मंगलवार, 17 जुलाई 2012

समग्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ..... संगीता पुरी

ज्‍योतिष के बारे में जन सामान्‍य की उत्‍सुकता आरंभ से ही रही है , गणित ज्‍योतिष के क्षेत्र में हमारे ज्‍योतिषियों द्वारा की जाने वाली काल गणना बहुत सटीक है। पर इसके फलित के वास्‍तविक स्‍वरूप के बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं होने से भ्रम की संभावना बनी रहती है, अभी तक यह समझने में सफलता नहीं मिल पायी है कि भाग्‍य बडा या कर्म ????? समय समय पर ज्‍योतिषियों को चुनौती दी जाती रही है ,  पर हेड और टेल  ज्‍योतिष का नहीं आंकडों का खेल होता है। ज्‍योतिषीयों की समस्‍या है कि वे ग्रहीय प्रभाव को सिद्ध नहीं कर पाते। कुछ लोग दैवी विद्या मानकर इसका अंधानुकरण करते हैं , तो कुछ शत प्रतिशत सटीक भविष्‍यवाणी न देने से इसे विज्ञान मानने को तैयार नहीं। ज्‍योतिषियों को चुनौती देने से पहले हमारे सुझाव पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए। हर ज्ञान पहले ही स्‍तर पर विकसित नहीं हो जाती। क्‍या गणित में हर प्रश्‍न का जबाब '='  में दिया जा सकता है ? सारे लोगों के ज्‍योतिष में रूचि और इतने ग्रंथो के होने के बावजूद ज्‍योतिष अबतक विवादास्‍पद क्‍यूं है ?   एक और प्रश्‍न का जबाब देने की कोशिश की गयी , पहले जन्‍म या फिर भाग्‍य .??


फलित ज्‍योतिष एक सांकेतिक विज्ञान है , कर्म का महत्‍व सर्वविदित है , जन्‍मकुंडली पर हमारा वश नहीं , पर अपनी कर्मकुंडली अच्‍छी बनानी चाहिए , ज्‍यातिष में राजयोग जैसे परंपरागत नियमों को आज की कसौटी में कसा जाना चाहिए। चिंतन करना होगा कि क्‍या कहता है हमारी जन्‍मकुंडली का कमद्रुम योग ? अध्‍ययन में हमने पाया कि विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलाना आवश्‍यक नहीं। विभिन्‍न युग में जीवनशैली में अंतर होने से ग्रहों के प्रभाव को भी भिन्‍न भिन्‍न कोण से देखा जाना चाहिए। यही कारण है कि आज जन्‍मकुंडली देखकर जातक के प्रेम विवाह या अभिभावक द्वारा आयोजित विवाह होने के बारे में जानकारी नहीं दी जा सकती है। पर इस दुनिया में सबकुछ नियम से होते हैं, संयोग या दुर्योग कुछ नहीं होता। धन, कर्म और प्रयोग से हमें 'विज्ञान' मिल सकता है, 'ज्ञान' प्राप्‍त करने के लिए ग्रहों का साथ होना आवश्‍यक है। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि प्रकृति से अपने वातावरण और जमाने के अनुकूल मिली विशेषताएं ही हमारा भाग्‍य हैं !! पर समाज से ज्‍योतिषीय भ्रांतियों को दूर करने का अथक प्रयास बेकार नजर आने लगता है तो कभी कभी मन विचलित हो जाता है , तब सोंचती हूं , काश हमारा सपना दिल्‍ली में एक कोठी लेने का ही होता।


गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष कई तरह से परंपरागत ज्‍योतिष से भिन्‍न है। मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट में इसके और इसके जनक के बारे में जानकारी दी गयी है। इसको पढने के बाद आप समझ सकेंगे कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष क्‍या है ? इसमें माना गया है कि जड चेतन को प्रभावित करने की मुख्‍य वजह ग्रहों की गति है। भविष्‍यवाणी में भी ग्रहों की गति पर ध्‍यान दिए जाने के कारण इस पद्धति को 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष कहते हैं, सिर्फ नाम से ही नहीं है गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष!  पच्‍चीस तीस वर्षों तक हमारा घर ज्‍योतिषीय रिसर्च का केन्‍द्र बना रहा , आप मान सकते हैं कि हमारी छत एक तरह की वेधशाला ही थी।  ग्रहों के आसमान में स्थिति का पृथ्‍वी के जड चेतन पर बनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव प्रत्‍यक्ष तौर पर पडता है ,क्‍या इस तरह के ग्राफों के बाद भी ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाया जा सकता है ?? समय युक्‍त भविष्‍यवाणियां प्रदान करने के कारण  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के जानकार को समय विशेषज्ञ माना जा सकता है। इस ब्‍लॉग के एक पोसट में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: ग्रहों का प्रभाव’ पुस्‍तक की उपलब्‍धता ..के बारे में भी विस्‍तार से लिखा गया है। वास्‍तव में हर क्षेत्र की घुसपैठ से ज्‍योतिष अधिक बदनाम हुआ है !! प्रकृति के नियमों की जानकारी से अहंकार समाप्‍त होता है , ज्‍योतिष का सही ज्ञान हमें आध्‍यात्‍म की ओर भी ले जाता है !!


व्‍यक्ति के बालपन से ही चंद्रमा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव शुरू हो जाता है। च्रदमा कमजोर होने से भले ही बाल मन के मनोवैज्ञानिक विकास में कमी आती है , पर ऐसे चंद्रमा के साथ कुछ योग मिलकर उसे असाधारण व्‍यक्तित्‍व का स्‍वामी बना सकते हैं। मेरे ब्‍लॉग में आप मंगल के बारे में विशेष जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं , इसका प्रभाव हमेशा एक सा नहीं होता , आकाश में मंगल की विभिन्‍न स्थिति का पृथ्‍वी पर अच्‍छा और बुरा प्रभाव  पडता है। मंगल के खास प्रभाव को दिखाते हुए विज्ञान दिवस पर खगोलविदों के लिए भी एक खास लेख लिखकर उन्‍हें इस नई पद्धति के बारे में जानकारी देने की कोशिश की गयी। इस आधार पर भृगुसंहिता लिखने की भी कोशिश हुई। क्‍या आपने भृगुसंहिता का नाम सुना है ? महर्षि भृगु द्वारा रचित यह एक कालजयी पुस्‍तक है , उसमें ग्रहों की गति के आधार पर फल में आनेवाले अंतर को दिखाया जाना था , पर भृगुसंहिता आधा अधूरा ही रह गया। काफी दिनों से इसे पुन: लिख पाने के प्रयास में हू , पर पुन: 'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' तैयार करने में इतनी देरी होने का कारण  भी स्‍पष्‍ट है। प्रत्‍येक लग्‍नवालों की चारित्रिक विशेषताओं और उनके विभिन्‍न संदर्भों के मध्‍य सहसंबंध को दिखलाते हुए बारह लेख लिखें गए , यह प्रमाणित किया गया कि मेष लग्‍न की कुंडली मानव जाति की जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करती है !! इसके साथ ही एक लेख यह भी कि कुंभ लग्‍न की कुंडली भारतीयों के जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करती है !!


गोचर के ग्रहों पर आधारित फल को आसानी से महसूस किया जा सकता है , खासकर बहुत आसान है चंद्रमा के प्रभाव को समझना। ज्‍योतिष के वैज्ञानिक तौर पर सक्षम होने के बावजूद राशिफल की वैज्ञानिकता में कुछ संशय है , पर लग्‍न राशिफल वैज्ञानिक और विश्‍वसनीय माने जा सकते हैं। जन्‍म कालीन ग्रहों से जीवन में वैवाहिक संदर्भों के अच्‍छे या बुरे होने का पता चलता है , पर विवाह समय के निर्धारण में मंद ग्रहों की भूमिका होती है। इसी प्रकार अन्‍य घटनाओं के लिए भी ग्रह की विभिन्‍न स्थितियां जिम्‍मेदार होती है, इसे समझा जा सकता है , दूर नहीं किया जा सकता। भूकम्‍प के बारे में की गयी मेरी भविष्‍यवाणी के सटीक होने के बाद मैने लिखा था काश मेरी भविष्‍यवाणी सही नहीं हुई होती।वास्‍तव में ज्‍योतिष को अन्‍य विज्ञान से काटकर रख दिया गया है , जबकि सच तो यह है कि  अन्‍य विज्ञानों से तालमेल बनाकर ही ज्‍योतिष को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है !!फिर तो   चार दिनों तक चलती रही हमारी बहस .. संपादन के बाद आपके लिए एक पोस्‍ट तैयार हो गयी !!


कुछ दिनों से लगातार 2012 दिसम्‍बर के बारे में विभिन्‍न स्रोतो से भयावह प्रस्‍तुतियां की जा रही हैं। 2012 दिसंबर को दुनिया के समाप्‍त होने के पक्ष में जो सबसे बडी दलील दी जा रही है , वो इस वक्‍त माया कैलेण्‍डर का समाप्‍त होना है। दुनिया के नष्‍ट होने की संभावना में एक बडी बात यह भी आ रही है कि ऐसा संभवतः पृथ्‍वी के चुंबकीय ध्रुव बदलने के कारण होगा। वास्‍तव में हमलोग सूर्य की सिर्फ दैनिक और वार्षिक गति के बारे में जानते हैं , जबकि इसके अलावे भी सूर्य की कई गतियां हैं। जब अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की ओर से पृथ्‍वी के धुर बदलने या किसी प्रकार के ग्रह के टकराने की संभावना से इंकार किया जा रहा है , तो निश्चित तौर पर प्रलय की संभावना सुनामी, भूकम्‍प, ज्वालामुखी, ग्लोबल वार्मिग,अकाल, बीमारियां, आतंकवाद, युद्ध की विभीषिका व अणु बम जैसी घटनाओं से ही मानी जा सकती है, जिनका कोई निश्चित चक्र न होने से उसके घटने की निश्चित तिथि की जानकारी अभी तक वैज्ञानिकों को नहीं है। पिछले 40 वर्षों से‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’विश्‍व भर में होनेवाले इन प्राकृतिक या मानवकृत बुरी घटनाओं का ग्रहीय कारण ढूंढता रहा है। 


अक्‍सर कुछ लोग पूछते हैं कि क्‍या ज्योतिष आम जन के लिए उपयोगी हो सकता है ?? जरूर , समय की जानकारी देकर टार्च , घडी और कैलेण्‍डर की तरह ही गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष आपकी मदद कर सकता है। इसके अलावे अच्‍छे मुहूर्त्‍त में बनी अंगूठी पहनकर स्‍वयं को बुरे ग्रहों के प्रभाव से बचाया जा सकता है, पूर्णिमा के दिन तैयार किए गए छल्‍ले को लगभग सभी व्‍यक्तियों को पहनना चाहिए।  इस वैज्ञानिक युग में पदार्पण के बावजूद अभी तक हमने प्रकृति के नियमों को नहीं बदला । युग की दृष्टि से किसी वस्तु का विशेष महत्व हो जाने से हम पाय: उसी वस्तु की आकांक्षा कर बैठते हैं , तो क्या अन्य वस्तुओं को लुप्त होने दिया जाए ? इस प्रकार वे अपने जीवनग्राफ के अच्छे समय के समुचित उपयोग द्वारा विशेष सफलता हासिल कर सकते हैं , जबकि बुरे समय में वे प्रतिरोधात्मक ढंग से जीवन व्यतीत कर सकते हैं । भविष्‍य में उत्पन्न होनेवाले बच्चों के लिए गत्यात्मक ज्योतिष वरदान हो सकता है। ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। 


साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए।  'गत्यात्मक ज्योतिष' भी कमजोर ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए उससे संबंधित रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह देता है। प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है।अन्‍य बातों की तरह ही जब गंभीरतापूर्वक काफी दिनों तक ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में पेड पौधों की भूमिका का भी परीक्षण किया गया तो निम्न बातें दृष्टिगोचर हुई। पर आजकल आपका शुभ मुहूर्त्‍त चल रहा होता है तो आप गहने नहीं बनवाते , गहने खरीदकर ले आते हैं , वह गहना उस समय का बना हो सकता है , जब आपके ग्रह कमजोर चल रहे थे। इसलिए इन सारे ग्रहों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए संबंधित जगहों पर दान करना या मदद में खडे हो जाना उचित है। इसमें किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती , सीधे स्‍वीकार कर लेना बेहतर है। पर प्रकृति से दूर कंप्‍यूटर में विभिन्‍न रंगों के संयोजन से तैयार किए गए नाना प्रकार के रंगों में से एक को चुनना आज हमारा फैशन है और वह हमें ग्रहों के दुष्‍प्रभाव से लडने की शक्ति नहीं दे पाता। यही कारण है कि हमें कृत्रिम तौर पर रंगों की ऐसी व्‍यवस्‍था करनी होती है , ताकि हम विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रह सके।

29 टिप्‍पणियां:

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

अनुठी पोस्ट, गागर में सागर ।

BS Pabla ने कहा…

वाकई में अनूठी!

JHAROKHA ने कहा…

Adarniya Sangeeta ji,
Bahut hi gyanvardhak aur tathyon se purn post....Abhar.
Poonam

JHAROKHA ने कहा…

Adarniya Sangeeta ji,
Bahut hi gyanvardhak aur tathyon se purn post....Abhar.
Poonam

kase kahun?by kavita verma ने कहा…

vakai is chamtkari vigyan ko samjhna bahut kathin hai aap ise sundar tareeke se logo tak pahuncha rahi hain..abhar

विनोद सैनी ने कहा…

शानदार प्रस्‍तुति
ब्‍लाग को ज्‍वाईन किया गया है आप भी युनिक को करे तो खुशी होगी

युनिक तकनीकी ब्‍लाग

विष्णु बैरागी ने कहा…

अद्भुत! कितने सारे उल्‍लेख? कितने सारे सन्‍दर्भ? कितना परिश्रम करती हैं आप? प्रेरक है आपकी इस पोस्‍ट का परिश्रम।

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

गूढ़ को सरल करती रचना | मूढ़ भी प्रभावित हुआ |

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

बहुत अच्छी व गवेषणात्मक जानकारी. साधुवाद.

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

बहुत अच्छी व गवेषणात्मक जानकारी. साधुवाद.

अली शोएब सैय्यद ने कहा…

अद्भभुत...लगा जैसे एक लोटे में समुन्दर समा गया...सिर्फ एक शब्द फिलहाल ज़हन में है आपके लिये संगीता जी....बेहतरीन

Shashiprakash Saini ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट
एक नया नजरिया दिया आपने ज्योतिष को देखने का

निर्मला कपिला ने कहा…

aapakee karmaTHataa se is vidhaa kaa acchaa pracaar prasaar ho rahaa hai| bahut bahut shubhakaamanaayeM|

निर्मला कपिला ने कहा…

bahut acchee baat hai shubhakaamanaayeM|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

समग्रता को समेटे यह अद्भुत पोस्ट ..... बीच में एक दो लेख पढे .... माया कैलेंडर के बारे में और भाग्य के बारे में ....
कर्म के साथ भाग्य का भी बहुत महत्त्व है मैं तो यही मानती हूँ .... लेकिन खाली भाग्य भरोसे भी कुछ हासिल नहीं हो सकता ॥कर्म तो करना ही पड़ेगा ।
इस पोस्ट को पढ़ने फिर आना होगा क्यों कि इसमें बहुत से लेखों के लिंक हैं जिनसे सार्थक जानकारी मिलेगी ... आभार

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut achchi lagi jaankari

Kumar Radharaman ने कहा…

कोई भी विधा बगैर स्वयं को प्रमाणित किए इतने समय तक जीवित नहीं रह सकती। निश्चय ही,ज्योतिष ने भी अपनी प्रतिष्ठा गणना के कारण नहीं,फलकथन की सत्यता के आधार पर ही बनाई होगी। जब यह विधा फलकथन के योग्य बनी होगी,तब की और अब की परिस्थितियां बहुत भिन्न हैं। हमारे जीवन में जटितलाएं लगातार बढ़ती गई हैं जिनकी नए संदर्भ में व्याख्या न होने के कारण ही ज्योतिष की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं। धंधेबाज़ों ने इस विधा को बहुत नुक़सान पहुंचाया है। जब उनकी बात सही निकलती है,वे सीना ताने चैनलों पर घूमते हैं। जब ग़लत निकलती है,दो-चार महीने भूमिगत रहकर वे फिर सामान्य हो लेते हैं जिसका ज्योतिष के अन्य जानकारों द्वारा मुखर विरोध न करने के कारण इस विधा को लेकर लोगों के मन में आशंकाएं लगातार बढ़ती जाती हैं।

expression ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट.....
संग्रहणीय....

आभार
अनु

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

adbhut... kaise itna sab aap bata pati hain:)

digvijay ने कहा…

kaafi dino baad aapka aalekh net par aaya hai...

digvijay ने कहा…

kaafi samay baad aapka aalekh net par aaya... kaafi gyanvardhak tha..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मेरी टिप्पणी कहाँ गयी ? मैं दोपहर को पढ़ कर और टिप्पणी दे कर गयी थी ....

खैर समग्रता से लिखा अद्भुत लेख .... इनमें दिये लिंक्स भी देखे ॥सारे नहीं अभी फिलहाल दो ही पढे हैं :)

vinay ने कहा…

एक ही शब्द "शानदार" ।

संध्या शर्मा ने कहा…

सचमुच अद्भुत पोस्ट.... सोच रही हूँ कितने परिश्रम से तैयार की होगी आपने. एक ही पोस्ट में सबकुछ एक साथ...जानकारी का खजाना दे दिया आपने ... बहुत - बहुत आभार संगीता जी ...

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

जय हिन्द

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत कुछ सीखने समझने को मिला।

Hemendra ने कहा…

संगीता जी,
एक नया नजरिया दिया आपने ज्योतिष को देखने का
बहुत अच्छी व गवेषणात्मक जानकारी.आपको बहुत-बहुत साधुवाद.आपसे संपर्क करना चाहता हु, क्या आप अपना mob॰ no॰ देना पसंद करेगी

Hemendra ने कहा…

Please provide your Mob. No. to contact you

संगीता पुरी ने कहा…

मेरा फोन नं है 09835192280