मंगलवार, 23 अगस्त 2011

आखिर कृष्‍ण जी के इतने संतुलित बाल लीलाओं का राज क्‍या था ??

भले ही महाभारत की कहानी के कुछ अंश को लेखक की एक कपोल कल्‍पना मान लें , पर यह मेरी व्‍यक्तिगत राय है कि पूरे महाभारत की कहानी पर प्रश्‍न चिन्‍ह नहीं लगाया जा सकता है। लोग भगवान कृष्ण को एक कथा या एक कहानी मान सकते हैं , पर ग्रंथो में उल्लिखित उनकी जन्‍मकुंडली एक ऐसा सत्‍य है , जो उनके साक्षात पृथ्‍वी पर जन्‍म लेने की कहानी कहता है। सिर्फ जन्‍म ही नहीं , उन्‍‍होने पूर्ण तौर पर मानव जीवन जीया है। इनके अनेक रूप हैं और हर रूप की लीला अद्भुत है। भले ही लोग उन्‍हें ईश्वर का अवतार कहते हों , पर बाल्‍यावस्‍था में उन्‍होने सामान्‍य बालक सा जीवन जीया है । कभी मां से बचने के लिए मैया मैंने माखन नहीं खाया , तो कभी मां से पूछते हैं , राधा इतनी गोरी क्यों है, मैं क्यों काला हूं? , कभी शिकायत करते हैं कि दाऊ क्यों कहते हैं कि तू मेरी मां नहीं है।

कृष्ण भक्ति में डूबे उनकी बाल लीलाओं का वर्णन करने वाले कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। पर भले ही सूरदास ने कृष्ण के बाल्य-रूप का सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन करने में अपनी कल्पना और प्रतिभा का कुछ सहारा लिया हो , पर कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली से स्‍पष्‍ट है कि वास्‍तव में उनका बालपन बहुत ही संतुलित रहा होगा । इसमें शक नहीं की जा सकती कि बालपन में ही एक एक घटनाओं पर उनकी दृष्टि बहुत ही गंभीर रही होगी। और बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टाएं पीढी दर पीढी चलती हुई सूरदास की पीढी तक पहुंच गयी होगी। भले ही उसके चित्रण में सूरदास ने अपनी कला का परिचय दे दिया हो।

ये रही कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली ........


'लग्‍नचंदायोग' की चर्चा करते हुए 9 फरवरी 2010 को प्रकाशित लेख में मैने लिखा था कि ज्‍योतिष में आसमान के बारहों राशियों में से जिसका उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता रहता है , उसे बालक का लग्‍न कहते हैं। अब इसी लग्‍न में यानि उदित होती राशि में चंद्रमा की स्थिति हो , तो बालक की 'जन्‍मकुंडली' में लग्‍नचंदायोग बन जाता है , जिसे ही क्षेत्रीय भाषा में 'लगनचंदा योग' कहते हैं। कृष्‍ण जी की कुंडली में 'लग्‍नचंदा योग स्‍पष्‍ट दिख रहा है , जो कृष्‍ण जी के बचपन को महत्‍वपूर्ण बनाने के लिए काफी है।

 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की जानकारी देते हुए लिखे गए अपने एक लेख में चंद्रमा की कमजोरी और मजबूती की चर्चा करने के क्रम में मैने लिखा है यदि चंद्रमा की स्थिति सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 90 डिग्री, या 270 डिग्री दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत और यदि 180 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। चूंकि कृष्‍ण जी ने अष्‍टमी के दिन जन्‍म लिया , जब सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य कोणिक दूरी 90 डिग्री की होती है , इसलिए उनके जन्‍मकालीन चंद्रमा को 50 प्रतिशत अंक प्राप्‍त होते हैं। 

इसी लेख में मैने आगे लिखा है कि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अत्यिधक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास संतुलित ढंग से होता है। इस नियम से कृष्‍ण जी का मनोवैज्ञानिक विकास बहुत ही संतुलित ढंग से होना चाहिए। 

अब यदि भाव यानि संदर्भ की की बात की जाए , तो  14 नवंबर 2008 में ही प्रकाशित इस लेख में मैने बताया था कि वृष लग्‍न लग्‍न में मजबूत चांद में बच्‍चे का जन्‍म हो , तो बच्‍चों का भाई बहन , बंधु बांधव के साथ अच्‍छा संबंध होता है। बाल सखाओं के साथ्‍ा मीठी मीठी हरकतों के कारण कृष्‍ण जी का बचपन यादगार बना रहा। यहां तक कि बाल सखा सुदामा को जीवनपर्यंत नहीं भूल सके। 

इसके अतिरिक्‍त 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की दृष्टि से एक और ग्रहीय स्थिति बनती है , जिसका उल्‍लेख भी मैने 'लग्‍नचंदा योग' वाले लेख में कर चुकी हूं। 'लग्‍नचंदा योग' के साथ यदि षष्‍ठ भाव में अधिकांश ग्रहों की स्थिति हो तो इस योग का प्रभाव और अधिक पडता है। कृष्‍ण जी के षष्‍ठ भाव में शुक्र और शनि दोनो ही ग्रहों की मजबूत स्थिति से कृष्‍ण जी के बचपन को महत्‍वपूर्ण बनाती है। इसके अलावे जिस ग्रह की पहली राशि में चंद्रमा स्थित है , उसी ग्रह की दूसरी राशि में शुक्र और शनि की स्थिति होने के कारण जीवन में झंझट भी आए और उन्‍होने उनका समाधान भी किया। शुक्र और शनि क्रमश: शरीर , व्‍यक्तित्‍व , प्रभाव , भाग्‍य और प्रतिष्‍ठा के मामले थे और ये सब बचपन में मजबूत बने रहें। यही था कृष्‍ण की संतुलित बाल लीलाओं का राज !!

14 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

कृष्ण चरित्र को कुंडली के माध्यम से समझाने की कोशिश की ...
रोचक !

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

गहन विश्लेषण किया है आपने।
आभार

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

अच्छा अध्ययन किया आपनें,आभार.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कृष्‍ण जी के इतने संतुलित बाल लीलाओं का राज उनकी विलक्षण प्रतिभा ही रही होगी!
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आपका श्रम सराहनीय है!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज 23 - 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
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एक स्वतन्त्र नागरिक ने कहा…

अच्छा लिखा है. सचिन को भारत रत्न क्यों? कृपया पढ़े और अपने विचार अवश्य व्यक्त करे.
http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रोचक जानकारी ...

यदि भविष्य की जानकारी हो तो क्या सुधार किया जा सकता है ? क्यों की हर पंडित कहता है कि हर बात का उपाय है .. जैसे किसी को शनि लगा हो तो उसका भी उपाय है ? क्या यह सच है ?

वन्दना ने कहा…

बेहद गहन विश्लेषण किया है।

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

रोचक

वीना ने कहा…

अच्छा प्रयास किया है समझाने का...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

vidhya ने कहा…

अच्छा अध्ययन किया आपनें,आभार.

Dilbag Virk ने कहा…

गहन विश्लेषण

विष्णु बैरागी ने कहा…

यह सब तो बहुत ही रोचक है। अच्‍छा लगा।