शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

तभी तो धूम होती है ... मेहंदी लगाके रखना !!

मेहंदी लिथेसिई कुल का काँटेदार आठ दस फुट तक ऊंचा झाडीनुमा पौधा होता है , जिसका वैज्ञानिक नाम लॉसोनिया इनर्मिस है। इसे त्वचा, बाल, नाखून, चमड़ा और ऊन रंगने के काम में प्रयोग किया जाता है। जंगली रूप से यह ताल तलैयों के किनारे उगता है , पर इसकी टहनियों को काटकर भूमि में गाड़ देने से भी बाग बगीचे में नए पौधे लगाए जाते हैं। हमारे यहां मेहंदी के बिना श्रृंगार अधूरा माना जाता है, विवाह के अवसर पर भी मेहंदी की रस्‍म होती है। इसे प्रेम व सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. मेहंदी के महत्‍व को ध्‍यान में रखते हुए हल्‍के हरे रंग का नाम ही मेहंदी रंग दिया गया है। यहां तक कि एक जलप्रपात को इसलिए मेहंदी कुंड के नाम से बुलाया जाता है , क्‍यूंकि जल प्रपात (झरने) के आसपास की पहाडियां हरी-भरी होने से उनकी परछाई के कारण कुंड का रंग हरा दिखाई देता है।

मेहंदी को शरीर को सजाने का एक साधन के रूप में दक्षिण एशिया में उपयोग किया जाता रहा है। यह परंपरा ग्यारहवीं सदी से पहले से भारतीय समाज में चली आ रही है. १९९० के दशक से ये पश्चिमी देशों में भी चलन में आया है। इसकी छोटी चिकनी पत्तियों को पीसकर एक प्रकार का लेप बनाते हैं, जिसे स्त्रियाँ नाखून, हाथ, पैर तथा उँगलियों पर लगा लेती हैं। कुछ घंटों के बाद धो देने पर लगाया हुआ स्थान मैरून लाल रंग में रंग जाता है जो तीन चार सप्ताह तक नहीं छूटता। पत्तियों को पीसकर रखने से भी रंग देने वाला लेप तैयार किया जा सकता है। 16 श्रंगार में मेहंदी का विशेष महत्व है.


सावन का महीना तो मेहंदी के लिए खास है , चूंकि श्रावण माह को मधुमास भी कहा जाता है, इसलिए इस माह में महिलाएं विशेषकर मेहंदी लगाती हैं. इसका धार्मिक, सामाजिक महत्व के साथ-साथ आयुर्वेद से भी संबंध है. आध्यात्मिक आख्यान के अनुसार पार्वती ने इसी माह में शंकर को प्रसन्न कर उन्हें पति रूप में प्राप्त किया था. करीब एक दशक पूर्व गांवों में मेहंदी की पत्तियां तोड़ कर जमा कर इसे सिलौटी-लोढ़ी से पीसा जाता था , अधिक रंग आने के लिए इसमें कत्था, चाय का पानी , नींबू का रस आदि‍ मिलाया जाता था, मेहंदी लगाने के दौरान मेहंदी के गीत गाये जाते थे. सावन में बरसात के कारण उत्पन्न होने वाली कई प्रकार की बीमारियों में मेहंदी का उपयोग काफी लाभदायक होता है. बरसात के दिनों में पैर-हाथ में पानी लग जाने पर अभी भी गांव में जानकार किसान व मजदूर मेहंदी लगाते हैं.


मेहंदी लगाना एक कला है। इस कला ने राजस्थान और उत्तर भारत में काफी उन्नति की है। लगभग हर शहर में मेहंदी लगाने की प्रतियोगिता होती है। आजकल इस क्षेत्र में भी रोजगार उपलब्‍ध हो गए हैं। पहले यह सिर्फ महिलाओं का काम हुआ करता था , अब पुरूष भी इस क्षेत्र में आ गए हैं। आजकल मेहंदी पार्लरों में विशेषज्ञों की फी बहुत अधिक होती है। पहले बारीक पिसी हुई गीली मेहंदी में सीक डुबोकर हाथों में सुंदर डिजाइन बनाए जाते थे , कुछ दिन बाजार में प्‍लास्टिक के सॉचे मिलने लगे , जिसमें मेहंदी को लगाने से डिजाइन अपने आप उग आती थी। उसके बाद कुप्पियां बनाकर मेहंदी लगाने की परंपरा चली। अब बाजार में बनी बनायी कुप्पियां मिलती हैं , जिससे मेहंदी लगाना काफी आसान हो गया है। बाजार में डिजाइन की पुस्‍तकों के भी भंडार हैं।


आयुर्वेद के हिसाब से मेहंदी कफ-पित्त शामक होती है. मसूड़े के ऐसे असाध्य रोग, जो दूसरी औषधियों से न मिटते हों, मेहंदी के पत्तों के उबले हुए पानी से कुल्ला करने से मिट जाते हैं। मेहंदी को उबालकर उसके पानी से कुल्ले करने से जहां मुंह के छाले मिटते हैं , वहीं धोने से फोड़े-फुन्सी में लाभ होता है। गर्मी और बरसात के उमस भरे मौसम में पीठ और गले पर व शरीर की नरम त्वचा पर घुमौरियां होने लगती हैं। मेहंदी के लेप से एकदम उनकी जलन मिटकर लाभ हो जाता है। मेहंदी के पत्ते, आंवला, जरा-सी नील दूध में पीसकर बालों पर लगाने से लाभ होता है। इसके फूलों को सुखाकर सुगंधित तेल भी निकाला जाता है। इसपौधे की छाल तथा पत्तियाँ दवा में प्रयुक्त होती हैं।


पिछले कुछ वर्षो में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तैयार रेडीमेड मेहंदी ने बाजार पर कब्‍जा कर लिया है। दुकानों में उपलब्ध मेहंदी केमिकल का बना होता है. इसका शरीर को कोई लाभ नहीं मिलता. रंग भी बनावटी होता है. अर्थात गाढ़ा लाल, जो काले रंग के करीब होता है.पीसी हुई मेहंदी लगाने का जो शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता था, वह आज की मेहंदी में नहीं है।.प्राकृतिक मेहंदी की ललाई में जो नजर को खींचने की ताकत थी, वह रेडीमेड मेहंदी की कालिमायुक्त लाली में कहां से होगी , पर आसान उपलब्धता तथा लगाने में सुगमता रेडीमेड मेहंदी को सर्वप्रिय बना रहा है.


आजकल रेग्युलर मेहंदी की जगह ज्‍वेलरी मेहंदी भी प्रचलन में हैं , जिसे ज्‍वेलरी और मेहंदी से मिलाकर बनाया गया है। इसमें आर्टिस्ट आपकी ड्रेस के डिजाइन का खास हिस्सा कॉपी करके हूबहू आपके हाथों पर बना सकता है। इसके लिए मेहंदी, स्पार्कल, कलर्स, सितारे, मोती, चांदी व सोना वगैरह यूज किया जाता है। अगर आपकी ड्रेस पर सितारे व मोती हैं, तो इन्हें भी मेहंदी में लगवा सकती हैं। इसे किसी विशेष पार्टी या शादी के मौके पर बनवाया जा सकता है। इसे लगाने के लिए हाथों पर स्किन से मैच करता हुआ बेस कोट लगाया जाता है। फिर इसे सीलर से सील कर दिया जाता है, ताकि आपका डिजाइन देर तक टिका रहे। तभी तो धूम होती है ... मेहंदी लगाके रखना !!

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

इतने दिनो बाद भी दिलों के मध्‍य फासला न बना ..यही क्‍या कम है ??

हमने तो बहुत दिनों तक अपने हाथो से भाइयों को राखी बांधी , आजकल की बहनें तो शुरू से ही पोस्‍ट से राखी भेजने या ग्रीटींग्स कार्ड के द्वारा राखी मनाने को मजबूर हैं, भाई साथ रहते ही कितने दिन हैं ??  बहनों के लिए वो दिन तो अब लौट नहीं सकते , जब संयुक्‍त परिवार हुआ करते थे और राखी बंधवाने के लिए भाई क्‍यू में खडे रहते थे। जहां एक ओर सुबह से स्‍नान कर पूजा कर भूखी  प्‍यासी बहने राखी की तैयारी में लगी होती , वहीं दूसरी ओर भाई भी स्‍नान कर बिना खाए पीए ही राखी के इंतजार में बैठे होते। एक एक कर सभी बहनें सभी भाइयों को , चाहे वो संख्‍या में कितने भी क्‍यूं न हों , टीके लगाती , राखी बांधती और मिठाईयां खिलाती। बदले में भाई बहनों को वो नोट थमाते , जो एक एक भाइयों के लिए उनकी माताओं ने उन्‍हें दिए होते। आज के दिन मिठाइयों की खपत की तो पूछिए मत , एक एक भाई के हिस्‍से दस , बारह , पंद्रह मिठाइयां तो होनी ही चाहिए।  यहां तक कि पडोसी के बच्‍चे भी राखी बंधवाने आ जाया करते , इसलिए आज घर में भरपूर मिठाई रखनी पडती थी। भाइयों को इतनी मिठाइयां खाते देख बहनें और बहनों को नोट गिनते देख भाई ललचते रहते।

गांव में तो बढे हुए ऑर्डर को पूरा करने के लिए खोए की कमी हो जाती और हलवाई इस खास त्‍यौहार पर मिठाइयों के साइज और क्‍वालिटी में काफी कटौती करते। इसलिए महिलाएं कई दिनों से ही घर मे खपत होनेवाले दूध के खोए बनाकर हल्‍की फुल्‍की मिठाइयां या पेडा बना लिया करती थी। चूंकि घर में पेडे का सांचा नहीं होता , गोल पेडे बनाकर उसे गुल के डब्‍बे के ढक्‍कन से दबा दिया जाता , जिससे उसके ऊपर  कलात्‍मक डिजाइन बन जाता। उस जमाने में मंजन के रूप में गुल का प्रयोग लगभग हर घर के मर्द करते थे ।  मिठाई की कमी के कारण ही बाजार का कम से कम सामान प्रयोग करनेवाले हमारे परिवार में गुलाबजामुन बनाने वाली गिट्स की पैकेट का उसी जमाने से उपयोग आरंभ कर दिया गया था। इसके साथ ही मिठाइयों के लिए हलवाई पर निर्भर रहने की बाध्‍यता कम हो गयी थी।

शादी के बाद शायद एकाध बार राखी में मायके में रहना हो सका हो , पर कई वर्षों तक ससुराल में कोई न कोई भाई आक‍र राखी बंधवा ही लेता था , दूरी भी तो अधिक नहीं थी , 30 कि मी होते ही कितने हैं ?? पर अब हमारे शहरों के मध्‍य का फासला जितना है , उससे अधिक दूरी रोजगार के क्षेत्र में चलने वाली प्रतिस्‍पर्धा ने बना रखी है। पिछले कई वर्षों से राखी का त्‍यौहार यूं ही आता और चला जाता है , डाक विभाग या कूरियर सर्विस के द्वारा राखी भाइयों तक पहुंचाकर जहां एक ओर मै , वहीं दूसरी ओर सभी भाई भी राखी वाले दिन एक फोन कर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। राखी के दस दिन पहले मैं खुद भाइयों के पास से चली आयी , उन्‍हें क्‍या कहूं ?? शादी विवाह और घर गृहस्‍थी के बाद अपनी अपनी जबाबदेही में व्‍यस्‍त रहना ही पडेगा । कोई जरूरत आ पडी तो हम एक दूसरे को समय दे देते हैं , यही बहुत है। इतने दिनो बाद भी दिलों के मध्‍य फासला न बना , यही क्‍या कम है ??

अखबार में नाम ..... बधाई तो बनती ही है !!!!!!

अखबार में अपना भी नाम आए , इसकी इच्‍छा भला किसे न होगी ?? जनसामान्‍य की इस मानसिकता को लेखक यशपाल जी ने अच्‍छे से समझा था और एक सफल कहानी 'अखबार में नाम' लिख डाला था। इस कहानी के नायक गुरदास को बचपन से ही अखबार में अपना नाम देखने का शौक था। वह समाज में अपने-आप को किसी अनाज की बोरी के करोड़ों एक ही से दानों में से एक साधारण दाने से अधिक अनुभव न कर पाता था। ऐसा दाना कि बोरी को उठाते समय वह गिर जाये तो कोई ध्यान नहीं देता। उम्र के साथ ही साथ अखबार में अपना नाम देखने की इच्‍छा बढती जा रही थी। अंत में उस बेचारे के साथ क्‍या हुआ , यह तो आप यशपाल जी की इस कहानी को पढकर जान ही लेंगे , पर यह तो निश्चित है कि नाम कमाने की इच्‍छा मनुष्‍य के मन में हमेशा हावी रहती है।

विद्यार्थी जीवन में तो किसी पत्र पत्रिकाओं में अपना नाम आने की बहुत कम गुंजाइश थी ,क्‍यूंकि हमारी पढाई लिखाई सरकारी स्‍कूलो कॉलेजों में हुई थी और उन्‍हें आज के प्राइवेट स्‍कूलों कॉलेजों की तरह विद्यार्थ‍ियों की छोटी मोटी उपलब्धियों की चर्चा करके उसके सहारे अपना विज्ञापन करने की कोई आवश्‍यकता नहीं थी। हां , कभी कभी कुछ हमारे स्‍कूल के कुछ सांसकृतिक कार्यक्रमों की चर्चा समाचार पत्रों में अवश्‍य होती थी , पर मैं न तो खेल कूद में अच्‍छी थी और ही अपने नाम के अनुरूप संगीत और नृत्‍य मे। विद्यार्थी जीवन से भी मेरे भाषण वक्‍ताओं पर अच्‍छा छाप छोडते थे , पर अखबारों में इसकी चर्चा शायद ही कभी होती हो। हर शहर से तो तब अखबार निकलते नहीं थे कि छोटे मोटे कार्यक्रमों की इतने विस्‍तार से चर्चा हो। 

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की जानकारी के बाद 1990 से ही मै विभिन्‍न ज्‍योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में लिखने लगी थी , पर इससे सिर्फ ज्‍योतिषियों के मध्‍य ही अपनी पहचान बन सकती थी। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सहारे समाज में फैली ज्‍योतिषीय भ्रांतियों और अंधविश्‍वास को दूर करने के उद्देश्‍य से आम जन के मध्‍य अपनी पहचान बनाना आवश्‍यक था। इसके लिए विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में अपने लेख प्रकाशित करवाना आवश्‍यक था। कई बार अखबारों को अपने लेख भेजें , पर शायद वो वहां की रद्दी की टोकरी में ही डाल दिए गए होंगे। फिर मुझे दिल्‍ली में चलनेवाले एक फीचर्स के बारे में पता चला। जब मैने अपने लेख वहां भेजने शुरू किए , तो उन्‍होने उसे देशभर के अखबारों में छपवाना शुरू किया , जो तीन चार वर्षों तक चला। बाद में मैं अपने सॉफ्टवेयर बनाने में व्‍यस्‍त हुई और लिखने का सिलसिला ही कम हो गया। 


जब से ब्‍लॉग लिखना आरंभ किया है , यत्र तत्र समाचार पत्रों में मेरे लेख प्रकाशित होते रहते हैं। हालांकि अभी तक शायद ही किसी ब्‍लॉगर को आर्थिक तौर पर फायदा हुआ हो, फिर भी अपनी पहचान बनते देख काफी खुशी होती है। कल जब इत्‍ते बडे समाचार पत्र पर अपना नाम प्रकाशित देखा , तो मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं। सबसे पहले पाबला जी ने अपने ब्‍लॉग का लिंक भेजकर मुझे बताया कि न्‍यूयार्क टाइम्‍स में Indian Women Bloggers Find Their Voice, in Their Own Language नामक शीर्षक के अंतर्गत घुघूती बासूती, अर्चना चावजी, रश्मि स्वरूप, निर्मला कपिला जी के साथ मेरा नाम भी आया है। सबों को बधाई और शुभकामनाएं । उसके बाद मेरे पास भी कई बधाई संदेश आए , बधाई तो बनती ही है !!

बुधवार, 10 अगस्त 2011

सच ही कहा गया है ..... भगवान केवल भक्‍त भाव के भूखे होते हैं !!

इस वर्ष के चारो सोमवार व्‍यतीत हो गए और मैं एक भी सोमवारी व्रत न कर सकी। इधर कुछ वर्षों से ऐसा ही हो रहा है , कभी काम की भीड और कभी तबियत के कारण सोमवारी व्रत नहीं कर पा रही हूं। हमारे धर्म में सावन महीने के सोमवार का बहुत म‍हत्‍व है। सावन के सोमवार को भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। भारत के सभी द्वादश शिवलिंगों पर इस दिन खास पूजा-अर्चना की जाती है. कहा जाता है सावन के सोमवार का व्रत करने से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और दूध की धार के साथ भगवान शिव से जो मांगो वह वर मिल जाता है. यही कारण है कि इस व्रत को कुंवारी कन्‍याएं काफी उत्‍साहित होकर करती हैं।

प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। सोमवार के व्रत की चाहे जितनी भी सामग्रियां इकट्ठी कर ली जाएं , व्रत में अधिक नियम की जरूरत नहीं। भोले भाले शिव जी की पूजा का यह सोमवार व्रत भी बिल्‍कुल अपने मन मुताबिक किया जा सकता है। यही कारण है कि सावन का सोमवारी व्रत छोटी छोटी बच्चियां भी कर लेती हैं। हमारे गांव में सावन का सोमवारी व्रत लडकियों के लिए काफी उत्‍साह का त्‍यौहार होता था। गांव के पंडितों की मानने के कारण हमें काफी तैयारी करनी होती थी।

शनिवार का गांव में हाट लगता था , इसलिए इस दिन से ही तैयारी शुरू हो जाती थी। पूजा के लिए कम से कम पांच प्रकार के फल तो होने ही चाहिए। एक दो घर में मिल जाते , बाकी तो हमें खरीदने ही होते थे। अपने घर में दूध का इंतजाम न हो , तो ग्‍वाले के घर जाकर गाय के कच्‍चे दूध का इंतजाम करना होता। बाजार से भांग , कपूर आदि खरीदकर लाने होते। रविवार को सुबह सुबह अच्‍छी तरह नहाकर एक लोटे में जल , दूध और पुष्‍प लेकर मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी पर चढाना होता था। उसके बाद दिनभर बिना प्‍याज लहसुन का शुद्ध खाना खाना होता था। 

हमारे गांव में भले ही सोमवार को शिवमंदिर का कपाट दो बजे के बाद ही खुलता था , सुबह से ही हमलोग पूजा की तैयारी में लग जाते थे। पूजा में कोई कमी न रह जाए , सुबह से ही बेलपत्र , धतुरे और धतूरे के फूल और अन्‍य फूल , जो हमारे बगीचे में नहीं होती , के लिए हमलोग भूखे प्‍यासे भटकते रहते। दो बजे के बाद स्‍नान कर हम पूजा का थाल सजाते। उसके बाद नए कपडे पहनकर शिवालय जाते। शिव परिवार को जलधारा , दूध, दही, शहद, शक्कर, घी से स्नान कराकर, गंध, चंदन, फूल, रोली, सिंदूर के साथ साथ धूप अगरबत्‍ती दिखाते हुए फलों का भोग लगाते। मंदिर में एक बूढी ब्राह्मणी होती , जो अस्‍पष्‍ट मंत्रों का उच्‍चारण करती जाती। शिव जी को अर्पित करने से पहले वे थोडा दूध अपने घर से लाई बाल्‍टी में जमा करती जातीं। प्रसाद तो हम उनके लिए अलग से ले जाते थे। मंदिर से बाहर निकलते ही प्रसाद के आस में बहुत महिलाएं और बच्‍चे खडे मिलते। उन्‍हें प्रसाद देकर हम वापस लौटते।

दिनभर के भूखे प्‍यासे हम बच्चियों की सेवा के लिए सबकी मम्‍मी पूरी तैयारी में होती। हमारे गांव में सोमवारी व्रत में दिनभर में एक बार ही बिना नमक का शुद्ध खाना खाने का विधान है , यहां तक की चाय पानी भी एक ही बैठकी में ले लेना होता। छोटी छोटी बच्चियां भी पूजा से पहले तो नहीं, पूजा के बाद भी दुबारा पानी नहीं पीती। दूसरे दिन भी हमें सुबह सुबह खाने की आजादी नहीं थी , स्‍नानकर पहले शिव पार्वती जी की पूजा कर उनसे इजाजत लेकर ही खाने की छूट होती। इस तरह हमलोगों का तीन दिन का नियम चलता। पर तीसरे दिन हमारे लिए खाने पहने की विशेष व्‍यवस्‍था कि जाती।

एक बार सावन के महीने में मामाजी के यहां थी , तो वहां महिलाओं को इतने नियम से सोमवारी का व्रत करते नहीं पाया। वहां सालोभर बिना प्‍याज लहसून के खाना बनता था , इसलिए रविवार को नियम से खाने की कोई जरूरत नहीं होती। सोमवार को दिनभर सबका फलाहार ही चलता , बस दोनो भाइयों के लिए खाना बनाने की जरूरत होती। वहां सुबह से ही शिवमंदिरों में भीड लगती थी , इसलिए सुबह ही सब पूजा कर लेते , पूजा के बाद प्रसाद और चाय ले लेते , फिर फलाहार तैयार करते।

भाइयों का खाना निबटाकर हमलोग तीन बजे के लगभग फलाहार करते। दिनभर पानी चाय की कोई मनाही नहीं थी। सबसे छोटी बहन तो फलाहार कर टिफिन में फलाहार लेकर स्‍कूल जाती आकर फिर दो तीन बार फलाहार ही करती। यानि जिसको जैसे इच्‍छा हो , वैसे खाओ पीओ। एक बार रांची में भी एक रिश्‍तेदार के यहां रूकने का मौका मिला , वहां भी ऐसे ही व्रत होते देखा। बहुत परिवारों में तो कुट्टू के आटे और सेंधा नमक का प्रयोग करते हुए पूरा फलाहार खाना बना लिया जाता है।

ससुराल में एक बार सावन के सोमवारी व्रत को करने को पूरा घर तैयार हो गया। मेरे ससुराल में चाय पी पीकर दिन काटने में किसी को दिक्‍कत नहीं है , पूजा करके चाय के सहारे दिनभर काट लिया। शाम को मेरे पूछने पर कि खाना क्‍या बनाऊं , दोनो भाइयों ने बिना प्‍याज लहसून के चावल दाल सब्‍जी बनाने को कहा। सोमवारी व्रत में चावल दाल ?? मैं तो चौंक गयी। इनलोगों ने बताया कि दिनभर के भूखे प्‍यासे इनलोगों की भूख फलाहार से शांत नहीं होती थी , इसलिए ये हॉस्‍टल में चावल दाल ही खाते आए हैं। भोले भाले शंकर बाबा की पूजा और व्रत हर जगह अलग अलग यानि मनमाने ढंग से ही होती आ रही है। भोले बाबा को इससे कोई अंतर नहीं पडता , सच ही कहा गया है , भगवान केवल भक्‍त भाव के भूखे होते हैं !!