शनिवार, 14 अगस्त 2010

बोकारो में बच्‍चों को एंटीबॉयटिक दवाओं का सेवन कम करना पडा !!

अभी तक आपने पढा .. बोकारो में कक्षा 1 और 3 में पढने वाले दो छोटे छोटे बच्‍चों को लेकर अकेले रहना आसान न था , स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति काफी सचेत रहती। पर बच्‍चों को कभी सर्दी , कभी खांसी तो कभी बुखार आ ही जाते थे , मेरी परेशानी तो जरूर बढती थी , पर यहां बगल में ही एक डॉक्‍टर के होने से तुरंत समाधान निकल जाता। यहां आने का एक फायदा हुआ कि हमारे यहां के डॉक्‍टर जितने एंटीबायटिक खिलाते थे , उससे ये दोनो जरूर बच गए , इससे दोनो की रोग प्रतिरोधक शक्ति को तो फायदा पहुंचा ही होगा। वहां भले ही इलाज में हमारे पैसे खर्च नहीं होते थे , पर दोनो ने बचपन से ही एलोपैथी की बहुत दवाइयां खा ली थी । यहां के डॉक्‍टर की फी मात्र 35 रूपए थी और अधिक से अधिक 25 रूपए की दवा लिखते , आश्‍चर्य कि कभी उनके पास दुबारा जाने की जरूरत भी नहीं होती।

हां , बाद में बच्‍चों के 10-11 वर्ष की उम्र के आसपास पहुंचने पर दोनो के अच्‍छे शारीरिक विकास के कारण उनके द्वारा दिया जानेवाला डोज जरूर कम होने लगा था , जिसे मैं समझ नहीं सकी थी , दवा खिलाने के बाद भी कई बार बुखार न उतरने पर रात भर मुझे पट्टी बदलते हुए काटने पडे थे। डोज के कम होने से दवा के असर नहीं करने से एक बार तो तबियत थोडी अधिक ही बिगड गयी । एक दूसरे डॉक्‍टर ने जब मैने दवा का नाम और डोज सुनाया तो बच्‍चों का वेट देखते हुए वे डॉक्‍टर की गल्‍ती को समझ गए और मुझसे डोज बढाने को कहा। तब मेरी समझ में सारी बाते आयी। डॉक्‍टर ने चुटकी भी ली कि मम्‍मी तुमलोगों को बच्‍चा समझकर आम और अन्‍य फल भी कम देती है क्‍या ??

आए हुए दो महीने भी नहीं हुए थे , बरसात के दिन में बडे बेटे को कुत्‍ते ने काट लिया, तब मै उन्‍हें  अकेले निकलने भी नहीं देती थी। चार बजे वे खेलने जाते तो मैं उनके साथ होती,  उस दिन भी किसी काम के सिलसिले में बस पांच मिनट इंतजार करने को कहा और इतनी ही देर में दरवाजा खोलकर दोनो निकल भी गए , अभी मेरा काम भी समाप्‍त नहीं हुआ था कि छोटे ने दौडते हुए आकर बताया कि भैया को कुत्‍ते ने काट लिया है। पडोसी का घरेलू कुत्‍ता था , पर कुत्‍ते के नाम से ही मन कांप जाता है। तुरंत डॉक्‍टर को दिखाया , टेटवेक के इंजेक्‍शन पडे। घाव तो था नहीं , सिर्फ एक दांत चुभ गया था , हल्‍की सी एंटीबायटिक पडी। कुत्‍ते का इंतजार किया गया , कुत्‍ता बिल्‍कुल ठीक था , इसलिए एंटीरैबिज के इंजेक्‍शन की आवश्‍यकता नहीं पडी, पर काफी दिनों तक हमलोग भयभीत रहे।

पता नहीं दवा कंपनी के द्वारा दिए जाने वाला कमीशन का लालच था या और कुछ बातें , बाद में हमें यहां कुछ डॉक्‍टर ऐसे भी दिखें , जो जमकर एंटीबॉयटिक देते थे। बात बात में खून पेशाब की जांच और अधिक से अधिक दवाइयां , हालांकि उनका कहना था कि मरीजों द्वारा कचहरी में घसीटे जाने के भय से वे ऐसा किया करते हैं। खाने पीने और जीवनशैली में सावधानी बरतने के कारण हमलोगों को डॉक्‍टर की जरूरत बहुत कम पडी , इसलिए इसका कोई प्रभाव हमपर नहीं पडा !!

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

बोकारो में दूध की व्‍यवस्‍था भी खुश कर देनेवाली है !!

अभी तक आपने पढा .. जब बच्‍चे छोटे थे , तो जिस कॉलोनी में उनका पालन पोषण हुआ , वहां दूध की व्‍यवस्‍था बिल्‍कुल अच्‍छी नहीं थी। दूधवालों की संख्‍या की कमी के कारण उनका एकाधिकार होता था और दूध खरीदने वाले मजबूरी में सबकुछ झेलने को तैयार थे , और उनके मुनाफे की तो पूछिए मत। हमारे पडोस में ही एक व्‍यक्ति मोतीलाल और उसका पुत्र जवाहरलाल मिलकर सालों से सरकारी जमीन पर खटाल चला रहे थे। जमीन छीने जाने पर दूसरे स्‍थान में वे लोग दूसरी जगह खटाल की व्‍यवस्‍था न कर सके और सभी गाय भैंसों की बिक्री कर देनी पडी। जमीन की व्‍यवस्‍था में ही उन्‍हें कई वर्ष लग गए , हमलोगों को शक था कि इतने दिनों से आपलोगों का व्‍यवसाय बंद है , महीने के खर्च में तो पूंजी कम हो गयी होगी। पर हमें यह जानकर ताज्‍जुब हुआ कि कि उन्‍होने पूंजी को हाथ भी नहीं लगाया है, अभी तक जहां तहां पडे उधार से अपना काम चला रहे हैं। 

दूध का व्‍यवसाय करने वाले घर घर पानी मिला दूध पहुंचाना पसंद करते थे , पर कुछ जागरूक लोगो ने सामने दुहवाकर दूध लेने की व्‍यवस्‍था की। इसके लिए वह दूध की दर अधिक रखते थे , फिर भी उन्‍हें संतोष नहीं होता था। कभी नाप के लिए रखे बरतन को वे अंदर से चिपका देते , तो कभी दूध निकालते वक्‍त बरतन को टेढा कर फेनों से उस बरतन को भर देते। चूंकि हमलोग संयुक्‍त परिवार में थे और दूध की अच्‍छी खासी खपत थी , सो हमने रोज रोज की परेशानी से तंग आकर हारकर एक गाय ही पाल लिया था और शुद्ध दूध की व्‍यवस्‍था कर ली थी। यहां आने पर दूध को लेकर चिंता बनी हुई थी।



पर बोकारो में दूधविक्रेताओं की व्‍यवस्‍था को देखकर काफी खुशी हुई , अन्‍य जगहों की तुलना में साफ सुथरे खटाल , मानक दर पर मानक माप और दूध की शुद्धता भी। भले ही चारे में अंतर के कारण दूध के स्‍वाद में कुछ कमी होती हो, साथ ही बछडे के न होने से दूध दूहने के लिए इंजेक्‍शन दिया करते हों। पर जमाने के अनुसार इसे अनदेखा किया जाए , तो बाकी और कोई शिकायत नहीं थी। पूरी सफाई के साथ ग्राहक के सामने बरतन को धोकर पूरा खाली कर गाय या भैंस के दूध दूहते। बहुत से नौकरी पेशा भी अलग से दूध का व्‍यवसाय करते थे , उनके यहां सफाई कुछ अधिक रहती थी।

अपनी जरूरत के हिसाब से ग्राहक आधे , एक या दो किलो के हॉर्लिक्‍स के बोतल लेकर आते , जिसमें दूधवाले निशान तक दूध अच्‍छी तरह भर देते। सही नाप के लिए यदि दूध में फेन होता , तो वह निशान के ऊपर आता।  इतना ही नहीं , कॉपरेटिव कॉलोनी में तो वे गायें लेकर सबके दरवाजे पर जाते और आवश्‍यकता के अनुसार दूध दूहकर आपको दे दिया करते और फिर गायें लेकर आगे बढ जाते। यहां के दूधवाले हर महीने हिसाब भी नहीं करते , वे कई कई महीनों के पैसे एक साथ ही लेते। हां , हमारा दूधवाला एडवांस में जरूर पैसे लेता था।

अखबार वालों की ऐसी व्‍यवस्‍था भी होती है !!

अभी तक आपने पढा ...बोकारो में आने के तुरंत हमलोगों को अखबार की जरूरत पड गयी थी , ताकि रोज की खबरों पर नजर रखी जा सके , क्‍यूंकि उस समय हमारे पास टी वी नहीं था। रेडियो का तो तब शहरों में समय ही समाप्‍त ही हो चुका था। पडोस में अखबार डालते अखबार वाले को बुलवाकर हमने उसी दिन से अपने पसंद का अखबार लेना शुरू कर दिया था। ट्रेन के देर होने से या अन्‍य किसी कारण से शहर में अखबार के आने में देर भले ही हो जाती , पर शहर के अंदर समाचार पत्रों को वितरित करने में बहुत चुस्‍त दुरूस्‍त लगे ये अखबार वाले , फटाफट अपनी जिम्‍मेदारी को समझते हुए हर जगह पहुंचा देते। हमने तीन मकान बदल लिए , पर हर जगह इन्‍हें ऐसा ही पाया।

जब हमलोग पहली बार मकान बदल रहे थे , तो अखबार वाले को बुलाकर उसका हिसाब करना चाहा। पर उसने हिसाब करने से इंकार कर दिया , उसने सिर्फ हमसे वह पता मांगा , जहां हम जा रहे थे। हम जब वहां पहुंचे तो दूसरे ही दिन से वहां मेरा पसंदीदा अखबार आने लगा। लगभग छह किलोमीटर की दूरी तक यानि दूसरी बार भी मकान बदलने पर ऐसा ही देखने को मिला। यह भी मालूम हुआ कि यदि हम पुराने अखबार वाले को अपना नया पता नहीं देकर आते तो भी दूसरे किसी अखबारवाले से अखबार ले सकते थे और हमें अपना अखबार मिलने लगता और सारे बिल एक साथ मिलते। नए महीने के पहले सप्‍ताह में ही पिछले महीने के बिल आते रहे , चाहे कितनी भी दूरी में और किसी से भी हमने समाचार पत्र क्‍यूं न लिए हों। पता नहीं , ऐसी व्‍यवस्‍था वे कैसे कर पाते थे ??

पूरे बोकारो शहर में भले ही सभी समाचार पत्रों का यहां एक ही एजेंट हो , उसे महाएजेंट माना जा सकता हो और उसके अंदर पुन: कई एजेंट कमीशन पर काम करते हैं , उनसे लेकर अखबार वितरित करनेवाले भी अपना काम करते हैं , जो अलग अलग क्षेत्रों के होते हैं । भले ही एजेंट पूर्ण रूप से अखबार के व्‍यवसाय से ही जुडे हो , पर अखबार वितरित करनेवालों का यह अतिरिक्‍त पेशा होता है , ये किसी अन्‍य काम से भी जुडे होते हैं , क्‍यूंकि उनकी आमदनी कम होती है। लेकिन सब‍ मिलकर हिसाब किताब एक साथ रखते हैं और आप बोकारो में जहां भी रहें और जिससे भी पेपर लें , बीच में हिसाब करने की कोई जरूरत नहीं ,उनका अपना हिसाब होता है। हो सकता है , सभी शहरों में ऐसी व्‍यवस्‍था हो , पर मैं नहीं जानती थी , इसलिए मुझे बडा आश्‍चर्य हुआ। 


बुधवार, 11 अगस्त 2010

शुक्र की सितंबर से दिसंबर 2010 तक की खास स्थिति का आपपर कैसा प्रभाव पडेगा ??

पिछले आलेख में 13 अगस्‍त को आसमान में दिखाई देने वाले शुक्र चंद्र युति की मैने चर्चा की है। सिर्फ 13 अगस्‍त को ही नहीं , आने वाले दिनों में लगभग पांच महीनों तक यानि 11 सितंबर , 9 अक्‍तूबर , 2 दिसंबर , 31 दिसंबर और 29 जनवरी को भी आसमान में ऐसी स्थिति बनती रहेगी, जिसमें सर्वाधिक चमक के साथ शुक्र और सबसे छोटा चांद 9 अक्‍तूबर को दिखेगा , जो आसमान में वाकई देखने में खूबसूरत लगता है। अगस्‍त 2009 से  जनवरी 2010 तक इस प्रकार की स्थिति के बनने की जो मुख्‍य वजह होती है , उसे मैं इस पोस्‍ट में भी समझा चुकी हूं। पिछले पोस्‍ट में ही इसका सामान्‍य तौर पर प्रभाव की चर्चा कर चुकी हूं , पर जनसामान्‍य पर इसके प्रभाव को विस्‍तार देने के लिए एक पोस्‍ट आवश्‍यक था। चंद्र राशि के हिसाब से शुक्र की इस खास ग्रहस्थिति के कारण आनेवाले चार पांच महीने मेष और वृष राशिवालों के लिए , खासकर भरणी और कृतिका नक्षत्र में जन्‍मलेनेवालों के लिए अच्‍छे तथा कुंभ और मीन राशि वालों , खासकर शतमिषा और पूर्व भाद्र पद में जन्‍मलेनेवालों के लिए कुछ गडबड होंगे। पर यदि इसके प्रभाव को अच्‍छी तरह समझना चाहते हों तो जन्‍म विवरण के द्वारा अपने लग्‍न , राशि और नक्षत्र की जानकारी के लिए यहां  या   यहां क्लिक कर पूरे पोस्‍ट को ध्‍यान से पढना आपके लिए आवश्‍यक है।

जहां तक शुक्र ग्रह के पृथ्‍वी पर पडने वाले प्रभाव की बात है , उसके कारण इन चारो महीनों में मेष लग्‍नवाले धन और घर गृहस्‍थी विषयक मामलों , वृष लग्‍नवाले शरीरिक और अन्‍य प्रकार के झंझटों से संबंधित , मिथुन लग्‍नवाले स्‍वयं या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , खर्च या बाहरी संदर्भों के मामलों, कर्क लग्‍नवाले माता , किसी प्रकार की संपत्ति या लाभ से संबंधित मुद्दो , सिंह लग्‍नवाले भाई बहन , बंधु बांधव , कैरियर या राजनीति से संबंधित विषयों , कन्‍या लग्‍नवाले धन और भाग्‍य विषयक मामलों , तुला लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य और जीवनशैली विषयक, वृश्चिक लग्‍नवाले घर गृहस्‍थी , खर्च तथा बाह्य संदर्भों से संबंधित मामलों , धनु लग्‍नवाले झंझटों का दूर कर लाभ से संबंधित वातावरण से केमामले , मकर लग्‍नवाले अपने या संतान पक्ष से संबंधित पढाई लिखाई या कैरियर या राजनीति विषयक, कुंभ लग्‍नवाले माता , हर ,प्रकार की छोटी बडी संपत्ति और भाग्‍य के मामलों तथा मीन लग्‍नवाले भाई बहन , बंधु बांधव और जीवनशैली या रूटीन के मामलों की कमजोरियों को ठीक करने या उन्‍हें मजबूत बनाने में जुटे रहेंगे। पर जिन दिनों में शुक्र और चंद्र साथ दिखाई पडेंगे, उसके आसपास के दिनों में इनकी यह प्रवृत्ति बढी हुई होंगी। पर कार्य का सकारात्‍मक या नकारात्‍मक फल उनके जन्‍मकालीन ग्रह स्थिति पर निर्भर करेगा। 

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से मनुष्‍य की जीवन यात्रा में शुक्र ग्रह का प्रभाव 36 वर्ष की उम्र से 48 वर्ष की उम्र तक के प्रौढों पर अधिक पडता है। यदि जातक के जन्‍म के समय शुक्र ग्रह अच्‍छे गत्‍यात्‍मक शक्ति का हो , तो जातक को 36 वर्ष की उम्र के बाद वृष और तुला राशि से संबंधित मामलों की सफलता मिलती रहती है। वैसे लोगों को शुक्र की गोचर की ऐसी स्थिति में भी सुखद अहसास हुआ करता है , इस दृष्टि से 36 वर्ष की उम्र के बाद सफल रह रहे प्रौढों के लिए शुक्र ग्रह की यह स्थिति अच्‍छा फल प्रदान करनेवाली होगी। पर यदि जातक के जन्‍म के समय शुक्र ग्रह कम गत्‍यात्‍मक शक्ति का होता है , तो जातक को 36 वर्ष की उम्र के बाद असफलता का मुंह देखना पडता है। वैसे लोगों के लिए शुक्र की गोचर की ऐसी स्थिति भी कष्‍टप्रद होती है। इस दृष्टि से 36 वर्ष की उम्र के बाद असफल रहने वाले प्रौढों के लिए शुक्र की यह स्थिति थोडी गडबड हो सकती है।

प्रौढावस्‍था के साथ ही साथ अन्‍य उम्र वाले लोगों में जिन लोगों ने 1945 , 1953 , 1961 , 1969 , 1977 , 1985 , 1993 ,2001 , 2009 के अप्रैल और मई महीनों में जन्‍म लिया है , उनको इस अवधि में कुछ परेशानी अवश्‍य रहेगी। इनमें से सबसे बुरी स्थिति 1969 के अप्रैल और मई में जन्‍म लेनेवालों की होगी , उन्‍हें खासकर शुक्र की इस स्थिति से थोडा सावधान  रहने की आवश्‍यकता है। स्‍तर में बढोत्‍तरी के बावजूद कुछ दवाबपूर्ण वातावरण 1946 , 1954 , 1962 , 1970 , 1978 , 1986 , 1994 , 2002 के सितंबर से दिसंबर के मध्‍य जन्‍म लेनेवालों का भी बना रहेगा , पर इन्‍हीं वर्षों में नवंबर और उसमें भी 25 नवंबर तक जन्‍म लेनेवाले , खासकर 1970 के नवंबर में जन्‍मलेनेवाले इन चार महीनों में कुछ अधिक तनाव में व्‍यतीत करेंगे। इसके लिए उपरोक्‍त समय में जन्‍म लेनेवाले इस समय जानबूझकर कोई बडा रिस्‍क न लें , कोई काम करने से पूर्व अच्‍छी तरह जांच पडताल करें , सफेद रंगों का अधिक से अधिक उपयोग करें और युवक युवतियों के विवाह में मदद करें।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर , जय कपीश तिंहू लोक उजागर .. संगीता पुरी

पिछले तीन आलेखों में आपने पढा कि किन परिस्थितियों में हमें तीन चार महीनों में तीन घर बदलने पडे थे , सेक्‍टर 4 के छोटे से क्‍वार्टर में पहुंच चुके थे। यहां आने के बाद हमलोग यहां के माहौल के अनुरूप धीरे धीरे ढलते जा रहे थ। यहां आने से पूर्व के दो वर्षों में भी हमलोग तीन क्‍वार्टर बदल चुके थे , उसकी चर्चा भी कभी अवश्‍य करूंगी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी हमलोग तनिक भी विचलित नहीं थे। अपने जेठ के उस क्‍वार्टर को जहां मैं विवाह के बाद पहुंची थी और अपने जीवन के आरंभिक 8 वर्ष व्‍यतीत किए थे , दोनो बच्‍चों ने जन्‍म लिया था और अपना बचपन जीया था , भी जोडा जाए तो हमारे  बच्‍चे 8 और 6 वर्ष की उम्र में ही अभी तक सात मकान देख चुके थे।

कहा जाता है कि बिल्‍ली जबतक अपने अपने बच्‍चों को सात घर में न घुमाए , तबतक उसके आंख नहीं खुलते। हमारे बच्‍चों के साथ भी ऐसा ही हो रहा था , ये सातवां घर था , इसलिए हम कुछ निश्चिंत थे कि अब शायद इन्‍हें लेकर कहीं और न जाना पडे। पर मनुष्‍य के जीवन के अनुरूप आंख खुलने तक , आज की सरकार के अनुसार बालिग होने तक इन्‍होने पूरे 10 मकान देख लिया। इनके 12वीं पास होने तक बोकारो स्‍टील सिटी में हमें और तीन मकान बदलने पडे, जिनके बारे में कुछ दिन बाद चर्चा करूंगी । अभी आनेवाले कुछ आलेखों में अन्‍य पहलुओं की चर्चा , क्‍यूंकि सेक्‍टर 4 के उस छोटे से आरामदायक क्‍वार्टर में हमने 4 वर्ष आराम से व्‍यतीत किए थे ।

वैसे तो हमारे यहां प्रथा है कि हम जब भी नए घर में रहने को जाएं , तो वहां मौजूद बुरे शक्तियों से बचने के लिए एक हवन अवश्‍य कराएं। मकान पुराना हो , तो इसकी आवश्‍यकता नहीं पडती है , पर नए में तो यह आवश्‍यक है। अधिकांश लोग स्‍वामी सत्‍य नारायण भगवान की ही कथा करवाते हैं, पर हम पुराने मकानों में शिफ्ट करते थे , इतनी जल्‍दबाजी में हर जगह अस्‍थायी तौर पर क्‍वार्टर बदलते थे कि हर वक्‍त इतना खर्च कर पाना आवश्‍यक नहीं लगा। और इसी क्रम में जब स्‍थायी तौर पर किसी क्‍वार्टर में निवास करने की बारी आयी तो भी पूजा करवाने का ध्‍यान न रहा। इस बात की वजह ये भी हो सकती है कि ईश्‍वर को मानते हुए भी विभिन्‍न प्रकार के कर्मकांडों पर हमारा कम विश्‍वास है।

पहली बार क्‍वार्टर बदलते समय हमलोगों ने स्‍वामी बजरंग बली की एक फोटो रख ली थी , बस जिस नए मकान में शिफ्ट करते ,  एक दो किलो लड्डू से ही उनका भोग लगाते और पडोसियों में प्रसाद के बहाने बांटकर सबके परिचय भी ले लिया करते। वास्‍तव में , बचपन से मेरी प्रवृत्ति रही है कि किसी भी प्रकार के घबराहट में मैं प्रार्थना अवश्‍य ईश्‍वर से किया करती हूं , पर जब भी पूजा , पाठ ,कर्मकांड , व्रत , मन्‍नत की बारी आती है , मुझे बजरंग बली ही याद आ जाते हैं और हमेशा हमें संकट से मुक्ति भी मिल जाती है। भले ही समाज मं चलती आ रही प्रथा केअनुरूप मैं संकट में घबडाकर कभी कोई मन्‍नत मान लिया करती हूं , पर वास्‍तव में मेरी सोंच है कि पूजा के तरीके से ईश्‍वर को कोई मतलब नहीं , दिल में भक्ति होनी चाहिए। ऐसी मानसिकता विकसित किए जाने में मेरे पिताजी का मुझपर प्रभाव रहा ,  मेरे पति की मानसिकता भी लगभग ऐसी ही है , यही कारण है कि जीवन में हर मौके पर हमलोग समाज और पंडितों के हिसाब से नहीं , अपनी मानसिकता के अनुसार काम करते रहें।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

जहां चाह वहां राह .. आखिरकार मुझे एक क्‍वार्टर प्राप्‍त करने में सफलता मिल ही गयी !!

बोकारो स्‍टील सिटी के मेरे अपने अनुभव की पिछली तीनों कडियां पढने के लिए आप यहां यहां और यहां चटका लगाएं , अब आगे बढते हैं। कॉपरेटिव कॉलोनी के प्‍लाट नं 420 में अभी साफ सफाई और सेटिंग में व्‍यस्‍त ही थे कि बोकारो के निकट के एक गांव बालीडीह में रहनेवाले मेरे पापाजी के एक मित्र ठाकुर साहब को संदेश मिल गया कि हमलोग दो तीन माह से एक क्‍वार्टर के लिए परेशान हैं। सुनते ही उन्‍होने पापाजी से संपर्क किया , बोकारो में स्‍टील प्‍लांट के निर्माण के वक्‍त बी एस एल को उन्‍होने सैकडो एकड जमीन दी थी , पर मुआवजे की रकम उन्‍हें 30 वर्ष बाद भी नहीं मिल पायी थे। इतने जमीन देने के बाद बोकारो स्‍टील सिटी में वे एक इंच जमीन के भी हकदार नहीं थे। अपनी बाकी जमा पूंजी से वे केस लड रहे थे , तबतक उनका केस चल ही रहा था। अपने परिवार की गरिमा को देखते हुए वे कंपनी की ओर से दिए जानेवाले चतुर्थ श्रेणी की नौकरी को अस्‍वीकार कर चुके थे, परिवार की कमजोर होती स्थिति को देखते हुए उनके एक छोटे भाई ने अवश्‍य बोकारो में नौकरी करना स्‍वीकार कर लिया था। उनको सेक्‍टर 4 में क्‍वार्टर एलॉट किया गया था , जो तबतक खाली ही पडा था , क्‍यूंकि नौकरी के लिए वे बोकारो से 10 कि मी दूर अपने गांव बालीडीह से ही आना जाना करते थे।

शहर में क्‍वार्टर की इतनी दिक्‍कत के बावजूद उस समय तक बोकारो के विस्‍थापित कर्मचारी इस शर्त पर अपने क्‍वार्टर दूसरों को आराम से दे दिया करते थे कि किरायेदार उसे वह पैसे दे दे , जो क्‍वार्टर के एवज में कंपनी उससे काटती है। हां , विस्‍थापितों को एक सुविधा अवश्‍य होती थी कि उसे सालभर या दो साल के पैसे एडवांस में मिल जाते थे। आज तो सब लोग व्‍यवसायिक बुद्धि के होते जा रहे हैं , इतने कम में शायद न सौदा न हो। हां , तो दोनो मित्रों में तय हुआ कि कंपनी से क्‍वार्टर के लिए जो पैसे काटे जाएंगे , वो हमें उनके भाई को दे देना होगा। उन्‍हें भी सुविधा हो , इसके लिए हमलोगों ने एडवांस में ही उन्‍हें 25,000 रूपए दे दिए और 2 जुलाई को हमें क्‍वार्टर की चाबी मिल गयी। कॉलोनी में इतने सस्‍ते दर पर बिजली और पानी की मुफ्त सुविधा के साथ एक क्‍वार्टर मिल जाना हमारे लिए बहुत बडी उपलब्धि थी। तीन महीनों से चल रहा सर से एक बडा बोझ हट गया था , पर कॉपरेटिव कॉलोनी के मकान मालिक हमारे दो महीने के एडवांस लौटाने को तैयार न थे।

लगातार खर्चे बढते देख हम भी कम परेशान न थे , पैसे को वसूल करने के लिए हम यदि दो महीने यहां रहते , तो एक महीने का पानी और डेढ महीने के बिजली के भी अतिरिक्‍त पैसे लगते। सेक्‍टर 4 का क्‍वार्टर तो हम ले ही चुके थे , इसलिए अब यहां मन भी नहीं लग रहा था , हमने पांच जुलाई को वहीं शिफ्ट करने का निश्‍चय किया। बहुत ही छोटे छोटे दो कमरो का सरकारी क्‍वार्टर , पर हम तीन मां बेटे तो रह ही सकते थे। मेरी आवश्‍यकता के अनुरूप रसोई अपेक्षाकृत बडी थी , क्‍यूंकि मैं एक साथ सबकुछ बनाने के फेर में सारा सामान फैला देती हूं , फिर खाना बन जाने के बाद ही सबको एक साथ समेटती हूं। दिक्‍कत इतनी ही दिखी कि स्‍लैब नहीं था , कुछ दिनों तक बैठकर खाना बनाना पडा। शिफ्ट करने के बाद बारिश का मौसम शुरू हुआ , रसोईघर के सीपेज वाले दीवाल में से , नालियों में से रंग बिरंगे कीडे निकलने का दौर शुरू हुआ , तो हमने स्‍वयं से ही इस रसोई की दीवालों पर प्‍लास्‍टर करने का मन बनाया। लेकिन यह काम बारिश के बाद ही हो सकता था , तबतक मैं इस छोटी सी समस्‍या को झेलने को मजबूर थी।

कुछ दिनों तक पानी के लाइन में काम होने की वजह से पानी भी 4 बजे से 7 बजे सुबह तक चला करता था। इतनी सुबह क्‍या काम हो , जब काम के लिए तैयार होते , नल में पानी ही नहीं होती। तब हमलोगों ने स्‍टोर करने के लिए एक बडा ड्रम रख लिया और सुबह सुबह ही कपडे धुल जाएं , इसलिए वाशिंग मशीन भी ले ली थी , भले ही तबतक घर में टी वी और फ्रिज तक नहीं थे। घर में वाशिंग मशीन रखने के लिए भी जगह नहीं थी , पर बडा किचन इस काम आया और उसके एक किनारे मैने इसे रख दिया। बरसात के बाद कंपनी का खुद ही टेंडर निकला , दीवाल के प्‍लास्‍टर के लिए कुछ मिस्‍त्री काम करने आए , लगे हाथ हमलोगों ने अलग से एक स्‍लैब बनवाया, सिंक खरीदा , रसोई में ये सब भी लगवा दिए। कंपनी की ओर से ऊपर की टंकी को भी ठीक किया गया , जिससे 24 घंटे पानी की सप्‍लाई होने लगी। कुछ ही दिनों में चूना भी हो गया और अक्‍तूबर 1998 से घर बिल्‍कुल मेरे रहने लायक था , बस कमी थी तो एक कि वह बहुत छोटा था , पर उस वक्‍त आदमी और सामान कम थे , सो दिक्‍कत नहीं हुई।

कुछ ही दिनों में सेक्‍टर 4 का यह छोटा सा क्‍वार्टर हमारे लिए पूरा सुविधाजनक बन गया था। यहां से मात्र 500 मीटर की दूरी पर एक ओर बोकारो का मुख्‍य बाजार , जिसमें हर प्रकार का बाजार किया जा सकता था , डॉक्‍टर भी बैठा करते , छोटे मोटे कई नर्सिंग होम भी थे। और इतनी ही दूरी पर दूसरी ओर बडा हॉस्पिटल भी , जहां किसी इमरजेंसी में जाया जा सकता था , वहीं बगल में छोटा सा हाट भी था , जहां से फल सब्जियां खरीदा जा सकता था। बच्‍चों के जूनियर स्‍कूल भले ही थोडी दूरी पर थे , वे बस से जाते। पर सीनियर स्‍कूल बगल में होने और उसी में सारा ऑफिशियल काम होने से मुझे बहुत सुविधा होती। आधे किलोमीटर के अंदर मेरा हर काम हो सकता था। कुल मिलाकर यह क्‍वार्टर बहुत ही अच्‍छी जगह था , जहां परिवार को छोडकर ये निश्चिंत रह सकते थे। इतने दिनों के झंझट में सारी छुट्टियां जो समाप्‍त हो गयी थी। धीरे धीरे कुछ परिचितों का भी पता चलने लगा था और हमलोग संडे वगैरह को वहां घूम भी लेते। अभी चलती ही रहेगी ये बोकारो गाथा !!

रविवार, 8 अगस्त 2010

13 अगस्‍त की शाम सूर्यास्‍त के बाद पश्चिमी क्षितिज पर देखें .. शुक्र चंद्र युति का अद्भुत नजारा

वैसे तो पूरे ब्रह्मांड में अक्‍सर ही कई प्रकार की दृश्‍यावलि बनती है , पर हम उन्‍हे अपनी आंखो से नहीं देख पाते हैं। प्रतिदिन दूरदर्शी यंत्र की सहायता से नासा द्वारा खींची गयी आसमान की वैसी कोई न कोई तस्‍वीर हम अपने कम्‍प्‍यूटर में देख सकते हैं। पर जब हमारे सौरमंडल के अंदर ग्रहों और उपग्रहों के आपसी मेल से किसी प्रकार की खास दृश्‍यावलि बनती है , तो हमें उसको देखना अच्‍छा लगता है , कभी किसी त्‍यौहार के बहाने या कभी अन्‍य बहानों से हम सूर्यग्रहण , चंद्रग्रहण या सुंदर चांद को अकेले भी देखना पसंद करते हैं। सौरमंडल का एक ग्रह शुक्र पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य होने से अक्‍सर सूर्य के साथ ही उदय और अस्‍त हो जाता है। पर इस जुलाई से ही सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के बढने से सूर्यास्‍त के बाद , जब तारे भी आसमान में नहीं होते , थोडी देर आसमान में सफेद चमक बिखेरते हुए चमकता दिखाई देता आ रहा है। 


'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के पुराने सभी पाठकों को मेरी 25 फरवरी 2009 की पोस्‍ट अवश्‍य याद होगी , जिसमें मैने बताया था कि 27 और 28 फरवरी 2009 को आसमान में शुक्र और चंद्र की युति का एक अनोखा दृश्‍य देखने को मिलेगा। यह नजारा इतना बढिया था कि इसे देखकर जी छत्‍तीसगढ 24 घंटे ने इसपर एक लाइव कार्यक्रम भी रखा था , जिसके लिए मैने इस पोस्‍ट में आभार व्‍यक्‍त किया था। बाद में इसकी चर्चा होने के बाद बहुत से पाठकों को  इसे नहीं देख पाने का अफसोस भी हुआ था , उस वक्‍त 27 फरवरी को जिस प्रकार का दृश्‍य बना था , ठीक इस चित्र के जैसा दृश्‍य इस वर्ष आनेवाले 13 अगस्‍त को देखने को मिलेगा। सूर्यास्‍त के थोडी देर बाद अंधेरा होते ही यह लगभग दो तीन घंटों तक दिखता रहेगा। हां , इस बार जहां शुक्र की चमक पिछली बार की तुलना में कुछ कम रहेगी , वहीं चांद का आकार भी थोडा बडा होगा , पर पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले इसके प्रभाव में कोई अंतर नहीं होगा। सिर्फ इसी दिन को नहीं , यहां से दो महीने तक हर 28 दिनों के बाद अधिक चमक लिए शुक्र और थोडे छोटे चंद्र की युति की ऐसी स्थिति बनती ही रहेगी  ...


पिछली बार भी एक फलित ज्‍योतिषी होने के नाते मैने शुक्र और चंद्र के इस विशेष मिलन के पृथ्‍वी पर पडने वाले प्रभाव की चर्चा की थी। वैसे तो पृथ्‍वी पर इसके अच्‍छे खासे प्रभाव से 13 अगस्‍त को ही नहीं , लगभग एक सप्‍ताह तक अधिसंख्‍य तन , मन या धन से किसी न किसी प्रकार के खास सुखदायक या दुखदायक कार्यों में उलझे रहेंगे , सामान्‍य तौर पर इस समय कई प्रकार के निर्णय भी आते हैं। पर सबसे अधिक प्रभाव सरकारी कर्मचारियों पर पड सकता है यानि उनके लिए खुशी की कोई खबर आ सकती है। अंतरिक्ष से संबंधित कोई विशेष कार्यक्रम या निर्णय की संभावना भी इस दिन के योग से बनती दिखाई दे सकती है। सफेद वस्‍तुओं पर इसका अच्‍छा प्रभाव देखा जा सकता है , उनके मूल्‍य में वृद्धि होगी। शेयर बाजार में बैंकिंग सेक्‍टर वगैरह पर भी खास प्रभाव दिख सकता है , पर इन दोनो दिनों में जो भी काम शुरू करने का निर्णय लिया जाएगा , सबमें 8 अक्‍तूबर से 19 नवंबर के मध्‍य किसी न किसी प्रकार की बाधा उपस्थित हो जाएगी , जिसके कारण काम कुछ रूका हुआ सा महसूस होगा। उस काम में पुन: 19 नवंबर के बाद ही तेजी आ सकेगी या सुधार हो पाएगा। यह योग वृष राशि वालों के लिए काफी अच्‍छा और मीन राशिवालों के लिए कुछ बुरा रह सकता है।

शुक्र चंद्र के इस खास योग का प्रभाव किन जातकों पर कितना पडेगा ,विस्‍तार में  इसकी जानकारी अगले आलेख में देने की कोशिश करूंगी।