शनिवार, 14 मई 2011

फिलहाल ज्‍योतिष का अध्‍ययन छोडने का मेरा कोई इरादा नहीं !!

कुछ दिन पूर्व यह समाचार मिलते ही कि हिंदी साहित्‍य निकेतन अपनी पचासवीं सालगिरह पर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है.जिसमें परिकल्‍पना डॉट कॉम द्वारा पिछले वर्ष घोषित किए गए 51 ब्‍लॉगरों और  नुक्‍कड़ डॉट कॉम के द्वारा निर्वाचित हिंदी 13 ब्‍लॉगरों को उनके उल्‍लेखनीय योगदान के लिए सम्‍मानित करेगा। ऐसे कार्यक्रमों में सम्मिलित होने और लोगों से मिलने जुलने का कोई मौका मैं हाथ से जाने नहीं देती, इसलिए रविन्‍द्र प्रभात जी के द्वारा दिए गए आमंत्रण को मैने सहर्ष स्‍वीकार कर लिया। इस कार्यक्रम के लिए मैं बोकारो से 28 को ही निकल पडी , 29 को दिल्‍ली पहुंची और 30 को साढे तीन बजे तक आयोजन स्‍थल में पहुंच गयी। आसपास कोई परिचित ब्‍लॉगर के न दिखाई देने से मैं निराश ही बैठी थी कि पहले वंदना जी और फिर तनेजा दंपत्ति भी वहां पहुंचे। संजू तनेजा जी से कई बार मुलाकात हो चुकी थी , हालांकि मुलाकात से पहले भी राजीव जी के द्वारा बिगाडे गए सभी चित्रों में मैं उन्‍हें पहचान जाती थी । वंदना जी से पहली बार मिलने के बावजूद कोई झिझक नहीं थी , उनकी कविताएं मैं नियमित जो पढती हूं। इसलिए उनके साथ आत्‍मीयता से बातचीत करने और कुछ लोगों से मिलने जुलने में एकाध घंटे का समय व्‍यतीत हो गया और कार्यक्रम की शुरूआत भी हो गयी। कार्यक्रम के बारे में तो आप सबों को जानकारी मिल ही चुकी है , इसलिए अधिक लिखना व्‍यर्थ है , बस इतना ही कहूंगी कि ब्‍लॉगिंग से जुडे इस प्रकार के कार्यक्रम होते रहने चाहिए।


धीरे धीरे बहुत सारे ब्‍लोगर पहुंचते गए और हॉल खचाखच भर गया। समय की कमी के कारण सभी ब्‍लोगरों से जान पहचान का मौका नहीं मिल पाया , पर बहुतों से परिचय हुआ। कुछ ने मेरे लेखन को सराहा , कुछ ने मेरी टिप्‍पणियों को ।  पवन चंदन जी ने कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में बारिश नहीं होनवाली भविष्‍यवाणी के सही होने की चर्चा की , तो कनिष्‍क कश्‍यप जी खुद की शादी की सटीक भविष्‍यवाणी के लिए मुझे गिफ्ट भेजने की चर्चा की , गिफ्ट क्‍या होगा , इसे सरप्राइज ही रहने दिया। कई ब्‍लॉगर बंधु मुझसे अगली भविष्‍यवाणी के बारे में पूछते रहें , पाबला जी ने खासकर भूकम्‍प की मेरी अगली भविष्‍यवाणी के बारे में पूछा। गिरीश बिल्‍लौरे जी पूरी श्रद्घा के साथ मुझसे मिले।  भी जिन्‍हे पहचान पायी , उनसे बातचीत करती रही , हालांकि संजीव तिवारी जी जैसे कुछ ब्‍लोगरों को मुझसे निराशा ही मिली। संजीव तिवारी जी के ब्‍लॉग्‍स पढा जरूर करती हूं , यदा कदा टिप्‍पणियां भी देती हूं , पर व्‍यक्तिगत तौर पर संजीव तिवारी जी से मेरा कोई परिचय नहीं रहा। पूर्ण परिचय के बाद मैं सामान्‍य हो जाती हूं , पर जिससे परिचय नहीं हो , उनके समक्ष मेरा स्‍वभाव कुछ संकोची होता है , दूसरी बात कि एक विषय में अधिक ध्‍यान संकेन्‍प्‍द्रण और किसी भी घटना को ग्रह नक्षत्रों से जोडने की आदत के कारण मैं कभी कभी ग्रहों की दुनिया में भी खो जाती हूं। इसी में से कोई वजह रही होगी , जो मै संजीव तिवारी जी को प्रत्‍युत्‍तर नहीं दे सकी , अगली बार ख्‍याल रखूंगी।


विचारों में प्रबल विरोध रखनेवाले जाकिर अली रजनीश जी ने अभिवादन करते हुए हाल फिलहाल के दिनों में ब्‍लॉगिंग में मेरे कम सक्रियता की चर्चा की। मैने जबाब दिया कि जल्‍द ही उनसे तर्क वितर्क करने मैं उनके ब्‍लोगों पर हाजिरी लगाने वाली हूं। दिनेश राय द्विवेदी जी ज्‍योतिष पढ चुके हैं , पर उन्‍हें यह विषय अवैज्ञानिक लगता है , इसलिए उन्‍होने कहा कि वे जिस काम को करके छोड चुके हैं , मैं वही काम कर रही हूं। इसलिए वे मेरे विचारों से सहमति नहीं रखते। मैने उन्‍हें कहा कि आपको रास्‍ता नहीं मिला , आप भटक गए , ज्‍योतिष का अध्‍ययन छोड दिया। मुझे जबतक रास्‍ता मिल रहा है , मैं ज्‍योतिष का अध्‍ययन नहीं छोड सकती। 


एक व्‍यक्ति हर विषय में रूचि नहीं रख सकता , हर कार्य करने के लायक नहीं होता। मेरे पिताजी ने मात्र 27 वर्ष की उम्र में एम्‍बेसेडर कार ली थी। उस वक्‍त अधिकांश लोग खुद गाडी नहीं चलाया करते थे, ड्राइवर रखते थे , मेरे पिताजी ने भी रखा। बिजनेस के काम से अपनी गाडी से ही रांची , बोकारो जाया करते। ड्राइवर पर उन्‍हे पूरा विश्‍वास था , उसके भरोसे गाडी रहती । ड्राइवर ने इस विश्‍वास का नाजायज फायदा उठाया और पांच सात वर्ष के अंदर गाडी की हालत इतनी खराब कर दी कि गाडी उनके लिए एक बोझ हो गयी। बाद में घर मकान बनाने और बचचों की जबाबदेही में पैसों की आवश्‍यकता पडती तो वे सोंचते कि गाडी न लेकर उस वक्‍त कुछ पैसे बैंक में रख दिए होते तो अधिक काम आता। वे अपने मित्रों , बच्‍चों और अन्‍य लोगों को जल्‍द गाडी लेने की सलाह जल्‍द नहीं दिया करते हैं। इसी प्रकार हमारे एक रिश्‍तेदार हैं , जिन्‍होने अपनी दस बीस वर्ष की कमाई एक संपत्ति खरीदने में लगा दी , बाद में मालूम हुआ कि उस संपत्ति में बडा झंझट है , मानसिक शांति खोते हुए पांच वर्षों तक की कमाई से केस लडने के बाद भी जमीन का कुछ ही हिस्‍सा उन्‍हे मिल सका। उनका मानना है कि बैंक में पैसे जमा कर लो , पर अनजान जगह पर जमीन वगैरह मत खरीदो। कोई किसी खास व्‍यवसाय को गलत बताएगा , तो कोई किसी खास प्रोफेशन को , अपनी उन गल्तियों की चर्चा नहीं करते , जिससे उन्‍हें असफलता मिली है।


 वास्‍तविकता तो यह है कि कोई भी विषय बिना नींव का नहीं होता , उसमें गहराई तक जाने की आवश्‍यकता है। तैरना न जानने से छिछले पानी में लोग डूबकर मर जाते हैं , जबकि समुद्र में गहराई तक उतरनेवाले मोती प्राप्‍त करते हैं। कितने विषय और कितने प्रोफेशन को लोग छोड दिया करते हैं , जबकि उसमें मौजूद लाखो लोग ज्ञानार्जन और अच्‍छी कमाई कर रहे होते हैं। बहुत सारे लोग शेयर बाजार को जुआ का घर कहते हैं , जब‍कि दुनियाभर में सम्मान के साथ आज वारेन बफेट का नाम लिया जाता है. वे अकूत धन-संपदा के मालिक है और ये कमाई उन्होंने शुद्ध शेयर बाज़ार से की है. वे अब कई कम्पनियों के मालिक जरूर है किंतु पेशा अब भी निवेशक का ही है। इसलिए कोई भी विषय या प्रोफेशन बुरा नहीं होता , बस उसमें ईमानदारी से चलने की आवश्‍यकता होती है। इसलिए फिलहाल ज्‍योतिष का अध्‍ययन छोडने का मेरा कोई इरादा नहीं।


18 टिप्‍पणियां:

Gyandutt Pandey ने कहा…

ज्योतिष पर विश्वास अविश्वास अलग बात है, पर वह निर्णय के अपने विकल्प तो रखता ही है!

Vijai Mathur ने कहा…

मैं खुद ज्योतिष की प्रेक्टिस के साथ-साथ सक्रीय राजनीति और समाज सेवा में भी हूँ;इसलिए कह सकता हूँ एक व्यक्ति एक से अधिक कार्यों में सक्रीय रह सकता है ,यदि वह चाहे तो.
आप ज्योतिष के क्षेत्र में मजबूती से सफलता की और बढ़ें हम ऐसी उम्मीद करते हैं.

मनोज कुमार ने कहा…

इसमें अविश्वास जैसी कोई बात ही नहीं।
यह एक विज्ञान है और इसके ऊपर हमारे ऋषियों ने वर्षों पहले प्रकाश डाला था।
आप इसे छोड़ेंगी क्यों? छोड़ें वे जिन्हें विज्ञान पर ही भरोसा न हो।

बी एस पाबला ने कहा…

किसी भी तरह का अध्ययन क्यों छोड़ा जाए?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आप ज्योतिष की सच्ची सधिका है!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

आप का काम सराहनीय है..

ललित शर्मा ने कहा…

जिन खोजा तिन पाइयां.गहरे पानी पैठ...........

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

जा मे जिस की रजा वा मे लेते रवो मज़ा

Vivek Rastogi ने कहा…

आप ज्योतिष छोड़ने के विषय में सोचे ही नहीं, आप अपनी विधा में पारंगत हैं, और इस बात के लिये किसी से भी प्रमाणीकरण लेने की जरूरत भी नहीं है।

Udan Tashtari ने कहा…

जारी रखिये...शुभकामनाएँ.

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

नमस्कार जी
आखिर मिल ही गया आपका ब्लाग, मैं ब्लाग का नाम तो भूल गया था, बस पता नही कैसे मिला

तीसरी आंख ने कहा…

बेशक आप अच्छा काम कर रहे हैं, मेरा आपको पूरा समर्थन है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सही निर्णय है आपका ...ज्योतिष विद्या कोई अंधविश्वास नहीं है ...वैज्ञानिक आधार है ..

आपसे कुछ पलों की मुलाक़ात अच्छी लगी .

वाणी गीत ने कहा…

सिर्फ आलोचना या असफलता के भय से कोई भी अध्ययन क्यों छोड़ा जाए ...विज्ञान मे भी प्रयोगों की सफलता /असफलता होती रहती है , तो क्या शोध कार्य छोड़ दिए जाएँ !

निर्मला कपिला ने कहा…

संगीता जी आजकल मेरे सितारे कुछ नाराज हैं दायें हाथ मे जहर सा निकला और पस पड गयी\ कुछ काम नही कर पा रही बायें हाथ से टाईप अच्छी तरह नही होता तो नेट से दूर रहना पडता है सारा दिन उदास लेटी रहती हूँ कोई उपाय बतायें। हाथ जल्दी सही होता नज़र नही आता। कब तक सेहत ऐसे रहेगी ? जवाब जरूर दें।

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

वास्‍तविकता तो यह है कि कोई भी विषय बिना नींव का नहीं होता,उसमें गहराई तक जाने की आवश्‍यकता है। तैरना न जानने से छिछले पानी में लोग डूबकर मर जाते हैं,जबकि समुद्र में गहराई तक उतरनेवाले मोती प्राप्‍त करते हैं।

आपकी ऊपरलिखित लाईनों से सहमत हूँ. ऐसा ही मुंशी प्रेमचंद ने अपनी एक कहानी "परीक्षा" में भी कहा है कि-गहरे सुंदर में जाने से मोती जरुर मिलता है. सन-1998 में जब यह कहानी पढ़ी और उससे बहुत प्रभावित हुआ. उसके बाद अपनी पत्रकारिता में इसका खूब प्रयोग किया और अनेक सफलता प्राप्त की.पिछले लगभग तीन सालों को छोड़कर अपने कार्यों में सफलता भी मिली.

अगर आप चाहे तो मेरे इस संकल्प को पूरा करने में अपना सहयोग कर सकते हैं. आप द्वारा दी दो आँखों से दो व्यक्तियों को रोशनी मिलती हैं. क्या आप किन्ही दो व्यक्तियों को रोशनी देना चाहेंगे? नेत्रदान आप करें और दूसरों को भी प्रेरित करें क्या है आपकी नेत्रदान पर विचारधारा?

यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.? कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है क्या है आपकी विचारधारा?

पति द्वारा क्रूरता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझावअपने अनुभवों से तैयार पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में दंड संबंधी भा.दं.संहिता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझाव विधि आयोग में भेज रहा हूँ.जिसने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के दुरुपयोग और उसे रोके जाने और प्रभावी बनाए जाने के लिए सुझाव आमंत्रित किए गए हैं. अगर आपने भी अपने आस-पास देखा हो या आप या आपने अपने किसी रिश्तेदार को महिलाओं के हितों में बनाये कानूनों के दुरूपयोग पर परेशान देखकर कोई मन में इन कानून लेकर बदलाव हेतु कोई सुझाव आया हो तब आप भी बताये.

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

सही निर्णय लिया आपने।

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

सही निर्णय लिया आपने।