शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

वैदिक साहित्‍य के आख्‍यानों और पौराणिक मिथकों को विज्ञान गल्‍प कथाएं कहा जा सकता है !!

2004 में 19 फरवरी से 21 फरवरी के मध्‍य राष्‍ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला में तृतीय अखिल भारतीय विज्ञान सममेलन हुआ था , जिसमें परंपरागत ज्ञान से संबंधित विषय को भी स्‍वीकार किया गया था। उस सम्‍मेलन के अवसर पर जो स्‍मारिका प्रकाशित हुई थी , उसमें दो तथ्‍यों को मैं आपके सम्‍मुख प्रस्‍तुत कर चुकी हूं। होशंगाबाद के शा गृहविज्ञान महाविद्यालय की छाया शर्मा ने अपने शोधपत्र के माध्‍यम से इस ओर ध्‍यान आकर्षित किया था कि वैदिक साहित्‍य के आख्‍यानों अथवा पौराणिक मिथकों को वस्‍तुत: मात्र चमत्‍कार गाथाएं नहीं मानी जानी चाहिए। वे ऐसी विज्ञानमय परिकल्‍पनाएं हैं , जिसमें अनेकानेक नवीन आविष्‍कारों की अनंत संभावनाएं छिपी हुई है।

इस प्रकार के तथ्‍य के अन्‍वेषण का कारण यह है कि प्राय: देखा जाता है कि विज्ञान का कोई नया आविष्‍कार सामने आते ही उससे मिलती जुलती पौराणिक कथाएं या शास्‍त्राख्‍यानों की तरु सहज ही ध्‍यान आकर्षित होता है और भारतीय मनीषी यह सोंचने लगते हैं कि उदाहरण के लिए डी एन ए के सिद्धांत के विकास के साथ जैसे ही विज्ञान ने इच्छित व्‍यक्ति के क्‍लोन बनाने की ओर कदम बढाए , तारकासुर के वध के लिए शिव के वीर्य से उद्भुत पुत्र की कथा सामने आ गयी। हृदय , किडनी , लीवर जैसे अंगों के प्रत्‍यारोपण की वैज्ञानिक क्षमता की तुलना में अज शिर के प्रत्‍यारोपण , जैी अनेक कथाएं से पौराणिक मिथक भंडार परिपूर्ण है , जहां तक विज्ञान को जाना शेष है। पार्वती द्वारा गणेश का निर्माण और देवताओं द्वारा अत्रि के आंसु से चंद्रमा के निर्माण की कथाएं मानव के लिए चुनौती हैं। वायुशिल्‍प की जिन ऊंचाइयों को रामायण और महाभारत के वर्णन छूते हैं , वहां तक पहुंच पाना हमें दुर्गम लगता है। वायुपुत्र हनुमान की परिकल्‍पना, उसकी समसत गतिविधियों में विज्ञान के बढते चरणों के लक्ष्‍य को नापने लगती है। मानव का पक्षी की तरह आकाश में उड पाने का सपना ही हनुमान का चरित्र है।

यद्यपि अनेक रहस्‍यमयी कथाओं को आध्‍यात्‍मपरक व्‍याख्‍या कर उन्‍हें योग विज्ञान के क्षेत्र में शामिल कर लिया गया है , फिर भी आवश्‍यकता है उन कथानकों के गूढ वैज्ञानिक इंगित को समझा जाए , जो काल के चतुर्थ आयाम को रेखांकित करती है और भविष्‍य से वर्तमान में आए चरित्रों की कथा जान पडती है। विंसेट एच गैडीज ने अपनी विज्ञान गल्‍प की परिभाषा में कहा है कि विज्ञान गल्‍व उन सपनों की अभिव्‍यक्ति है , जो बाद में थोडी संशोधित और संवर्धित होकर वैज्ञानिक उन्‍नति की वास्‍तविकता बन जाती हैं। फेंटेसी या कल्‍पकथा की अपेक्षा विज्ञान गल्‍प अपनी मूल संरचना में ही संभावनाओं को प्रस्‍तुत करता है और कल्‍पनाशील विचारों का वह भंडार तैयार करता है , जो कभी व्‍यवहारिक या प्रायोगिक चिंतन को प्ररित कर सकता है। इस आधार पर वैदिक साहित्‍य के इन आख्‍यानों और पौराणिक मिथकों को विज्ञान गल्‍प कथाएं कहा जा सकता है। रचनात्‍मक अध्‍ययन , अन्‍वेषण और आविष्‍कार के लिए भी इनका अध्‍ययन अत्‍यंत आवश्‍यक है।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

दक्षिण: कुक्षौ पुत्रम् जीजनत् वाम कुक्षौ पुत्रीम् जीजनत् का वैज्ञानिक सत्‍यापन

कल दिब्‍या श्रीवास्‍तव जी के लेख मनचाही संतान कैसे प्राप्‍त करें के पोस्‍ट होने के बाद से ही ब्‍लॉग जगत में हमारे देश के परंपरागत तकनीकों के विरोध के स्‍वर मुखरित हो रहे हैं। पोस्‍ट के विवादास्‍पद होने का कारण यह विषय नहीं , वरन् इसके लिए आयुर्वेद के महत्‍व को माना जाना है। टिप्‍पणियों में अच्‍छी खासी चर्चा के बाद कई आलेख भी प्रकाशित किए गए हैं और उनमें भी पक्ष और विपक्ष में टिप्‍पणियां आ रही हैं। जिन महत्‍वपूर्ण आधारों पर हमारी परंपरागत जीवनशैली आधारित थी , जिसके कारण सदियों से एक अच्‍छी परंपरा चली आ रही है , उसे इतनी आसानी से अनदेखा नहीं किया जा सकता। आखिर बिना किन्‍हीं सिद्धांतों को परखे जांचे बिना हम किसी बात को सही गलत कैसे कह सकते हैं ??


आज डॉ अजीत गुप्‍ताजी ने गलत नहीं लिखा है।  इस देश को 250 वर्षों तक अंग्रेजों ने बेदर्दी से लूटा और लूटा ही नहीं हमारे सारे उद्योग धंधों को चौपट किया, हमारी शिक्षा पद्धति, चिकित्‍सा पद्धति, न्‍याय व्‍यवस्‍था, पंचायती राज व्‍यस्‍था आदि को आमूल-चूल नष्‍ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्‍होने अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए हमें आपस में ही खूब लडाया , हमारी परंपरा को गलत ठहराया और हममें एक गुलामों वाली मानसिकता विकसित की और इसी का कारण है कि हमें आज परंपरागत चीजें नहीं , सिर्फ आज का चकाचौंध ही अच्‍छा लगता है। लेकिन दिव्‍या जी का प्रश्‍न भी जायज है कि यदि आयुर्वेद का महत्‍व नहीं , तो हल्दी और नीम , सर्पगंधा, शंखपुष्पी, शतावरी, मुस्ली तथा जिस पर भी थोडा सा शोध होता है उसे विज्ञानं पटेंट कर क्‍यूं Allopath के साथ जोड़ देता है ?? आयुर्वेद में शोध से क्या फायदा ? शोध के नतीजे तो पटेंट होने के बाद Allopath का अंग बन जायेंगे। CDRI , Lucknow has patented 'bramhi' and 'Shankhpushpi' in year 2002.America has parented 'Haldi' and ' Neem ' recently.


मुझे याद है 2004 में विज्ञान भवन में एक विज्ञान सम्‍मेलन हुआ था , जिसमें परंपरागत ज्ञान विज्ञान के शोधों को भी शामिल किया गया था। दरअसल अमेरिका द्वारा किए गए कुछ पेटेंटो से आहत होकर माशेलकर जी ने इस दिशा में प्रयास किया था , पर आगे उसपर कोई कार्रवाई होते नहीं देखा। मुझे एक बात याद भी है , जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है। उसमें जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्‍वविद्यालय के एम जी महिला महाविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग से अंकिता बोहरे का शोधपत्र भी शामिल किया गया था। उन्‍होने अपने शोधपत्र में लिखा था कि आज के आधुनिक विज्ञान के युग में प्राचीन विचारकों तथा वैज्ञानिकों के द्वारा दिए गए तथ्‍यों व विचारों को सत्‍यापित कर स्‍थापित करने की रेणी में मानव प्रजनन कार्यकि में स्‍त्री और पुरूष के परस्‍पर समान भागिदारिता सिद्ध करने का एक प्रयास किया गया था। लिंग निर्धारण के लिए मात्र पुरूष ही नहीं , महिला भी उतनी ही उत्‍तरदायी है , इस बात का सत्‍यापन आयुर्वेद में वर्णित एक उक्ति दक्षिण: कुक्षौ पुत्रम् जीजनत् वाम कुक्षौ पुत्रीम् जीजनत्, के आधार पर किया गया। इस उक्ति का अर्थ है कि दायीं ओर से निक्षेपित अंड से पुत्र तथा बायीं ओर के अंड से पुत्री का निर्माण होता है।

इस उक्ति के सत्‍यापन के लिए यू जी सी के अंतर्गत एक रिसर्च प्रोजेक्‍ट शासकीय मेडिकल कॉलेज में संपन्‍न किया गया, जिसमें 84 प्रतिशत सफलता मिली। इस शोध कार्य में गाइनोकोलोजिस्‍ट तथा रेडियोलोजिस्‍ट की टीम ने मिलकर कार्य किया तथा सभी महिलाओं का सोनोग्राफिक परीक्षण किया गया। इस प्रोजेक्‍ट की सफलता से यह सत्‍यापित हुआ कि महिला की दायें अंडाशय से उत्‍पन्‍न होनेवाला अंड काफी सीमा तक पुरूष लिंग निर्मित करने के लिए सूचनाबद्ध होते हैं। इस धारणा को जैव रसायनिक आधार देने की भी कोशिश की जा रही थी। यह सत्‍यापन मानव प्रजनन की तथा आनुवंशिकी में नए सोपान निर्घारित कर सकता था। इस सफलता के बाद इस दिशा में अधिक रिसर्च होने हेतु सरकार की ओर से क्‍या प्रयास हुआ , नहीं कह सकती , पर इतना तो अवश्‍य है कि परंपरागत तकनीकों के विकास में सरकार का व्‍यवहार सौतेला है। जहां तक महत्‍व की बात है हर युग में हर पद्धति का महत्‍व होता है ......
जहां काम आवै सूई , क्‍या करे तलवारि !!

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

रविकांत पांडेय जी और हिमांशु मोहन जी के साथ साथ सुज्ञ जी का विश्‍लेषण बढिया रहा .. करण समस्‍तीपुरी ने भी लगायी मुहर!!

कल मैने एक लोकोक्ति पोस्‍ट की थी और पाठकों से उसका अर्थ पूछा था ..


आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।


एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!

बहुत सारे रोचक जबाब आए ... पाठकों का बहुत आभार ... आप भी देखिए उनके जबाब ......

Divya said...


हुत अच्छी लोकोक्ति । अर्थ जानने के लिए दुबारा आउंगी.
Blogger रविकांत पाण्डेय said...
अर्थ कठिन नहीं है। पाहुन के आते ही यदि आदर न दिया गया और जाते वक्त हाथ न जोड़ा गया तो रिश्ता ज्यादा दिनों तक नहीं निभता। उसमें ख्टास आने लगती है। दूसरी ओर यदि आर्द्रा नक्ष्त्र के आते ही बारिश न हुई और हस्त नक्षत्र के जाते-जाते बारिश न हुई तो कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो गृहस्थ के लिये दुखद है। प्रकारांतर से ये लोकोक्ति ऐसे भी सुनने में आती है
आवत आदर ना दिये जात न दिये हस्त
ये दोनों पछतात हैं पाहुन और गृहस्थ
Blogger Coral said...
संगीता जी मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी लिए धन्यवाद...
इस लोकोक्ति का अर्थ तो मै जानती नहीं हू जानेकी इच्छा है
Blogger डा० अमर कुमार said...
comments must be approved by the blog author
फिर भी..
इसका भावार्थ यह होगा ।
माघ की आर्द्रा और इस समय की हथिया ( हस्तिका ) सबके लिये बराबर है, चाहे मेहमान हों या गृहस्थ सभी अपनी जगह ठप्प पड़ जाते हैं ।
Blogger ajit gupta said...
संगीताजी, कहावत पहली बार सुनी है लेकिन फिर भी भावार्थ करने का प्रयास कर रही हूँ।
आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।
एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!
अतिथि के आने पर जो आदर नहीं देता और उसके जाने पर जो हाथ नहीं जोड़ता उससे मेहमान और घर वाले दोनों ही चले जाते हैं।
Blogger सुज्ञ said...
आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।
एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!
इस लोकोक्ति का अर्थ है,आने वाले अतिथि का आते जो आदर न करे,व जाता हुआ अतिथि हाथ जोड धन्यवाद न करे तो पाहुन(मह्मान)और गृहस्‍थ (मेज़बान)दोनो का जीवन व्यर्थ है।
Blogger Himanshu Mohan said...
आते हुए आर्द्रा में वर्षा न हो, और जाते हुए हस्त में तो अकाल से गृहस्थों को संकट होगा।
अभिधार्थ है कि यदि आते समय पानी को न पूछे और विदा के समय हाथ जोड़कर सम्मान से न विदा करे - तो अतिथि का घोर तिरस्कार है।
आपकी व्याख्या की प्रतीक्षा रहेगी, मैंने यह कहावत पहले सुनी नहीं है।
Blogger अन्तर सोहिल said...
पहली बार सुनी है जी
आप ही बतायें
प्रणाम
Blogger Himanshu Mohan said...
दोबारा सोचता हूँ तो लगता है कि कुछ सम्बन्ध आर्द्रा में यव या जौ (अर्थात इस फसल की) बुआई से हो शायद, और हस्त में जाँत (चक्की, या थोड़ा अर्थ को दूर तक ले जाएँ तो शायद खेती की निराई) से अर्थ सम्बन्धित हो सकता है। मगर लगता नहीं ऐसा, क्योंकि आर्द्रा-प्रवेश की सैद्धान्तिक महत्ता सिद्ध है - अत: वही अर्थ ग्राह्य लगता है।
Blogger vinay said...
अर्थ मुझे भी नहीं पता,अगर मालुम चले मुझे भी बताइगा ।
Blogger Aadarsh Rathore said...
अजीत गुप्ता जी ने एकदम सही सरलार्थ किया है..
भावार्थ है- जीवन में विनम्र रहो
पाहुने का अर्थ- मेहमान
जय हो
Blogger सुज्ञ said...
संगीता जी,
आत न आर्द्रा जो करे,
आते अतिथि का जो आदर न करे
लगते आर्द्रा(नक्षत्र)में जो बोवनी न करे

जात न जोडे हस्‍त।
जाते अतिथि को हाथ जोड बिदाई न करे
जाते हस्त(नक्षत्र)में उपज जोड न ले

एतै में दोनो गए,
ऐसे में दोनो के कार्य निष्फ़ल है

पाहुन और गृहस्‍थ !!
पाहुन अर्थार्त महमान,व गृहस्‍थ अर्थार्त मेज़बान
पाहुन अर्थार्त बरसात,व गृहस्‍थ अर्थार्त किसा
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...
लोकोक्ति और अर्थ दोनों ही मिल गए....
Blogger Science Bloggers Association said...
गागर में सागर जैसी है यह लोकाक्ति।
................
Blogger महफूज़ अली said...
मैं तो हिंदी में ख़ुद ही बहुत बड़ा नालायक हूँ.... ही ही ही ही....
Blogger शंकर फुलारा said...
लोकोक्ति को जानकर और टिप्पणियों के अध्ययन के बाद तो ज्ञान चक्षु खुल गए | ऐसा ज्ञान और काव्य क्षमता केवल भारत में ही संभव है | लोकोक्ति के लिए धन्यवाद।
Blogger हास्यफुहार said...
मुझे नहीं पता।
शायद देसिल बयना वाले करण जी जवब दें।
करण समस्तीपुरी said...
यह लोकोक्ति 'घाघ-भड्डरी' की लोक-कथाओं से आकलित है. अल्प वय में अनाथ हो चुके 'घाघ' की छोटी-छोटी बातें बड़ा महत्व रखने लगी. लोग उन्हें भविष्य वक्ता समझने लगे किन्तु सच तो यह था कि उन्हें 'मौसम विज्ञान' की बहुत गहरी समझ थी. उनका मौसम पूर्वानुमान प्रायः सच होता था. मौसम के उपयोगी जानकारी को इन्होने लोक-मानस से जोड़ कर अनेक कहावते गढ़ी. जैसे १. शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय। तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।। २. सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय। महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।। इसके अतिरिक्त उन्होंने लोक-मान्यताओं पर आधारित अनेक उक्तियाँ दी. जैसे दिशा-शूल के सम्बन्ध में उनका एक पद्य बड़ा प्रचलित है।
शनि-सोम पूर्व नहि चालु !
मंगल बुध उत्तर दिशी कालू !!


इसी तरह दिशा-शूल निवारण के लिए भी उनका एक पद्य-सूत्र इस प्रकार है,
रवि ताम्बूल, सोम को दर्पण !
भौमवार गुड़-धनिया चरबन !!
बुध को राई, गुरु मिठाई !
शुक्र कहे मोहे दधी सुहाई !!
शनि वे-विरंगी फांके,
इन्द्रहु जीती पुत्र घर आबे !


प्रस्तुत लोकोक्ति "आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त। एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!" भी घाघ की एक प्रसिद्द लोकोक्ति है. इसके बारे में मैं ने जितनी पढी और सुनी है उसके मुताबिक़ श्री राविकांत पाण्डेय जी के विवरण से अक्षरशः सहमत हूँ ! आते हुए आदर (आर्द्र नक्षत्र पानी) नहीं और जाते हुए हस्त (हस्ती या हथिया नक्षत्र नहीं बरसा) बोले तो हाथ में कुछ विदाई नहीं दिया तो इसमें गृहस्थ यानी कि किसान और पाहून दोनों गए काम से !!!
शिवम् मिश्रा said...
एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं
rashmi ravija said..
जानबूझकर इस पोस्ट पर देर से आई ताकि अर्थ पता चले...और कितना कुछ पता चला..
सच...ब्लॉग्गिंग का यही फायदा है...इतना विस्तारपूर्वक कोई नहीं बता सकता था.
एक नई लोकोक्ति और उसके अर्थ दोनों पता चले.

सभी मनुष्‍यों का समय बहुत ही तेज गति से बदलता है !!

एक सज्‍जन कई वर्षों से हमारे संपर्क में थे , बहुत बुरा दिन चल रहा था उनका। कभी करोडों में खेलने का मौका जरूर मिला था उन्‍हें , पर बाद में एक एक पैसे के लिए मुहंताज चल रहे थे। महीनेभर का खर्च , बेटे बेटियों की पढाई , हर बात के लिए कर्ज लेने को मजबूर थे। कोई परेशानी आती , तो हमें भी फोन पर परेशान कर देते थे। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' यह मानता है कि ज्‍योतिष में ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए अभी तक बहुत सटीक उपाय नहीं हुए हैं, कुछ उपायों से बुरे समय को कम बुरा और अच्‍छे समय को अधिक अच्‍छा ही किया जा सकता है। इसलिए कुछ पाने के लिए समय का धैर्यपूर्वक इंतजार करना ही पडेगा। हम उन्‍हें भी उनके आगे के समय के सकारात्‍मक होने की चर्चा करते हुए उनके आत्‍म विश्‍वास को बढाने की कोशिश करते थे। उनकी पत्‍नी हमेशा कहा करती कि मेरे दिलासा देने के कारण ही वे इतना धैर्य रख पा रही हैं , नहीं तो इतनी बेचैनी में कब पूरा परिवार पुडिया खाकर सो गया होता।

उन्‍होने जहां तहां से पूंजी जुटाकर कुछ व्‍यवसाय करने की भी कोशिश की , पर खास फायदा न होने से वह कर्ज भी माथे पर आ गया। अब उनके समय को सुधरने में दो वर्ष बचे हैं। कल उनका फोन आया , वे आत्‍मविश्‍वास से भरे थे , दो वर्ष में उनकी सारी समस्‍याएं हल हो जाएंगी , उन्‍हें अब दिख रहा था। मेरे पूछने पर उन्‍होने बताया कि उनके पिताजी के नाम से कुछ जमीन पडी थी , तीनो भाइयों में सहमति न बन पाने से उसकी बिक्री नहीं हो सकी थी। एक बिल्‍डर ने उस जमीन में अपार्टमेंट बनाने का निश्‍चय किया है , जिसमें से पांच पांच फ्ल्‍ैट वह तीनो भाइयों को दे देगा। एक फ्ल्‍ैट में वो रहेंगे , बाकि किराए पर लगा देंगे , तबतक बेटे बेटियां भी पढकर निकल जाएंगे। धीरे धीरे वो कर्ज चुका ही देंगे , यदि खुद नहीं भी चुका सकें , तो मात्र एक फ्ल्‍ैट को बेचकर बाजार का कर्ज चुकाया जा सकता है। चलिए वृद्धावस्‍था सुख से कटेगा , यह कम बडी बात नहीं है।

एक ऐसा ही किस्‍सा पिछले वर्ष भी हमारे सामने आया था , एक अच्‍छे खासे व्‍यवसायी अपनी लापरवाही के कारण अपने स्‍टाफों के द्वारा हिसाब किताब में किए गए घोटालों के कारण ऐसी स्थिति में पहुंच गए कि उन्‍हें अपना सबकुछ गंवाना पड गया। उनके बेटे भी बडे हो गए थे , हर काम में पैसों की आवश्‍यकता थी , तीन चार वर्षों तक काफी परेशान थे। ऐसी हालत को सुधारने के लिए कई ज्‍योतिषियों ने भी उन्‍हें लंबी चौडी आर्थिक चपत लगा दी थी। काफी दिनों बाद ही वे मेरे पास पहुंचे , मैने उन्‍हें कुछ दिनों का इंतजार करने को कहा , पर उनके सामने घना अंधेरा छाया था , मेरी बातों पर वे विश्‍वास ही नहीं कर पा रहे थे कि उनका समय भी अब आ सकता है। पर एक जमीन ने ही उनकी भी मदद की ,कुछ मित्रों के सुझाव पर जब उन्‍होने वहां पर मारकेट कांप्‍लेक्‍स बनाने का प्‍लान किया , दुकान की बुकिंग के लिए एडवांस मिलने शुरू हो गए। पैसे जुटते ही फटाफट काम शुरू हुआ , फिर तो बैंक से लोन भी पास हो गया  और दो वर्ष के अंदर उनकी समस्‍याएं हल हो गयीं।

उपरोक्‍त दोनो उदाहरण में देखने को मिला कि उनकी समस्‍या को सुलझाने में संपत्ति ने ही मदद की , पर यदि उनके पास संपत्ति नहीं होती , तो भी समय आने पर समस्‍याएं सुलझ ही जाती। कोई न कोई ऐसा बहाना निकल आता , जिसके कारण समस्‍याएं हल हो जाती। दाने दाने के लिए मुहंताज एक परिवार को मैने दस वर्षों के अंदर काफी तरक्‍की करते पाया है। पिछले वर्ष तक ए‍क युवति मेरे पास आकर रोया करती थी , न तो उसका विवाह हो पा रहा था और न ही कैरियर के कोई आसार दिख रहे थे। पर अचानक इसी वर्ष उसका ववाह भी हुआ और एक बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर के रूप मे बहाली भी हुई। मेरे सामने कई ऐसे उदाहरण है , जिन्‍होने सतत् संघर्ष के बाद विजय पायी है। आज जो सफल हैं , उन्‍होने ही जीवन में मेहनत की , ऐसा नहीं है। आज जो मेहनत कर रहे हें , वे कल भी सफल हो सकते हैं। संयोग और दुर्योग किसी को आगे ले जाने में और पीछे खींचने में महत्‍वपूर्ण रोल अदा करता है। सभी मनुष्‍यों का समय बहुत ही तेज गति से बदलता है , ऐसे में धैर्य बहुत आवश्‍यक है। !!

सोमवार, 19 जुलाई 2010

एक लोकोक्ति का अर्थ स्‍पष्‍ट करें .....

गांव में बोली जाने वाली एक लोकोक्ति की याद आ गयी , पाठकों से निवेदन है कि इसका अर्थ स्‍पष्‍ट करें .....

आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।
एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!