शनिवार, 21 अगस्त 2010

अपने एकाधिकार का पूरा फायदा उठाती थी उस वक्‍त बी एस एन एल !!

अभी तक आपने पढा .... 20 वीं सदी का अंत संचार के मामलों में बहुत ही प्रगति पर था और भारतवर्ष के शहरों की बात क्‍या ग्रामीण अंचल भी इससे अछूते नहीं थे।  भले ही हम शहरी क्षेत्र में थे , पर पूरे परिवार में सबसे पहले 1990 में हमारे गांव में ही मेरे श्‍वसुर जी ने ही फोन का कनेक्‍शन लिया था। तब वे DVC के सुरक्षा पदाधिकारी के पद से सेवानिवृत्‍त होकर बिहार के दरभंगा जिले के एक गांव जाले में निवास कर रहे थे। इससे पहले वे बिहार मिलिटरी पुलिस में पु‍लिस अफसर भी रह चुके थे , जिसके कारण गांव में होनेवाले महत्‍वपूर्ण आयोजनों में उन्‍हें निमंत्रित किया जाता था। इसी कारण फोन की सुविधा दिए जाने से पूर्व बी एस एन एल द्वारा हुए उद्घाटन समारोह में उन्‍हें भी निमंत्रित किया गया था। उसी मीटिंग में उन्‍होने बात रखी कि‍ जिस परिवार के अधिकांश सदस्‍य दूर रहते हों , उन्‍हें फोन की सुविधा सबसे पहले मिलनी चाहिए। रिटायर होने के बाद 20 वर्षों से वे अपने तीनों बेटों से दूर रहते हुए 80 वर्ष की उम्र में पहुंच चुके थे , इसलिए दूसरे ही दिन उन्‍हें फोन की सुविधा मिल गयी थी , शहरी क्षेत्र में होते हुए भी तबतक हमलोगों को भी कनेक्‍शन नहीं मिल सका था , पर टेलीफोन बूथ से हमलोग समय पर हाल चाल लेने में अवश्‍य समर्थ हो गए थे। दो चार वर्ष के अंदर ही बिहार के छोटे बडे हर गांव में टेलीफोन के जाल ही बिछ गए थे और कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया था। उसी फोन ने इन्‍हे अंतिम समय में उनके बडे बेटे से मिला भी दिया था। भले ही 1993 में ही वे हमें छोडकर इस दुनिया से चल दिए हों , पर उससे पहले 1992 से ही रिश्‍तेदारों का हाल चाल लेने के लिए हमलोगों को पूर्ण तौर पर टेलीफोन पर निर्भर कर दिया था।

यही कारण था कि बोकारो में स्‍थायित्‍व की समस्‍या हल होने पर एक टेलीफोन का कनेक्‍शन लेना हमारे लिए जरूरत बन चुका था , पर इसमें बहुत सारी समस्‍याएं थी। क्‍वार्टर किसी और का हो , उसे किराए में लगाने की छूट भी न हो । एक मित्र के तौर पर हम वहां रह सकते थे और इसी आधार पर कनेक्‍शन ले सकते थे। इसके लिए अदालत में भी कुछ फार्मलिटिज की जरूरत थी। छोटे शहरों में लैंडलाइन लेने के लिए अभी तक सिर्फ सरकारी कंपनियां ही हैं ,  जिनके पास उस समय कनेक्‍शन देने की सुविधाएं सीमित थी और फोन कनेक्‍शन लेने के मामलों में मध्‍यमवर्गीय परिवारों में एक होड सी लगी थी। ऐसे में आपका नंबर आने में दो तीन वर्षों तक का इंतजार करना पडता था , अन्‍य लोगों की तरह ही इतना इंतजार करने को हमलोग भी तैयार नहीं थे। इस कारण विभाग में भ्रष्‍टाचार का भी बोलबाला था , नंबर में देर होने के बावजूद पैसे लेकर फोन कनेक्‍शन दिए जा रहे थे। पर हमारे द्वारा फोन के लिए एप्‍लाई किए जाने के दो तीन महीने बाद ही बी एस एन एल में आधिकारिक तौर पर घोषणा की गयी कि इंतजार कर रहे सभी लोगों को अक्‍तूबर तक फोन लगा दिए जाएंगे। भले ही एक वर्ष तक हमने बिना फोन के व्‍यतीत किए हों , पर इस घोषणा के होते ही हमारी यह समस्‍या भी हल हो गयी। तबतक हमलोगों ने सामने वाले पडोसी को बहुत कष्‍ट दिए।

पर फोन का कनेक्‍शन मिलने के बाद भी यहां समस्‍याएं कम न थी। उस समय खुले केबल के माध्‍यम से फोन का कनेक्‍शन किया जाता था , इस कारण हमेशा फोन को लॉक करने का झंझट था। बरसात में अक्‍सर फोन कट जाता , दस बारह दिन बाद ही उसके ठीक होने की उम्‍मीद रहती। हालांकि कुछ ही वर्षों में पूरी कॉलोनी में अंडरग्राउंड केबिल लग गए और असुविधाएं कम हो गयी थी। पर बिल की मनमानी की तो पूछिए ही मत , अपने एकाधिकार का पूरा फायदा उठाती थी उस वक्‍त बी एस एन एल । बिल के डिटेल्‍स निकालने की कोई सुविधा नहीं थी , सिर्फ एस टी डी के बिल निकलते थे , हमने एक दो बार निकलवाया , पर क्‍या फायदा ?? एस टी डी का बिल 160 रूपए , पर कुल बिल 1600।  अब हम उन्‍हें कैसे समझाएं कि लोकल में हमारे इतने परिचित भी नहीं कि इतना बिल आ जाए , चुपचाप बिल भरने को बाध्‍य थे। कितने तो अपनी पत्नियों और बच्‍चों पर शक की निगाह रखते , मजबूरी में फोन कटवा देते। एक बार तो गरमी की छुट्टियों के दो महीने दिल्‍ली में व्‍यतीत करने के बाद भी हमें टेलीफोन बिल के रूप में 1800 रूपए भरने पडे थे।पर धीरे धीरे कई कंपनियों के इस क्षेत्र में आने से उनका एकाधिकार समाप्‍त हुआ और सुविधाओं में बढोत्‍तरी होती गयी। पर आज हर प्रकार के प्‍लान और सुविधाओं के कारण इसी बी एस एन एल से हमें कोई शिकायत नहीं।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

क्‍या आपके शहर में भी एक गैस कनेक्‍शन लेने का यही हाल है ??

पिछले पोस्‍टों में आप पढ ही चुके हैं ... बच्‍चों के एडमिशन के बाद हमलोगों को बिना किसी तैयारी के ही एक महीने के अंदर बोकारो में शिफ्ट करना पड गया था। शहर के कई कॉलोनी में दौडते भागते अंत में सेक्‍टर 4 में एक क्‍वार्टर मिलने के बाद हमलोग निश्चिंत हो गए थे। इसके साथ ही स्‍थायित्‍व के लिए आवश्‍यक अन्‍य सुविधाओं पर हमारा ध्‍यान चला गया था।  दो तीन महीने किरासन तेल के स्‍टोव पर खाना बनाते हुए हमने काट दिए थे , इस तरह के स्‍टोव का उपयोग मैं जीवन में पहली बार कर रही थी , इसलिए मुझे किन समस्‍याओं का सामना करना पडा होगा , आप पाठक जन उम्‍मीद कर सकते हैं। इस स्‍टोव की तुलना में खाना बनाने के लिए लकडी या कोयले के चूल्‍हे का उपयोग मेरे लिए अधिक आसान था , पर दोमंजिले के छोटे से क्‍वार्टर में इसका उपयोग नहीं किया जा सकता था , इसलिए  एक गैस कनेक्‍शन तो हमारे लिए बहुत आवश्‍यक था ।

बोकारो के विभिन्‍न सेक्‍टरों में इंडियन ऑयल गैस की जितनी भी एजेंसियां थी , हमलोग सबमें भटकते रहे , पर सबने हमें एक कनेक्‍शन देने से इंकार कर दिया था। उन दिनों गैस कनेक्‍शन की मांग की तुलना में पूर्ति का कम होना एक मुख्‍य वजह हो सकती है , पर हमारे पास बोकारो में कनेक्‍शन लेने के लिए आवश्‍यक कागजात भी नहीं थे कि हम वहां नंबर भी लगा सकते। वैसे आवश्‍यक कागजातों के बाद भी सरकारी दर से किसी को गैस नहीं मिला करता था। एक कनेक्‍शन के लिए दुगुने तीगुने पैसे देने होते। पडोस में पूछती , तो मालूम होता कि उन्‍होने गैस का कनेक्‍शन भी नहीं लिया है। बाजार से ही एक चूल्‍हा , कहीं से एक सिलिंडर और रेगुलेटर और पाइप का इंतजाम करते और ब्‍लैक से सिलिंडर चेंज करते। बिजली की सुविधा मुफ्त थी , इसलिए अधिकांश लोग हीटर का भी उपयोग करते।

प्राइवेट मकानों में तो इसकी सुविधा नहीं थी , पर सरकारी क्‍वार्टर में आने के बाद हमलोगों ने भी एक हीटर रख लिया था , पर हीटर और स्‍टोव में खाना बनाने में समय काफी जाया होता।  हमारी इच्‍छा इंडियन ऑयल के गैस के कनेक्‍शन लेने की थी  , लेकिन बोकारो मे कोई व्‍यवस्‍था नहीं हो रही थी। मरता क्‍या न करता , आखिरकार हमें हार मानकर यहां से 30 किमी दूर के एक शहर फुसरो से एक एच पी का गैस कनेक्‍शन लेना पडा । वो भी आसानी से नहीं , हमें उन्‍हें कमीशन देने के लिए एक गैस चूल्‍हा भी साथ खरीदना पडा , डबल सिलिंडर का कनेक्‍शन और उन्‍हें मनमाने पैसे , तब यानि 1998 में सरकार के द्वारा तय किए गए मात्र 1800 रूपए खर्च करने की जगह हमें 5500 रूपए खर्च करने पडे थे। फिर जबतक उस कनेक्‍शन का बोकारो ट्रांसफर नहीं हुआ , हमें ब्‍लैक में ही गैस भरवाने यानि हर महीने 100 रूपए अधिक देने को बाध्‍य होना पडा। इस मामले में काफी दिनों बाद हम निश्चिंत हो सके थे । आज घर घर तक गैस के पहुंचने के बाद भी यह समस्‍या वैसे ही बनी हुई है , बोकारो में इंडियन ऑयल या एच पी का कनेक्‍शन लेना आज भी मुश्किल कार्य है। क्‍या आपके शहर में भी एक गैस कनेक्‍शन लेने में इतनी समस्‍याओं का सामना करना पडता है ??

ज्‍योतिष का सही ज्ञान हमें आध्‍यात्‍म की ओर भी ले जाता है !!

किसी खास युग में हर क्षेत्र में किसी प्रकार की सफलता प्राप्‍त करने के लिए चाहे जिन गुणों और ज्ञान का महत्‍व हो , वे किसी एक व्‍यक्ति को शीर्ष तक क्‍यूं न पहुंचा देते हो , उनकी देखा देखी वैसे गुणों को आत्‍मसात कर स्‍वयं भी ऊंचाई पर पहुंचने के लिए चाहे हमारे जैसे कितने भी लोग प्रयत्‍नशील क्‍यूं न हों , सफल होकर हम सांसारिक सफलताओं से लैस ही क्‍यूं न हो जाएं , पर वह चिरंतन और स्‍थायी सुख नहीं दे पाते। स्‍थायी मा‍नसिक सुख प्राप्‍त करने के लिए कुछ ऐसे नियमों की जानकारी आवश्‍यक होती है , जिसे हमारे महापुरूषों द्वारा हर धर्म के सिद्धांतों के रूप में जोड दिया गया। ये सिद्धांत किसी भी व्‍यक्ति से 'अहं' को दूर करते हैं और इनके पालन से हमारे क्रियाकलाप सर्वजनहिताय होते हैं। सिर्फ अपने बारे में ही नहीं , सारे प्राणियों के साथ साथ दुनिया के एक एक कण से प्‍यार और उनकी सुरक्षा के लिए चिंतन ही आध्‍यात्‍म की ओर जाने की सीढी है । आज के दौर में गलत हाथों में जाकर धर्म का स्‍वरूप भले ही विकृत हो गया हो , पर दुनिया के प्रत्‍येक धर्म की खासियत यही थी , इससे इंकार नहीं किया जा सकता। 

आज का युग पूरे स्‍वार्थ का हो गया है , हर व्‍यक्ति को सिर्फ अपने से मतलब है।  अपना शरीर , अपने परिवार , अपने बच्‍चे , अपना व्‍यवसाय और अपना ही विकास , इसके लिए हम कोई भी तरीका अपनाने को तैयार हैं। गलत धरातल पर खडे होने के बाद भी हम अपनी उपलब्धियों पर गुमान करते हैं , बच्‍चों को भी सांसारिक रूप से ही सफल होने के हर गुर सिखाते हैं। एक व्‍यक्ति नहीं , आज सारे ही आगे बढने के लिए एक दूसरे को धक्‍का दे रहे हैं। आज ताकतवर की ही चल रही है , अपनी अपनी ताकत का हम सब दुरूपयोग कर रहे हैं , ऐसे में समस्‍त चर अचर मुसीबत में हैं। जबतक खुद के साथ विपत्ति नहीं आ जाती , दूसरे की समस्‍या पर हंसना आज हमारा खेल बना होता है। पर जब हमारे ऊपर मुसीबत आती है और हम लाचार होते हैं , तब समझ में आता है कि हमने जीवन में क्‍या क्‍या गल्तियां की हैं और हमारी जीवनशैली क्‍या होनी चाहिए। पर तब पछताने के सिवा कुछ भी नहीं होता।

ज्‍योतिष की सहायता से हम ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन करते हैं। जिस प्रकार प्रकृति में मौजूद हर जड चेतन की तरह में कुछ न कुछ विशेषताएं होती हैं , इसी प्रकार प्रत्‍येक मनुष्‍य भी भिन्‍न भिन्‍न बनावट के होते हैं , प्रत्‍येक में अलग अलग क्षमता होती है , इसलिए सबके पास सबकुछ नहीं हो सकता। भले ही सभी जड चेतन एक जैसे जीवन चक्र से गुजरते हों , पर चूंकि मनुष्‍य सबसे अधिक विकसित प्राणी है , और इसके जीवन के बहुत सारे आयाम हैं , इस कारण एक जैसे दिखने के बाद भी मनुष्‍य की जीवनशैली एक जैसी नहीं। दुनियाभर में समान उम्र के लोग भी भिन्‍न भिन्‍न परिस्थितियों से गुजरने को बाध्‍य होते हैं , प्रकृति के खास नियम के हिसाब से एक का समय अनुकूल होता है तो दूसरे का प्रतिकूल ।

ज्‍योतिष विषय की सहायता से हमें ग्रहों की मदद से अनुकूल और प्रतिकूल परिथितियों को जानने में मदद मिलती है। जब अनुकूल समय होता है , तो हमारा आत्‍मविश्‍वास बढाने के लिए हमारे मनोनुकूल वातावरण होता है , जबकि प्रतिकूल समय में हमारे साथ ऐसी ऐसी घटनाएं होती हैं , जिनसे हमारे आत्‍मविश्‍वास पर असर पडता है। जब हम अपने मनोनुकूल समय में अपने अधिकार के साथ साथ कर्तब्‍यों का पालन भी करें , तो प्रतिकूल समय में हमें काफी राहत मिल सकती है। पर यदि मनोनुकूल समय में अधिकारों का दुरूपयोग करेंगे , तो उसका बुरा फल प्रतिकूल समय में हमें या हमारे संतान को अवश्‍य झेलने को मजबूर होना होगा। प्रत्‍येक बुरा कार्य करने से पहले हमारी अंतरात्‍मा बारंबार झकझोरती है , पर हम उसे अनसुना करते हैं , पर उस गल्‍ती को करने के बाद एक दिन भी चैन से नहीं रह पाते। जिस सांसारिक सफलता को देखकर हम प्रभावित होते हैं , उसका मनुष्‍य के सुख और चैन से कोई संबंध नहीं होता। प्रकृति से जुडा व्‍यक्ति ही सर्वाधिक सुख और चैन से रह सकता है।

इसके अलावे ज्‍योतिष से हमें इस बात के संकेत मिल जाते हैं कि जातक के आनेवाले समय में किसी खास पक्ष का वातावरण सुखद रहेगा या कष्‍टप्रद ..  इस बात का अहसास होते ही प्रकृति के नियमों के प्रति हमारा विश्‍वास गहराने लगता है। चूंकि सुख और कष्‍ट की सीमा को जान पाना मुश्किल है , इसलिए हमलोग किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानते , अंत अंत तक जीतने की कोशिश करते है , पर न जीत का घमंड होता है , न हार का गम । हम यह मान लेते हैं कि जो भी परिणाम हमारे सामने है , वो प्रकृति के किसी नियम के अनुसार हैं। हमने किसी समय कोई गल्‍ती की , जिसका फल हमें भुगतना पड रहा है। ऐसी स्थिति में हम दूसरों पर व्‍यर्थ का दोषारोपण नहीं करते , प्रकृति को जिम्‍मेदार मानकर अपने मन को कलुषित होने से बचा लेते हैं। हमें विश्‍वास हो जाता है कि यदि जानबूझकर दूसरा हमें कष्‍ट दे रहा है , तो प्रकृति उसका हिसाब किताब अवश्‍य रखती है और आनेवाले दिनों में उसका फल उसे स्‍वयं मिलेगा। इस प्रकार प्रकृति के नियमों के सहारे आध्‍यात्‍म का ज्ञान हमें ज्‍योतिष के माध्‍यम से मिल जाता है।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

10,000 रूपए की बजट में सबसे अच्‍छा डिजिटल कैमरा कौन सा होगा ??

घर में दो कैमरे वाले मोबाइल थे , दोनो बेटे लेकर चले गए। इच्‍छा है  , एक डिजिटल कैमरा ही ले लिया जाए ।  पर उपयुक्‍त जानकारी के अभाव में निर्णय नहीं ले पा रही। मेरा बजट लगभग 10,000 रूपए का है , ज्ञानी पाठक जन सटीक राय देने की कृपा करें , घरेलू उपयोग के लिए कौन सा कैमरा लेना अच्‍छा रहेगा ??

रविवार, 15 अगस्त 2010

हिंदी ब्‍लॉग जगत के सभी लेखकों और पाठकों को स्‍वतंत्रता दिवस की असीम शुभकामनाएं .....

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कितने दरिंदे हो जाते हैं लोग , मेहनत मजदूरी करने वालों को भी चैन से जीने नहीं देते !!

बोकारो के सेक्‍टर 4 में आने तक स्‍थायित्‍व की कमी के कारण हम किसी कामवाली को भी नहीं रख पाए थे , सब कहते कि पूरी प्रोफेशनल हैं यहां कि कामवालियां , उन्‍हें महीने के पैसों और काम से मतलब होता है बस। पर नए जगह में किसपर विश्‍वास करें , यहां आने के बाद भी कुछ दिन सोंचते रहें। कामवाली के चुनाव में मैं सर्वाधिक प्रमुखता उसके साफ सफाई वाले रहन सहन को देती थी , जिसके कारण देर हो रही थी। एकाध को रखा भी , तो उसका रहन सहन और काम मुझे नहीं जंचा , कुछ ही दिनों में उसकी छुट्टी करनी पडी। बच्‍चों के साढे सात बजे स्‍कूल की बस पकडा देने के बाद के दिन भर अकेलेपन में घर के छोटे और सब सुविधायुक्‍त होने से मुझे काम में दिक्‍कत नहीं हो रही थी ,  इसलिए पडोसियों को एक अच्‍छी कामवाली की तलाश करने की जिम्‍मेदारी देकर मैं निश्चिंत थी।

कुछ ही दिनों बाद एक दोपहर बच्‍चों को लेकर मैं लेटी ही थी कि दरवाजे पर हल्‍की सी दस्‍तक हुई। दरवाजा खोलने पर एक महिला को खडा पाया , जिसे देखकर उसके आने के प्रयोजन को समझने में मैं असमर्थ थी । न तो उसके पास कोई सामान था , जिससे उसके सेल्‍सवूमैन होने का अदाजा होता और न ही वो पडोस में रहनेवाली किसी महिला जैसी दिखी। जब उसने अपने आने का प्रयोजन बताया तो मैं तो चौंक सी गयी ,  उसका व्‍यक्तित्‍व कामवाली का तो बिल्‍कुल ही नहीं था , सो अनुमान लगाने का प्रश्‍न ही नहीं था। गेहूएं रंग में तीखे नैन नक्‍श के साथ एक चमक सी चेहरे पर , अच्‍छी हिंदी में धीमी आवाज में बात करती हुई उस युवति को देखकर कोई भी कह सकता था कि वह किसी संभ्रांत परिवार की है। पर आज वह बरतन मांजने और झाडू पोछे के काम के लिए मेरे सामने खडी थी। जिस विश्‍वस्‍त व्‍यक्ति के माध्‍यम से वह मेरे पास पहुंची थी कि मेरे 'ना' कहने का कोई प्रश्‍न ही नहीं था। जब नाम पूछा तो उसने बताया 'संगीता'।

दूसरे ही दिन वह काम पर आ गयी , दो चार दिनों में मेरे यहां के काम की जानकारी हो गयी , मुस्‍कराती हुई बस काम करती रहती। सुबह सुबह नहाधोकर पूजा करके सबसे पहले मेरे यहां आती , उसके बाद दूसरी जगह जाती। पर्व त्‍यौहार में प्रसाद के पैसे न होते , तो दौडकर 50 रूपए लेने मेरे पास आती , उसके परिवार के एक एक सदस्‍य नहाधोकर पूजा के लिए खडे होते थे। भले ही उसका पति घर घर माली का काम किया करता , पर सुबह सुबह उसके घर पर अखबार आता , आकर कभी कभी कोई न्‍यूज भी बताती , पति मैट्रिक पास था आर वो मिडिल , फिर भी माली का काम करने को मजबूर। उसके  दो बेटे और दो बेटियां थी , सबको स्‍कूल में पढा रही थी। मैं समझती थी , बहुत दबाब में है वो , पर बिना किसी लालच के इतना शांत होकर पूरी जिम्‍मेदारी के साथ काम करते मैने आजतक किसी कामवाली को नहीं देखा । जैसी मां थी , वैसी ही बेटियां , मुश्किल से उनकी उम्र आठ और दस वर्ष की होगी , स्‍कूल से आकर खाना खाने के बाद मां को सोए देख चुपचाप सारे घरों के काम निबटा जाती। मां हडबडाकर उठती , अंधेरा देखकर घबडा जाती , ये कुछ न बताती , जब वह घर से निकलने लगतीं , तो दोनो हंसती , कहती कि आपका काम हो गया है।

मुझे उसके बारे में जानने की बहुत जिज्ञासा थी , तब खाली भी रहा करती थी , मैने उससे खुलकर बात करना शुरू किया। बातचीत के क्रम में उजागर हुआ कि इसके पिताजी और ससुरजी दोनो एच ई सी , रांची में एक ही साथ सर्विस करते थे , दोनो में काफी दोस्‍ती थी और दोनो ने अपने बच्‍चों का विवाह कर दिया था। इसका पति बहुत दिनों तक छोटी मोटी नौकरी के लिए दौडधूप करता रहा , पर कहीं काम न मिल सका। जितने दिन ससुर नौकरी में रहें , इन्‍हें तो कोई दिक्‍कत नहीं हुई , इसी मध्‍य दो बेटे और दो बेटियों ने जन्‍म भी ले लिया। रिटायर होने के बाद भी कुछ दिन ससुर ने चलाने की कोशिश की , पर पैसे लगातार कम हो रहे थे , हारकर अपने बचे पैसे दोनो पोतियों के विवाह के लिए रखकर बेटे बहू को घरखर्चे के लिए कमाने कहकर कुछ दिनों मे गांव चले गए। दोनो ही पक्षों के सब भाई बहन में से कुछ नौकरी में लग गए थे या फिर व्‍यवसाय में , ठीक ठाक कमा रहे थे , पर इनके लिए कुछ भी काम न था।

इनलोगों ने बहुत काम ढूंढा , पर कुछ भी न मिला तो एक ठेकेदार के साथ मजदूरी करने रांची से बोकारो पहुंचे, पर कॉलोनी में रहनेवाला कोमल शरीर भला मजदूरी कर पाता ? दोनो बीच बीच में थककर बैठ जाते । ठेकेदार को उनपर दया आ गयी , उन्‍हें एक स्‍कूल में काम पर लगवाने का वादा किया। इनके पास किसी काम का अनुभव तो था नहीं , एक रिश्‍तेदार बी एस एल में माली का काम करता था। इसका पति उससे कुछ जानकारी लेने लगा , ठेकेदार ने कहा कि किसी स्‍कूल में पति को माली और पत्‍नी को झाडू पोछे का काम दिलवा देगा। कुछ महीने ये इंतजार करते रहें , पर अपना भाग्‍य साथ दे तभी किसी का साथ भी मिल पाता है। तबतक बची खुची क्षमता भी समाप्‍त हो चुकी थी, सो मात्र 300 रूपए प्रति माह में पति ने घर घर माली और पत्‍नी ने झाडू पोछे और बरतन धोने का काम करना शुरू किया। कॉलोनी में ही एक व्‍यक्ति ने इन्‍हें अपने तार के घेरे के अंदर कोने पर घर बनाने की छूट दे दी थी , उसमें एक कच्‍चा अस्‍थायी कमरा बना लिया था , जिसमें जैसे तैसे परिवार के छहो व्‍यक्ति दिन काट रहे थे।

हमारे क्‍वार्टर के एक ओर वह रहती थी , दूसरी ओर एक बडे से मैदान को भी लोग झोपडपट्टी बनाए हुए थे , किसी काम के लिए आए एक ठेकेदार ने उसी स्‍थान पर पक्‍के का एक कमरा और साथ में बाथरूम बनाया था। जब इसके रहने के स्‍थान को असुरक्षित पाकर इसके भाई ने ठेकेदार का वो कमरा खरीदकर इन्‍हें देना चाहा , तो इसने इस भय से इंकार कर दिया कि इधर रहने वाले बच्‍चे संस्‍कारी नहीं हैं , कहीं मेरे बच्‍चे भी बिगड न जाए और वह अकेले वहां कष्‍ट काटते रहें। कम पैसे में ही सही , इंतजाम से चलने से उनका जीवन सही चलने लगा था , अपने बच्‍चों के भविष्‍य को लेकर बहुत चिंतित रहती , कहती लडकियों के विवाह के पैसे ननद के पास हैं , इन्‍हें मैट्रिक करवा दें तो इनके लिए अच्‍छे लडके मिल जाएंगे। बेटे बेटियों से छोटे थे , बेटों को भी वह मैट्रिक के बाद किसी प्रकार के काम सिखाने की चिंता में रहा करती , ताकि उनका जीवन इसकी तरह बर्वाद न हो।

लगभग पांच वर्ष मेरे यहां काम करने के बाद मुझे उसे छोडकर फिर से कॉपरेटिव कॉलोनी में आना पडा था। आते वक्‍त उसने चारो बच्‍चों के जन्‍मविवरण लिखे कागज तक मुझे थमाएं , पर मैं जन्‍मकुडली तक भी बनाकर न दे सकी। यहां आने के दो महीने बाद मैं उसके बाकी सौ रूपए लौटाने ढूंढती हुई उसके घर गयी , तो उसने बहुत कृतज्ञता प्रकट की। वास्‍तव में उसे उम्‍मीद भी नहीं थी कि मैं उसे पूरे महीने के पैसे दूंगी , उसने उस महीने दो चार दिन ही तो काम किया था और एडवांस में पैसे ले चुकी थी। उस दिन वह मुझे अपने घर के अंदर बुलाती रही , पर अंदर था भी क्‍या , बांसों खपच्चियों के दीवाल से तैयार किया एक छोटा सा कमरा , जिसके छत को प्‍लास्टिक डालकर छाया गया था। मैं बाहर से ही बातें करती लौट गयी , वैसे मुझे उनकी मदद करने की इच्‍छा थी और उनके संपर्क में बने रहना चाहती थी। पर काफी दिनों तक मेरा उस कॉलोनी में आना जाना न हो सका , बाद में एक पडोसी से मालूम हुआ कि किसी दरिंदे की नजर उनकी बेटियों को लग चुकी थी और उसने छोटी के साथ जबरदस्‍ती कर उसकी जान तक ले ली थी , इस घटना के बाद उनलोगों ने भय से बोकारो छोड दिया था। मैने उनका पता करना चाहा , पर कुछ भी पता न चल सका । कितने दरिंदे हो जाते हैं लोग , मेहनत मजदूरी करने वालों को भी चैन से जीने नहीं देते , जिस देश में ऐसी ऐसी घटनाएं होती हों , वहां स्‍वतंत्रता दिवस का क्‍या अर्थ ??