शनिवार, 3 सितंबर 2011

एक दिवसीय मैचों में भी भारतीय क्रिकेट टीम का संघर्ष दिखता है !!

इंगलैंड टीम के खिलाफ खेले गए मैच में भारत चार टेस्ट मैचों की सीरीज़ 0-4 से हारने के साथ ही भारत टेस्ट क्रिकेट में अपना शीर्ष स्थान भी गंवा बैठा. वैसे तो इंग्लैंड कभी भी टेस्ट मैचों के हिसाब से वनडे में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है , पर जिस तरह से भारतीय टीम लगातार मजबूत होते हुए क्रिकेट में लगातार कई उपलब्धियां , यहां तक कि हाल में कुछ महीने पहले विश्व कप का ख़िताब भी हासिल कर चुकी है , ऐसी हार को देख पाना दुखद है। आश्‍चर्य है , अभी न तो हमारी बल्लेबाजी में दम दिख रहा है और न गेंदबाजी में। एक के बाद एक हार के कारण टेस्ट क्रिकेट में भारत की साख पर बट्टा लगा है। और तो और, भारत 31 अगस्‍त को हुए इंगलैंड के खिलाफ एकमात्र T20 मैच भी हार गया। अब पांच एक दिवसीय मैच खेले जाने हैं , जिसमें टीम की क्षमता और अपनी जीत को देखने के लिए करोडो भारतवासियों की नजर बनी हुई है। 


ग्रहीय आधार पर किसी भी मैच के बारे में भविष्यवाणी कर पाने में कुछ समस्याएं तो अवश्य आती हैं , क्योंकि जहॉ एक ओर दोनो टीम के सभी सदस्यों का जन्म-विवरण हमारे पास मौजूद नहीं होता , वहीं दूसरी ओर जिस शहर में मैच हो रहा है , वहॉ के आक्षांस और देशांतर रेखाओं से ग्रहों के तालमेल में भी कठिनाई आतीं हैं। फिर भी कुछ वर्षों से हमारे द्वारा क्रिकेट मैच से संबंधित जो शोध किए गए है , उसके आधार पर क्रिकेट मैच के दिन की ग्रहीय स्थिति का उस दिन के क्रिकेट पर पड़नेवाले प्रभाव का विश्लेषण 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के इस ब्‍लॉग पर किया जाता रहा है। मैच के बारे में किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी करके भविष्‍य के लिए होनेवाले इस रोमांच को समाप्‍त करने का मुझे कोई हक नहीं दिखता। पर मुझे लगता है कि मेरे हल्‍के रूप में संकेत देने से शायद आपका रोमांच कम नहीं होगा।  हालांकि इस प्रकार के अध्‍ययन में बहुत ध्‍यान संकेन्‍द्रण की आवश्‍यकता पडती है और कुछ दिनों से मैं काफी व्‍यस्‍त थी , इसलिए खेलप्रेमियों क्रिकेट पर ग्रहों के प्रभाव की सूचना न दे पा रही थी। इसलिए फुर्सत मिलते ही अब शुरू कर रही हूं।


आज यानि 3 सितंबर 2011 को इंगलैंड की टीम के खिलाफ खेले जानेवाले पहले एकदिवसीय मैच में भी भारतीयों का संघर्ष स्‍पष्‍ट दिखता है। भारतीय समयानुसार मैच 14:45 पर आरंभ होगा। शुरूआत की ग्रह स्थिति इंगलैंड की टीम के पक्ष में होंगी , जिस कारण बहुत संभावना है कि टॉस वही जीते। ऐसा न भी हो तो भी लगभग डेढ घंटे में ही वह अच्‍छी मजबूती हासिल कर लेगा। पर इसके बाद स्थिति कुछ सामान्‍य होती चली जाएगी , जिसके कारण भारतीय टीम का दबाब कुछ कम होता दिखता है , लेकिन इसके बावजूद पारी का अंत इंगलैंड के पक्ष में ही दिखेगा। दूसरी पारी का आरंभ भारतीय टीम बहुत ही संतुलित ढंग से करेंगे , पर साढे छह बजे के बाद ही ग्रहों की स्थिति भारतीय टीम के पक्ष में नहीं रहेगी , इस कारण इसका प्रदर्शन मनोनुकूल नहीं रहेगा , इस कारण लगभग आठ बजे तक भारतीय टीम पूरे दबाब में रहेगी। पर उसके बाद क्रमश: बुरे ग्रहों का प्रभाव कम होना आरंभ होगा और भारतीय टीम का प्रदर्शन अच्‍छा होता चला जाएगा। इसलिए इसके बाद यदि उन्‍हें अच्‍छी तरह खेलने के लिए डेढ घंटे भी मिल गए तो जीत की उम्‍मीद रखी जा सकती है, आइए प्रार्थना करें ताकि साढे छह से आठ बजे के मध्‍य भारतीय टीम कठिनाइयों से उबरने में सफल हो !!

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

सभी ग्रहों का दशा काल यानि ग्रहों का प्रभावी वर्ष ( भाग . 2 ) .....

लगभग 24 वर्ष की उम्र के बाद अक्‍सरहा लोग पूरे उत्‍साह के साथ जीविकोपार्जन के लिए संघर्ष शुरू कर देते हैं। वे शादी कर पति पत्‍नी भी बन जाते हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में मंगल को शक्ति और साहस का प्रतीक ग्रह माना जाता है और यदि मानव जीवन पर ध्‍यान दिया जाए , तो 24 वर्ष की उम्र के बाद शक्ति और साहस की प्रचुरता बनती है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने अपने अध्‍ययन में पाया कि जन्‍मकुंडली में मंगल प्रतिकूल हो , तो जातक का प्रारंभिक दाम्‍पत्‍य जीवन या तो कलहपूर्ण होता है या वे 24 वर्ष की उम्र से 36 वर्ष की उम्र तक बेरोजगार की स्थिति में भटकते रहते हैं। इस अंतराल इनके जीवन में किसी तरह भी स्‍थायित्‍व नहीं आ पाता। जबकि मंगल मजबूत हो तो लोगों को कैरियर में अच्‍छी सफलता मिलती है। इनका दाम्‍पत्‍य जीवन भी सुखद होता है।  परंपरागत ज्‍योतिष शास्‍त्र में भी इस ग्रह को वयस में युवा सेनापति कहा गया है , अत: इस वय में मंगल के काल की पुष्टि हो जाती है।

36 वर्ष की उम्र तक शरीर की सारी ग्रंथियां बनकर तैयार हो जाती है , मनुष्‍य का नैतिक दृष्टिकोण निश्चित हो जाता है। इसलिए भारत के राष्‍ट्रपति बनने के लिए आवश्‍यक शर्त की उम्र 35 वर्ष है। इस उम्र में आते आते व्‍यक्ति को परिवार के प्रति लगाव बढने लगता है , इस वक्‍त जिम्‍मेदारियां भी भरपूर होती हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने अपने अध्‍ययन में पाया कि यदि जन्‍मकालीन शुक्र मजबूत हो , तो जातक 36 वर्ष से 48 वर्ष तक का समय बहुत अच्‍छे एंग से गुजारते हैं , बच्‍चों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारियों का निर्वाह आसानी से करने में सफलीभूत होते हैं/ रोजगार में रहनेवालों को अधिक मुनाफा होता है और नौकरी करनेवालों को प्रोन्‍नति मिलती है। यदि शुक्र कमजोर होता है तो जातक इस अवधि में पगतिकूल परिस्थितियों से गुजरना पडता है।

जिन कुंडलियों मे सूर्य बलवान होता है , उनके उत्‍कर्ष का समय 48 से 60 वर्ष तक की अवस्‍था होती है। सूर्य बलवान होने के कारण ही इंदिरा गांधी 48 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनी और 1977 तक यानि 60 वर्ष की उम्र तक बिना परिवर्तन के डटी रही। इसके विपरीत सूर्य कमजारे हो , तो 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र तक जातकों को कई प्रकार की मुसीबत से जूझना पडता है। फलित ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथो में मंगल को राजकुमार और सूर्य को राजा कहा गया है। मंगल के दशाकाल 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र में पिता बनने की उम्र 24 वर्ष जोड दी जाए , तो वह 48 वर्ष से 60 वर्ष हो जाता है। अत: इसे सूर्य का दशाकाल माना जा सकता है।

प्राचीन ज्‍योतिष में बृहस्‍पति को सृजनशील वृद्ध ब्राह्मण माना जाता है। इसलिए हंस योग के फलीभूत होने की उम्र 60 वर्ष से 72 वर्ष की अवस्‍था  मानी जाती है। सचमुच मानव जीवन में इस उम्र को अत्‍यंत ही बडप्‍पन युक्‍त और प्रभावपूर्ण देखा गया है। जिसकी जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति मजबूत होता है , सेवावनवृत्ति के बाद निश्चिंति से जीवन निर्वाह करते हैं। बृहस्‍पति कमजोर होने पर उनकी जबाबदेहियां सेवानिवृत्ति के पश्‍चात् भी बनी रहती हैं। पं जवाहर लाल नेहरू जी की जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति बहुत मजबूत स्थिति में था नेहरू जी 60 वर्ष की उम्र से 72 वर्ष की उम्र तक लागातार भारत के प्रधानमंत्री बने रहें। इसलिए इस उम्र में बृहस्‍पति के दशाकाल की पुष्टि हो जाती है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने 72 वर्ष की उम्र के बाद मानव जीवन पर शनि का प्रभाव महससू किया है , क्‍यूंकि यदि महात्‍मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की कुंडली पर ध्‍यान दिया जाए , तो यही मिलेगा कि दोनो के ही मारक भाव द्वितीय भाव में शनि स्थित है। इन दोनो महापुरूषों की मृत्‍यु 72 वर्ष की उम्र के बाद हुई। परंपरागत ज्‍योतिष भी शनि को अतिवृद्ध के रूप में स्‍वीकार करता है। शनि बली सभी मनुष्‍य इस उम्र में सुखी होते हैं , जबकि जन्‍मकालीन शनि कमजोर हो तो इस उम्र में वे प्रतिकूल स्थिति में जीने को बाध्‍य होते हैं।

84 वर्ष के बाद 120 वर्ष तक की आयु , जो मनुष्‍य की परमायु बतायी गयी है , का समय तीन ग्रहों यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटों को दिया जा सकता है। इनमें से प्रत्‍येक ग्रह को बारी बारी से 12 - 12 वर्षों का समय दिया जा सकता है। इस प्रकार किसी जातक के उम्र विशेष पर विभिन्‍न ग्रहों का प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है .........
जन्‍म से 12 वर्षों तक का समय .... बाल्‍यावस्‍था ..... चंद्रमा,
12 से 24 वर्षों तक का समय .... किशोरावस्‍था ...... बुध ,
24 से 36 वर्षों तक का समय ..... युवावस्‍था ...... मंगल,
36 से 48 वर्षों तक का समय .... पूर्व प्रौढावस्‍था ... शुक्र,
48 से 60 वर्षों तक का समय ..... उत्‍तर प्रौढावस्‍था .... सूर्य,
60 से 72 वर्ष तक का समय ..... पूर्व वृद्धावस्‍था .... बृहस्‍पति,
72 से 84 वर्ष तक का समय ..... उत्‍तर वृद्धावस्‍था ..... शनि,

इस प्रकार सभी ग्रह कुंडली में प्राप्‍त बल और स्थिति के अनुसार मानव जीवन में अपनी अवस्‍था विशेष में प्रभाव डालते रहते हैं। लेकिन इन 12 वर्षों में भी प्रथम छह वर्ष और बाद के छह वर्ष में अलग अलग प्रभाव दिखाई देता है। इसके अलावे इन 12 वर्षों में भी बीच बीच में उतार चढाव का आना या छोटे छोटे अंतरालों में खास परिस्थितियों का उपस्थित होने का ज्ञान इस पद्धति से संभव नहीं है। 12 वर्ष के अंतर्गत होनेवाले उलटफेर का निर्णय हम 'लग्‍न सापेक्ष गत्‍यात्‍मक गोचर प्रणाली' से करें , तो दशाकाल से संबंधित सारी कठिनाइयां समाप्‍त हो जाएंगी।

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

सभी ग्रहों का दशा काल यानि ग्रहों का प्रभावी वर्ष .....

अबतक की प्रचलित दशा पद्धति , चाहे कितनी भी लोकप्रिय क्‍यूं न हो , लेकिन अबतक ज्‍योतिषियों के सरदर्द का सबसे बडा कारण दशाकाल का निर्णय यानि ग्रहों के प्रभावी वर्ष का निर्णय ही रहा है। भले ही उसकी गणना का आधार स्‍थूल नक्षत्र प्रणाली ही हो। यदि इस तरह की बात न होती , तो शनि महादशा और इसकी ही अंतर्दशा के अंतर्गत शत प्रतिशत ज्‍योतिषियो की आशा के विपरीत 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी पुन: प्रधानमंत्री का पद सुशोभित नहीं करती। इस लेख का उद्देश्‍य पुराने विंशोत्‍तरी या अन्‍य दशा पद्धतियों की आलोचना नहीं , लेकिन इतना निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि एक निश्चित उद्देश्‍य के लिए जब एक नियम पूर्णत: काम नहीं करते , तो उस नियम के पूरक के रूप में दूसरे , तीसरे चौथे .... अनेक नियम बनते चले जाते हैं या बनते चले जाने चाहिए। अभी भी सामान्‍य या उच्‍च कोटि के जितने भी ज्‍योतिषी हैं , चाहे वो जिस दशा पद्धति के अनुयायी हों , अपने तथ्‍य की पुष्टि अन्‍तत: लग्‍न सापेक्ष गोचर प्रणाली (यानि आज के आसमान की स्थिति को देखकर ) से करते हैं।

दशा काल निर्णय के संदर्भ में इस लग्‍न सापेक्ष गोचर प्रणाली को भी अमोघ शस्‍त्र के रूप में स्‍वीकार करने में दिक्‍कतें आती हैं , जैसे एक ग्रह गोचर में अनेक बार अच्‍छे र‍ाशि और भाव में आता है , पर एक राशि और भाव में रहने के बावजूद हर बार मात्रा या गुण के ख्‍याल से समान नहीं होता। जैसे किसी व्‍यक्ति का लग्‍न और राशि मेष हो , तो गोचर काल में जब जब वृष राशि में बलवान चद्रमा आएगा , नियमत: जातक को मात्रा और गुण के संदर्भ में द्वितीय भाव से संबंधित तत्‍वों अर्थात् धन , कोष कुटुम्‍ब आदि के संदर्भ में सुख की अनुभूति होगी। पर जीवन के विस्‍तृत अंतराल में फलित एक जैसा नही होता है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि फलित में यह परिवर्तन ग्रहों की अवस्‍था के अनुसार मनुष्‍य की अवस्‍था पर पडनेवाला प्रभाव है। हम सभी जानते हैं कि लडकपन भोलेपन की जिंदगी होती है। परंतु लडकपन में भोलेपन का कारण किसी भी दशापद्धति के अनुसार दशा और महादशा के हिसाब से भोले ग्रहों का काल नहीं होता। इसी प्रकार विश्‍व के सभी व्‍यक्ति किशोरावस्‍था में ही ज्ञानार्जन करते हैं , चाहे विद्या जिस प्रकार की भी हो , पर दशाकाल के हिसाब से सबकी जन्‍मकुंडली में विद्यार्जन करानेवाले ग्रहों का ही काल नहीं होता है। एक विशेष उम्र में ही लडके और लडकियों में परस्‍पर आकर्षण होता है , वे नियिचत उम्र में ही प्रणय सूत्र में बंधते हैं। दशा अंतर्दशा के हिसाब से कोई औरत वृद्धावस्‍था में प्रजनन नहीं कर पाती है। शारीरिक शक्ति के ह्रास के साथ वृद्धावस्‍था में सभी स्‍त्री पुरूष नीति आचरण की संहिता बन जाते हैं। दशा अंतर्दशा की प्रतिक्षा किए वगैर उपर्युक्‍त घटनाएं स्‍वाभाविक ढंग से प्रत्‍येक व्‍यक्ति के जीवन में घटती रहती है।

इसका अर्थ यह है कि बचपन में भोलेपन के ग्रह यानि चंद्रमा का प्रभाव पडना चाहिए। कुंभ लग्‍न की उन कुंडलियों में , जिसमें चंद्रमा कमजोर हो , बच्‍चे 12 वर्ष की उम्र तक बहुत बीमार होते हैं और शरीर से कमजोर रहते हैं। उनका जन्‍म किस नक्षत्र में हुआ , यह मायने नहीं रखता। इसके विपरीत कर्क लग्‍न के चंद्रबली बच्‍चे शरीर से निरोग रहते हुए अपने बाल साथियों के नेता रहते हैं। वृश्चिक लग्‍न के जातकों में बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कमजोर चंद्र के कारण बालपन में कोई समस्‍या चल रही हो , तो 12 वर्ष की उम्र के पश्‍चात् वे समाप्‍त हो जाती हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में चंद्रमा को बाल ग्रह माना गया है , शास्‍त्रों में भी बालारिष्‍ट योग की चर्चा चंद्रमा के प्रतिकूल प्रभाव से ही की जाती है , इसलिए जीवन के प्रारंभिक भाग को चंद्र की ही दशा समझनी चाहिए।

इसी तरह वास्‍तविक अर्थ में विद्यार्जन का समय 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र तक का होता है। 12 वर्ष के पहले बालक की तर्कशक्ति न के बराबर होती है। ज्ञानार्जन से संबंधित ग्रंथियां 24 वर्ष की उम्र तक पूर्ण तौर पर बन जाती हैं। इसलिए अधिकांश देशों में इस उम्र तक पहुंचते पहुंचते लोगों को बालिग घोषित कर दिया जाता है। इसलिए विद्या के कारक ग्रह बुध का दशाकाल 12 वर्ष से 24 वर्ष तक माना जाना चाहिए। बुध बली इस उम्र में विद्यार्जन के लिए अनुकूल वातावरण प्राप्‍त करते हैं , जबकि जिनका बुध निर्बल होता है , उन्‍हें विद्यार्थी जीवन में मुसीबतें झेलनी पडती हैं।

(24 वर्ष की उम्र के बाद क्रम से किन ग्रहों का दशाकाल आता है, इसे जानने के लिए इस लेख का दूसरा भाग पढें)


सोमवार, 29 अगस्त 2011

जनसामान्‍य के लिए कैसा रहेगा कल शाम साढे तीन से साढे पांच के मध्‍य का समय ??


गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष इस बात को नहीं मानता कि ग्रहों के हिसाब से किसी खास समयांतराल में शुरूआत की जानेवाले कार्यक्रम के हमेशा सुखद या दुखद बने रहने की गारंटी दी जा सके, इस तरह यह मुहूर्त्‍त या शकुन पर विश्‍वास नहीं करता। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के प्रणेता मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा ने अपने इस लेख में  कहा था कि अभी तक ज्‍योतिषियों के लिए यह चुनौती ही है कि शुभ मुहूर्त और यात्रा निकालने के बाद भी किए गए बहुत सारे कार्य अधूरे पड़े रहते हैं या कार्यों की समाप्ति के बाद परिणाम नुकसानप्रद सिद्ध होते हैं । एक अच्छे मुहूर्त में लाखों विद्यार्थी परीक्षा में सम्मिलित होते हैं , किन्तु सभी अपनी योग्यता के अनुसार ही फल प्राप्त करते हैं , फिर मुहूर्त या यात्रा का क्या औचित्य है ?

पर इसके बावजूद हम यह मानते हैं कि आसमान में ग्रहों की शुभ और अशुभ स्थिति होती है और उसका फल विश्‍व के किसी खास भाग की जनता पर अच्‍छे या बुरे रूप में पडता है। जहां एक दुर्घटना से पूरे देश या विश्‍व की जनता आहत होती है , वहीं किसी प्रकार की सुखद खबर से जनता के मध्‍य उत्‍साह की लहर भी फैलती है। कभी कभी प्रभावित क्षेत्र की अधिकांश जनता किसी एक बडी घटना से नहीं , पर अलग अलग छोटी छोटी घटनाओं से छोटे या बडे रूप में प्रभावित होती है। ग्रहों के हिसाब से अच्‍छे समय में परीक्षा हो तो पेपर सहज मिलते हैं , जबकि बुरे समय में पेपर कठिन। ग्रहों के हिसाब से अच्‍छे समय में यात्रा हो तो वह सुखद यादगार होती है , जबकि बुरे समय की यात्रा कष्‍टकर यादगार बन जाती है।

लग्‍न राशिफल लिखते वक्‍त ग्रहों की इसी अच्‍छी या बुरी स्थिति को ध्‍यान में रखा जाता है , ताकि पाठकों को खास अच्‍छे या बुरे दिन तथा खास अच्‍छे या बुरे समय की जानकारी हो सके। ऐसी ही जानकारी अपने राशिफल वाले ब्‍लॉग पर देती आ रही हूं।  दो वर्षों से यह राशिफल चल रहा है , पर 26 , 27 और 28 अगस्‍त के लग्‍न राशिफल में मैने पहली बार सभी राशियों के लिए एक पक्तियां लगायी थी। लिखा था कि इस कार्यक्रम में 2 बजे से 4 बजे तक थोडी बाधा उपस्थित होगी , जबकि सूर्यास्‍त के बाद झंझट के हल होने या सफलता मिलने की उम्‍मीद अधिक दिखती है।

इसका अर्थ यही है कि यह दिन खास महत्‍व का था , जिसमें भारतवर्ष के सभी लग्‍नवाले लोग किसी न किसी कार्यक्रम से जुडनेवाले थे। 26 अगस्‍त को सारे भारतवासियों का ध्‍यान लोकसभा में होनेवाली बहस की ओर लगा था , ठीक 2 बजे के बाद सांसदों के हंगामें के बाद लोकसभा भंग हो गयी और लोगों को निराशा का सामना करना पडा , क्‍यूंकि आनेवाले दो दिन सोमवार और रविवार थे और अनशन दो दिनों तक टल सकता था। अन्‍ना की तबियत बिगड सकती थी। पर सूर्यास्‍त के बाद यानि शाम तक समस्‍या का हल निकला , जब सरकार ने अन्‍ना टीम को बताया कि कल संसद में प्रस्‍ताव पर वोटिंग करायी जाएगी।

दूसरे दिन यानि 27 अगस्‍त को ग्रहों के हिसाब से पुन: 2 बजे से 4 बजे तक कार्यक्रम में बाधा उपस्थित होनी थी , तो इस दौरान बना बनाया काम बिगड गया और सरकार अपनी ही बातों से मुकर गयी और संसद में प्रस्‍ताव पर वोटिंग करवाने से इंकार किया। पूरे देश में निराशा का वातावरण बन गया , पर शाम सूर्यास्‍त होने के बाद वातावरण पुन: सामान्‍य हुआ और सरकार द्वारा हल निकाला गया और रात तक अन्‍ना के अनशन टूटने को पूरी उम्‍मीद बनी। इसके बाद पूरे देश में खुशी की लहर दौड पडी।

इस लेख को लिखने का उद्देश्‍य खुद की प्रशंसा करना नहीं है , क्‍यूंकि यह मेरी बहुत बडी उपलब्धि नहीं। पर ज्‍योतिष के प्रति जनसामान्‍य की भ्रांतियों को दूर करना और ग्रहों के प्रभाव के वैज्ञानिक पक्ष की जानकारी देना मेरा लक्ष्‍य है और इस बात को समझाने के लिए इस प्रकार का उदाहरण देना आवश्‍यक है। आनेवाला 29 और 30 अगस्‍त तो 26 , 27 और 28 अगस्‍त की तरह महत्‍वपूर्ण नहीं , पर इन दोनो दिनों में भी ग्रहों का खास प्रभाव जनसामान्‍य पर मैं देख रही हूं। ग्रहों के प्रभाव से शाम साढे तीन से साढे पांच के मध्‍य हर प्रकार के कार्यक्रम में बाधा आएगी , साढे पांच के बाद थोडी राहत होनी शुरू होगी तथा 7 बजे के बाद अधिकांश कार्यक्रम सफल होता दिखेगा। हां , कुछ लोगों का परिणाम साढे तीन से साढे पांच के मध्‍य ही आ जाएगा , जो असंतुष्टि दायक हो सकता है और उसे नहीं बदला जा सकता है।