बुधवार, 28 दिसंबर 2011

ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन .... … अतिथि पोस्‍ट … (मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा की)

कल मुहूर्त्‍त को लकर लोगों के भ्रम के बारे में एक लेख लिखा गया था , कुछ कट्टर ज्‍योतिषियों को इस पोस्‍ट से तकलीफ पहुंची है , अपने रिसर्च की पुस्‍तक को लिखने से पहले ही मेरे पिताजी ने ज्‍योतिषियों से एक विनम्र अनुरोध किया था, एक नजर डालिए इसपर भी ....



केवल शब्दजाल या अंधविश्वास नहीं

सभी व्यक्तियों को भविष्य की जानकारी की इच्छा होती है, अतः फलित ज्योतिष के प्रति जिज्ञासा और अभिरुचि अधिसंख्य के लिए बिल्कुल स्वाभाविक है। फलित ज्योतिष एकमात्र विद्या है , जिससे समययुक्त भावी घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है, इसी विश्वास के साथ जहा एक ओर आधी आबादी राशिफल पढ़कर संतुष्ट होती है, वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवी वर्ग फलित ज्योतिष में इसके वैज्ञानिक स्वरुप को नहीं पाकर इसकी उपयोगिता पर संशय प्रकट करते हैं। फलित ज्योतिष परंपरागत ढंग से जिन रहस्यों का उद्घाटन करता है , उनका कुछ अंश सत्य को कुछ भ्रमित करनेवाला पहेली जैसा होता है। इस कारण लोग एक लम्बे अर्से से फलित ज्योतिष में अंतर्निहित सत्य और झूठ दोनो को ढोते चले आ रहे हैं।

यह भी ध्यातब्य है कि जो विद्या वैदिककाल से आज तक लोगों को आकर्षित करती चली आ रही है , वह केवल शब्दजाल या अंध-विश्वास नहीं हो सकती। निष्कर्षतः अभी भी फलित-ज्योतिष विकासशील विद्या है , इसका पूर्ण विकसित स्वरुप उभरकर सामने तो आ रहा है परंतु अभी भी विकास की काफी संभावनाएं विद्यमान हैं। विकास के मार्ग में कदम-कदम पर भ्रांतियां हैं। बुद्धिजीवी वर्ग ग्रहों के प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण चाहता है , ज्योतिषी इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध नहीं कर पाते हैं। ग्रह-स्थिति से संबंधित कुछ नियमों का हवाला देते हुए अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति करते हैं। एक ही प्रकार के ग्रह-स्थिति का फलाफल विभिन्न ज्योतिषी विभिन्न प्रकार से करते हैं , जो संदेह के घेरे में होता है। आम लोग फलित ज्योतिष से कब, कैसे, कौन, कितना का उत्तर स्पष्ट रुप से चाहते हैं , किन्तु ज्योतिष से प्राप्त उत्तर अस्पष्ट, छायावादी और प्रतीकात्मक होता है। पारभाषक जानकारी आज के प्रतियोगितावादी युग में नीति.निर्देशक नहीं हो सकती ।

संभवतः यही कारण है कि आजतक विश्व के विश्व-विद्यालयों में फलित-ज्योतिष को समुचित स्थान नहीं मिल सका है। फलित ज्योतिष का सम्यक् विकास कई कारणों से नहीं हो सका। ज्योतिषयों को भ्रांति है कि यह वैदिककालीन सर्वाधिक पुरानी विद्या या ब्रह्म विद्या है , इसमें वर्णित समग्र नियम पुराने ऋषि-मुनियों की देन है , इसलिए फलित ज्योतिष पूर्ण विज्ञान है तथा इन नियमों में किसी प्रकार के संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है। अतः ये फलित ज्योतिष की कमजोरियों को ढूढ़ नहीं पाते हैं। यदि कोई व्यक्ति इसकी कमजोरियों की ओर इशारा करता है तो ज्योतिषी इसे स्वीकार नहीं कर पाते हैं। ज्योतिष की कमजोरियों की अनुभूति होने पर उसकी क्षति-पूर्ति ज्योतिषी सिद्ध पुरूष बनकर करते हैं, मौलिक चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का वे सहारा नहीं ले पाते। फलतः विकसित गणित या विज्ञान की दूसरी शाखाओं के सहयोग से वे वंचित रह जाते हैं।

दूसरी ओर भविष्य के प्रति जिज्ञासु एक ज्योतिष-प्रेमी इस विद्या को पूर्ण विकसित समझते हुए ऐसी अपेक्षा रखता है कि ज्योतिषी के पास जाकर भविष्य की भावी घटनाओं की न वह केवल जानकारी प्राप्त कर सकता है ,वरन् अनपेक्षित अनिष्टकर घटनाओं पर नियंत्रण प्राप्त करके अपने बुरे समय से छुटकारा भी प्राप्त कर सकता है। किन्तु ऐसा न हो पाने से लोगों को निराशा होती है , ज्योतिष के प्रति आस्था में कमी होती है, फलित ज्योतिष वैदिककालीन स्वदेशी विद्या है, भारतीय संस्कृति , दर्शन और आध्यात्म की जननी है, इसके विकास के लिए सरकारी कोई व्यवस्था नहीं है । प्रशासक और बुद्धिजीवी वर्ग ज्योतिष की अस्पष्टता को अंधविश्वास समझते हैं । जिन मेधावी , कुशाग्र बुद्धि व्यक्तियों को ज्योतिष के विकास में अतिशय रुचि होती है , अर्थाभाव होने से “शोध-कार्य में पूर्ण समर्पित नहीं हो पाते। इस कारण मौलिक लेखन का अभाव है , इसलिए ज्योतिष बहुत दिनों से यथास्थितिवाद में पड़ा हुआ है।

मै इसके वर्तमान स्वरूप का अंधभक्त नहीं 

मुझे फलित ज्योतिष में गहरी अभिरुचि है ,परंतु मै इसके वर्तमान स्वरुप का अंधभक्त नहीं हूं । इसकी यथास्थितिवादिता वैज्ञानिक स्वरुप प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधा बन गयी है। मै ज्ञानपूर्वक इसमें अंतर्निहित सत्य और असत्य को स्वीकार करने का पक्षधर हूं । मै इस विषय में सत्य के साक्षात्कार से इंकार नहीं करता, इसे उभारने की आवश्यकता है , किन्तु इससे संश्लिष्ट भ्रांतियों का उल्लेख कर मैं इनका उन्मूलन भी चाहता हूं, ताकि यह निःसंकोच बुद्धिजीवी वर्ग को ग्राह्य हो, इसे जनसमुदाय का विश्वास प्राप्त हो सके। कुछ भ्रांतियों की वजह से फलित ज्योतिष की लोकप्रियता घट रही है , यह उपहास का विषय बना हुआ है।

ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन
ब्लाग को पढ़ाने से पूर्व ही प्रबुद्ध ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन करना चाहूंगा कि एक ज्योतिषी होकर भी मैने फलित ज्योतिष की कमजोरियों को केवल स्वीकार ही नहीं किया , वरन् आम जनता के समक्ष फलित ज्योतिष की वास्तविकता को यथावत रखने की चेष्टा की है। मेरा विश्वास है कि कमजोरियों को स्वीकार करने पर जटिलताएं बढ़ती नहीं , वरन् उनका अंत होता है। फलित ज्योतिष की कमजोरियों को उजागर कर ज्योतिष के इस अंग को मै कमजोर नहीं कर रहा हं , वरन् इसके द्रुत विकास और वैज्ञानिक विकास के मार्ग को प्रशस्त करने की कोिशश कर रहा हूं। बहुत सारे ज्योतिषी बंधुओं को कष्ट इस बात से पहुंच सकता है कि परंपरागत बहुत सारे ज्योतिषीय नियमों को अवैज्ञानिक सिद्ध कर देने से ज्योतिष-शास्त्र में अकस्मात् शून्य की स्थिति पैदा हो जाएगी।

केवल ज्योतिष कर्मकाण्ड में लिप्त रहनेवाले विद्वानों को घोर असुविधाओं का सामना करना पड़ेगा , कुछ आर्थिक क्षति भी हो सकती है , किन्तु यदि हम सचमुच ही फलित ज्योतिष का विकास चाहते हैं , तो इस प्रकार के नुकसान का कोई अर्थ नहीं है। आम ज्योतिषियों के लिए यह काफी अपमान का विषय है कि जिस विषय पर हमारी आस्था और श्रद्धा है , जिस विषय पर हमारी रुचि है , उसे समाज का बुिद्धजीवी वर्ग अंधविश्वास कहता है। दो-चार की संख्या में पदाधिकारीगण ज्योतिष पर विश्वास भी कर लें, इसपर अपनी रुचि प्रदिशZत कर ले , इससे भी बात बननेवाली नहीं है , क्योकि वे सार्वजनिक रुप से इस विद्या की वकालत करने में कहीं-न-कहीं से भयभीत होते हैं। अत: आज विश्व के विश्वविद्यालयो में इसे उचित स्थान नहीं प्राप्त है। इसकी वैज्ञानिकता पर लोगों को विश्वास नहीं है। प्रबुद्ध ज्योतिषी भी इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में इस विद्या के प्रति संदेह अनावश्यक नहीं है।

आज आवश्यक है , हम ज्योतिष की कमजोरियों को सहज स्वीकार करते हुए इसके वैज्ञानिक पहलू का तेज गति से विकास करें। बहुत ही निष्ठुर होकर मैं फलित ज्योतिष की कमजोरियों को जनता के समक्ष रख रहा हूं । परंपरागत ज्योतिषी इसका भिन्न अर्थ न लें। ऐसा करने का उद्देश्य केवल यही है कि मै फलित ज्योतिष में किसी प्रकार की कमजोरी नहीं देखना चाहता हंं। विश्वविद्यालय इसकी वैज्ञानिकता को कबूल करे , इसे अपनाकर इसके प्रति सम्मान प्रदिशZत करें । जबतक इसे वैज्ञानिक आधार नहीं प्राप्त हो जाता, तबतक इसके अध्ययेता और प्रेमी आदर के पात्र हो ही नहीं सकते। अत: अवसर आ गया है कि सभी ज्योतिषी इसके वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक अध्याय पर ठंडे दिमाग से सूझ-बूझ के साथ विचार करें तथा इसे विज्ञान सिद्ध करने में कोई कसर न रहने दें। अपनी कमजोरियों को वही स्वीकार कर सकता है , जो बलवान बनना चाहता है। अकड़ के साथ कमजोरियों से चिपके रहने वाले व्यक्ति को अज्ञात भय सताता है। वे ऊंचाई की ओर कदापि प्रवृत्त नहीं हो सकते।

यह ब्लाग ज्योतिष-प्रेमियों को फलित ज्योतिष की कमजोरियों की ओर झॉकने की प्रवृत्ति का विकास करेगी तथा साथ ही साथ उनके उत्साह को बढ़ाने के लिए फलित ज्योतिष के कई नए वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी भी प्रदान करेगी । इस पुस्तक के माध्यम से मै विश्व के समस्त ज्योतिष प्रेमियों को यह संदेश देना चाहता हंू कि वे फलित ज्योतिष की त्रुटियों से छुटकारा पाने में अपने अंत:करण की आवाज को सुनें। ज्योतिषीय सिद्धांतों और नियमों को ऋषि-मुनियों या पूर्वजों की देन समझकर उसे ढोने की प्रवृत्ति का त्याग करें। जो सिद्धांत विज्ञान पर आधारित न हो , उसका त्याग करें तथा जो नियम विज्ञान पर आधारित हों, उनको विकसित करने में तल्लीन हो जाएँ

विश्वविद्यालयों द्वारा स्वीकृति पाना आवश्यक

भौतिक विज्ञान , रसायन विज्ञान , गणित या अन्य विज्ञानों के विभाग में लाखों विद्यार्थी नियमपूर्वक पढ़ाई कर रहें हैं और इसे सीखने में गर्व महसूस कर रहें हैं। ऐसा इसलिए हो पा रहा है कि इन विषयों को विश्वविद्यालय में मान्यता मिली हुई है। फलित ज्योतिष विश्वविद्यालयों द्वारा स्वीकृत नहीं है इसलिए इसे कोई पढ़ना नहीं चाहता । इसे पढ़कर इस भौतिकवादी युग में किस उद्देश्य की पूर्ति हो पाएगी ? केवल अंत:करण के सुख के लिए इसे पढ़ने का कार्यक्रम कबतक चल सकता है ? कबतक ज्योतिषियों कों फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता को प्रमाणित करने के लिए तर्क-वितकोZ के दौर से गुजरना होगा ? आज भी संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं , जो नि:स्वार्थ भाव से फलित ज्योतिष के विकास और इसे उचित स्थान दिलाने की दिशा में कार्यरत हैं ,किन्तु जाने-अनजाने उनकी सारी शक्ति ` विंशोत्तरी दशा पद्धति ´ में उलझकर रह गयी है। ग्रह-शक्ति के सही सूत्र को भी प्राप्त कर पाने में वे सफल नहीं हो सके हैं। मेरा विश्वास है कि यदि आप यह ब्लाग गंभीरतापूर्वक पढ़ेंगे तो नििश्चत रुप से समझ पाएंगे कि फलित ज्योतिष का विकास अभी तक क्यों नहीं हो सका ?

झाड़झंखाड़ों को काटकर बनाया गया है एक सुंदर पथ 

इस दिशा में शौकिया काम करनेवालों को यह जानकर अत्यधिक प्रसन्नता होगी जब उन्हें मालूम होगा कि फलित ज्योतिष के सिद्धांत , नियम और उपनियमों के घने बीहड़ जंगलों में जहॉ वे भटकाव की स्थिति में थे , अब झाड़-झंखाड़ों को काटकर एक सुंदर पथ का सृजन किया जा चुका है , लेकिन मै भयभीत हूं , यह सोंचकर कि कहीं अतिपरंपरावादी ज्योतिषी जो भटकावपसंद थे , कहीं मुझपर आरोप न लगा बैठे कि मैने उनके सुंदर जंगलों को नष्ट कर दिया है क्योकि मेरे एक लेख को पढ़कर एक विद्वान ज्योतिषी ने मेरे ऊपर इस प्रकार का आरोप लगाया था।- 

वह नहीं नूतन , जो पुरातन की जड़ हिला दे।
नूतन उसे कहूंगा , जो पुरातन को नया कर दे। 

ज्योतिषी बंधुओं , पुरातन को हिलाना मेरा उद्देश्य नहीं है , लेकिन कुछ नियमों और सिद्धांतों को ढोते-ढोते आप स्वयं हिलने की स्थिति में आ गए हैं , आप थककर चूर हैं , आप हजारो बार इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इन नियमों में कहीं न कहीं त्रुटियॉ हैं , फलित ज्योतिष के विकास में ठहराव आ गया है। इससे बचने के लिए पुराने का पुनमूर्ल्यांकण और नए नियमों का सृजन करना ही होगा ,अन्यथा हम सभी उपेक्षित रह जाएंगे। प्रस्तुत पुस्तक इस दिशा में काफी सहयोगी सिद्ध होगी। अंत में मै पुन: सभी ज्योतिषियों से क्षमा मॉगता हूं । सही समीक्षा के द्वारा फलित ज्योतिष का ऑपरेशन किया गया है , इससे कई लोगों की भावनाओं को चोट भी पहुंच सकती है , किन्तु मेरी कलम से लोग आहत हों ,यह उद्देश्य कदापि मेरा नहीं है। मुझे आप सबों के सहयोग की आवश्यकता है। 

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

मुहूर्त्‍त को लकर लोगों के भ्रम ... अतिथि पोस्‍ट ... (मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा की)

कई प्रकार की व्‍यस्‍तता के कारण कुछ दिनों से अपने ब्‍लोग पर नियमित रूप से ध्‍यान नहीं दे पा रही हूं। फिलहाल जहां एक ओर दोनो बच्‍चों की छुट्टियां मनमाने ढंग से मनाने में उनकी मदद कर रही हूं , वहीं दूसरी ओर बिखरे पडे सभी आलेखों को संपादित कर उसे पुस्‍तकाकार देने में भी व्‍यस्‍त हूं। इस पुस्‍तक का काम जल्‍द ही पूरा हो जाएगा , जिसमें ज्‍योतिष की सारी कमियों को सटीक ढंग से स्‍वीकार करते हुए उसे दूर करने के उपायों की चर्चा की गयी है। जल्‍द ही इसकी पी डी एफ फाइल इंटरनेट पर डाल दूंगी , ताकि इसे पढकर ज्‍योतिष प्रेमी ज्‍योतिष के वास्‍तविक स्‍वरूप को समझ पाएं। इसी दौरान पिताजी की भी एक डायरी पढने का मौका मिला , उसमें से भी कुछ उपयोगी आलेखों को इस पुस्‍तक में सम्मिलित करने की भी इच्‍छा है। उन्‍हीं चुने हुए आलेखों में से एक आज आपके लिए प्रस्‍तुत है .....

आज के अनिश्चित और अनियमित युग में हर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। अपने कर्मों और कार्यक्रमों पर भरोसेवाली कोई बात नहीं रह जाती है। जैसे जैसे आत्मविश्वास में कमी होती जा रही है , मुहूर्त , यात्रा आदि संदर्भों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर फिल्म-निर्माण प्रारंभ करने और उसके प्रदर्शन की शुरुआत के लिए मुहूर्त की चर्चा देखने को मिलती है। फिल्म-निर्माण करने में अधिक से अधिक खर्च-शक्ति और पूंजी की लागत होती है , कामयाबी मिलने पर लागत-पूंजी न केवल सार्थक होती है , वरन् प्रतिदान के रुप में कई गुणा बढ़ भी जाती है। दूसरी ओर फिल्म फलॉप होने पर फिल्म निर्माता दर-दर भटकाव की स्थिति को प्राप्त करते हैं। सचमुच फिल्म निर्माण बहुत बड़ा रिस्क होता है , इसलिए फिल्मनिर्माता एक अच्छे मुहूर्त की तलाश में होते हैं , ताकि काम अबाध गति से चलता रहे और प्रदर्शन के बाद भी फिल्म काफी लाभदायक सिद्ध हो। किन्तु वस्तुतः होता क्या है ? आज का फिल्म उद्योग काफी लाभप्रद नहीं रह गया है , कुछ सफल है , तो अधिकांश की स्थिति बिगड़ी हुई है। क्या सचमुच मुहूर्त काम करता है ?

पूरे देश में प्रवेशिका परीक्षा देनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। इस वैज्ञानिक युग में जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते चले गए , पढ़ाई का वातावरण धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला गया। आज जैसे ही परीक्षा के लिए कार्यक्रम की घोषणा होती है , अधिकांश विद्यार्थी परेशान नजर आते हैं , क्योंकि उनकी तैयारी संतोषजनक नहीं होती है , इसलिए उनका आत्मविश्वास काम नहीं करता रहता है। प्रायः सभी विद्यार्थी और उनके अभिभावक अपने आवास से परीक्षा-स्थल पर पहुंचने के लिए मुहूर्त्‍त की तलाश में पंडितों के पास पहुंच जाते हैं। पंडितजी के पास ग्रहों , नक्षत्रों के आधार पर शोध किए गए कुछ विशिष्ट शुभ समय-अंतराल की तालिका होती है।

कभी महेन्द्र योग , कभी अमृत योग तो कभी सिद्धियोग से संबंधित इस प्रकार के शुभफलदायी लघुकालावधि की सूचना बारी-बारी से सभी विद्यार्थियों और अभिभावकों को दी जाती है या फिर एक ही विद्यार्थी पंडितजी से यह मुहूर्त्‍त प्राप्त कर कई विद्यार्थियों को जानकारी देते हैं। विद्यार्थी झुंड बनाकर एक ही साथ उसी शुभ मुहूर्त्‍त में अपने गांव , कस्बे या क्षेत्र से परीक्षास्थल के लिए निकलते हैं। पर सोंचने की बात है कि क्या सबका परिणाम एक सा होता है ? नहीं , विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा के अनुरुप ही फल प्राप्त होता है। उत्तीर्ण होने लायक विद्यार्थी सचमुच उत्तीर्ण होते हैं और जिन विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की संभावना पहले से ही रहती है , वैसे ही विद्यार्थी अनुत्तीर्ण देखे जाते हैं। विरले ही ऐसे विद्यार्थी होते हैं , जिनका परीक्षा परिणाम प्रत्याशा के विरुद्ध होता है , उन विद्यार्थियों ने शुभ मुहूर्त्‍त में यात्रा नहीं की , इसलिए ही ऐसा हुआ , यह तो कदापि नहीं कहा जा सकता।

यहां तो मैं केवल यात्रा की बात कर रहा हूं , किन्तु कल्पना करें किसी समय अमृत योग , सिद्धि योग या महेन्द्र योग चल रहा हो और उसी समय किसी विषय की परीक्षा चल रही हो , तो क्या लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थी उस विषय में उत्तीर्ण हो जाएंगे ? कदापि नहीं , सभी विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुरुप ही  परीक्षाफल की प्राप्ति होगी। अमृतयोग या सिद्धियोग कुछ काम नहीं कर पाएगा।

हर विषय की परीक्षा का समय निर्धारित होता है और लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा में सम्मिलित होकर भिन्न-भिन्न परीणामों को प्राप्त करते हैं। समय के छोटे से टुकड़े को ही मुहूत्र्त कहा जाता है। इस दृष्टिकोण से परीक्षा की कुल अवधि , जिसमें सभी विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं , एक प्रकार का मुहूत्र्त ही हुआ। वह मुहूर्त्‍त अच्छा है या बुरा , सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसा ही होना चाहिए , परंतु क्या वैसा हो पाता है ? स्पष्ट है , ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

बहुत बार समय का एक छोटा सा अंतराल आम लोगों को प्रभावित करता है। हवाई जहाज या रेल के दुर्घटनाग्रस्त होने पर सैकड़ो लोग एक साथ मरते हैं। इसी तरह युद्ध , भूकम्प या तूफान के समय मरनेवालों की संख्या हजारो में होती है। उक्त कालावधि को हम बहुत ही बुरे समय से अभिहित कर सकते हैं , क्योकि इस प्रकार की घटनाएं जनमानस पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालती है , किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को अच्छे योगों में भी घटते हुए मैंने पाया है। इसी प्रकार शुभ विवाह के लिए शुभ मुहूर्तों की एक लम्बी तालिका होती है , जिन तिथियों में ही शादी-विवाह की व्यवस्था की जाती है। परंतु बहुत बार हम ऐसा सुनते हैं कि आकस्मिक दुर्घटना के कारण बरातियों की मौत हो गयी , ऐसी हालत में इन योगों की कौन सी प्रासंगिकता रह जाती है ? क्या यह बात दावे से कही जा सकती है कि जो हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुई , उसमें हवाई यात्रा करने से पूर्व सभी यात्रियों में से किसी ने मुहूर्त्‍त नहीं देखा होगा ? उसमें स्थित कोई आम आदमी , जो भाग्यवादी दृष्टिकोण भी रखता होगा , यात्रा के विषय में अवश्य ही पंडितों से सलाह ले चुका होगा , फिर भी सभी यात्रियो का परिणाम एक सा ही देखा जाता है।

जहां एक ओर  सामूहिक उत्सव , एक ही मेले में लाखो लोगों का एक साथ उपस्थित होना , सामूहिक विवाह , सौंदर्य प्रतियोगिता आदि सुखद अहसास खास समय अंतराल के विषय वस्तु हो सकते हैं , वहीं दूसरी ओर भूकम्प , तूफान , युद्ध और दुर्घटनाओं से लाखों लोगों का प्रभावित होना भी सच हो सकता है। इस प्रकार से अच्छे या बुरे समय को स्वीकार करना हमारी बाध्यता तो हो सकती है , किन्तु इन दोनों प्रकार के समयों को अलग-अलग कर दिखाने के सूत्रों की पकड़ जब अच्छी तरह हो जाएगी , तो फलित ज्योतिष के द्वारा समय और तिथियुक्त भविष्यवाणियां भी आसानी से की जा सकेगी।

अमुक दिन अमुक समय पर भूकम्प आनेवाला है , तूफान आनेवाला है , कहकर लोगों को सतर्क किया जा सकेगा। अगर ऐसा हो पाया तो बुरे समय का बोध स्वतः हो जाएगा। किन्तु अभी फलित ज्योतिष इतना ही विकसित है कि वह ग्रह की स्थिति अंश , कला और विकला तक कर सकता है , परंतु उसके फलाफल की प्राप्ति किस वर्ष होगी , इसकी भी चर्चा नहीं कर पाता । दूसरी ओर फलित ज्योतिष के ज्ञाता किसी खास घंटा और मिनट को भी शुभ और अशुभ कहने में नहीं चूकते हैं। फलित कथन की यह दोहरी नीति फलित ज्योतिष में भ्रम उत्पन्न करती है।

कभी-कभी एक ही समय में एक घटना घटित होती है और उस घटना का प्रभाव दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति और समुदाय के लिए अलग-अलग यानि एक के लिए शुभ और दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होता है। इस प्रकार की घटनाएं अक्सर होती हैं , एक हारता है , तो दूसरा जीतता है। एक को हानि होती है , तो दूसरा लाभान्वित होता है। वर्षों तक मुकदमा लड़ने के बाद दोनों पक्ष के मुकदमेबाज ज्योतिषी से सलाह लेने पहुंच जाते हैं। फैसले के लिए कौन सी तिथि का चुनाव किया जाए। पंचांग में एक बहुत ही शुभ समय का उल्लेख है। दोनो पक्ष भिन्न-भिन्न ज्योतिषियों से सलाह लेकर उस शुभ दिन को फैसले की सुनवाई के लिए तैयार होकर जाते हैं। पर परिणाम क्या होगा ? एक को जीत तो दूसरे को हार मिलनी ही है। निर्धारित शुभ समय एक के लिए शुभफलदायक तो दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होगा।

दो देशों के मध्य क्रिकेट मैच हो रहा है।  दोनो देशों के निवासी बड़ी तल्लीनता के साथ मैच देख रहे होते हैं। कई घंटे बाद निर्णायक क्षण आता है। जीतनेवाला देश कुछ ही मिनटों में खुशी का इजहार करते हुए करोड़ो रुपए की आतिशबाजी कर लेता है , किन्तु प्रतिद्वंदी देश गम में डूबा , शोकाकुल मातम मनाता रहता है। ऐसे निर्णायक क्षण को बुरा कहा जाए या अच्छा , निर्णय करना आसान नहीं है। इसी तरह बंगला देश के आविर्भाव के समय 1971 में दिसम्बर के पूर्वार्द्ध में एक पखवारे तक दोनो देशों के बीच युद्ध होता रहा , जान-माल की हानि होती रही। बंगला देश अस्तित्व में आया। सिद्धांततः भारत की जीत हुई , पाकिस्तान की पराजय। किन्तु दोनो ही देशों को भरपूर आर्थिक नुकसान हुआ। इन पंद्रह दिनों की अवघि को किस देश के लिए किस रुप में चिन्हित किया जाए। 15 दिनों के अंदर उल्लिखित अमृत , महेन्द्र और सिद्धियोग का भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के लिए और बंगला देश के नागरिकों के लिए क्या उपयोगिता रही ?

इस अवधि में बंगला देश निवासी स्त्री-पुरुषों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर था। क्या फलित ज्योतिष के दैनिक मुहूर्तों का इनपर कोई प्रभाव पड़ सका ? मुहूर्त के रुप मे छोटे-छोटे अंतराल की चर्चा न कर स्थूल रुप से ही इस लम्बी अवधि तक की युद्ध की विभीषिका को क्या फलित ज्योतिष में एक अनिष्टकर योग के रुप में  चित्रित किया जा सकता है ? नहीं , क्योकि इस घटना का प्रभाव सारे विश्व के लिए एक जैसा नहीं था । न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत एक प्रतिक्रिया होती है। यदि यह प्रकृति का नियम है , तो समय के छोटे से अंतराल में भी , जिसे हम बुरा या अशुभ फल प्रदान करनेवाला कहते हैं , किसी न किसी का कल्याण हो रहा होता है।

अतः किसी भी समय को किसी व्यक्ति विशेष के लिए अच्छा या बुरा समय कहना ज्यादा सटीक होगा। अमृत योग में भी किसी को फांसी पर लटकाया जा सकता है , विषयोग में भी कल्याणकारी कार्य हो सकते हैं । किसी वर्ष मक्का-मदीना में गए हजयात्रियों की संख्या 20 लाख थी। गैस-रिसाव से अग्नि प्रज्वलित हुई तथा तेज हवा के झोकों के कारण आग की लपटे हजारो पंडालों तक फैल गयी। इससे 400 तीर्थयात्री मारे गए। शेष हजयात्रा पूरी करके सकुशल वापस आ गए। जो मारे गए , वे सीधे जन्नत सिधार गए। उनका संपूर्ण परिवार पीडि़त हुआ। जो घायल हुए , वे स्वयं पीडि़त हुए। शेष हादसे से प्रभावित नहीं होने के कारण हजयात्रा की सफलता को उपलब्धि के रुप में लेंगे। सभी अपने अपने दशाकाल के अनुसार फल की प्राप्ति कर रहे थे , मुहूर्त के अनुसार उनका फल प्रभावित नहीं हुआ।

किसी धनाढ्य व्यक्ति के यहां लक्ष्मीपूजन किस समय किया जाए , इसके लिए पंडित शुभ मुहूर्त निकाल देते हैं , पूजा भी हो जाती है , धन की वर्षा भी होने लगती है , किन्तु एक पंडित अपने लिए वह शुभ मुहूर्त कभी नहीं निकाल पाता है । यदि पक्के विश्वास की बात होती , तो पंडित उस शुभ घड़ी में स्वयं अपने यहां लक्ष्मी-पूजन करता और धन की वर्षा उसी के यहां होती , उसे केवल दक्षिणा से संतुष्ट रहने की बात नहीं होती।

निष्कर्ष यह है कि हर समय का महत्व हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। पंचांग में यदि एक समय को शुभ लिख दिया जाए , तो कोई समय शुभ नहीं हो जाएगा। एक समय एक व्यक्ति हॅसता है , तो दूसरा रोता है। यात्रा या मुहूर्त के बल पर बुरे समय को अच्छे समय में बदलना कठिन ही नहीं , असंभव कार्य है। अपने कर्मफल को भोगने के लिए हम सभी विवश हैं। किसी की यात्रा या मुहूर्त उसी दिन शुरु हो जाता है , जिस दिन उसका जन्म पृथ्वी पर होता है। जबतक यह जीवन है , हर व्यक्ति अपने यात्रा-पथ में है।

जन्म के अनुसार संस्कार , विचारधारा , कर्तब्य , सुखदुख सब निर्धारित है। जन्मकालीन ग्रहों द्वारा निर्मित वातावरण इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। जन्म से मृत्यु तक के यात्रापथ में उसके समस्त कार्यक्रम , उसकी सफलता और असफलता तक के क्षणों का निर्धारण लगभग हो चुका होता है। इस बीच यदि कोई बार-बार मुहूर्त की तलाश करता है , तो क्या सचमुच अपनी प्रकृति , विचारधारा , कार्यप्रणाली और मंजिल को बदलने की क्षमता रखता है ? यदि ये सारे संदर्भ हर समय बदल दिए जाए , तो व्यक्ति कहां पहुंचेगा ?

पंचांगों में शुभ विवाह के लिए बहुत सारे मुहूर्तों का उल्लेख होता है। वैवाहिक बंधनों में बॅघनेवालों के लिए शुभ तिथियां कुल मिलाकर 40 से 50 के बीच होती हैं। उनमें भी कई प्रकार के दोषों का उल्लेख रहता है। लोग भ्रमजाल में उलझे उनमें से किसी अच्छी तिथि के लिए पंडितों के पास पहुंचते हैं। अभिभावकों के पास पंचांगों में लिखी बातों को मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता। वैवाहिक संस्कार जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है , इसका बंधन बहुत ही नाजुक होता है , संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालनेवाला।

इसलिए लोग शुभलग्न या शुभ तिथियों में ही विवाह निश्चित करते हैं। सीमित तिथियां होने से कभी-कभी एक ही तिथि में शादी की इतनी भीड़ हो जाती है कि हर प्रकार की व्यवस्था में अभिभावकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उत्सवी वातावरण बोझिल बन जाता है। जिस कार्यक्रम की शुरुआत में ही कष्ट या तनाव हो जाए , उसका मनोवैज्ञानिक बुरा प्रभाव भविष्य में भी देखने को मिलता है। शुभ तिथि के चयन में इस बात का सर्वाधिक महत्व होना चाहिए कि वांछित कार्यक्रम का किस प्रकार से समापन हो , पर इसका सहारा न लेकर ऊबाऊ मुहूर्त की चर्चा करना समाज में व्यर्थ का बोझ देना है। 

पंचांग में शुक्र के अस्‍त होने पर शादी के लिए कोई शुभ लग्न पंचांगों में दर्ज नहीं किया जाता है। पर ज्योतिषियों को यह मालूम होना चाहिए कि शुक्र का अस्त होना हर स्थिति में कष्टकर नहीं होता। सूर्य के साथ अंतर्युति करते हुए जब शुक्र अस्त होता है , तो वह आम लोगों के लिए कष्टकर हो सकता है , किन्तु वही शुक्र सूर्य से बहिर्युति करते हुए जब अस्त हो , तो बहुत ही अच्छा फल प्रदान करता है। जब शुक्रास्त सूर्य के साथ बहिर्युति करते होता है तो शुक्र की कमजोरी को दृष्टिकोण में रखकर वैवाहिक शुभ लग्न का उल्लेख नहीं करना अनजाने में बहुत बड़ी भूल होती है। पंचांग निर्माता या फलित ज्योतिष के विशेषज्ञ विभिन्न कारणों से शादी के लिए किसी वर्ष शुभ लग्न की कितनी भी कमी दर्ज क्यों न करें , विवाह की कुछ संख्या घट सकती है , परंतु होगी तो अवश्य ही और यदि वे लागातार कुछ वर्षों तक शुभ लग्न की कमी दिखलाते रहें तो विवाह बिना लग्न के ही होते देखे जाएंगे।

कहने का अभिप्राय यह है कि विधि-निषेध ओर कर्मकाण्ड से संबंधित ज्योतिषीय चर्चा जब भी हो , उसका ठोस वैज्ञानिक आधार होना आवश्यक होगा , अन्यथा उन नियमों की अवहेलना स्वतः युग के साथ होनी स्वाभाविक है। जब आजतक ग्रह-शक्ति निर्धारण और उनके प्रतिफलन काल से संबंधित ठोस सूत्र ज्योतिषियों को मालूम नहीं है , तो मुहूर्त को लेकर तनाव में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जबतक फलित ज्योतिष को विकसित स्वरुप न प्रदान कर दी जाए , यानि ग्रह की इस स्थिति का यह परिणाम होगा , यह बात दावे से न कही जा सके , तबतक ज्योतिषियों के अधूरे ज्ञान या संशय का लाभ जनता को मिलना चाहिए। अनावश्यक विधि निषेध से संबंधित नियमावलि से आमलोगों को कदापि परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

शादी के लिए कन्या पक्ष और वरपक्ष तैयार है , सांसारिक दृष्टि से उसे अंजाम देने में सप्ताह भर का समय काफी है , परंतु फिर भी विवाह नहीं हो पा रहा है , इसका कारण यह है कि पंचांग में शुभ लगन का अभाव है। इस तरह सिर्फ वैवाहिक लग्न के संदर्भ में ही नहीं , अपितु हर प्रकार के कार्यों में पंचांगों में दर्ज मुहूर्तों का अभाव आम जीवन में कई प्रकार की असुविधाओं को जन्म देता है , जबकि विश्वासपूर्वक मुहूर्तों की उपयोगिता और प्रभाव को अभी कदापि सिद्ध नहीं किया जा सका है।

स्मरण रहे , हर शुभ मुहूर्त का आधार तिथि , नक्षत्र , चंद्रमा की स्थिति , योगिनी , दिशा और ग्रहस्थिति के आधार पर किया गया है , किन्तु ग्रह-शक्ति के सबसे बड़े आधार ग्रह की विभिन्न प्रकार की गतियों के आधार पर मुहूर्तों का चयन नहीं हुआ है। अतः अभी तक के मुहूर्त पूर्ण विश्वसनीय नहीं हैं। अभी यह भी अनुसंधान बाकी ही है कि एक व्यक्ति के लिए सभी शुभ मुहूर्त शुभफल ही प्रदान करते हैं , अतः कर्मकाण्ड से डरने की कोई आवश्यकता नहीं। विकसित विज्ञान का काम सभी व्यक्तियों के मन से भय को दूर कर मनुष्य को निडर बनाना है। .. और हमें उसी प्रयास में बने रहना चाहिए।

न तो एक व्यस्त डॉक्टर मुहूर्त देखकर रोगी का ऑपरेशन करता है , और न ही एक व्यस्त वकील मुहूर्त देखकर अपने मुकदमें की पैरवी करता है , न ही एक कुशल वैज्ञानिक मुहूर्त देखकर उपग्रह या मिसाइल का प्रक्षेपण करते हैं। जो अधिक फुर्सत में होते है , वे ही मुहूर्त की तलाश में होते हैं या फिर जिनके आत्मविश्वास में थोड़ी कमी होती है , वे ही मुहूर्त की चर्चा करते हैं। योजनाओं के अनुरुप हर प्रकार के संसाधन उपस्थित हो तो किसी भी व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि मुहूर्त स्वयं आकर हमारे सामने खड़ा है , उसे ढूंढ़ने के लिए पंडित के पास जाने की आवश्यकता नहीं। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर किसी भी व्यक्ति को अपने काम में विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह अलग बात हे कि जब योजना को स्वरुप देने में संसाधन की कमी हो रही हो , कई तरह की बाधाएं उपस्थित हो रही हो , तो ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी से यह सलाह लेने की बात हो सकती है कि निकट भविष्य में कोई शुभ मुहूर्त उसके जीवन में है या नहीं ?   

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढाई का विरोध क्‍यूं ??

दिल्ली की एचआरडी मिनिस्ट्री छह जनवरी से एक पाठ्यक्रम शुरू करने जा रही है ,ज्योतिष और वास्तु शास्त्र को लेकर जिस तरह से टीवी चैनलों-न्यूज पेपरों मे अंधविश्‍वासी बातें सामने आ रही हैं, उसको ध्यान में रखकर देश के विद्वानों से राय लेकर  तीन महीने के इस तरह के पाठ्यक्रमों को चलाने की योजना बनायी गयी। लोगों को ज्योतिष और वास्तु शास्त्र विधाओं से परिचित कराने की जिम्मेदारी लखनऊ स्थित केंद्रीय राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान को दी गई है। इससे पूर्व भी यू जी सी द्वारा ज्‍योतिष की शिक्षा देने का कार्यक्रम बनाया गया था , पर इसे जनसामान्‍य का विरोध झेलना पडा था। पर मेरा मानना है कि किसी प्रकार का ज्ञान हर प्रकार के भ्रम का उन्‍मूलन करता है , इसलिए इसका विरोध नहीं होना चाहिए। मै पहले भी इस संबंध में आलेख लिख चुकी हूं।


जब हमारी प्राचीन वैदिक ज्ञानसंपदा सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक , नैतिक , धार्मिक ,वैज्ञानिक , पर्यावरणीय और स्वास्थ्य की दृष्टि से सही साबित हो रही है , तो फिर विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढ़ाई को लेकर बवाल क्यों मचाया जाता है ? वैज्ञानिक संसाधनों के अभाव के बावजूद हमारे ऋषि मुनियों के द्वारा `गणित ज्योतिष´ का विकास जब इतना सटीक है , तो उन्हीं के द्वारा विकसित `फलित ज्योतिष´ अंधविश्वास कैसे हो सकता है ? भले ही सदियों की उपेक्षा के कारण वह अन्य विज्ञानों की तुलना में कुछ पीछे रह गया हो और इस कारण उसके कुछ सिद्धांत आज की कसौटी पर खरे न उतरते हों। भले ही व्यक्ति अपनी मेहनत , अपने स्तर और अपने कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त करता हो , किन्तु उनकी परिस्थितियों और चारित्रिक विशेषताओं पर ग्रह का ही नियंत्रण होता है और `गत्यात्मक ज्योतिष´ द्वारा इसे सिद्ध किया जा सकता है।

मानव जब जंगल में रहते थे , उस समय भी उनकी जन्मपत्री बनायी जाती , तो वैसी ही बनती , जैसी आज के युग में बनती है। वही बारह खानें होते , उन्हीं खानों में सभी ग्रहों की स्थिति होती , विंशोत्तरी के अनुसार दशाकाल का गणित भी वही होता , जैसा अभी होता है। आज भी अमेरिका जैसे उन्नत देश तथा अफ्रीका जैसे पिछड़े देश में लोगों की जन्मपत्र एक जैसी बनती है। मानव जाति ने अपने बुद्धि के प्रयोग से जंगलों की कंदराओं को छोड़कर सभ्य और प्रगतिशील समाज की स्थापना की है , ये सब किसी के भाग्य में लिखे नहीं थे , ये चिंतन , अन्वेषण और प्रयोग के ही परिणाम हैं। लेकिन यह तो मानना ही होगां कि इसके लिए प्रकृति ने अन्य जानवरों की तुलना में मानव को अतिरिक्त बुद्धि से नवाजा। यदि यह नहीं होता , तो मनुष्य आज भी पशुओं की तरह ही होते। बस इसी तरह सामूहिक तौर पर ही नहीं ,  प्रकृति व्‍यक्तिगत तौर पर भी हमारी मदद करती है। 

विश्वविद्यालय में ज्योतिष का प्रवेश विवाद का विषय नहीं होना चाहिए , विवाद सिर्फ इसपर हो कि ज्योतिष के विभाग में नियुक्ति किनकी हो और पुस्तकें कैसी रखी जाएं ? यदि इसमें भी राजनीति हुई , तो ज्योतिष जैसा पवित्र विभाग भी मैला हो जाएगा।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

पूरे ब्रह्मांड में बनते रहते हैं सुंदर सुंदर दृश्‍य .....

जिस तरह पृथ्‍वी में सुंदर दृश्‍यों की कमी नहीं , वैसे ही पूरे ब्रह्मांड में भी बनते रहते हैं। हमारा ब्रह्मांड करोड़ों निहारिकाओं के समूह से भरा हुआ है। आसमान में अक्‍सर इनकी विभिन्‍न गतियों के कारण सुंदर दृश्‍य बनते हैं। कभी कभी इनमें से किसी एक को आधी रात के आकाश में धुंधले बादल के रूप में देख सकते हैं। टेलीस्कोप से देखने पर यह बैलगाड़ी के चक्के के समान दिखाई देती है। कोरी आंखों से जरा ध्यान से देखना होता है। अन्‍य ग्रहों , उपग्रहों और नक्षत्रों की चाल और विशेषताओं के फलस्‍वरूप सौरमंडल के अंदर और सौरमंडल के बाहर और धरती से सटे आसमान में दिखाई देने वाले आकाश के ऐसे प्राकृतिक सुंदर दृश्‍यों को नासा कैमरे में कैद कर अपनी वेबसाइट पर डाल दिया करता है। इंटरनेट में मौजूद आसमान के इन सुंदर दृश्‍यों के साथ साथ नासा के आसमान में किए गए क्रियाकलापों के कुछ कृत्रिम सुंदर दृश्‍यों को भी इस पृष्‍ठ पर देखा जा सकता है। मैं तो इन्‍हे नियमित देखती हूं , आप भी आनंद लिया कीजिए। कुछ खास चित्र यहां दिए जा रहे हैं .....











ऐसे ही और दृश्‍यों का आनंद लेना चाहते हैं तो अभी पहुंच जाइए यहां पर ....दश्‍यों के साथ साथ इनसे संबंधित जानकारियां भी यहां उपलब्‍ध हैं।

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

28 नवंबर को बाजार खुलने तक सेंसेक्‍स और निफ्टी को अच्‍छी ऊंचाई पर होना चाहिए !!


लगातार गिरता हुआ बम्बई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक पिछले शुक्रवार को पिछले शुक्रवार को सेंसेक्स 16,371.51 पर और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का 50 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक निफ्टी 4,905.8 पर बंद हुआ. विशेषज्ञों का मानना था कि बाजार में अत्यधिक बिकवाली हो चुकी है इसलिए सोमवार को थोड़ा सुधार का रुख भी देखने को मिल सकता है। पर कल भी ऐसा देखने को नहीं मिला , वैश्विक बाजारों में कमजोरी के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा सतत बिकवाली के चलते बंबई शेयर बाजार में गिरावट का दौर कल लगातार आठवें दिन जारी रहा जबकि सेंसेक्स 425 अंक और टूटकर 16,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे चला गया। इस तरह कल तीसरे सप्‍ताह भी विश्‍वभर के शेयर बाजार में लगातार बिकवाली का दौर चलता रहा। 

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के सिद्धांतों की माने तो आज भी बाजार में बहुत ही कमजोर हालात बने रहेंगे , पर 23 नवंबर से बाजार में सुधार का क्रम जारी रहना चाहिए , खासकर  28 नवंबर को बाजार खुलने तक सेंसेक्‍स और निफ्टी अच्‍छी ऊंचाई पर होना चाहिए। 24 नवंबर को मुद्रास्फीति के आंकड़े से भी शेयर बाजार को सकारात्‍मक दिशा ही मिलनी चाहिए  इस तरह इस सप्‍ताह दुनियाभर के शेयर बाजार की दिशा सकारात्‍मक ही दिखती है , पर इस दौरान शेयर बाजार पर लोगों का विश्‍वास कम रहेगा , इस कारण इस सप्‍ताह लगभग प्रत्‍येक दिन अंत में बाजार एक बार बिकवाली का दबाब झेलने को मजबूर होगा , जिससे सेंसेक्‍स और निफ्टी में गिरावट आती रहेगी , अभी बहुत तेजी के आसार निकट में नहीं दिखते !!

शनिवार, 19 नवंबर 2011

निरंतर 8 महीने तक डटा रहेगा सिंह राशि में मंगल .. अच्‍छे या बुरे प्रभाव में आ रहे हैं आप ??

पिछले दोनो लेखों में गोचर में ढाई वर्षों तक तुला राशि में स्थित शनि और दो महीने तक वृश्चिक राशि में स्थित बुध के अच्‍छे और बुरे प्रभाव से प्रभावित होने वाले जातकों के बारे में विस्‍तार से उल्‍लेख किया गया , आज के आलेख में चर्चा होगी उन समयांतराल की , जिसमें जन्‍म लेनेवाले सिंह राशि के मंगल के अच्‍छे या बुरे प्रभाव में आएंगे। जिन्‍होने भी नियमित तौर पर पंचांग में ग्रहों के चाल पर ध्‍यान दिया होगा , उन्‍होने पाया होगा कि लगभग डेढ से दो महीने तक एक राशि में होने के बाद मंगल अपनी राशि बदल लेता है , पर कभी कभी वक्री होने से पहले और मार्गी होने के बाद इसकी गति कम हो जाती है , उन दिनों में या छह सात महीने एक ही राशि में रह जाता है , इस बार तो यह पूरे आठ महीने सिंह राशि में डटा हुआ है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार इस समय यह बहुत ही क्रियाशील होता है और जनसामान्‍य के सम्‍मुख किसी न किसी प्रकार के कार्य , जबाबदेही या तनाव उपस्थित कर देता है। इसकी हल्‍की शुरूआत तभी हो जाती है , जब यह संबंधित राशि में चला जाता है।

इस वर्ष 1 नवंबर 2011 से 21 जून 2012 तक मंगल की स्थिति सिंह राशि में बनी हुई है , इसी कारण 1 नवंबर से मंगल से संबंधित मुद्दों को मजबूत बनाने के लिए या उससे संबंधित कमजोरी को दूर करने के लिए लोगों का ध्‍यान संकेन्‍द्रण बनने लगा है। मेष लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यक्तित्‍व और जीवनशैली , वृष लग्‍नवाले घर , गृहस्‍थी , खर्च , बाहरी संदर्भों , मिथुन लग्‍नवाले लाभ , प्रभाव या कई प्रकार के झंझट , कर्क लग्‍नवाले अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , कार्यक्षेत्र या समाजिक मामलों , सिंह लग्‍न वाले भाग्‍य , धर्म , माता पक्ष या वाहन समेत कई प्रकार की संपत्ति , कन्‍या लग्‍नवाले भाई , बहन , बंधु बांधव या जीवनशैली , तुला लग्‍नवाले धन , कोष , घर गृहस्‍थी के मामले , वृश्चिक लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यक्तित्‍व , प्रभाव , कई प्रकार के झंझट , धनु लग्‍नवाले अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , खर्च और बाहरी संदर्भ , मकर लग्‍न वाले माता पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति और लाभ , कुंभ लग्‍न वाले भाई , बहन , बंधु , बांधव , पिता पक्ष , कार्यक्षेत्र और सामाजिक मामलों तथा मीन लग्‍नवाले भाग्‍य , धन , कोष की स्थिति को लेकर चिंतन शुरू करेंगे।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से मंगल युवा वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करता है , इसलिए 24 से 30 वर्ष की उम्र के युवाओं पर इसका सर्वाधिक प्रभाव होता है। इसलिए इन छह महीनों के अंदर इनकी स्थिति में परिवर्तन देखने को मिलेंगे , नौकरी में ट्रांसफर , प्रोमोशन और वैवाहिक मामलों में इनकी व्‍यस्‍तता बन सकती है। खासकर 1981 , 1983, 1985 और 1987 , 1988 के अंत अंत में और मीन राशि में जन्‍म लेनेवाले युवा यहां बडी सफलता की उम्‍मीद रख सकते हैं। अधिकांश लोग खासकर जिनका मंगल मजबूत है और जिन्‍होने युवावस्‍था का समय आनंद में व्‍यतीत किया या कर रहे हैं  , का 1 नवंबर 2011 से ही शुरू होनेवाला संबंधित विषयों पर चिंतन 2 दिसंबर 2011 को आसमान में सूर्य और मंगल की खास स्थिति बनने के बाद गंभीर होता जाएगा और लगभग दो महीने तक इस दिशा में अपने कार्यक्रम और कार्यवाही शुरू कर देंगे।  25 जनवरी 2012 के आसपास किसी बाधा के उपस्थित होने के कारण कार्यक्रम कुछ मंद पडेगा और 4 मार्च तक काम आगे नहीं बढ पाएगा,उसके बाद कुछ सुधार की गुंजाइश है। 14 अप्रैल 2012 के आपास अपने उसी रूप में या रूप बदलकर कार्य रु्तार पकडेगा और 8 जून 2012 के आसपास एक निर्णायक मोड पर आ जाएगा। उपरोक्‍त समयांतराल में जन्‍म लेने वाले अधिकांश लोग इस निर्णय से खुश रहेंगे ।

लेकिन यदि 2 मार्च से 3 मई 1982 , 17 अप्रैल से 11 जून 1984 या 20 जून से 3 अगस्‍त 1986 तक या मकर राशि में जन्‍म लेनेवाले युवाओं की बात की जाए , तो मंगल की इस खास स्थिति में इनकी परिस्थितियां बहुत गडबड रहेगी, वैसे तो 24 वर्ष की उम्र से ही ये कठिनाई के दौर से गुजर रहे हैं , इस वर्ष  1 नवंबर से ही इनके सम्‍मुख अनिश्चितता की स्थिति बन गयी होगी । बाकी लोगों में भी खासकर जिनका मंगल कमजोर है और जिन्‍होने युवावस्‍था का समय कठिनाई में व्‍यतीत किया या कर रहे हैं  , का 1 नवंबर से ही शुरू होनेवाले माहौल की गडबडी 2 दिसंबर को आसमान में सूर्य और मंगल की खास स्थिति बनने के बाद गंभीर होती जाएगी और निराशाजनक परिस्थितियों में लगभग दो महीने तक इसे सुधारने की कार्यवाही शुरू कर देंगे।  पर 25 जनवरी तक जो भी आशा बनी होगी , वो टूट जाएगा और उनके समक्ष 4 मार्च तक किंकर्तब्‍यविमूढावस्‍था की स्थिति बनी रहेगी। उसके बाद पुन: किसी आशा पर काम किया जा सकता है , 14 अप्रैल 2012 के बाद एक बार पुन: निराशाजनक परिस्थितियों में कार्यारंभ होगा और 8 जून तक पुन: तनाव देने वाला परिणाम सामने आएगा। कोशिश बेकार महसूस होगी , पर 21 जून 2012 के बाद मंगल के सिंह राशि से निकलते ही इस कार्यक्रम का पटाक्षेप हो जाएगा और कार्याधिक्‍य के दबाब से प्रभावित लोग राहत की सांस लेंगे। 

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

आज से ढाई वर्षों तक तुला राशि में बने रहेंगे शनिदेव ... कैसा रहेगा इनका आप पर प्रभाव ????


वैसे तो ज्‍योतिष के अनुसार अपने जन्‍मकालीन ग्रहों के हिसाब से ही लोग जीवन में सुख या दुख प्राप्‍त कर पाते हैं , पर उस सुख या दुख को अनुभव करने में देर सबेर करने की भूमिका गोचर के ग्रहों यानि आसमान में समय समय पर बन रही ग्रहों की स्थिति की भी होती हैं। आज यानि 15 नवंबर 2011 को शनि ग्रह की स्थिति तुला राशि में बनने जा रही है , जिसका इंतजार काफी दिनों से बहुत लोगों द्वारा किया जा रहा था। तुला राशि में शनि ग्रह की स्थिति 2 नवंबर 2014 तक बनी रहेगी। लगभग सभी ज्‍योतिषियों का मानना है कि इससे पूर्व 10 सितंबर 2009 से कन्‍या राशि में शनि ग्रह की उपस्थिति से लोगों के शनि के भाव से संबंधित कार्य में विलंब हो रहा था। खासकर कुंभ राशि से संबंधित कार्य तो बिल्‍कुल ही आगे नहीं बढ पा रहे थे। जिनका जन्‍मकालीन शनि मजबूत है , उन्‍हें कुछ राहत भी थी , पर जिनका जन्‍मकालीन शनि कमजोर था , उनकी स्थिति अधिक शोचनीय बनी हुई थी।

उनमें मेष लग्‍नवाले सामाजिक , राजनीतिक माहौल , कैरियर और अपने लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में बाधा , वृष लग्‍नवाले भाग्‍य की कमजोरी , सामाजिक राजनीतिक माहौल की गडबडी , मिथुन लग्‍नवाले जीवनशैली और भाग्‍य में बाधा , कर्क लग्‍नवाले वैवाहिक संदर्भों और जीवनशैली की कठिनाई , सिंह लग्‍नवाले वैवाहिक संदर्भों और रोग , ऋण या शत्रु जैसे झंझटों , कन्‍या लग्‍नवाले अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई या अन्‍य झंझट , तुला लग्‍नवाले अपने स्‍थायित्‍व की कमजोरी या किसी प्रकार की संपत्ति को प्राप्‍त करने में बाधा , संतान पक्ष के माहौल की कमजोरी , वृश्चिक लग्‍नवाले भाई बहन बंधु बांधव  से विचारों के तालमेल का अभाव या अन्‍य कठिनाई या स्‍थायित्‍व की कमजोरी , धनु लग्‍नवाले आर्थिक पारिवारिक कमजोरी या भाई , बहन , बंधु बांधव , सहयोगी की कमी , मकर लग्‍नवाले शारीरिक , आर्थिक ,  पारिवारिक कमजोरी , कुंभ लग्‍नवाले शारीरिक मामलों , खर्च या बाहरी संदर्भों की कमजोरी तथा मीन लग्‍नवाले लाभ और खचर् के मामलों की कमजोरी झेलने को बाध्‍य रहें।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' तो गोचर के शनि को तब से कमजोर मानता आ रहा है , जब से इसकी स्थिति सिंह राशि में बनी है , यानि 16 जुलाई 2007 से। उस वक्‍त से ही विभिन्‍न लग्‍नवालों के शनि से संबंधित भावों के सुख में कुछ रूकावट उपस्थित होती जा रही है। 16 जुलाई 2007 से 10 सितंबर 2009 तक मकर राशि से संबंधित तथा 10 सितंबर 2009 से 14 नवंबर 2011 तक कुंभ राशि से संबंधित कार्य अच्‍छी तरह संपन्‍न नहीं हो सके। तुला राशि का शनि आम जन के लिए काफी राहत देने वाला तो होगा , पर कुछ की परेशानी अभी भी बनी रहेगी।खासकर जब शनि ग्रह की क्रियाशीलता बढ जाएगी , लगभग जनवरी 2012 से जुलाई 2012 के मध्‍य अधिकांश लोगों को सामान्‍य शुभ , तो कुछ को विशेष शुभ तो कुछ को अशुभ फल से भी संयुक्‍त करेगा। 16 जनवरी 2012 को शनि ग्रह की सूर्य से एक खास कोणिक दूरी और पृथ्वी से खास स्थिति बनेगी। 'गत्यात्मक ज्योतिष' के अनुसार इस दिन से 8 फरवरी 2012 तक शनि ग्रह की स्थैतिक उर्जा में दिन प्रतिदिन वृद्धि होती चली जाएगी। इस कारण 16 जनवरी से 8 फरवरी 2012  तक शनि ग्रह की यह स्थिति जनसामान्य के सम्मुख विभिन्न प्रकार के कार्य उपस्थित करेगी। इस एक महीने में लोग शनि के कारण उत्पन्न होनेवाले सुखद या कष्‍टकर कार्य में उलझे रहेंगे।

जिनलोगों के लिए यह व्यस्तता सुख प्रदान करनेवाली होगी , वे उत्साहित होकर कार्य में जुटे रहेंगे। एक महीने तक कार्य अच्छी तरह होने के पश्चात 8 फरवरी 2012 के आसपास कुछ व्यवधान के उपस्थित होने से उनके कार्य की गति कुछ धीमी पड़ जाएगी। 16 अप्रैल 2012 तक काम लगभग रुका हुआ सा महसूस होगा। 25 जून के बाद स्थगित कार्य पुनः उसी रुप में या बदले हुए रुप में उपस्थित होकर पुनः गतिमान होगा और 26 जुलाई 2012 तक अपने निर्णयात्मक मोड़ पर पहुंच जाएगा। शनि के कारण होनेवाले इस निर्णय से भी इन लोगों को खुशी होगी। ऐसा निम्न लोगों के साथ होगा---

1, वे वृद्ध , जिनका जन्‍म 1933 से 1940 के जनवरी से अप्रैल के मध्‍य हुआ हो , इनका जन्‍मकालीन शनि मजबूत है और इसके कारण 72 वर्ष की उम्र के बाद मकर और कुंभ राशि से संबंधित संदर्भों में सुखी हैं।
2, जिनका जन्म जुलाई 1940 से जुलाई 1942 , जून 1969 से जून 1972 , मई 1999 से जून 2001 के मध्‍य हुआ हो।
3, खासकर जिनका जन्म मई और जून , खासकर उपरोक्‍त समयांतराल में मई और जून महीनों में हुआ हो।
4, खासकर जिनका जन्म वृष या तुला राशि के अंतर्गत हुआ हो।

किन्तु शनि की 20 जनवरी से 8 फरवरी 2012 की उपरोक्‍त उल्लिखित विशेष स्थिति से कुछ लोगों को कष्ट या तकलीफ भी होगी। वे निराशाजनक वातावरण में कार्य करने को बाध्य होंगे। एक  महीने के पश्चात 8 फरवरी 2012 के आसपास कार्य के असफल होने से भी उन्हें तनाव का सामना करना पडे़गा। 16 अप्रैल तक बिल्‍कुल किंकर्तब्‍यविमूढावस्‍था में गुजारने के बाद 25 जून 2012 को पुनः निराशाजनक वातावरण में वे कार्य को आगे बढ़ाएंगे, कार्य उसी रुप में या बदले हुए रुप में गतिमान होकर 16 जुलाई तक अपने निर्णयात्मक मोड़ पर पहुंच जाएगा। शनि के कारण होनेवाले इस निर्णय से भी इनलोगों को कष्ट पहुंचेगा। ऐसा निम्न लोगों के साथ होगा ----

1, वे वृद्ध ,जिनका जन्म 1933 या 1934 के जुलाई या अगस्‍त में , 1935 या 1936 के अगस्‍त या सितंबर में , 1937 या 1938 के सितंबर या अक्‍तूबर में , 1939 या 1940 के अक्‍तूबर या नवंबर महीने में हुआ हो ।इनका जन्‍मकालीन शनि कमजोर है , जिसके कारण 72 वर्ष की उम्र के बाद ही ये मकर और कुंभ राशि से संबंधित मामलों का कष्‍ट झेल रहे हें।
2,  जिनका जन्म मई 1935 से मार्च 1938 , मार्च 1965 से फरवरी 1968 तथा अप्रैल 1994 से फरवरी 1997 तक हुआ हो ।
3, खासकर जिनका जन्म मार्च अप्रैल में , खासकर उपरोक्‍त समयांतराल के मार्च अप्रैल में हुआ हो ।
4, जिनका जन्म मीन राशि के अंतर्गत हुआ हो।

उपरोक्त समयांतराल में शनि के कारण लोग भिन्न-भिन्न संदर्भों की खुशी या कष्ट प्राप्त करेंगे। संदर्भ लग्नानुसार निम्न होंगे---
1, मेष लग्नवाले-पिता ,समाज , पद ,प्रतिष्ठा , राजनीति , प्रेम प्रसंग , घरेलू माहौल
2, वृष लग्नवाले-भाग्य , संयोग , पिता ,समाज , पद ,प्रतिष्ठा , राजनीति , प्रभाव , किसी प्रकार का झंझट
3, मिथुन लग्नवाले-भाग्य , संयोग , जीवनशैली , रुटीन , बुद्धि , ज्ञान , संतान
4, कर्क लग्नवाले-जीवनशैली , रुटीन , पति पत्नी , स्‍थायित्‍व , वाहन या किसी प्रकार की संपत्ति
5, सिंह लग्नवाले-पति पत्नी , घर गृहस्थी ,दाम्पत्य , हर प्रकार के झंझट , प्रभाव , भाई बहन , बंधु बांधव
6, कन्या लग्नवाले-बुद्धि ,ज्ञान ,संतान ,रोग ,ऋण ,शत्रु जैसे झंझट , प्रभाव , धन , कोष
7, तुला लग्नवाले-माता ,हर प्रकार की संपत्ति ,वाहन ,स्थयित्व , शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास
8, वृश्चिक लग्नवाले- माता ,हर प्रकार की संपत्ति ,वाहन ,स्थयित्व , खर्च , बाह्य संदर्भ
9, धनु लग्नवाले- भाई ,बहन , बंधु-बांधव ,सहयोगी ,धन ,कोष , कुटुम्ब , परिवार , लाभ , ल्‍क्ष्‍य
10, मकर लग्नवाले-धन ,कोष , कुटुम्ब , परिवार , शरीर  ,व्यक्तिव , आत्मविश्वास , कैरियर , सामाजिक राजनीतिक वातावरण
11, कुंभ लग्नवाले-शरीर  ,व्यक्तिव , आत्मविश्वास ,खर्च ,बाहरी संबंध , भाग्‍य
12, मीन लग्नवाले- खर्च ,बाहरी संबंध ,हर प्रकार का लाभ , मंजिल , रूटीन , जीवनशैली

इस तरह शनि की प्रभावी स्थिति 16 जनवरी से 27 जुलाई 2012 तक बनीं रहेगी । शनि के प्रभाव की महत्वपूर्ण तिथियां होंगी---
16, 17, 18 , 23 , 24 , 25 , 26 , 27 जनवरी , 12 , 13 , 14 , 19 , 20 , 21 , 22 , 23 फरवरी , 11 , 12 , 17 , 18 , 19 , 20 , 21 मार्च , 7 , 8 , 9 , 13 , 14 , 15 , 16 , 17 , 18 अप्रैल  , 5 , 6 , 11 , 12 , 13 , 14 , 15 मई , 1 , 2 , 3 , 7 , 8 , 9 , 10 , 11 27 , 28 , 29 , 30  जून , 5 , 6 , 7 , 8 , 24 , 25 , 26 , 27 जुलाई 2012।

जिनका जन्म उपरोक्‍त समय-अंतराल से भिन्न समय पर हुआ हो, या जिन्हें अपने जन्मसमय की जानकारी नहीं हो, वे उपरोक्त महत्वपूर्ण तिथियों में घटी घटनाओं या अपनी मनःस्थिति के आधार पर शनि के गोचर की स्थिति के अपने उपर पड़नेवाले अच्छे या बुरे प्रभाव का मूल्यांकण कर सकते हैं। आनेवाले लेखों में अन्‍य ग्रहों की गेाचर की स्थिति और उसके प्रभाव की चर्चा की जाएगी।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

ग्रहीय स्थिति के हिसाब से 11-11-11 जादुई आंकडें का दिन नहीं !!

इंतजार की घडी बहुत निकट आ गयी है , 11-11-11 के जादुई आंकडें के दिन में मात्र चार दिन बच गए हैं। जैसे जैसे यह निकट आ रहा है , वैसे वैसे शुभ काम शुरू करने की प्रतीक्षा में युवाओं के दिल की धडकने तेज हो गयी है। कुछ विवाह के लिए तो कई परिवार नन्हे मेहमान के इंतजार में बैठे है। वे चाहते हैं कि बच्चा सदी की खास तारीख 11-11-11 को ही इस दुनिया में आए। यहां तक कि ऐश्वर्या राय ने भी इसी दिन मां बनने का निश्‍चय किया है। अंक ज्‍योतिषियों की मानें , छह 1 यनि ट्रिपल इलेवन के आने से ही यह दिन महत्‍वपूर्ण बन गया है। इस दिन लडका हुआ तो राजयोग में जन्‍म लेगा , धनवान , ईमानदार, ऊर्जावान , कुशल नेतृत्वकर्ता , पुरुषार्थी होगा , जबकि बेटी हुई तो शक्ति का अवतार और धर्मपरायण होगी , उसे संगीत से लगाव होगा तथा वह लेखनी में निपुण होगी। इस खास तारीख का महत्‍व अंक विशेषज्ञों ने ऐसा बना डाला है कि लोग इस दिन सिजेरियन के लिए भी तैयार हैं ,  दस दिन पूर्व और पश्‍चात् जन्‍म लेने वाले बच्‍चे भी इसी दिन जन्‍म लेने को विवश हैं। कइयों के मां बाप ने तो अस्‍पतालों में एडवांस बुकिंग भी करा ली है और इस दिन की प्रसूति के लिए विशेषज्ञ डॉक्‍टरों की देख रेख में गर्भवती महिलाओं को रखा गया है।

पर ज्‍योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो इस दिन ग्रहों की स्थिति की ऐसी कोई खासियत नहीं दिखाई देती , जिसका प्रभाव जन्‍म लेने वाले बच्‍चे पर असाधारण ढंग से पडे। यह दिन पूर्णिमा का है , इसलिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के हिसाब से चंद्रमा पूरी ताकत में होगा , इस कारण बच्‍चे के बचपन के स्‍वच्‍छंद मनोवैज्ञानिक विकास में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। मंगल की राशि में पूर्ण चंद्र मंगल से संबंधित पक्षों को भी मजबूत बन सकता है। पर इसके साथ का वक्री बृहस्‍पति बच्‍चे को किसी न किसी मुद्दे को लेकर संवेदनशील बनाएगा , जिसका प्रभाव भी उसके विकास पर पडेगा। इस जातक की चंद्र कुंडली में दो दो ग्रहों बुध और शुक्र की आठवें भाव में स्थिति बनेगी , जिसके कारण जीवन के तीन चार पक्ष मनोनुकूल नहीं बने रहने से जीवन में बाधाएं आती रहेंगी। यही नहीं , इन ग्रहों के प्रभाव से बचपन में ही छह वर्ष की उम्र के बाद ही पारिवारिक मामलों में कई तरह की बाधाएं देखने को मिलेगी। चंद्रमा के बाद एक शनि की ग्रह स्थिति ही कुछ मनोनुकूल बनकर जातक को कभी कभी अपने संदर्भों में राहत दे सकती है , पर जिस प्रकार के असाधारण बच्‍चों की बात अंक विशेषज्ञ कर रहे हैं , वैसा तो गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के हिसाब से हमें नहीं दिखाई देता।
 

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

इस वर्ष जल्‍द ही पडने लगेगी ठंड .....

कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि को झेलना भारतवर्ष की मजबूरी रही है। इसी वर्ष जुलाई से सितंबर तक होनेवाले लगातार बारिश से देश के विभिन्‍न भागों में लोग परेशान रहें। जहां गांव के कृषकों को खेत की अधिकांश फसलों का नुकसान झेलना पडा , वहीं शहरों के लोगों का भी जनजीवन बारिश के कारण अस्‍त व्‍यस्‍त रहा। एक महीने से बारिश थमी है , जिससे लगभग हर क्षेत्र में साफ सफाई हो चुकी है और लोग सुहावने मौसम का तथा सारे त्‍यौहारों का आनंद एक साथ ले पा रहे हैं। बारिश से बच गए फसल खलिहान में आ चुके हैं और उन्‍हें देखकर ही किसानों को संतुष्टि बनी हुई है। हाल के वर्षों में ठंड देर से यानि मध्‍य दिसंबर में ही पड रही है और इस कारण त्‍यौहारों की समाप्ति के बाद लोग निश्चिंत हैं।

पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मानें तो इस वर्ष ठंड बहुत जल्‍द शुरू हो सकती है। 9 नवंबर से ही ग्रहीय स्थिति कुछ इस तरह की बनेगी कि मौसम में बडा परिवर्तन देखने को मिलेगा। ठंड बढाने वाले हर कारकों के इस दिन क्रियाशील होने से मौसम में बडा परिवर्तन देखने को मिलेगा। पहाडी क्षेत्रों में बर्फ पड सकती है , मैदानी भागों में बारिश , ओले तथा तटीय प्रदेशों में तूफान .. इसके कारण भारतवर्ष के अधिकांश भागों का मौसम बिगड जाएगा और ठंड बढ जाएगी। ठंड की शुरूआत यहीं से हो जाने के बावजूद दो चार दिनों के बाद मौसम कुछ सामान्‍य दिखता है , पर पुन: एकबार 25 नवंबर से वातावरण का तापमान कम होना आरंभ होगा और दिसंबर का पहला सप्‍ताह इस वर्ष के सर्वाधिक ठंडे दिनों में से एक होगा। यही नहीं , इस समय चिडचिडाने वाली बारिश की भी संभावना है। इसी समय किसानों की खरीफ की फसल खलिहानों में रहती है , हल्की सी बरसात उसकी गुणवत्ता बिगाड सकती है, अधिक होने से तो अनाज के सडने का ही भय है। मौसम के इस रवैये से उन्‍हें अच्‍छा नुकसान झेलने को बाध्‍य होना पड सकता है।

8 दिसंबर तक की कडकडाती ठंड को झेलने के बाद आमजन को ठंड से थोडी राहत मिलनी आरंभ होगी। पर समस्‍या के समाप्‍त होने की उम्‍मीद नहीं दिखती। 27 दिसंबर के आसपास पुन: मौसम को खराब बनाने के सभी कारक काम करना आरंभ करेंगे , जैसे तेज हवाओं का चलना , बादलों का बनना , आंधी और बारिश का होना , बर्फ गिरना आदि , जिससे लगभग पूरे देश का तापमान कम होगा और लोगों को दो चार दिन ठंड झेलने को मजबूर होना पडेगा। पर जैसे ठंड की शुरूआत जल्‍द होगी , वैसे ही इसका अंत भी जल्‍द आएगा और जनवरी से ही मौसम काफी अच्‍छा हो जाएगा। 10 जनवरी के आसपास से ही पुन: मौसम के सुहावने हो जाने से लोगों को राहत मिलनी आरंभ हो जाएगी। उसके बाद का मौसम सामान्‍य तौर का होगा। यानि कि इस वर्ष पिकनिक मनाने के भरपूर अवसर मिलेंगे।


बुधवार, 2 नवंबर 2011

कम से कम 6 नवंबर तक शेयर बाजार कमजोर बना रहेगा ....

अभी पिछले सप्‍ताह की ही तो बात है , जब घरेलू शेयर बाजार में दीवाली का जश्न रहा और प्रमुख शेयर सूचकांकों ने लम्बी छलांग लगाई। वैश्विक सकारात्‍मक माहौल को देखते हुए बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स लगभग 18,000 अंक के स्तर तक पहुंच गया था। विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि, ‘यूरोपीय नेताओं की ऋण संकट से निपटने की योजना और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बेहतर वृद्धि दर के आंकड़ों से बाजार में तेजी आई है। यही नहीं , उन्‍होने तेजी का माहौल अगले सप्ताह भी जारी रहने की संभावना जतायी। निवेशकों ने रिजर्व बैंक की ओर से ब्याज दरों में की गयी बढ़ोतरी को नजरअंदाज करते हुए बाजार में जम कर खरीदारी की , हालांकि यह बात अलग है कि बाजार पिछले साल की दिवाली के २१ हजार अंक के स्तर के आसपास भी नहीं पहुंच सके।

पर दूसरे ही सप्‍ताह में मुनाफावसूली और यूरोपीय ऋण संकट की चिंता में कमजोर वैश्विक संकेतों से बंबई शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला आज लगातार दूसरे दिन जारी रहा और सेंसेक्स और निफ्टी में अच्‍छी खासी गिरावट आयी। पिछले सप्ताह की तेजी के बाद यूरो क्षेत्र को लेकर अनिश्चितता की वजह से निवेशकों ने मुनाफावसूली की। बैंकिंग शेयरों में भी गिरावट रही। निवेशकों को चिंता है कि ब्याज दरों में वृद्धि से बैंकों का मुनाफा प्रभावित होगा। अभी भी यूरोपीय और एशियाई बाजारों की स्थिति अच्‍छी नहीं दिखाई दे रही है , जिसका असर आज के बाजार में पडने की पूरी संभावना है।


'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के नियमों की मानें , तो अभी आनेवाले कुछ दिनों में बाजार में सुधार के कोई संकेत नहीं दिखते हैं। 2 और 3 नवंबर को भी बाजार काफी कमजोर दिखेगा ,सिर्फ विदेशी बाजारों के कारण ही नहीं , खासकर ऑयल और गैस सेक्‍टर में किसी विवादास्‍पद मुद्दे के उपस्थित हो जाने से भी बाजार पर ऋणात्‍मक प्रभाव पड सकता है। उसके बाद भी अर्थव्‍यवस्‍थ को प्रभावित करनेवाले अन्‍य कारकों के कमजोर होने के कारण कम से कम 6 नवंबर तक बाजार कमजोर दिखाई पड सकता है। वैसे इसके तुरंत बाद भी बाजार में बडे सुधार की गुंजाइश नहीं दिखती है , पर सामान्‍य तौर से बाजार की स्थिति कुछ मजबूत हो जाएगी।

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

हैकरों के लिए ऐसे पासवर्डों का तोड निकालना कुछ कठिन होता है !!

इस वर्ष नवरात्र में दस बारह दिनों के लिए गांव चली गयी , चूंकि गांव में मेरे पास कंप्‍यूटर और इंटरनेट की सुविधा नहीं थी , इसलिए इतने दिनों तक अपने जीमेल को लॉगिन भी नहीं कर सकी। आने के बाद जैसे ही काम करना शुरू किया , एलर्ट आने शुरू हुए। मेरा अकाउंट 8 अक्‍तूबर को किसी दूसरे देश से खोला गया था। राहत की बात थी कि किसी को मेल वगैरह नहीं किया गया था। मैने झट से पासवर्ड बदला , पर बदलने के बाद भी मुझे कोई राहत नहीं मिली। 11 अक्‍तूबर को ब्राजील और 13 अक्‍तूबर को टर्की से पुन: इस अकाउंट को खोले जाने की सूचना मिली। इसके बाद मैने अपने पासवर्ड को बहुत मजबूत बनाया , उसमें कैपिटल , स्‍माल अक्षरों और अंकों के साथ संकेत चिन्‍हों का भी प्रयोग किया , यानि कि वैसा ही मजबूत पासवर्ड रखा , जैसा इंटरनेट बैंकिंग में रखने की सलाह दी जाती है ..


पासवर्ड को बदलने के बाद इतने दिन गुजर चुके हैं , अभी तक पुन: ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है । शायद हैकरों के लिए ऐसे पासवर्डों का तोड निकालना शायद कुछ कठिन होता हो या फिर उन्‍हें अब मेरे अकाउंट को खोलने की आवश्‍यकता नहीं हो रही हो , पर मुझे तो राहत मिल गयी है। हालांकि ऐसे पासवर्डों को याद रखना लोगों के लिए भी कठिन होता है , पर मेरी सलाह है कि  इंटरनेट का अच्‍छी तरह उपयोग करनेवालों को ऐसी सावधानी बरतनी ही चाहिए , उन्‍हें ऐसे ही पासवर्ड रखने चाहिए , क्‍यूंकि अकाउंट का दुरूपयोग किए जाने के बाद कोई चारा नहीं होता।

शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

चलिए आज के लिए भारतीय क्रिकेट टीम को जीत की शुभकामनाएं दे दें !!

23 अक्‍तूबर को ईडन गार्डन्स पर खेले गए पांचवें और अंतिम वनडे अंतरराष्ट्रीय मैच में भारतीय क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड को 95 रन से हराकर सीरीज 5-0 से जीत ली और क्लीन स्वीप करके क्रिकेट प्रेमियों को दिवाली का शानदार तोहफा दिया। इस जीत से भारतीय टीम ने हाल में इंग्लैंड दौरे पर टेस्ट, वनडे और टी-20 में मिली हार का बदला भी चुकता कर दिया।

भारत की इस जीत के नायक रहे मैन ऑफ द सीरीज कप्तान महेंद्र सिंह धौनी और मैन ऑफ द मैच रविंदर जडेजा तथा आर. अश्विन। धौनी ने पहले नाबाद 75 रन की जांबाज पारी खेलकर टीम का स्कोर आठ विकेट पर 271 रन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उसके बाद जडेजा ने 33 रन देकर चार विकेट और आर अश्विन ने 28 रन देकर तीन विकेट झटके जिससे भारत ने इंग्लैंड को अच्छी शुरुआत का फायदा नहीं उठाने दिया और उसकी पूरी टीम 37 ओवर में 176 रन पर ढेर कर दी। इस मैच में शुरूआती दबाब के बाद भारत के जीत की भविष्‍यवाणी मैने इस पोस्‍ट में कर दी थी।

अब 29 अक्‍तूबर 2011 को भारतीय समयानुसार 8 बजे रात्रि ईडेन गार्डेन कोलकाता में इंगलैंड और भारत के मध्‍य अंतिम मैच एकमात्र ट्वेन्‍टी ट्वेन्‍टी खेला जाना है। यह दिन भी भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए खुशी का होगा , क्‍यूंकि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से इस दिन की भी ग्रहों की ग्रहस्थिति भारत के पक्ष में है। कभी एकाध घंटे के लिए इंगलैंड भले ही अच्‍छा खेल ले , पर शुरू से अंत तक मैच लगभग भारतीय क्रिकेट टीम के ही पक्ष में रहेगा और काफी हद तक जीत की संभावना भी भारतीय टीम की ही होगी। चलिए एक बार फिर से भारतीय क्रिकेट टीम को जीत की शुभकामनाएं दे दें !!

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

भला बिना बच्‍चों के कैसी दीपावली ??

वैसे तो पूरी दुनिया में हर देश और समाज में कोई न कोई त्‍यौहार मनाए जाते हैं , पर भारतीय संस्‍कृति की बात ही अलग है। हर महीने एक दो पर्व मनते ही रहते हैं , कुछ आंचलिक होते हैं तो कुछ पूरे देश में मनाए जानेवाले। दीपावली , ईद और क्रिसमस पूरे विश्‍व में मनाए जाने वाले तीन महत्‍वपूर्ण त्‍यौहार हैं , जो अलग अलग धर्मों के लोग मनाते हैं। भारतवर्ष में पूरे देश में मनाए जानेवाले त्‍यौहारों में होली , दशहरा , दीपावली जैसे कई त्‍यौहार हैं। त्‍यौहार मनाने के क्रम में लगभग सभी परिवारों में पति खर्च से परेशान होता है , पत्‍नी व्रत पूजन , साफ सफाई और पकवान बनाने के अपने बढे हुए काम से , पर बच्‍चों के लिए तो त्‍यौहार मनोरंजन का एक बडा साधन होता है। स्‍कूलों में छुट्टियां है , पापा के साथ घूमघूमकर खरीदारी करने का और मम्‍मी से मनपसंद पकवान बनवाकर खाने की छूट है , तो मस्‍ती ही मस्‍ती है। मम्‍मी और पापा की तो बच्‍चों की खुशी में ही खुशी है। सच कहं , तो बच्‍चों के बिना कैसा त्‍यौहार ??

पर आज सभी छोटे छोटे शहरों के मां पापा बिना बच्‍चों के त्‍यौहार मनाने को मजबूर हैं। चाहे होली हो , दशहरा हो या दीपावली , किसी के बच्‍चे उनके साथ नहीं। इस प्रतियोगिता वाले दौर में न तो पढाई छोटे शहरों में हो सकती है और न ही नौकरी। दसवीं पास करते ही अनुभवहीन बच्‍चों को दूर शहरों में भेजना अभिभावकों की मजबूरी होती है , वहीं से पढाई लिखाई कर आगे बढते हुए कैरियर के चक्‍कर में वो ऐसे फंसते हैं कि पर्व त्‍यौहारों में दो चार दिन की छुट्टियों की व्‍यवस्‍था भी नहीं कर पाते। मैं भी पिछले वर्ष से हर त्‍यौहार बच्‍चों के बिना ही मनाती आ रही हूं। दशहरे में गांव चली गयी , भांजे भांजियों को बुलवा लिया , नई जगह मन कुछ बहला। पर दीपावली में अपने घर में रहने की मजबूरी थी , लक्ष्‍मी जी का स्‍वागत तो करना ही पडेगा। पर बच्‍चों के न रहने से भला कोई त्‍यौहार त्‍यौहार जैसा लग सकता है ??

पहले संयुक्‍त परिवार हुआ करते थे , तीन तीन पीढियों के पच्‍चीस पचास लोगों का परिवार , असली त्‍यौहार मनाए जाते थे। कई पीढियों की बातें तो छोड ही दी जाए , अब तो त्‍यौहारों में पति पत्‍नी और बच्‍चों तक का साथ रह पाना दूभर होता है। जबतक बच्‍चों की स्‍कूली पढाई चलती है , त्‍यौहारों में पति की अनुपस्थिति बनी रहती है , क्‍यूंकि बच्‍चों की पढाई में कोई बाधा न डालने के चक्‍कर में वे परिवार को एक स्‍थान पर शिफ्ट कर देते हैं और खुद तबादले की मार खाते हुए इधर उधर चक्‍कर लगाते रहते हैं। हमारे मुहल्‍ले के अधिकांश परिवारों में किराए में रहनेवाली सभी महिलाएं बच्‍चों की पढाई के कारण अपने अपने पतियों से अलग थी। पर्व त्‍यौहारों में भी उनका सम्मिलित होना कठिन होता था , किसी के पति कुछ घंटों के लिए , तो किसी के दिनभर के लिए समय निकालकर आ जाते। मैने खुद ये सब झेला है , भला त्‍यौहार अकेले मनाया जाता है ??

बच्‍चों की शिक्षा जैसी मौलिक आवश्‍यकता के लिए भी सरकार के पास कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। पहले समाज के सबसे विद्वान लोग शिंक्षक हुआ करते थे , सरकारी स्‍कूलों की मजबूत स्थिति ने कितने छात्रों को डॉक्‍टर और इंजीनियर बना दिया था। पर समय के साथ विद्वान दूसरे क्षेत्रों में जाते रहें और शिक्षकों का स्‍तर गिरता चला गया। शिक्षकों के हिस्‍से इतने सरकारी काम भी आ गए कि सरकारी स्‍कूलों में बच्‍चों की पढाई पीछे होती गयी।सरकार ने कर्मचारियों के बच्‍चों के पढने के लिए केन्‍द्रीय स्‍कूल भी खोलें , उनमें शिक्षकों का मानसिक स्‍तर का भी ध्‍यान रखा , पर अधिकांश क्षेत्रों में खासकर छोटी छोटी जगहों के स्‍कूल पढाई की कम राजनीति की जगह अधिक बनें।  इसका फायदा उठाते हुए प्राइवेट स्‍कूल खुलने लगे और मजबूरी में अभिभावकों ने बच्‍चों को इसमें पढाना उचित समझा। आज अच्‍छे स्‍कूल और अच्‍छे कॉलेजों की लालच में बच्‍चों को अपनी उम्र से अधिक जबाबदेही देते हुए हम दूर भेज देते हैं। अब नौकरी या व्‍यवसाय के कारण कहीं और जाने की जरूरत हुई तो पूरे परिवार को ले जाना मुनासिब नहीं था। इस कारण परिवार में सबके अलग अलग रहने की मजबूरी बनी रहती है।

वास्‍तव में अध्‍ययन के लिए कम उम्र के बच्‍चों का माता पिता से इतनी दूर रहना उनके सर्वांगीन विकास में बाधक है , क्‍यूंकि आज के गुरू भी व्‍यावसायिक गुरू हैं , जिनका छात्रों के भविष्‍य या चरित्र निर्माण से कोई लेना देना नहीं। इसलिए उन्‍हें अपने घर के आसपास ही अध्‍ययन मनन की सुविधा मिलनी चाहिए।  यह सब इतना आसान तो नहीं , बहुत समय लग सकता है , पर पारिवारिक सुद्ढ माहौल के लिए यह सब बहुत आवश्‍यक है। इसलिए आनेवाले दिनों में सरकार को इस विषय पर सोंचना चाहिए।  मैं उस दिन का इंतजार कर रही हूं , जब सरकार ऐसी व्‍यवस्‍था करे , जब प्राइमरी विद्यालय में पढने के लिए बच्‍चे को अपने मुहल्‍ले से अधिक दूर , उच्‍च विद्यालय में पढने के लिए अपने गांव से अधिक दूर , कॉलेज में पढने या कैरियर बनाने के लिए अपने जिले से अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं पडेगी। तभी पूरा परिवार साथ साथ रह पाएगा और आनेवाले दिनों में पर्व त्‍यौहारों पर हम मांओं के चेहरे पर खुशी आ सकती है , भला बिना बच्‍चों के कैसी दीपावली ??

आप सबकी .. आपके परिवार की और आपके मित्रों की दीपावली मंगलमय हो !!!!!! .. संगीता पुरी




मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

भारतीय टीम के लिए मैच का शुरूआती एक घंटा बहुत बुरा होगा !!!!!

ज्‍योतिष विज्ञान है या अंधविश्‍वास , बुद्धिजीवियों द्वारा तय न किए जाने से आम लोगों की स्थिति बहुत ही कष्‍टमय हो गयी है। पर पूरा जीवन ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव के अवलोकण के पश्‍चात् मैं इतना तो निशिचत तौर पर कह सकती हूं कि ग्रहों का प्रभाव हर क्षेत्र पर पडता है। अपने अनुभव के आधार पर ब्‍लॉग पर मैं समय समय पर मौसम , शेयर बाजार और क्रिकेट से संबंधित भविष्‍यवाणियां करती आ रही हूं। हां , यह बात अवश्‍य है कि इस प्रकार की गणनाओं में पूरे ध्‍यानसंकेन्‍द्रण की आवश्‍यकता होती है , क्‍यूंकि थोडी भी चूक से और एकाध ग्रहों पर ध्‍यान न दे पाने से चूक होने की संभावना बनी रहती है। और वैसी चूक होने पर मुझे व्‍यंग्‍यवाण झेलने पडते हैं। इसलिए अब पूरी निश्चिंति के बाद ही किसी तरह की भविष्‍यवाणी करने का प्रयास करती हूं। सबसे बडी बात है कि ग्रहीय आधार पर किए गए मैच के मेरे विश्‍लेषण में सिर्फ हार और जीत की चर्चा नहीं होती , जो संभावनावाद के हिसाब से तुक्‍का मानी जा सकती है। इसमें मैच के आठ घंटे के दौरान अच्‍छे और बुरे समयांतराल की चर्चा की जाती है , जब कोई टीम अच्‍छा या बुरा खेलती है।

व्‍यस्‍तता के कारण काफी दिनों से ब्‍लॉग जगत में मेरी सक्रियता कम हो गयी थी , एक डेढ वर्ष से अपने इस ब्‍लॉग पर कभी कभार ही पोस्‍ट डाल पा रही थी। बहुत दिनों बाद इस वर्ष 3 सितंबर 2011 को मैंने ग्रहीय आधार पर भारत और इंगलैंड के मध्‍य होनेवाले क्रिकेट मैच का विश्‍लेषण किया। उसमें शीर्षक में ही मैने लिखा था कि इंगलैंड की टीम के खिलाफ खेले जानेवाले एकदिवसीय मैचों में भी भारतीयों का संघर्ष स्‍पष्‍ट दिखता है। 3 सितंबर को होने वाले मैच के लिए उसी लेख में मैने लिखा था कि साढे छह बजे के बाद ही ग्रहों की स्थिति भारतीय टीम के पक्ष में नहीं रहेगी , इस कारण इसका प्रदर्शन मनोनुकूल नहीं रहेगा , इस कारण लगभग आठ बजे तक भारतीय टीम पूरे दबाब में रहेगी। सचमुच साढे छह बजे तक इंडिया की टीम का प्रदर्शन बहुत बढिया रहा , मैच उसके पक्ष में हो सकता था , लेकिन उसके थोडी ही देर बाद बारिश के कारण मैच को रद्द करना पडा और भारतीय टीम को निराशाजनक समाचार मिले।

इसी प्रकार 6 सितंबर के लेख में मैने  साढे नौ बजे रात्रि से लेकर साढे ग्‍यारह बजे तक ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति की चर्चा की थी और आपको यह जानकर ताज्‍जुब होगा कि इसी दौरान पुन: बारिश के कारण मैच को रद्द करना पडा और  इंग्लैंड क्रिकेट टीम के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले में भारत को डकवर्थ लुईस नियम के तहत तीन विकेट से हराए जाने की घोषणा हुई । । और 11 सितंबर के लेख में लिखा गया था कि  दूसरी पारी में इंगलैंड की शुरूआत भी सामान्‍य ही रहेगी , अंत अंत तक उनके लिए काफी अनुकूल वातावरण बनेगा और काफी हद तक जीत की उम्‍मीद उसी की की जा सकती है। ग्रहों का खेल देखिए , बारिश ने पुन: ऐसा माहौल बनाया कि 
डकवर्थ लुईस नियम  इंगलैंड के हिस्‍से ही जीत आयी।  

जब इंगलैंड की टीम भारत पहुंची और पहला मैच खेलना शुरू किया तो मुझे इसकी जानकारी देर से मिली , इस कारण पहले मैच में कोई संभावना व्‍यक्‍त न कर सकी। दूसरे मैच के बारे में मैने 17 अक्‍तूबर को पोस्‍ट लिखी , जिसमें बताया कि  खासकर शाम के 7 बजे से 9 बजे तक ग्रहों की स्थिति इंगलैंड की टीम के पक्ष में नहीं रहेगी , जिसका फायदा भारतीय क्रिकेटरों को मिलेगा और इस तरह इस मैच में भारत के जीत की ही संभावना दिखती है। सचमुच 7 से 9 बजे के मध्‍य ही भारतीय टीम की जीत निश्चित हुई। पुन: 20 अक्‍तूबर की पोस्‍ट में लिखा गया कि आरंभ के तीन घंटे तक आज की ग्रह स्थिति इंगलैंड के बिल्‍कुल प्रतिकूल दिखेगी , हालांकि उसके बाद उसके खेल में थोडा सुधार दिखेगा , जो भारतीय टीम के संघर्ष को कुछ बढा सकता है। पर ग्रहीय स्थिति से बिल्‍कुल अंत अंत तक खेल के भारतीय टीम के पक्ष में जाने की उम्‍मीद दिखती है, इसलिए आज भी भारतीय टीम की जीत की उम्‍मीद की जा सकती है।  इस दिन बिल्‍कुल अंतिम ओवर में भारत की जीत पक्‍की हुई। पुन: 23 अक्‍तूबर की पोस्‍ट का  शीर्षक ही था .. पहली पारी के अंत में भारत की स्थिति मजबूत बनेगी !!! .. और इस मैच में पहली पारी में बल्‍लेबाजी कर रही टीम 4 ओवर खेले बिना ही ऑल आउट हो गयी।  

आज यानि 25 अक्‍तूबर 2011  को भारत और इंगलैंड के मध्‍य हो रही इस श्रृंखला का अंतिम मैच होना निश्चित है। यह मैच इडेन गार्डेन कलकत्‍ता में भारतीय समयानुसार ढाई बजे दिन में शुरू होगा। यदि इस समय मैच शुरू होता है तो भारतीय टीम के लिए शुरूआती एक घंटा बहुत ही गडबड होगा , पर उसके बाद क्रमश: खेल में सुधार आएगा और अंत तक स्थिति सामान्‍य हो जाएगी। दूसरी पारी के शुरूआत में ही दो घंटे यह काफी मजबूत स्थिति में बनी रहेगी , और इसी वक्‍त बहुत हद तक भारतीय टीम की जीत तय हो सकती है। हां , यदि इस वक्‍त मजबूती न बन पायी तो इस मैच में हारने की बात हो सकती है , जिसकी संभावना बहुत थोडी है , इसलिए भारतीय क्रिकेट प्रेमी निराश न हों। आज भी भारतीय टीम को शुभकामनाएं दें कि शुरूआती बिगडे हुए माहौल का तनाव न लें और अच्‍छी तरह अपनी पारी खेल सके।