते ही भाग जाया करते थे।

जमीन के मालिक ने खुशी खुशी रजिस्‍ट्री कर दी , दादाजी ने एक कुंआ बनवाया , उसी से निकली मिट्टी से मजबूत दीवाल बनवाया । हमारे यहां कच्‍चे मकान में पहले छत को बनाने के लिए लकडी और मिट्टी का उपयोग किया जाता है और दोमंजिले पर बांस और खपडे का, जिससे वातानुकूलित घर बनकर तैयार हो जाता है। बिल्‍कुल सामन्‍य ढंग से बने दो बेडरूम , एक बैठक , एक बरामदे , चार गौशाले और एक रसोई वाले इस घर को आज भी ज्‍यों का त्‍यों देखा जा सकता है। इसमें हर वर्ष बरसात से पूर्व टूटे खपडों को हटाकर फिर से नये खपडे लगाने पडते हैं। इसी प्रकार बरसात के बाद थोडी लिपाई पुताई करवानी पडती है ।

घर बनने के बाद बडे धूमधाम से गृहप्रवेश किया गया , पूजा पाठ , हवन , प्रसाद वितरण पूरे गांव को खिलाने पिलाने के बाद पूरा परिवार वहां शिफ्ट कर गया। गांव के बिल्‍कुल एकांत में बने उस मकान में रात के वक्‍त सीधा श्‍मशान ही दिखाई देता था , दादाजी अक्‍सर काम के सिलसिले में बाहर होते , पर शायद दादीजी भी दिल की मजबूत थी , कुछ दिनो तक कोई बात नहीं हुई । कुछ दिन बाद दादीजी पुन: गर्भवती हुईं , गर्भ के छह महीने तक तो कोई दिक्‍कत नहीं , उसके बाद दादीजी की तबियत अचानक खराब हो गयी। बच्‍चे ने हरकत करना बंद कर दिया था , गांव में महिला चिकित्‍सक भी नहीं थी , दादीजी को सीधा हजारीबाग ले जाया गया। वहां हालत हद से अधिक खराब हो गयी , दादीजी को शवगृह के निकट हॉल में रखा गया था , यह सोंचकर कि अब वो मरने ही वाली हैं। नर्स यदा कदा आकर दवाइयां पिला देती थी , पर उसी देखरेख में दादी जी को होश आ गया और कुछ दिनों में वे सामान्‍य होकर घर वापस आयी। ऐसा किस्‍सा एक बार नहीं , छह वर्षों के दौरान तीन तीन बार हुआ।

पूरे गांव को शक था कि भूत ही उन्‍हें परेशान कर रहा है , उनके माता पिता तो तब थे नहीं , भाई और भाभी दादाजी को अपने घर में वापस लौटने को कहते , पर दादाजी इसके लिए तैयार नहीं थे , उनका मानना था कि यदि भूत है तो वह बहुत कमजोर है। सिर्फ गर्भ के कमजोर बच्‍चों को ही नुकसान पहुंचा सकता है , देखता हूं , कबतक वह हमारा पीछा करता है। अगली बार दादीजी फिर गर्भवती हुईं , सबलोग उन्‍हें अपने अपने घर में बुलाते रहें , पर दादीजी का कहना था कि आज वे किसी के घर में रह सकती हैं , पर कल को बेटी बहू आएंगी और वे गर्भवती होंगी , तो उन्‍हें लेकर कहां कहां भटका जाएगा , अच्‍छा है , मेरा ही पीछा करे , कितने दिनों तक करता है ?

पर अगली बार कुछ भी नहीं हुआ , अंतिम क्षणों तक सबकुछ ठीक रहा और दादीजी ने एक स्‍वस्‍थ पुत्र को जन्‍म दिया। उसके बाद सभी बच्‍चों के हर प्रकार के विकास , उनकी पढाई लिखाई , सबके कैरियर , दादाजी को व्‍यवसाय में बडी सफलताएं , नौकर चाकर  , कई घर मकान और गाडी तक हर प्रकार की सफलता उसी घर में मिली। फिर पांचों बेटों की पांच बहूएं आयी , सबके चार पांच बच्‍चे हुए , पूरे आंगन का माहौल हर समय उत्‍सवी बना रहा। कभी भी कोई अनहोनी होते नहीं देखी गयी। इसलिए मेरे परिवार में कोई भी नहीं मानते कि भूत होते हैं , उनमें अपरिमित शक्ति होती है और वे अनिष्‍ट करते हैं। यदि सचमुच ऐसा मान भी लें तो यह कहा जा सकता है कि दृढ इच्‍छाशक्ति के आगे भूतों को भी हारना पडता है।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

आसमान में शुक्र हमेशा क्‍यूं नहीं दिखाई देता ??

11 जुलाई को ललित शर्मा जी ने एक पोस्‍ट लगायी थी , जिसमें एक चित्र दिखाकर पूछा था कि हमने इस तारे की फ़ोटो ली, आप देख कर बताईए कि कौन सा तारा हो सकता है? हालांकि उस चित्र में तो स्‍पष्‍ट तौर पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था , फिर भी मैं समझ गयी कि यह शुक्र ही हो सकता है। मैने उसमें टिप्‍पणी की ...

सूर्य की परिक्रमा करने के क्रम में शुक्र जब सूर्य से नीचे और ऊपर होता है .. तो सालभर यह पृथ्‍वी से दिखाई नहीं देता .. पर जब वह पृथ्‍वी के बाएं हो जाता है .. तो सूर्यास्‍त के बाद पश्चिम में चमक बिखेरता है .. और जब दाएं हो जाता है तो सूर्योदय के पहले पूरब में भी चमकता है .. अभी वह पश्चिम में चमक रहा है .. इसकी चमक अभी अक्‍तूबर तक बढती चली जाएगी .. क्‍यूंकि वह पृथ्‍वी के निकट आने की दिशा में प्रवृत्‍त है .. दिसंबर से वह पूरब दिशा में चमकेगा .. क्‍यूंकि वहां से वह पृथ्‍वी से दूर होता जाएगा .. मार्च तक इसकी चमक क्रमश: कम होती जाएगी और धीरे धीरे सूर्य की चमक में इसकी चमक खो जाएगी !!


इससे पहले भी मै शुक्र की ऐसी ही स्थिति में चंद्रमा के साथ युति होने की एडवांस में खबर और उसके पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव की जानकारी देते हुए एक पोस्‍ट लिख चुकी हूं ।

दिनेश राय द्विवेदी जी को मेरी बात समझ में नहीं आयी , उन्‍होने टिप्‍पणी में लिखा ....

संगीता जी की उपरोक्त बात समझ नहीं आती है। शुक्र जब दृश्य में सूर्य के अत्यंत नजदीक आता है तो केवल 20 दिन के लगभग दिखाई नहीं देता तब हम उसे अस्त कहते हैं। यदि वह पश्चिम में अस्त होता है तो 20-22 दिन बाद पूरब में और पूरब में अस्त होने पर इतने ही दिन बाद पश्चिम में दिखाई देने लगता है। वे जो ऊपर-नीचे और दाएँ-बाएँ बता रही हैं उन का क्या अर्थ है यह तो वे ही बता सकती हैं।

वास्‍तव में ज्‍ज्‍योतिष का ज्ञान परंपरागत रूप से इस ढंग से हमारे पास आ रहा होता है कि हम सामान्‍य सी आकाशीय घटना को भी नहीं समझ पाते हैं , यही कारण है कि 'सीखें गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में मैं जन्‍मकुंडली के माध्‍यम से पूरे आकाशीय स्थिति को सिखलाने की कोशिश कर रही हूं। ललित जी के पोस्‍ट पर टिप्‍पणी के रूप में इसे समझाना आसान न था , इसलिए आसमान में शुक्र के पथ ABCD को दर्शाते हुए एक चित्र भी साथ पोस्‍ट कर रही हूं.....


जब हम पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए सूर्य की गति को प्रतिदिन एक डिग्री बढाते हुए देखते हैं , तो उसके साथ साथ शुक्र भी उसके सापेक्षिक गति के साथ आगे बढता जाता है। सूर्य की परिक्रमा करता हुआ वह अपने पथ में कहीं भी हो सकता है , अधिकांश समय सालभर नहीं तो कम से कम आठ दस महीने यह D विंदू के पास होता है , इसलिए वह पृथ्‍वी से दूर तो होता ही है , सूर्योदय के साथ उदित और सूर्यास्‍त के साथ अस्‍त होता है , इस कारण इसे आसमान में नहीं देखा जा सकता। थोडे दिन यह B विंदु के आसपास होता है , जब भले ही पृथ्‍वी के निकट होता है , पर तब भी पृथ्‍वी से देखने पर वह सूर्य की सीध में होता है , इसलिए सूर्य की चमक से इसे नहीं देखा जा सकता , यहां तक कि उन विंदुओं से थोडे अगल बगल होने पर भी उन्‍हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता , पर जब वह दाएं A विंदु के आसपास होता है तो उसके उदय के थोडी देर बाद सूर्योदय होता है , इस कारण इसे भोर में देखा जा सकता है , पर जब वह बाएं C विंदू के आसपास होता है तो सूर्यास्‍त के थोडी देर बाद तक आसमान में होता है और इसे देखा जा सकता है। दोनो ही बार ऐसा समय तीन चार महीनों के लिए आता है । आशा है , द्विवेदी जी के साथ साथ अन्‍य पाठकों की भी शंका दूर हो गयी होगी।

रविवार, 11 जुलाई 2010

भाग्‍यशालियों को ही बधाई दी जाती है .. उनकी सफलता का गुणगान किया जाता है !!

मेरे पिछले आलेख के अंतिम वाक्‍य "वैसे जो भी हो , जिन भविष्‍यवाणियों को करने के लिए हमें गणनाओं का ओर छोर भी न मिल रहा हो , उसे आसानी से बता देने के लिए ऑक्‍टोपस और उनके मालिक को बधाई तो दी ही जा सकती है" पर हमारे कुछ मित्रों को गंभीर आपत्ति हुई है । उनका कहना है कि जब ऑक्‍टोपस द्वारा की गयी भविष्‍यवाणी मात्र तुक्‍का है तो उसे बधाई देने का क्‍या तुक है। हमारे वो मित्र नहीं जानतें कि बधाई हमेशा भाग्‍यशालियों को ही दी जाती है , अभागों को नहीं। समाज में सफल लोगों का गुणगान किया जाता है , मेहनतकशों का नहीं।

सारे प्रतिभाशाली विद्यार्थी नियमित तौर पर पढाई कर रहे हैं , सबके एक से बढकर एक परीक्षा परिणाम , युवा होते ही प्रतियोगिता की बारी आती है , कोई दो चार प्रश्‍नों के तुक्‍का सवालों का जबाब देकर आता है , उसके अधिक तुक्‍के सही हो जाते हैं , प्रतियोगिता में टॉप पर आने से उसे कोई नहीं रोक पाता। उसे बधाई देने वालों का तांता लग जाता है , पर उस मेहनती बच्‍चे को लोग कहां याद रख पाते हैं , ऐन परीक्षा के वक्‍त जिसकी तबियत खराब हो जाती है , जिसकी गाडी खराब हो जाती है या फिर बहुत सोंचसमझकर भी दो विकल्‍पों में से एक को चुनता है और वो भी गलत हो जाने से उसके प्राप्‍तांक का भी नुकसान हो जाता है और एक नंबर से वह प्रतियोगिता में चुने जाने से चूक जाता है।

सारे माता पिता अपने बच्‍चों के विवाह के लिए परेशान हैं , कुछ का संयोग काम करता है , उन्‍हें उपयुक्‍त पात्र मिल जाते हैं , वे वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं , उन्‍हें और उनके माता पिता को बधाई देनेवालों का तांता लग जाता है। पर कुछ बच्‍चों को , उनके माता पिता का दुर्योग उनसे बहुत दिनों तकं इतजार ही करवाता है , वे इतने वर्षों तक दौड धूप करते रह जाते हैं , कहीं उपयुक्‍त पात्र नजर नहीं आता , अब भला उन्‍हें किस बात की बधाई दी जाए।

जितने दंपत्ति विवाह बंधन में बंधते हैं , सबके घरों में बच्‍चों की किलकारियां गूंजने लगती है , उनके घर पर बधाइयों की झडी लगने लगती हैं , पर उन दंपत्तियों की मेहनत का कोई मूल्‍य नहीं , जो प्रतिदिन चेकअप के लिए डॉक्‍टर के पास जा रहे हैं , कडवी दवाइयां खा रहे हैं और शारिरीक रूप से कई कष्‍टों को झेलने के लिए बाध्‍य हैं या फिर उन दंपत्तियों के कष्‍टों का , जिनके बच्‍चे शारीरिक या मानसिक तौर पर  बीमार हैं।

आपने कभी जमीन या मकान के बारे में सोचा भी नहीं और अचानक आपको ऐसे मकान के बारे में पता चल जाता है , जिसका मालिक किसी विपत्ति में पडने के कारण उसे जल्‍द से जल्‍द बेचने को बाध्‍य है। आपके पास पैसे नहीं होते , पर कुछ मित्र या रिश्‍तेदार आपका साथ देने को तैयार होते हैं।  पैसों का प्रबंध हो जाता है और जमीन या मकान की रजिस्‍ट्री हो जाती है , आपको चारो ओर से बधाइयां मिलने लगती हैं , जबकि मकान या जमीन खरीदने को इच्‍छुक कितने ही व्‍यक्ति के पैसे बैंक में वर्षों तक पडे रह जाते हैं , उनको सही दर में भी मनमुताबिक जमीन नहीं मिल पाती , इसलिए वे बधाई के हकदार नहीं।

विश्‍वकप के बारे में ऑक्‍टोपस द्वारा सटीक भविष्‍यवाणी का कारण क्‍या हो सकता है ??

मैने जब से ब्‍लॉग लिखना शुरू किया है , हर चर्चित मुद्दे पर , चाहे वो मौसम हो या राजनीति , खेल हो या कोई बीमारी , कुछ न कुछ भविष्‍यवाणियां करती आ रही हूं । आकलन में कितनी सत्‍यता होती है , वो तो हमारे पाठक ही बता सकते हैं , पर मैं तुक्‍का नहीं लगाती , एक निश्चित आधार होने पर ही भविष्‍यवाणियां करती हूं। यदि ऐसा नहीं होता तो विश्‍वकप फुटबॉल के बारे में मैं भविष्‍यवाणियां कर चुकी होती। अनिश्चितता के माहौल में इस प्रकार के आकलन का कुछ तो महत्‍व है ही ,  शायद यही कारण हो कि कल के पोस्‍ट पर शिक्षामित्र ने टिप्‍पणी कर पूछा कि क्या आप विश्वकप फुटबाल के बारे में कोई भविष्यवाणी करना चाहेंगी?

पहले भी कुछ पाठकों के मेल आने पर मैने विश्‍वकप फुटबॉल के बारे में जानकारी के लिए गणना करनी शुरू की थी। पर उस गणना से कुछ साफ तस्‍वीर नजर नहीं आ सकी और इसलिए मैने इसके बारे में कुछ भी नहीं लिखा। लेकिन मेरी या अन्‍य ज्‍योतिषियों की कमी ऑक्‍टोपस ने कर दी और अपनी सटीक हो रही भविष्‍यवाणियों के कारण वह दुनियाभर का हीरो बना हुआ है। जहां ज्‍योतिष के इतने सारे तथ्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए एक एक भविष्‍यवाणियां करने में इतनी मुश्किलें आती है , खेलते कूदते ऑक्‍टोपस बाबा एक डब्‍बे पर बैठकर आसानी से भविष्‍यवाणी कर रहे हैं। 

इस घटना को सुनने के बाद मेरा ध्‍यान बहुत पुरानी कुछ घटनाओं पर गया, जहां किसी दुविधा की स्थिति में हाथ की दो उंगलियों में दो परिणामों को रखते हुए उन्‍हें आगे कर किसी बच्‍चे को उनमें से एक पकडने को कहा जाता था। मान्‍यता है कि बच्‍चे दिल के सच्‍चे होते हैं , इस कारण वे जो भी उंगली पकडेंगे , आनेवाला निर्णय वास्‍तव में वैसा ही आएगा। यह संयोग ही है कि अधिकांश समय बच्‍चे के द्वारा पकडी गयी उंगली वाला परिणाम ही देखने को मिलता था। जिस बच्‍चे के द्वारा पकडी गयी उंगली का अनुमान अधिक सही होगा , परिवार य समाज में उसे भाग्‍यशाली माना जाएगा ही। आखिर ईश्‍वर की विशेष कृपा होने से ही तो वह सही उंगली को पकड पाता था।

एक बार मेरे छोटे बेटे की तबियत बहुत गडबड थी , अस्‍पताल में मेरे बेटे का इलाज चल रहा था और मैं मायके में थी। मेरा भतीजा तब बहुत छोटा था , लेकिन उसकी मम्‍मी ने कहा कि उसकी ओर दो उंगलियां बढाएं , वह बिल्‍कुल सही उंगली पकडेगा। मैं इन सब बातों को नहीं मानती हूं , ग्रहों के हिसाब से मैने जो गणना की थी , उसके हिसाब से 18 तारीख तक का डेट सेंसिटीव था , कोई बुरी खबर भी मिल सकती थी , पर यदि जांच पडताल के क्रम में ही वो डेट टल जाए , तो स्थिति बिगडने वाली नहीं होगी। पर 19 तारीख में दस दिन की देर थी , इसलिए सबका मन घबडाया हुआ था। बच्‍चे की मम्‍मी ने ही अपने हाथ की दोनो उंगलियां उसकी ओर बढाया , जिसमें से उसने एक को पकडा। उसने बहुत खुश होते हुए मुझे बताया कि बेटा दवा से ही ठीक हो जाएगा , ऑपरेशन की आवश्‍यकता नहीं पडेगी। दस दिनों तक चेकअप चलता रहा और कई डॉक्‍टरों ने संयुक्‍त रूप से मिलकर फैसला किया कि ऑपरेशन की आवश्‍यकता नहीं है , दवा से ही ठीक हो जाएगा। आप सबों को जानकर ताज्‍जुब होगा कि यह परिणाम 19 तारीख को आया।

दो ऑप्‍शनों में से एक को चुनने के बाद उसका सही होने का सबसे बडा कारण लोगों का विश्‍वास होता है। प्रकृति के नियमों को समझना सरल नहीं , पर किसी बात पर आप पूरा विश्‍वास रखो , तो उस घटना के सही होने के चांसेज बढ जाते हैं। यही कारण है कि किसी के जीवन में एक बार सफलता की शुरूआत होती है , तो आत्‍मविश्‍वास बढता है और उसके साथ ही साथ सफलताओं का इतिहास बनता जाता है। इसके विपरीत यदि किसी के जीवन में असफलता की शुरूआत होती है , तो आत्‍मविश्‍वास घटता है और वह कई असफलताओं को जन्‍म देता है। आत्‍मविश्‍वास के कारण ही कभी कभी मनुष्‍य में एक छठी इंद्रिय भी काम करती है और आनेवाली घटनाओं को वह पहले से देखने लगता है।

मेरे ख्‍याल से ऑक्‍टोपस के द्वारा इस प्रकार की भविष्‍यवाणियों के सटीक होने में एक ओर उसके और उसके मालिकों के भाग्‍य का खेल है , तो दूसरी ओर लोगों का विश्‍वास भी काम कर रहा है।लेकिन इस प्रकार संकेत में प्राप्‍त की गयी भविष्‍यवाणियों का कोई आधार नहीं होता , भाग्‍य के साथ देने से कभी लगातार भी कई भविष्‍यवाणियां सही हो सकती है , जबकि भाग्‍य न साथ दे तो एक भी सही न हो। वास्‍तव में इस प्रकार की भविष्‍यवाणियां एक प्रकार का तुक्‍का है , इसलिए इसके बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता। अल्‍पावधि भविष्‍यवाणियों के मामलों में इस प्रकार की घटना कितनी भी लोकलुभावन क्‍यूं न हों , पर दीर्घावधि भविष्‍यवाणियों के लिए इनका कोई महत्‍व नहीं , क्‍यूंकि किसी का भाग्‍य हर वक्‍त तो साथ नहीं दे सकता। वैसे जो भी हो , जिन भविष्‍यवाणियों को करने के लिए हमें गणनाओं का ओर छोर भी न मिल रहा हो , उसे आसानी से बता देने के लिए ऑक्‍टोपस और उनके मालिक को बधाई तो दी ही जा सकती है।