बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

हनुमान पचासा और हनुमान कृपाष्‍टक के बाद अब हनुमान जी की आरती भी

मेरे ब्‍लॉग में आप पहले से हमारे मित्र और पडोसी पं श्रद्धानंद पांडेय जी का हनुमान पचासा और हनुमान कृपाष्‍टक पढ चुके हैं। वैसे तो उनकी बहुत सारी अन्‍य रचनाएं भी प्रकाशित हो चुकी है , यहां तक कि भोजपुरी में रामचरित मानस तक भी , पर मेरे पास उनकी जो पुस्‍तक है , उसमें हनुमान जी की आरती भी लिखी है , जो आज प्रस्‍तुत कर रही हूं .... ......

जय महावीर मारूतनंदन ,
आरती नमन स्‍वीकार करो।
संकटमोचन संकट हर लो ,
बबाधाओं का प्रतीकार करो।।

सागर को पार किया तुमने,
अरिपुर को छार किया तुमने ,
सबका उपकार किया तुमने ,
इस जन का भी उद्धार करो।।

जय कपिवर द्राणाचलधारी ,
ररघुनायक तक हैं आभारी ,
शरणागत के दुख भयकारी ,
सुखमय सबका संसार करो।।

बलवान निरोग रहे काया,
व्‍यापे न कभी कलि की माया,
मन हो प्रभुपद में लपटाया,
ऐसा वरदान उदार करो।।

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

ईश्वर की सत्ता में यकीन रखने वाले मित्रों से एक अपील!!! .... का जबाब

कल आनंद सिंह जी के एक नए ब्‍लॉग क्रांतिकारी विचार में एक कविता पढने को मिली , जिसमें उन्‍होने ईश्‍वर की सत्‍ता में यकीन रखनेवाले मित्रों से एक अपील की थी ......

उनसे पूछना कि जब हीरोशिमा और नागासाकी पर
शैतान अमेरिका गिरा रहा था परमाणु बम,
तो मानवता का कलेजा तो हो गया था छलनी छलनी ,
लेकिन महाशय के कानों में क्यों नहीं रेंगी जूँ तक?

फिर उनसे पूछना कि जब दिल्ली की सड़कों पर
कोंग्रेसी राक्षस मासूम सिखों का कर रहे थे कत्लेआम,
तब यह धरती तो काँप उठी थी
लेकिन बैकुंठ में क्यों नहीं हुई ज़रा सी भी हलचल?

उनसे यह भी पूछना कि जब गुजरात में
संघ परिवार के ख़ूनी दरिंदों द्वारा
मुस्लिम महिलाओं का हो रहा था सामूहिक बलात्कार,
तब इंसानियत तो हो गयी थी शर्मसार
पर जनाब के रूह में क्यों नहीं हुई थोड़ी भी हरकत?


पूरी कविता पढने के लिए आप यहां पे क्लिक कर सकते हैं। 

मैने कल ब्‍लॉग4वार्ता में भी इस पोस्‍ट की चर्चा की थी , ताकि उन्‍हें जबाब मिल पाए। पर इतने पाठकों में से किसी से भी उन्‍हें संतुष्टि होने सा जबाब नहीं मिला। मैं ईश्‍वर की सत्‍ता में विश्‍वास रखती हूं , पर यह मानते हुए कि वह भी मनमानी नहीं कर सकता। वह भी प्रकृति के नियमों से ही बंधा है , इसलिए अधिक पूजा पाठ या कर्मकांड के कारण उसे खुश करके सांसारिक या अन्‍य प्रकार की सफलता प्राप्‍त की जा सकती है , यह हमारा भ्रम है। ऐसे कर्मकांडों को मैं महत्‍वपूर्ण मानती हूं , जब उससे समाज का या पर्यावरण का भला हो रहा हो। सामाजिक सौहार्द बिगाडने वाला , चारित्रिक रूप से कमजोर बनाने वाला और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कर्मकांड मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं। इसलिए मेरे द्वारा दिया जाने वाला जबाब लेखक को संतुष्टि नहीं भी दे सकता, पर फिर भी अपने तर्क के हिसाब से इसका जबाब देना आवश्‍यक समझूंगी। 


एक पिता के लिए अपना संतान बहुत प्‍यारा होता है , पर उसके सही विकास के लिए डांट फटकार और मार पीट करने को भी बाध्‍य होता है। वर्ष में एक या दो दिन की डांट मार से वह या आंख दिखाने से वह पूरे वर्षभर पिता के भय से भयभीत रहता है और किसी भी गलत काम की हिम्‍मत नहीं कर पाता। उसी प्रकार समय समय पर प्रकृति को भी कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था रखनी पडती है , ताकि इतने बडे संसार का काम सुचारू ढंग से चल सके। प्रकृति को ही कुछ लोग ईश्‍वर माना करते हैं । एक बच्‍चे के पालन पोषण में बहुत देखभाल की आवश्‍यकता होती है , यदि देखभाल के अभाव में एक दो बच्‍चे मौत के मुंह में न जाएं या अविकसित न रहें , तो बच्‍चों को ढंग से पालने की झमेले में कौन फंसना चाहेगा ??

प्रतिदिन करोडों व्‍यक्ति कहीं न कहीं आ जा रहे हैं , खतरे का काम कर रहे हैं , छिटपुट एक दो दुर्घटनाएं घटती हैं , सैकडों के जान चले जाते हैं। यदि समय समय पर ये दुर्घटनाएं नहीं हो , तो सोंचिए क्‍या होगा ?? न कोई यातायात के नियमों का पालन करे , न खुद पर नियंत्रण और न ही वाहन को सुरक्षित रखने का प्रयास। पिछले वर्ष जयपुर के पेट्रोल पंप में आग लगी थी , उस वक्‍त भी किसी नास्तिक ने ऐसा ही सवाल उठाया था। ईश्‍वर जब किसी को बुरा नहीं चाहता , तो ऐसी घटनाएं किसके अच्‍छाई के लिए घटा करती है ?? पर एक स्‍थान पर लीकेज की इस बडी घटना में भले ही अरबों का नुकसान हुआ हो , पर उसके बारे में सुनकर ही दुनियाभर के पेट्रोलवाले सावधान हो गए होंगे और उससे सौगुणे की देख रेख सही ढंग से होने लगती है।

भले ही कभी कभी निर्दोष के कष्‍ट को देखकर हम परेशान हो जाते है , पर प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के नहीं होते ,  उसमें से कुछ को हम समझ चुके हैं और कुछ की खोज निरेतर जारी है। । पर यदि खतरे की कोई संभावना ही न रहे , तो दुनिया में कोई भी सावधानी नहीं बरत सकेगा। इसलिए ईश्‍वर या प्रकृति जो भी करती है , उसका उद्देश्‍य शुभ हुआ करता है।  यदि प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के होते , तो आज विज्ञान का विकास न हो पाता। विज्ञान इन नियमों को ही तो प्रकृति के नियमों का सहारा लेकर मानव जीवन को सरल बनता है। सभी जीवों में मनुष्‍य ही ऐसा है , जो प्रकृति के रहस्‍यों को ढूंढने में समर्थ है , क्‍यूंकि उसके मस्तिष्‍क की खास बनावट है , जो उसने प्रकृति से ही पायी है।

कोई गलत काम करने से पूर्व प्रकृति की ओर से हमारे दिमाग में बार बार संदेश जाता है , 'हम गलत कर रहे हैं' , पर मनुष्‍य गलत काम करने के वक्‍त उसे दबाने की पूरी कोशिश करता है। कोई भी जीव अपनी प्रकृति के विरूद्ध काम नहीं करता , पर प्रकृति ने मनुष्‍य को अच्‍छे उद्देश्‍य के लिए जो दिमाग दिया है , उसका वही दुरूपयोग कर रहा है। जहां गल्‍ती बडी करनी होती है , वहां आत्‍मा के इस शोर को दबाने के लिए वह मदिरा का सेवन करना है , होश खोकर गलत काम किया करता है , और सारी जबाबदेही ईश्‍वर के मत्‍थे । प्रकृति या ईश्‍वर से कोई प्रश्‍न पूछने की आवश्‍यकता नहीं , आज वहीं हमसे दस प्रश्‍न पूछ सकती है।  वह उसने जितना दिया वह कम नहीं। उसे जिम्‍मेदारी पूर्वक चलाना नहीं आता , ईश्‍वर पर दोषारोपण करना तो बहुत आसान है।  

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

आज की सरस्‍वती बिना लक्ष्‍मी के क्‍यूं नहीं रह पाती ??

प्राचीन कहावत है कि लक्ष्‍मी और सरस्‍वती एक स्‍थान पर नहीं रह सकती, यानि कि एक ही व्‍यक्ति का ध्‍यान कला और ज्ञान के साथ साथ भौतिक तत्‍वों की ओर नहीं जा सकता , इसलिए प्राचीन काल में पैसे से किसी का स्‍तर नहीं देखा जाता था, बल्कि भौतिक सुखों का नकारकर किसी प्रकार की साधना करने वालों को , ज्ञान प्राप्‍त करने वालों को धनवानों से ऊंचा स्‍थान प्राप्‍त होता था। यहां तक कि उस वक्‍त राजा भी ऋषि महर्षियों के पांव पखारा करते थे और अपने पुत्रों को ज्ञान प्राप्ति के लिए उनके पास भेजा करते थे। उच्‍च पद में रहनेवाले लोगों की संताने हर प्रकार के ज्ञान के साथ साथ नैतिक और आध्‍यात्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। पर क्रमश: भौतिकवादी युग के विकास के साथ ही संपन्‍न लोग कला और साधना में रत लोगों का शोषण करने लगे ।

आज पूर्ण रूप से जड जमा चुके भौतिकवादी युग में बिना डिग्री के या बिना व्‍यवसायिक बुद्धि के कला और ज्ञान की साधना का कोई मूल्‍य नहीं , सच्‍चे साधक तो कहीं छुपे पडे होते हैं , व्‍यावसायिक तौर पर सफल ज्ञानी और धनवान के मध्‍य अपने को महत्‍वपूर्ण समझने की प्रतिस्‍पर्धा है। हमारे परिचय के एक व्‍यक्ति ने बोकारो में एक बडा नर्सिंग होम खोला था , इसी शहर के एक ख्‍यातिप्राप्‍त सर्जन उनके यहां काम करने के इच्‍छुक थे। नर्सिंग होम के संचालक की भी इच्‍छा थी कि वे उनके यहां काम करे। चूंकि दोनो ही मेरे परिचित थे , मैने दोनो से बातचीत भी की और उन्‍हें एक दूसरे का फोन नं भी दिया। पर पहल कौन करे , लक्ष्‍मी और सरस्‍वती में ऐसी टकराहट हो गयी थी कि दोनो 'पहले आप' 'पहले आप' कहते रह गए।

ऊपर के उदाहरण में सरस्‍वती ने लक्ष्‍मी से टक्‍कर लेने की हिम्‍मत इसलिए की , क्‍यूंकि उनके पास डिग्री है। आर्थिक रूप से संपन्‍न परिवारों के या व्‍यावसायिक बुद्धि रखनेवाले कुछ कलाकार भी समृद्ध लोगों से टक्‍कर ले सकते हैं , पर बाकी कलाकारों को तो धनवानों की कृपादृष्टि पर बने रहने को बाध्‍य होना पडता है। उन कलाकारो , अन्‍य प्रकार के साधकों और ज्ञानियों की सामाजिक प्रतिष्‍ठा का अभी तक लगातार ह्रास होता जा रहा है , जो समाज के लिए बहुत लाभदायक हो सकते थे। अपनी प्रतिष्‍ठा को बनाए रखने के लिए उन्‍हें साधना में कमी कर अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों के निर्वाह के लिए अलग काम करने को बाध्‍य होना पडता है।

आज के व्‍यावसायिक युग में सांसारिक सफलता प्राप्‍त करनेवालों का गुमान देखते ही बनता है , कलाकारो , बुद्धिजीवियों का उनके लिए कोई महत्‍व नहीं होता। सांसारिक सफलताओं की अनदेखी कर जो व्‍यक्ति साधना के क्षेत्र में रह जाते हैं , उनकी मानसिकता एक गुलाम की हो जाती है। जो अपने परिवार की जबाबदेहियों को हल करने में असमर्थ हों , उसका आत्‍मविश्‍वास समाज का कल्‍याण करने में नहीं हो पता। इसके परिणामरूवरूप उन नीम हकीम खतरे जान कलाकारों और दिखावटी गुरूओं की बन आती है , जो व्‍यावसायिक बुद्धि रखते हैं और अपने दिखावटीपन से समाज को लूटने में कामयाब तो होते ही हैं , धर्म , ज्ञान और साधना के प्रति समाज के विश्‍वास तो तोडने में भी सक्षम होते हैं। ऐसे लोग समाज के विश्‍वास का तबतक लगातार फायदा उठाते हैं , जबतक समाज का एक एक वर्ग उनके चंगुल में न फंस जाए।

आज जिसके पास लक्ष्‍मी नहीं , वह ज्ञानार्जन तक के योग्‍य ही नहीं। और जिसने ज्ञानार्जन नहीं किया , वह मेहनत मजदूरी करने को बाध्‍य है। सारे कोर्स प्रोफेशनल हो गए हैं , जिन्‍हें पढने के लिए पैसे चाहिए और ज्ञानार्जन के बाद पैसों का ढेर लग सकता है। आज की सरस्‍वती बिना लक्ष्‍मी के नहीं रह सकती , इसलिए तो गुण और ज्ञान प्राप्‍त करनेवाले भी गुणहीन और ज्ञानहीन हैं।  लाखों में पढाई कर करोडों में कमाई करनेवाले व्‍यक्ति से उनकी खुद की और उनके कंपनी के विकास की उम्‍मीद रखी जा सकती है , पर समाज या देश की नहीं। और जो अपने ज्ञान के बल बूते देश का कल्‍याण कर सकते हैं , वे कोने में पडे कराह रहे होते हैं।