रविवार, 22 दिसंबर 2013

ज्‍योतिष का अन्‍य विज्ञानों के साथ धनात्‍मक सहसंबंध आवश्‍यक ... अतिथि पोस्‍ट विद्या सागर महथा ( Astrology )


पृथ्‍वी की निरंतर गतिशीलता के कारण प्रत्‍येक दो घंटे में विभिन्‍न लग्‍नों का उदय है। इसकी दैनिक गति के कारण दिन और रात का अस्तित्‍व है, वार्षिक गति के कारण इसके ऋतु परिवर्तन का चक्र। गति के कारण ही चंद्रमा का बढता घटता स्‍वरूप है , गति के कारण विशिष्‍ट ग्रहों की पहचान है। सूर्य और चंद्र की गति के कारण ही नक्षत्रों का वर्गीकरण है , सूर्य और चंद्र का ग्रहण है। ग्रहों की गति के कारण ही संसार का नित नूतन पिरवेश है और इसी परिवर्तनशीलता के कारण इसका नाम जगत है। न्‍यूटन ने गति के सिद्धांत को समझा, तो भौतिक विज्ञान में क्रांति आ गयी। आज उन्‍ही सिद्धांतों को अधिक विकसित कर वैज्ञानिक अंतरिक्ष में अरबों मील की यात्रा करके तरह तरह की खोज करके सकुशल पृथ्‍वी पर लौट आते हैं।

सृष्टि काल के आरंभ से ही सूर्य , चंद्र और सभी ग्रहों की गति हमारे लिए आकर्शण का केन्‍द्र बने रहें। वैदिककालीन विद्याओं में यह प्रमुख विद्या थी , इसलिए इसे वेद का नेत्र कहा जाता था। उस समय से आजतक आकाशीय पिंडों की गति और स्थिति के विषय में बहुत जानकारी प्राप्‍त कर ली गयी है , सभी पिंडों की गति और परिभ्रमण पथ की इतनी सूक्ष्‍म जानकारी आज है कि आज से सैकडों वर्ष बाद के सभी ग्रहों की स्थिति , सूर्य और चंद्र ग्रहण की जानकारी मिनट सेकण्‍ड की शुद्धता के साथ दी जा सकती है। सूर्य चंद्र परिभ्रमण पथ की सम्‍यक जानकारी के कारण यह भी बताया जा सकता है कि पृथ्‍वी के किस भाग में यह ग्रहण दिखाई पडेगा। यही कारण है कि गणित ज्‍योतिष की पढाई संपूर्ण विश्‍व में हो रही है। गति की सम्‍यक जानकारी के कारण ही पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग , करण आदि का समुचित उल्‍लेख किया जाता है , पर फलित के मामलों में गहों की गति की उपेक्षा की गयी है। फलित ज्‍योतिष में ग्रहों की सिर्फ स्थिति पर ही विचार किया गया है , इसलिए आज तक इसके द्वारा कहा जाने वाला फल अधूरा और अनिश्चित रह गया है।

पृथ्‍वी स्‍वयं गतिशील है , दैनिक और वार्षिक गति के कारण अपने अक्ष और कक्षा में सदैव अपने को हजारो मील दूर ले जाती है। किंतु पृथ्‍वी वासी होने के कारण हमें इसकी गति का आभास भी नहीं हो पाता है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी पर स्थित हर जड चेतन की गति पृथ्‍वी की गति के बराबर हो जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ट्रेन पर सवार सभी व्‍यक्ति विरामावस्‍था में होते हुए भी लंबी दूरी तय कर लेते हैं। फलित ज्‍योतिष के अध्‍येता अपने को ब्रह्मांड का केन्‍द्र विंदू मानकर इसे स्थिरावस्‍था में समझते हुए ही संपूर्ण ब्रह्मांड और आकाशीय पिंडों का अध्‍ययन करता है। ब्रह्मांड में दरअसल पृथ्‍वी के साथ शेष ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: पृथ्‍वी को विरामावस्‍था में मानने से इसके सापेक्ष सभी ग्रहों की सापेक्षिक गति की जानकारी होती है।

पृथ्‍वी सूर्य की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करता है , इस कारण उसके सापेक्ष सूर्य की समरूप गति को हम देख पाते हैं , चंद्रमा को भी पृथ्‍वी की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करते हुए देखा जा सकता है। भचक्र में ये दोनो ग्रह लगभग समरूप गति में होते हैं। सूर्य कभी उत्‍तरायण तो कभी दक्षिणायण होता है , उसके हिसाब से विभिन्‍न ऋतुएं होती हैं , विभिन्‍न नक्षत्रों से गुजरता है तो उसके अनुरूप उसका फल होता है। चंद्रमा के प्रकाशमान भाग के अनुरूप ही जातक की मनोवैज्ञानिक शक्ति होती है । किसी निश्चित तिथि को सूर्य आकाश के एक निश्चित भाग में ही होता है , पर उस दिन जन्‍म लेने वाले समस्‍त जातकों की कुंडली में विभिन्‍न भावों में दर्ज किया जाता है। उसका फल भी भिन्‍न भिन्‍न जातकों के लिए अलग अलग होता है।

आकाश में शेष ग्रहों का पृथ्‍वी से अप्रत्‍यक्ष गत्‍यात्‍मक संबंध है। यानि की सौरमंडल में अन्‍य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए कभी पृथ्‍वी की ओर आ जाते हैं , तो कभी पृथ्‍वी के विपरीत दिशा में। इसके कारण पृथ्‍वी से विभिन्‍न ग्रहों की दूरी और सापेक्षिक गति बढती घटती है। पृथ्‍वी के सापेक्ष कभी कभी ग्रहों की गति ऋणात्‍मक भी हो जाती है। ‘गणित ज्‍योतिष’ में इसकी विशद चर्चा है , पर ‘फलित ज्‍योतिष’ का अध्‍ययन करते वक्‍त आज तक ग्रहों की इस गति को नजरअंदाज कर दिय गया , जो ग्रहों के बलाबल का सही आधार है। यह विडंबना ही है कि बंदूक की छोटी सी गोली में उसकी शक्ति का अनुमान उसकी गति के कारण हम सहज ही कर लेते हैं। हथेली पर एक छोटा सा पत्‍थर का टुकडा रखकर अपने को बलवान समझते हैं , क्‍यंकि उसे गति देकर शक्ति उत्‍सर्जित की जा सकती है , पर हजारो मील प्रतिघंटा की गति वाले भीमकाय ग्रहों की शक्ति को आज तक ज्‍योतिषी इसकी स्थिति में ढूंढते आ रहे हें। जाने अनजाने ग्रहों की गति के रहस्‍य को नहीं समझ पाने से फलित ज्‍योतिष की गति स्‍वत: अवरूद्ध हो गयी। यही करण है कि हजारो वर्षों से इसकी स्थिति यथावत बनी हुई है और लोग इसे अनुमान शास्‍त्र कहने लगे हैं।

प्रकृति के नियम बहुत ही सरल होते हैं , एक दो प्रतिशत ही अपवाद होते हैं,पर इसे समझने में हमें बहुत समय लग जाता है। फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में ग्रह शक्ति के निर्धारण के लिए बहुत सारे नियम हैं। स्‍थान बल , काल बल , दिक बल , नैसर्गिक बल , चेष्‍टा बल , अंश बल , योग कारक बल , पक्ष बल , अयन बल , स्‍थान बल के अलावे भी ष्‍डवर्ग अष्‍टकवर्ग आदि आदि। इसका अभिप्राय यह है कि हमारे .षि मुनि पूर्व ज्‍योतिषियों ने ग्रह शक्ति को समझने की चुनौती को स्‍वीकार किया था। इस परिप्रेक्ष्‍य में उनके द्वारा बहुआयामी प्रयास किया गया , इस लिए ग्रहशक्ति से संबंधित इतने नियम हैं , किंतु व्‍यवहारिक दृष्टि से एक ज्‍योतिषी इतने नियमों को आतमसात करते हुए तल्‍लीन रहकर भविष्‍य कथन नहीं कर सकता। इतने नियमों के मध्‍य विभिन्‍न ज्‍योतिषियों के फलकथन में एकरूपता की बात हो ही नहीं सकती। ज्‍योतिष के इन जटिल सूत्रों ने ग्रह फल कथन में ज्‍योतिषियों के निष्‍कर्ष में विरूपता पैदा कर इसके वैज्ञानिक स्‍वरूप को नष्‍ट करते हुए इसे अनुमान शास्‍त्र बना दिया है। इन उलझनों से बचने के लिए एकमात्र उपाय ग्रहों की गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहरा लेना समीचीन सिद्ध हुआ है। फलित ज्‍योतिष में अन्‍य नियमों की तरह ये नियम भी ग्रह शक्ति निर्धारण के लिए एक नया प्रयोग नहीं है। सन् 1981 से अबतक चालीस पचास हजार कुंडलियों में किए गए प्रयोग का निचोड निष्‍कर्ष है।

फलित ज्‍योतिष सबसे पुरानी विधाओं में एक वैदिककालीन विद्या है। किंतु भौतिक विज्ञान में वर्णित न्‍यूटन के गति के सिद्धांत का आविष्‍कार सन् 1887 में हुआ , इससे पूर्व ज्‍योतिष में इसका उपयोग संभव नहीं था। पर उसके बाद इसका उपयोग फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी होना चाहिए था , क्‍यूंकि किसी भी विज्ञान का विकास विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाकर ही होता है। अगर हम फलित ज्‍योतिष को विज्ञान बनाना चाहते हैं तो हमें भौतिक विज्ञान में वर्णित गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहारा लेना , उसका उपयोग करना एक स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण होगा। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में ग्रहों की गति की विशद व्‍याख्‍या करते हुए इसकी विभिन्‍न प्रकार की गतियों का सपष्‍ट भिन्‍न भिन्‍न प्रभाव मानव जाति पर कैसे पडता है , का अध्‍ययन किया गया है।

मेरे पिताजी विद्या सागर महथा जी के द्वारा लिखा गया 

मंगलवार, 21 मई 2013

हाल फिलहाल हमारे सॉफ्टवेयर के पन्‍ने पर बना चार्ट सबकुछ स्‍पष्‍ट कर देता है ....( Astrology )

चार छह दिन पहले मैने एक पोस्‍ट में स्‍पष्‍ट किया कि काफी दिनों से मेरी भी इच्‍छा एक ऐसा ही चार्ट बनाने की थी , जिसमें अलग अलग आयु में लोगों के अलग अलग प्रकार के सुख और दुख को स्‍पष्‍टत: बताया जा सके। सहारा तो हमें इसी सूत्र का लेना था , पर परिणाम शब्‍दों में निकालना था। तीन महीने तक 84 खानों में अलग अलग सटीक परिणाम लाने के प्रयास में गंभीर मशक्‍कत होनी ही थी , पर इसके बाद कल मिली सफलता से मैं खुद ही चौंक गयी। कारण यह है कि किसी कुंडली में मौजूद जिस समस्‍या को मैं पहचान लेती थी , उसे दोनो ग्राफ से स्‍पष्‍ट नहीं कर पाती थी और सामने वाले को समझाना पडता था ख्‍ जिसे वे झूठी दलील भी समझ सकते थे। पर अब इस चार्ट से सामनेवाले को समझाने में दिक्‍कत नहीं होती।

इंटरनेट में सक्रियता की वजह से भविष्‍य को जानने के इच्‍छुक लोगों के दो चार जन्‍म विवरण प्रतिदिन मिलते हैं , अपने कार्यक्रमों को लेकर काफी व्‍यस्‍तता की वजह से मैं अधिकांश का काम नहीं कर पाती। कभी फुर्सत मिलने पर बिना किसी प्राथमिकता के डायरी, ईमेल , मोबाइल के मैसेज या फेसबुक मैसेज को खोलकर दो चार छह जन्‍मपत्रियों पर काम शुरू कर उन्‍हें उनका परिणाम भेजती हूं  , कभी कभी उसी दौरान फोन कर लेने वालों की भी कुंडलियों का अध्‍ययन हो जाता है। मतलब यहां भी भाग्‍य की ही सक्रियता ही होती है , वरना किसी के जन्‍म विवरण वर्षों इन्‍बॉक्‍स में पडे होते हैं और किसी का काम एक दो महीने के अंदर क्‍यों होता ??

अब बात मुद्दे की , अभी इसी महीने एक जन्‍म विवरण मिला , कल अपने सॉफ्टवेयर में उसे डालने का मौका मिला। उसका पहला ग्राफ यानि जीवन के उतार चढाव का चित्र इस प्रकार था .....

 इस ग्राफ में परिस्थितियों की कोई गडबडी नहीं दिख रही है , यानि कुल माहौल संतोषजनक है। इसके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों के सुख और दुख को समझाने वाला चार्ट इस प्रकार था ....

इससे स्‍पष्‍ट हो गया कि जीवन के बाकी संदर्भों की तुलना में इस जातक के धन और लाभ का सुख काफी कमजोर है। पर इस चार्ट से भी यह साफ नहीं हो पाया कि उम्र के किस अंतराल में इससे संबंधित सुख या दुख मिल सकता है । इसे स्‍पष्‍ट किया हाल फिलहाल के पन्‍ने पर बने चार्ट ने .....

धन या लाभ का ग्रह किसी भी अवधि में सुखद स्थिति में नहीं है , पर जातक का और कोई पक्ष कमजोर नहीं , इसलिए यह भी स्‍पष्‍ट है कि धन की कमी जीवन में बाधा नहीं बनेगी , किसी न किसी तरह काम हो ही जाएगा। इन तीनो चार्ट के अलावा उसे जो मैसेज किया वह इस प्रकार है ....

सॉफ्टवेयर ने आपके जन्‍म विवरण से ये तीन तरह के ग्राफ्स निकाले हैं .. पहले ग्राफ के हिसाब से तो 2009 के बाद परिस्थितियों का ग्राफ कुछ सुधरा हुआ लग रहा है .. पर पाई चार्ट को देखने पर महसूस हुआ कि धन कोष या लाभ देने वाला ग्रह बृहस्‍पति काफी कमजोर है . इसलिए इनका सुख आपके जीवन में कम हैं .. तीसरे चार्ट में धन या लाभ के कॉलम को आप देखेंगे तो पाएंगे कि लगभग हर उम्र मे आपको धन से संबंधित मामलों को लेकर समझौता या कठिनाई का सामना आपको करना पड रहा है .. जीवन में ओर किसी तरह के सुख में कमी नहीं है , इसलिए काम तो किसी तरह हो ही जाता होगा आपका .. पर धन का कष्‍ट तो है जीवन में .. 3 या 4 अगस्‍त 2013 को आपको सूट करने वाला एक अच्‍छा मुहूर्त्‍त आ रहा है .. शाम साढे पांच बजे से साढे सात बजे तक यदि कोई अंगूठी बनवाकर पहने तो थोडा लाभ हो सकता है .. उसे पहनने के बाद तीन चार महीने के अंदर या जितनी जल्‍द हो सके .. अपने स्‍थायित्‍व की व्‍यवस्‍था करें .. सफलता मिलेगी , बहुत बडा कोई रिस्‍क न लें .. आपके पास जो संसाधन हैं , उतने का उपयोग करते हुए अपने स्‍तर के अनुरूप स्‍थायित्‍व की व्‍यवस्‍था करें .. क्‍योंकि प्रचुर धन की संभावना आगे भी कम दिखती है ।





गुरुवार, 16 मई 2013

सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करने में कल मिली एक बडी सफलता ( Astrology )

अभी तक एक स्‍वर से गणित ज्‍योतिष को विज्ञान स्‍वीकार किए जाने के बावजूद इसी पर आधारित फलित पक्ष पर हमेशा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों के द्वारा सवालिया निशान लगाया जाता रहा है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इसे चुनौतीपूर्ण ढंग से लेते हुए इस शास्‍त्र को भी वस्‍तुपरक बनाने का पूरा प्रयास किया है। इस चिट्ठे को नियमित तौर पर पढने वालों को मालूम हो ही गया होगा कि ग्रहों के प्रभाव की इस नई गत्‍यात्‍मक खोज के बाद किसी भी व्‍यक्ति के जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर उसके पूरे जीवन के उतार चढाव का चिंत्र खींचा जा सकता है। लगभग 40 से 50 हजार लोगों की जन्‍मकुंडली में इस ग्राफ की सटीकता को देखा गया , इस पोस्‍ट में कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जन्‍मकालीन ग्रहों पर आधारित जीवन ग्राफ की चर्चा हुई है , जिसमें देखा जा सकता है कि उनके जीवन में परिस्थितियों का उतार चढाव इस ग्राफ के सापेक्ष ही रहा। इसी तरह हमारा सॉफ्टवेयर एक पाई चार्ट भी तैयार करता है , जिससे मालूम होता है कि पूरे जीवन आपके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का सुख दुख किस किस अनुपात में होगा। पर इस तरह के ग्राफ को देखने से यह स्‍पष्‍ट तो होता है कि किसी के जीवन में आनेवाला समय धनात्‍मक होगा या ऋणात्‍मक , पर यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता कि जीवन में उतार या चढाव किन किन संदर्भों को लेकर होगा।

वस्‍तु परक ढंग से इसे समझाने के लिए मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी ने भी कई तरह के प्रयोग किए , जिसमें बीस पच्‍चीस वर्ष पूर्व उनके द्वारा बनायी जाने वाली हस्‍त लिखित जन्‍म कुंडली में बनाया गया एक चार्ट सबसे महत्‍वपूर्ण था ....
इस चार्ट में एक ओर जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का उल्‍लेख है तो दूसरी ओर जीवन के विभिन्‍न आयु वर्ग का भी। किस आयु वर्ग में किसी व्‍यक्ति के जीवन का कौन सा संदर्भ किस स्थिति में रहेगा , इसको उससे संबंधित खाने में भरा गया है।  A > B > C > D का चिन्‍ह बतलाता है कि जिस खाने में D लिखा हो उसे कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से कमजोर और जिस खाने में A लिखा हो उसे  कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से मजबूत समझा जाना चाहिए। इसी प्रकार + ऊंचे मनोबल के लिए तथा - मनोबल की गिरावट के लिए लिखा गया है। + और - में जितना अधिक पावर है , उस उम्र और उस संदर्भ में किसी का मनोबल उतना ही बढा या घटा हुआ होगा। इसी प्रकार दो तीन और चिन्‍ह के लिए भी अलग अलग अर्थ हैं , जिन्‍हें पाठक देख सकते हैं।

पिछले दस वर्षों से मैं नियमित तौर पर अपने पिताजी के 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सभी सिद्धांतों को कंप्‍यूटराइज्‍ड कर कंप्‍यूटर से अलग अलग प्रकार के फल लेने की कोशिश करती आ रही हूं। काफी दिनों से मेरी भी इच्‍छा एक ऐसा ही चार्ट बनाने की थी , जिसमें अलग अलग आयु में लोगों के अलग अलग प्रकार के सुख और दुख को स्‍पष्‍टत: बताया जा सके। सहारा तो हमें इसी सूत्र का लेना था , पर परिणाम शब्‍दों में निकालना था। तीन महीने तक 84 खानों में अलग अलग सटीक परिणाम लाने के प्रयास में गंभीर मशक्‍कत होनी ही थी , पर इसके बाद कल मिली सफलता से मैं खुद ही चौंक गयी, जब मेरे सॉफ्टवेयर ने एक जन्‍मविवरण से इस तरह का पन्‍ना निकाला ........

उम्र के जिस जिस भाग में उन्‍हें जिस जिस प्रकार की सफलताएं और असफलताएं मिली , इसका सटीक उल्‍लेख इस एक पन्‍ने में मिल जाता है , वैसे तो इस खोज का सारा श्रेय मेरे पिताजी को ही जाता है , पर मैं कंप्‍यूटर की थोडी जानकारी रखते हुए अपने सॉफ्टवेयर में सटीक परिणाम ले आती हूं तो वह भी कम बडी उपलब्धि नहीं। 

शनिवार, 11 मई 2013

अंधविश्‍वास , आस्‍था और विज्ञान ( Astrology )

वह विश्‍वास जो तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता , हम अंधविश्‍वास कहते हैं , अंधविश्‍वास से स्‍वस्‍थ समाज का निर्माण नहीं हो सकता । कभी कभी अंधविश्‍वास समाज में व्‍यापक रूप से व्‍याप्‍त रहता है । इससे जनसमुदाय को बडा नुकसान होता है। स्‍वस्‍थ समाज के विकास क्रम में बहुत सारी बाधाएं होती हैं । अंधविश्‍वास का लाभ चंद ऐसे लोगों को मिलता है , जो बहुत ही धूर्त्‍त होते हैं । अंधविश्‍वास परिवार , समाज या राष्‍ट्र को तोडता है , आदमी से आदमी को अलग करता है। अपेक्षाकृत कम बुद्धिवाले या संकीर्ण बुद्धि वाले इससे प्रभावित होते हैं। बुद्धिजीवी के लिए यह कष्‍टकर होता है , भगवान चम्‍मच से दूध पी रहे हैं , इन्‍हें दूध पिलाओ , पूरा संसार एक ही दिन में करोडों चम्‍मच का उपयोग करते हुए भगवान को दूध पिलाया। यह अंधविश्‍वास है , भगवान निश्चित रूप से आस्‍था का विषय हैं , लेकिन वे दूध पी रहे हैं , यह अंधविश्‍वास है। अंधविश्‍वास बहुत समय तक जीवित नहीं रहता या टिकाऊ नहीं होता।

आस्‍था वह विसवास है , जिससे सदा सर्वदा हमारा मन स्‍वीकार करता है ,, लेकिन जिसे हम प्रमाणित करने में कठिनाई महसूस करते हैं , पृथ्‍वी की बडी से बडी आबादी यह स्‍वीकार करती है , कि भगवान हैं। हममें तुममें खड्ग ख्‍ंभ में भगवान हैं , उसकी अभिव्‍यक्ति के लिए इसके स्‍वरूप और चरित्र चिंत्रण में अनेकानेक कथाओं को सहारा लेते हैं। हरि अनंत हरि कथा अनंता। उनके निवास के लिए मंदिर मस्जिद , गि‍रजाघर और गुरूद्वारे का निर्माण करते हैं। हर व्‍यक्ति अपनी अपनी भावना के अनुसार उनके दर्शन करते हैं। कोई राम कोई मुहम्‍मद पैगंबर , कोई ईसा मसीह को मानते हैं। इस प्रकार जाकि रहे भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन तैसी । लेकिन भवनों के निर्माण में या उनके स्‍वरूप के निर्धारण में पूरी आबादी में एकता का अभाव है।

वैज्ञानिकों के देखने का नजरिया कुछ भिन्‍न होता है , वे संपूर्ण ब्रह्मांड, आकाशीय पिंडों , पृ;थ्‍वी , अनु परमाणु , इलेक्‍ट्रोन , प्रोट्रोन , न्‍यूट्रॉन , गॉड पार्टिकल के रूप में इसे स्‍वीकारण्‍ करते हैं। जिससे सारे विश्‍व का निर्माण हुआ , यह सर्वत्र व्‍याप्‍त है , शाष्‍वत है , अक्षुण्‍ण है , हर काल में मौजूद है । कभी नश्‍वर नहीं होता। हम सौर परिवार में रहते हैं। इसमें स्थित सारे ग्रह उपग्रह निरंतर गतिशील हैं , पृथ्‍वी में रहनेवाले हर व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली बन सकती है। जन्‍म कालीन ग्रहों की गति और स्थिति से हर व्‍यक्ति विभिन्‍न शक्तियों और स्‍वभाव से संयुक्‍त है। उसकी कार्यशैली संसाधन और गंतब्‍य भिन्‍न भिन्‍न हो सकते हैं , किंतु एक ही सृष्टि होने की वजह से एक दूसरे का पूरक होना उसका सर्वोत्‍तम उपयोग है।

सभ्‍य सुशिक्षित समाज के विकास क्रम में पहले अंधविश्‍वास , फिर आस्‍था और अंत में विज्ञान आता है। जबतक व्‍यक्ति वैज्ञानिक सोंच विचार का अध्‍ययन मनन नहीं करेगा , अंधविश्‍वास को दूर नहीं भगा सकता। आस्‍था के विषय को भी सही ढंग से प्रमाणित नहीं कर पाएगा। अनपढ गंवार वृद्ध बुढिया एक पढी लंबी रेखा के नीचे अनगिनत रेखाएं खींचकर राम लक्ष्‍मण सीता नामक आस्‍था के तीन शब्‍दों से परीक्षार्थियों का रिजल्‍ट पहले ही बताने की चेष्‍टा करती थी। भविष्‍य को समझने और समझाने की यह चेष्‍टा उसकी बुद्धि के अनुसार हो सकती है , लेकिन बुद्धिजीवी इसे कदापि स्‍वीकार नहीं करेंगे , एक ही व्‍यक्ति के लिए इसका प्रयोग अनेक बार करने से एक ही निष्‍कर्ष नहीं निकलेगा। तोते से भाग्‍य की पत्र निकालना रेलवे स्‍टेशन में मशीन से वजन कराने के समय प्राप्‍त वजन टिकट पर लिखा भविष्‍य भी विश्‍वसनीय नहीं है। सप्‍ताह के दिन और पक्ष के तिथियों के अनुसार यात्रा , बाल कटवाना या दाढी बनवाना भी अंधविश्‍वास है। पुस्‍तकों में बहुत सारी बातें लिखि गयी हैं , जो तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं। इसमें उलझकर व्‍यक्ति का समय बर्वाद होता है , इसके करने या न करने के अपराध बोध से मन विचलित होता है। हम सुख का अनुभव नहीं कर पाते और अधिकांश समय अज्ञात भय से ग्रसित होते हैं। तर्क की दृष्टि से , संभावनावाद की दृष्टि अभी तक विज्ञान नहीं बन सके हैं।

विज्ञान विश्‍व को जोडता है , हिंदू , मुस्लिम सिक्‍ख ईसाई में कोई भेद उत्‍पन्‍न नहीं करता , सभी का खून एक जैसा होता है। एक ग्रुप का खून सबके शरीर में एक जैसा काम करेंगा। अस्‍वस्‍थ होने पर सबकी दवाएं एक ही ढंग से काम करती हैं , एक ही तरह का इलाज है , सब उसी बडी शक्ति की उपज हैं। सभी के साथ ग्रह नक्षत्र एक जैसा ही काम करता है। प्रकृति के रहस्‍य को समझने के लिए निरंतर वैज्ञानिक सोंच की जरूरत है , प्रकृति में अनगिनत या अनंत रहस्‍य छिपे हुए हैं। हर सत्‍य को उजागर करने के लिए एक नई सोंच की जरूरत है। लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि एक ही वैज्ञानिक विज्ञान के हर क्षेत्र में एक ही साथ निपुणता प्रापत कर ले , हर वैज्ञानिक को एक ही साथ प्रकृति का हर रहस्‍य दिखाई दे।

अणु परमाणु , इलेक्‍ट्रोन प्रोट्रोन न्‍यूट्रोन , गॉड पार्टिकल्‍स जैसे सूक्ष्‍मातिसूक्ष्‍म तत्‍वों के गुण स्‍वभाव को समझने वाले वैज्ञानिक समुदाय को भी अजतक विशालकाय त्‍वरित तीव्रगामी ग्रहों के मानव जीवन पर पडनेवाले प्रभाव और गुण दोष को समझने में भी विलंब हो गया है। आजतक ग्रहों के प्रभाव को अंधविश्‍वास समझा जाता रहा है। जिस बडी आबादी को इसके प्रभाव के प्रति जबर्दस्‍त आस्‍था है , वे ज्‍योतिष प्रेमी यहां तक की ज्‍योतिष को समझनेवाले ज्‍योतिषी भी इसे विज्ञान सिद्ध नहीं कर पाए। इसमें अगर वैज्ञानिकों ने इसे विज्ञान नहीं माना तो इसमें उनका भी कसूर क्‍या है ?

जहां तक मेरी सोंच है , विकास क्रम में अकस्‍मात विज्ञान का आगमन नहीं होता , पृथ्‍वी के बने अरबों वर्ष हो चुके , किंतु सभ्‍यता के विकास का सबूत कुछ हजार वर्षों से ही दिखाई पड रहा है। विज्ञान का जोरदार आगमन दो तीन सौ वर्षों से ही दिखाई पड रहा है। मुख्‍यत: विगत सौ दो सौ वर्षों में ही आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ है।

संपूर्ण ब्रह्मांड विराट ऊर्जा पुंज है। यही सर्वोच्‍च सत्‍ता या भगवान है। ऊर्जा सदैव नापतौल के हिसाब से शाष्‍वत और अक्षुण्‍ण बनी रहती है , यह रूपांतरित हो सकती है , पर नष्‍ट नहीं हो सकती। पृथ्‍वी सहित इसके संपूर्ण जड चेतन इसकी उपज है। विभिन्‍न गति और स्थिति के कारण ही सारे प्राणियों का अस्त्तिव भिन्‍न भिन्‍न गुण दोषों से संयुक्‍त होता है। एक दूसरे से अलग होता हुआ प्रतीत होता है। पृथ्‍वी सौर िपरिवार का सदस्‍य है , सूर्य की परिक्रमा करने वाले हर ग्रह उपग्रह जो विभिन्‍न सापेक्षिक गतियों के कारण अपरिमित ऊर्जा उत्‍सर्जित करते हैं , उससे पृथ्‍ववी प्रभावित होती है। इसमें स्थितजड चेतन समस्‍त प्राणी प्रभावित होते हें। मनुष्‍य विभिन्‍न शक्तियों से निर्मित विश्‍व का सर्वश्रेष्‍ठ प्राणी है , इसमें सोच विचार करने की अद्भुत क्षमता होती है , अगर वह अपनी शक्तियों का सदुपयोग करे तो हिमालय से ऊंचा और प्रशांत महासागर से गहरा सोंच मानव कल्‍याण के लिए प्रस्‍तुत कर सकता है।

उल्लिखित तथ्‍यों को समझने के लिए विज्ञान विशेषकर भौतक विज्ञान को समझना बहुत जरूरी है , क्‍योंकि विज्ञान की इस शाखा में ही ऊर्जा की संपूर्ण विशेषताओं का उल्‍लेख है। आम आदमी न तो विज्ञान की परिभाषा से परिचित है और न इन्‍हें विज्ञान का अध्‍ययन करने का मोका मिलता है। ऐसी परिस्थिति में वह कैसे कह सकता है कि उसकी अभिव्‍यक्ति वैज्ञानिकता से परिपूर्ण है।

मनुष्‍य के विकास क्रम में लडकपन , जवानी और वृद्धावस्‍था सम्मिलित है। अत: भूत वर्तमान और भविष्‍य तीनों कालों का वर्गीकरण को हर कोई समझता है , भूत वर्तमान का , और वर्तमान भविष्‍य का आधार है। भूत से वर्तमान तक का रास्‍ता स्‍पष्‍टत: दिखाई पडता है , जिधर से हम आ रहे होते हैं। वर्तमान में हम सदैव चौराहे पर खडे होते हैं , जहां से सही रास्‍ते का चयन करना सर्वाधिक कठिन होता है , क्‍योंकि पृथ्‍वी में मानव सर्वधिक विकसित प्राणी है। अन्‍य जीव जंतुओं के साथ इतनी कठिन परिस्थितियां नहीं होती हैं। वर्तमान से भविष्‍य की ओर कदम रखने के लिए हजारो विकल्‍प होते हैं। अत: पग पग पर दूरदृष्टि रखने वले अनुभवी लोगों के दिशा निर्देश की जरूरत महसूस होती है। पर हर जगह सूझ बूझ , अनुभवी दूर दृष्टि रखनेवाले व्‍यक्ति नहीं होते। भविष्‍य को समझने के लिए गत्‍यात्‍मक फलित ज्‍योतिष श्रेष्‍ठतम वैज्ञानिक विधा है।

भूत वर्तमान और भविष्‍य तीनों कालों का वर्गीकरण को हर कोई समझता है , भूत वर्तमान का , और वर्तमान भविष्‍य का आधार है। भूत से वर्तमान तक का रास्‍ता स्‍पष्‍टत: दिखाई पडता है , जिधर से हम आ रहे होते हैं। वर्तमान में हम सदैव चौराहे पर खडे होते हैं , जहां से सही रास्‍ते का चयन करना सर्वाधिक कठिन होता है , क्‍योंकि वर्तमान से भविष्‍य की ओर कदम रखने के लिए हजारो विकल्‍प होते हैं। अत: पग पग पर दूरदृष्टि रखने वले अनुभवी लोगों के दिशा निर्देश की जरूरत महसूस होती है। पर हर जगह सूझ बूझ , अनुभवी दूर दृष्टि रखनेवाले व्‍यक्ति नहीं होते। भविष्‍य को समझने के लिए गत्‍यात्‍मक फलित ज्‍योतिष श्रेष्‍ठतम वैज्ञानिक विधा है।

(मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा लिखा गया )

गुरुवार, 9 मई 2013

पूरे ब्रह्मांड में बनते रहते हैं सुंदर सुंदर दृश्‍य .....

जिस तरह पृथ्‍वी में सुंदर दृश्‍यों की कमी नहीं , वैसे ही पूरे ब्रह्मांड में भी बनते रहते हैं। हमारा ब्रह्मांड करोड़ों निहारिकाओं के समूह से भरा हुआ है। आसमान में अक्‍सर इनकी विभिन्‍न गतियों के कारण सुंदर दृश्‍य बनते हैं। कभी कभी इनमें से किसी एक को आधी रात के आकाश में धुंधले बादल के रूप में देख सकते हैं। टेलीस्कोप से देखने पर यह बैलगाड़ी के चक्के के समान दिखाई देती है। कोरी आंखों से जरा ध्यान से देखना होता है। अन्‍य ग्रहों , उपग्रहों और नक्षत्रों की चाल और विशेषताओं के फलस्‍वरूप सौरमंडल के अंदर और सौरमंडल के बाहर और धरती से सटे आसमान में दिखाई देने वाले आकाश के ऐसे प्राकृतिक सुंदर दृश्‍यों को नासा कैमरे में कैद कर अपनी वेबसाइट पर डाल दिया करता है। इंटरनेट में मौजूद आसमान के इन सुंदर दृश्‍यों के साथ साथ नासा के आसमान में किए गए क्रियाकलापों के कुछ कृत्रिम सुंदर दृश्‍यों को भी इस पृष्‍ठ पर देखा जा सकता है। शायद आपको याद होगा , इस लेख में भी कुछ चित्रों को आपके सामने रखा गया था , मैं तो इन्‍हे नियमित देखती हूं , आप भी आनंद लिया कीजिए। कुछ खास चित्र यहां भी दिए जा रहे हैं .................








दिए जा रहे हैं .....

सोमवार, 6 मई 2013

हमारे सॉफ्टवेयर के आधार पर बने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जीवनग्राफ ..... ( Astrology )

मेरे ब्‍लॉग में और फेसबुक में अनेक बार जीवन ग्राफ शब्‍द की चर्चा हुई है .. शायद ही लोग जानते होंगे कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सूत्रों के आधार पर किसी के जन्‍मकालीन ग्रहों को देखकर किसी के पूरे के उतार चढाव का लेखा चित्र ख्‍ींचा जा सकता है ... जीवन ग्राफ के अनुसार ही या तो हम आराम से सफलता प्राप्‍त करते हैं या कठिन श्रम से सफलता या कठिन श्रम के बाद भी असफलता या फिर निराशाजनक वातावरण में जीने को बाध्‍य होते हैं .... कभी परिस्थितियां हमारे नियंत्रण में होती हैं तो कभी हम परिस्थितियों के नियंत्रण में ... मेरे सॉफ्टवेयर ने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों का जीवन ग्राफ निकाला है ... इस लेख में कुछ उदाहरणों द्वारा स्‍पष्‍ट किया जा रहा है ...

यह फिल्‍म स्‍टार संजय दत्‍त का जीवन ग्राफ है ... बचपन में मां की मृत्‍यु के उपरांत इनका 1983 तक का समय बहुत कठिनाईपूर्ण व्‍यतीत हुआ , उसके बाद 1989 तक आरामदायक जीवन था , पर 1989 के बाद से ही ग्राफ ने मोड लिया , 1995 के बाद किए जाने वाले मेहनत के बाद भी 2001 के आसपास का समय असफलतापूर्ण बना रहा , पर उसके बाद कानूनी शिकंजे में कुछ ढील मिली , इन्‍हें काम करने का वातावरण और 2007 से 2013 तक का समय तो जीवन के सर्वाधिक सफलता का समय बना रहा।। 2013 में अचानक कानूनी शिकंजा कुछ तेज हो गया है , ग्राफ के हिसाब से भी आगे समय सही नहीं दिखता।

यह फिल्‍म स्‍टार अमिताभ बच्‍चन का जीवन ग्राफ है .. ये भी 1966 तक के जीवन को काफी सुखद नहीं मानते , परिस्थितियों की कुछ कठिनाई हो न हो स्‍वभाव के अतर्मुखी थे और उनके बाद में इतने बडे स्‍टार बन जाने की बात कोई नहीं सोंच सकता था , पर हम देख सकते हैं कि उसके बाद इनका पूरे जीवन ग्राफ सकारात्‍मक रहा और 2014 तक निरंतर काम का वातावरण और सफलता मिलती गई , 2006 से स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर यदा कदा परेशानी आती रही है वो 2014 के बाद बढ सकती है , क्‍योंकि 2014 के बाद इनके जीवन ग्राफ में ऋणात्‍मकता है।



यह बिहार के मुख्‍य मंत्री लालू प्रसाद यादव का जीवन ग्राफ है .. बचपन से कमजोर परिस्थितियों के साथ आरंभ होने वाली जीवन यात्रा 1978 तक बहुत ही अच्‍छी बन गयी , जहां छात्र नेता के रूप में इनका व्‍यक्तित्‍व महत्‍वपूर्ण था , पर उसके बाद काम का वातावरण मिलने के बावजूद स्‍तर के बावजूद 1990 तक बडी सफलता नहीं दिख सकी , 1990 से 2002 तक ग्राफ के उत्‍तरोत्‍तर विकास के साथ मुख्‍यमंत्री के तौर पर ये महत्‍वपूर्ण बने रहें , 2002 के बाद ग्राफ में गिरावट के साथ ही इन्के सम्‍मुख कुछ न कुछ कठिनाई उपस्थित होनी आरंभ हुई और 2008 के बाद असफलता का क्रम 2014 तक किसी न किसी रूप में मौजूद रहा । 2014 में पुन: परिस्थितियों में कुछ सुधार की गुंजाइश है। 


यह मेनका गांधी का जीवन ग्राफ है .... जन्‍म से 1974 तक सुखद माहौल में पालन पोषण और व्‍यक्तित्‍व का संपूर्ण विकास प्राप्‍त करने के बाद इनका परिस्थितियों से नियंत्रण कमजोर दिखने लगा है , किस तरह की ऋणात्‍मक वातावरण को झेल रही थी , उनकी मन:स्थिति के बारे में तो मैं नहीं बता सकती , पर 1980 के बाद की परिस्थिति तो उनके ग्राफ के सत्‍य को बयान कर ही देती है। उनके साथ जो हुआ वह 1986 तक उन्‍हें निराश करने के लिए काफी था। 1986 के बाद वो निरंतर काम कर अपने महत्‍व को स्‍थापित करती जा रही है , पर 2010 तक का समय बडी सफलता का नहीं दिख रहा। 2016 के बाद कुछ अच्‍छी उम्‍मीद रखी जा सकती है।


यह फिल्‍म स्‍टार सलमान खान का जीवन ग्राफ है , 2007 के आसपास के कुछ वर्षों को छोड दिया जाए तो 1989 से 2019 तक ग्राफ सकारात्‍मक ही दिख रहा है , निरंतर सफलता की सीढियां चढते जा रहे हैं , 2019 के बाद ही इनके जीवन में कुछ बाधाएं आ सकती हैं , जो 2025 के बाद बडा रूप ले लें।


यह गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जनक मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी का जीवन ग्राफ है .. जैसा कि ग्राफ की शुरूआत निम्‍न स्‍तर से हुई है , बचपन में हुए चेचक ने न सिर्फ छह महीने बिस्‍तर पर रहने मजबूर और शरीर को कुछ दिनों के लिए कमजोर किया , वरन् पूरे जीवन के लिए चेहरे पर चेचक के दाग दे दिया , पर क्रमश: बढते हुए ग्राफ ने इन्‍हें समाज में मेधावी छात्र के तौर पर स्‍थापित किया और 1963 तक की जीवनयात्रा एक विद्यार्थी के तौर पर बहुत अच्‍छी रही। पर 1963 के बाद जैसे ही ग्राफ में गिरावट आरंभ हुई , कैरियर में हर जगह असफलता ही हाथ आयी , 1969 तक निराशा के भंवर में डूबने उतराने के बाद उन्‍होने गंभीरता से प्रकृति के उस रहस्‍य को समझने की चेष्‍टा की , जिसके कारण इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी वे ढंग की नौकरी न प्राप्‍त कर सके। छह वर्षों तक तरह तरह की ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में बिखरे पडे ज्‍योतिषीय तथ्‍यों के परत दर परत खोलते हुए उनके सामने 1975 तक सचमुच एक रहस्‍य सामने आया , उसके बाद तो ग्रहों के प्रभाव के एक एक रहस्‍य की गुत्‍थी सुलझती चली गई। 1981 के बाद प्रायोगिक तौर पर काम आरंभ हुआ और निरंतर चल रहा है। 


यह ग्राफ  उ०  प० के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की है, २०१५ तक अनायास सफलता प्राप्ति का ग्राफ दिख रहा है ,  .... 

यह ग्राफ क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का है , २०११ तक आसान सफलता के बाद गंभीरता बढ़ी है …… 


यह ग्राफ बॉलीवुड की महान अदाकारा हेमा मालिनी जी का है ....... 

यह ग्राफ जैकी श्रॉफ को तब दिया गया था , जब लगातार उनकी हर फिल्म हिट हो रही थी .... 

यह ग्राफ संसद मनोज तिवारी का है.... 


यह ग्राफ शबाना आजमी जी का है ....... 


यह ग्राफ वरुण गांधी का है ................... 







यह ग्राफ पूरे आसमान में मौजूद सारे ग्रहों के चित्र को देखकर बनाया जाता है , अबतक 40,000 से ऊपर कुंडलियों में इसकी जांच हो चुकी है , विरले ही कहीं अपवाद नजर आया हो। इस खोज के बाद एक बात स्‍पष्‍ट हुई है कि आज के समाज की जो जीवनशैली है , वह प्राकृतिक तौर पर सही नहीं है , हमें अपनी जीवनशैली अपनी सोंच बदलनी होगी। 

शनिवार, 4 मई 2013

भारतीय शेयर बाजार : कैसा रहेगा अगला सप्‍ताह ?? ( Astrology )

2 मई की पोस्‍ट में मैने जानकारी दी थी भारतीय शेयर बाजार से संबंधित अनुसंधान भी हमारे द्वारा किया गया है , जिसके आधार पर इसके भविष्‍य की जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है। इस विषय में हमारे रिसर्च की शुरूआत जनवरी 2008 में तब हुई थी , जब शेयर बाजार दिन प्रतिदिन बडे बडे कदम नाप रहा था। इसका कारण ढूंढ पाने में हमें जबतक सफलता मिलती , उससे पहले ही इतनी उंचाई पर खडा शेयर बाजार प्रतिदिन लुढकने लगा था। जब इस खास महीनें में हुई इस आकस्मिक घटना के लिए आकाशीय स्थिति पर हमने गौर किया , तो एक खास योग को 22 जनवरी को उपस्थित पाया। वैसे तो जब आज विश्‍व का शेयर बाजार की इतने सारे घटकों पर निर्भरता बनीं हुई है, जिसे देखते हुए उस दिन भविष्‍यवाणी तो नहीं की जा सकी थी , पर उसी 22 जनवरी को ही बाजार के सबसे अधिक गिरने से हमें शेयर बाजार से संबंधित रिसर्च के लिए एक बडा आधार मिल गया, जिसके बल बूते रिसर्च करना बहुत आसान हो गया और आज अध्‍ययन मनन के परिणामस्‍वरूप नवम्‍बर तक पहुंचते पहुंचते बडी सफलता हाथ आ गयी है। जनवरी से अक्‍तूबर तक के 9 महीने का समय इतने बडे रिसर्च के लिए काफी नहीं माना जा सकता है , पर इसी रिसर्च का परिणाम शेयर से संबंधित भविष्‍यवाणियां है , जिनको आज आप सबों के साथ शेयर कर पाने में मुझे बडी खुशी हो रही है। सेंसेक्‍स और निफटी के अतिरिक्‍त अन्‍य सेक्‍टरों पर उतार चढाव से संबंधित शोध अभी भी जारी है।

आर्थिक क्षेत्र की छोटी बडी कई तरह की घटनाएं शेयर बाजार को प्रभावित करती हैं , पिछले सप्‍ताह हमने देखा कि रिजर्व बैंक की तरफ से नरम मौद्रिक नीतियों की घोषणा और पॉलिसी रेट में कटौती की उम्मीद में निवेशक इस कदर उत्‍साहित हुए कि रेट सेंसिटिव स्टॉक्स में खरीदारी से बाजार में 2 मई को जबर्दस्‍त उछाल आया , जिससे शेयर बाजार तीन महीने के उच्‍च स्‍तर पर पहुंच गया। पर बाजार की ऊंची उम्मीदों के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) ने मुद्रास्फीति के खतरे पर सख्त रुख बरकरार रखते हुए अपनी अल्पकालिक मुख्य ब्याज दर केवल 0.25 फीसदी घटाकर 7.25 फीसदी की पर सीआरआर को अपरिवर्तित रखा।  लेकिन आरबीआई की चेतावनी से बाजार को झटका लगा और  देश के शेयर बाजारों में हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार 3 मई को गिरावट का रुख बना रहा। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 55.35 अंकों की गिरावट के साथ 19,680.42 पर और निफ्टी भी लगभग इसी समय 69.15 अंकों की गिरावट के साथ 5,999.35 पर कारोबार की शुरूआत हुई और और सेंसेक्‍स 160.13 अंकों की गिरावट के साथ तथा निफ्टी 19,575.64 पर और 55.35 अंकों की गिरावट के साथ 5,944.00 पर बंद हुआ।

बाजार में न सिर्फ इस घटना का प्रभाव आनेवाले सप्‍ताह में भी देखने को मिलेगा वरन् आने वाले सप्‍ताह में अन्‍य कुछ घटक भी बाजार को प्रभावित कर सकते हैं। इस कारण 6 और 7 मई की स्थिति शेयर बाजार के लिए कुछ अधिक ही कमजोर रहेगी। मेटल सेक्टर के शेयरों में अधिक घटत की संभावना है! पूंजीगत वस्तुएं एवं खाद़य सामग्री के शेयरों के घटत की उम्मीद बनती है! कई क्षेत्रों के शेयर बढत की ओर प्रव़त्त हो सकते हैं! दोनो ही दिन 12 बजे से 3 बजे के मध्‍य ग्रहों का ऋणात्‍मक प्रभाव अधिक दिखेगा। पर 8 मई से 10 मई तक स्थिति बुरी नहीं दिखती है। इन तीनो ही दिन शेयर बाजार को प्रभावित करने वाले कुछ तत्व अच्छे और मनोनुकूल स्थिति में बने रहने से शेयर बाजार में उत्साहजनक वातावरण बनने की उम्मीद है। आई टी तथा रियल्टी सेक्टर के शेयरों की स्थिति अच्छी रहने की संभावना है! कई क्षेत्रों के शेयर बढत की ओर प्रव़त्त हो सकते हैं! ऑयल और गैस सेक्टर के मुख्य शेयरों में बढत की संभावना है! इन तीनों ही दिन 2 बजे के बाद मुनाफा वसूली का कुछ चक्‍कर हो सकता है।

फिलहाल किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती ..



आज निम्न  वर्गीय परिवारों के बच्चों को खाना , कपडा , मकान , सायकल और जरूरत की अन्य चीजें मुफ्त मिल रही है .. जो उनके माता पिता को दिनभर कडी मेहनत के बाद भी नहीं मिल पाती थी ... वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों  को प्रतियोगिता और मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी के दायित्वों तले उलझा दिया गया है .. भले ही महानगर में रहने की बाध्यता तले उनके पैसे न बच पाए .. पर बडी बडी सेलरी को देखने के बाद वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चे भी अपनी कंपनी को चुंबकीय बनाने के लिए ऐसी ऐसी ट्रेनिंग लेने में व्यस्‍त है .. जो पूरे बाजार में बिखरे पडे पैसो को अपनी ओर खींच सके .. इसकी पूरी सुविधा होने से वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
इसके अलावा सरकारी तंत्र के लोगों ने इसे सीमा से अधिक भ्रष्‍ट कर दिया है ... अपने अधिकारों का नाजायज फायदा उठाकर अपनी संतानों को कई पीढी तक नालायक बनाने की पूरी व्‍यवस्‍था कर चुके हैं .. उनकी संताने भी इस व्‍यवस्‍था में क्‍या खामी देखेंगी ??
 इस व्यवस्था में खामी को दूर करने की हमारी सोंच तभी कामयाब हो सकती है ... जब हम दूसरे की तकलीफ को अपनी तकलीफ समझें .. पर किसी भी वर्ग के नवयुवकों के पास खुद के सिवा दूसरों की समस्‍या  के लिए सोंचने का वक्त नहीं .... अब इस स्वा‍र्थपूर्ण माहौल में भारतवर्ष में हाल फिलहाल में किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती  ..

गुरुवार, 2 मई 2013

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की नजर में शेयर बाजार


प्राचीन काल से ही अज्ञानता जैसे शब्‍द से मानव जाति को सख्‍त नफरत रही है। शायद इसी कारण प्रकृति के उलझे हुए रहस्‍यों को न जान पाना उसके लिए एक भयंकर चुनौती बनी रही और उसने प्रकृति के सारी रहस्‍यों को सुलझाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी । इसका परिणाम हम सब अपने सामने देख रहे हैं। प्रकृति के एक एक रहस्‍यों को सुलझाती , उससे निबटने में सफलता प्राप्‍त करते हुए कंदराओं और गुफाओं में रहने वाली जनजाति आज एक अतिविकसित प्राणी के तौर पर संसार में अपनी उपस्थति दर्शा रही है।

किन्‍तु भूत और वर्तमान को सुलझा पाने में इसे जितनी ही अधिक सफलता मिलती जा रही है , भविष्‍य उतने ही घने अंधेरे के रूप में इसके सामने मुंह चिढाता खडा हो रहा है। कल क्‍या होगा ? किसी को पता नहीं। इस दिशा में भी गुत्त्थियों को सुलझा पाने की शुरूआत हमारे ऋषि , महर्षियों और योगियों ने की थी , ताकि जिस तरह हम एक रोशनी लेकर अनजान पथ पर भी आगे बढ जाते हैं , एक सहारा लेकर इस जीवन पथ पर भी चलें और भविष्‍य को जान पाने के लिए ज्‍योतिष शास्‍त्र के रूप में एक विज्ञान को विकसित किया गया। पर कालांतर में जब सभी शास्‍त्रों का नवीनीकरण किया गया , इस शास्‍त्र को अंधविश्‍वास समझते हुए इसे उपेक्षित छोड दिया गया जिसके कारण हम आजतक अंधकार में ही भटक रहे हैं।

वैसे तो हर क्षेत्र में ही देखा जाए , तो भविष्‍य बिल्‍कुल अनिश्चित है , क्‍योकि आज के अनिश्चितता के दौर में जब आम आदमी का जीवन ही निश्चित नहीं , तो किस पैसे , किस संपत्ति , किस डिग्री , किस जान परिचय और किस सगे संबंधी पर आप भरोसा कर सकते हैं ? पर आज की तिथि में जो सर्वाधिक अनिश्चित दिखाई पड रहा है , वह है पूरे विश्‍व का शेयर बाजार , जिसके बारे में बिना किसी आधार के एक दो घंटे बाद की भविष्‍यवाणी कर पाना भी काफी मुश्किल हो गया है। इसका मुख्‍य कारण यह है कि आज के बाजार में शेयरों की खरीद बिक्री की कोई मुख्‍य वजह नहीं रह गयी है। लोगों की मन:स्थिति में होनेवाले परिवर्तन के बल बूते पर बाजार में खरीद और बिक्री का दौर जारी है और चूंकि लोगों की मन:स्थिति को प्रभावित करने में ग्रहों की भूमिका होती है , इसलिए अप्रत्‍यक्ष तौर पर ही सही , अभी सिर्फ और सिर्फ ग्रहों का ही प्रभाव शेयर बाजार पर देखने को मिल रहा है।

ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव को जानने की एकमात्र विधा ज्‍योतिष ही है और इसे सही ढंग से विकसित कर पाने की दिशा में 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र ' बोकारो द्वारा 20वीं सदी के अंतिम 40 वर्षों में बहुत बडा रिसर्च हुआ। ग्रहो की वास्‍तविक शक्तियों की खोज कर ज्‍योतिष को विज्ञान बना पाने सफलता मिलने से भविष्‍य को देख पाने के लिए एक तरह की रोशनी मिली , जो काफी हद तक स्‍पष्‍ट तो नहीं कही जा सकती , पर हमारे सामने भविष्‍य का एक धुंधला सा चित्र अवश्‍य खींच देती है। इसी के आधार पर 2008 के जनवरी से ही मै अपने ब्‍लाग पर शेयर से संबंधित भविष्‍यवाणी करती आ रही हूं। स्‍टॉक मार्केट पर हिंदी की पहली वेबसाइट 'मोल तोल डॉट इन' में मैं शेयर बाजार के बारे में भविष्‍यवाणी करते हुए साप्‍ताहिक कॉलम लिखा करती थी , पर पिछले दो वर्षों से इस क्षेत्र का रिसर्च बंद हो जाने से लेखन रूक गया था। इस सप्‍ताहांत से पुन: इसे शुरू करने जा रही हूं , शेयर बाजार में रूचि रखने वालों के लिए थोडा भी लाभदायक हुआ तो मेरी मेहनत साकार महसूस होगी। 

रांची कॉलेज , रांची के भूतपूर्व प्राचार्य डॉ बी एन पांडेय जी के द्वारा मेरी पुस्‍तक के लिए लिखा गया प्राक्‍कथन ( Astrology )



सूर्यादि ग्रहों तथा अश्विन्‍यादि नक्षत्रों के गणित तथा फलित का वर्णन विवेचन करने वाले शास्‍त्र की अभिद्दा ज्‍योतिष है। वेद के छठे अंग ( अनुक्रमत शिक्षा , कल्‍प , व्‍याकरण , तिरूक्‍त , छंद और ज्‍योतिष ) के रूप में ज्‍योतिष विद्या की प्राचीनता एवं महत्‍व निर्विवाद है। वेदांगों के बिना वेदों का सम्‍यक अध्‍ययन तथा उनके द्वारा अनुदेशित आचरणों के अनुरूप जीवनचर्या ढालकर ऊर्घ्‍वगामिता सिद्ध नहीं हो सकती। वेदांगों में ज्‍योतिष को वेदों का साक्षात नेत्र (वेदस्‍य चक्षु o) कहा गया है। हमारा जीवन श्रोताश्रित यानि  वंदाधारित हो अथवा स्‍मार्त्‍ताश्रित यानि परंपरावादी धर्मशास्‍त्रानुरूप ज्‍योतिष विज्ञान दोनो का अधिष्‍ठान है। प्रारंभ में वैदिक कर्मकांड की तिथियों तथा उससे संबंधित मांगलिक मुहूर्त्‍तों को जानने के लिए ज्‍योतिष विद्या का चिंतन एवं आविर्भाव किया गया। पर कालक्रम से इसके आयाम उपवृंहित होकर भविष्‍य का पूर्वज्ञान करने तथा जीवन जातक के भावी शुभाशुभ घटनाओं के पूर्व कथन करने तक विस्‍तीर्ण हो गया। विष्‍णुधर्मोत्‍तरपुराण के एक श्‍लोक से सिद्ध होता है कि ज्‍योतिष विद्या या ज्‍योतिर्विज्ञान का दूसरा नाम काल विधान शास्‍त्र भी है ..
वेदास्‍तु यज्ञार्थमभिप्रवृत्‍ता: कालानुपूर्वा विहिताश्र्च यज्ञा:।
तस्‍मादिदं कालविधान शास्‍त्र, यो ज्‍योतिषं वेद स वेद सर्वम् ।।

अर्थात् वेद तो यज्ञों के अनुष्‍ठान के लिए प्रवृत्‍त हुए हैं और सभी यज्ञ कालानुपूर्व ( क्रमबद्ध रूप से निर्धारित यानि निर्णित काल से पहले ही बंधे हुए हैं ) हैं , इसलिए जो विद्वान कालविधानशास्‍त्र यानि ज्‍योतिष विद्या का ज्ञाता है वही सर्वज्ञाता है ।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि ज्‍योतिर्विज्ञान के और चाहे जितने उद्देश्‍य हों , इसका मुख्‍य प्रयोजन काल विधान ही है। इसके बिना षोडष संस्‍कार , तिथि , वार , योग , नक्षत्रों की स्थिति इसके अनुरूप व्रत निर्देश , जातक एवं होरा विषयक मुहूर्त्‍तादि विचार संभव ही नहीं है। समासत: सकल ज्ञान का आधार ज्‍योतिष विद्या ही है तथा यही इसका मुख्‍य उद्देश्‍य भी है।

अर्थात यह ज्‍योतिष शास्‍त्र वेदो का नेत्र है , अतएव उसकी प्रधानता अन्‍य वेदांगों के बीच स्‍वत: प्रमाणित है , क्‍योंकि अन्‍य सभी अंगों से परिपूर्ण व्‍यक्ति नेत्रहीन होने से नहीं के बराबर है।
वेदस्‍य चक्षु किल शास्‍त्रमेतत्‍प्रधानतांगेषु ततोर्थजाता।
अंगैर्युतोन्‍ये: परिपूर्णमूर्तिश्र्चक्षुर्विहीन: पुसषों न किंचित्।। 

यह ज्‍योतिष शास्‍त्र स्‍कंध त्रियात्‍मक है , इसका प्रथम स्‍कंध ( शाखा अथवा विभाग ) सिद्धांत स्‍कंध , दूसरा संहिता स्‍कंध और तीसरा होरा स्‍कंध कहा जाता है। त्रुटि ( समय का अत्‍यंत सूक्ष्‍म भाग ) से लेकर प्रलय के अंत तक के काल और सूर्यादि ग्रहों से संबंधित कालमान की गणना की गणित विद्या को सिद्धांत स्‍कंध कहते हैं।

सूर्यदि ग्रहों , विविध केतुओं , तारामंडलों , नक्षत्रों , ताराओं , तारामंडलों के स्‍थान , योग , उनकी गति संबंधी शुभाशुभ फलों के विचार , शास्‍त्र को संहिता स्‍कंध कहते हैं। तथा ज्‍योतिष के जिस अंग के द्वारा जन्‍म , वर्ष , इष्‍ट काल पर ग्रहादि के प्रभाव , दृष्टि , बल , दशा एवं अंतर्दशादि की गणना और फलाफल का र्नि‍णय किया जाता है , उसे होरा स्‍कंध कहते हैं। होरा , जातक तथा हायन इसी के पर्यावाची नाम हैं। विद्वानों के मतानुसार अहोरात्र शब्‍द के आदि और अंत के वर्णों का लोप होकर ही होरा शब्‍द निर्मित हुआ है , जिसका अर्थ लग्‍न अथवा लग्‍नार्थ होता है , जिसके द्वारा जातक अर्थात जन्‍म और नवजात शिशु संबंधी सभी घटना फलों का विचार किया जाता है।

‘चतुर्लक्षं च ज्‍योतिषं’ सूत्र के अनुसार मूल ज्‍योतिर्विज्ञान 400000 श्‍लोकों से समृद्ध है। नारदसंहिता , कश्‍यपसंहिता और पराशरसंहिता के साक्ष्‍य से इस विज्ञान के 18 प्रवर्तक माने जाते हैं। यथा ब्रह्मा , सूर्य , वशिष्‍ठ , अवि , मनु , सोम या पौल्‍स्‍त्‍य , लोमश , मरीच , अंगिरा , व्‍यास , नारद , शौनक , भृगु , च्‍यवन , यवन , गर्ग , कश्‍यप तथा पराशर । ( कुछ पश्चिम भक्‍त लेखकों ने यवनाचार्य को म्‍लेच्‍छ के रूप में यूनानी लोमश को रोमश बताकर रोम का तथा पौल्‍स्‍त्‍य को एलेक्‍जेन्ड्रिया का पॉल नाम से विदेशी निर्धारित करने की चेष्‍टा की है। दृष्‍टब्‍य अद्भुत भारत ( वंडर दैट वाज इंडिया ) लेखक ए एल बाशम पृष्‍ठ 492 )

उत्‍तर वैदिक काल के ज्‍योतिषियों में आर्यभट्ट (पांचवी शताब्‍दी) , वराहमिहिर (छठी शताब्‍दी) , लल्‍लू ब्रह्मगुप्‍त (सातवीं शताब्‍दी) तथा भास्‍कराचार्य के नाम से प्रख्‍यात है। ज्ञातब्‍य है कि पश्चिम जगत को ज्ञात होने से काफी पहले आर्यभट्ट ने यह सिद्धांत स्‍थापित किया था कि सूर्य स्थिर है तथा पृथ्‍वी ही उसकी परिक्रमा करती है। यद्पि सिद्धांत , संहिता और होरा स्‍कंध के अंतर्गत शतश: उपविषय सिन्‍नविष्‍ट है , पर स्‍थूल रूप से इसके ही दो भाग प्रमुख हैं..
1. गणित तथा 2. फलित , जो गिरा ( वाणी ) और अर्थ अथवा जल और वीचि यानि लहर के समान परस्‍पर अभिन्‍न रूप से जुडे है , जिस प्रकार अर्थरहित शब्‍द बेकार होता है , उसी प्रकार फलित पक्ष विहीन गणित ज्‍योतिष भी व्‍यर्थ होता है। तदापि इन दोनो में ज्‍योतिष प्रधन्‍तर है , क्‍योंकि गणित के बिना फलित ज्‍योतिष किसी निष्‍कर्ष पर नहीं पहुंच सकता। वह सर्वथा परतंत्र और गणित ज्‍योतिष के अधीन है।

पूर्वोक्‍त प्राचीन 18 प्राचीन आचार्यों के सिद्धांतों में संप्रति जो सिद्धांत सर्वाधिक मान्‍य है , वह है सूर्य सिद्धांत। वैसे वराह मिहिर ने अपनी पुस्‍तक पंच सिद्धांतिका में पांच , नृसिंह दैवज्ञ ने हिल्‍लाजदीपिका में छह , दैवज्ञ पुंजराज ने अपने ग्रंथ शंभुहोरा प्रकाश में सात तथा शाकल्‍य संहिता के ब्रह्म सिद्धांत में आठ सिद्धांतों के होने की चर्चा मिलती है।  किंतु सभी ने सूर्य सिद्धांत को ही सबसे अधिक मान्‍य प्रामाणिक और शुद्ध माना है। ज्‍योतिर्विज्ञान की प्राचीनता के अतिरिक्‍त यह निर्विवाद है कि गणित और ज्‍योतिष शास्‍त्र सारे संसार में भारत से ही फैले हैं। खगोल और भूगोल विद्या भी ज्‍योतिष के अंग हैं। सामान्‍य भाषा में शून्‍य का अर्थ आकाश होता है। पर ज्‍योतिष के अनुसार आकाश शून्‍य ( खाली ) नहीं है। इसमें अनेक ग्रहों , नक्षत्रों और तारामंडल की अवस्थिति है। आकाश को प्राचीन ऋषियों ने तीन भागों में विभक्‍त किया है ...
क. पृथ्‍वी ख. अंतरिक्ष और ग. द्यूलोक । नक्षत्र मंडल को भी राशिचक्रों में विभाजित किया गया है और प्रत्‍येक राशि के साथ सूर्य के संक्रमण को देखकर 12 राशियों के नाम पर 12 सोर मास तथा पूर्णिमा की रात में नक्षत्र विशेष के साथ चंद्रमा की सन्निकटता के आधार पर चांद्रमासों का विधान किया गया। जिस मास की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र से युक्‍त थी , उसे चैत , विशाखा से युक्‍त को बैशाख , ज्‍येष्‍ठा से ज्‍येष्‍ठ , पूर्वाषाढ या उत्‍तराषाढ से आषाढ , श्रवण से श्रावण , पूर्व एवं उत्‍तर भाद्रपद से भाद्रपद ( भादो ) , अश्विनी से आश्विन , कृतिका से कात्रिक , मृगशिरा से मार्गशीर्ष ( अगहन  , पुष्‍य से पौष , मघा से माघ तथा पूर्वा और उत्‍तरा फाल्‍गुनी नक्षत्र से फाल्‍गुन महीने का नामकरण हुआ। इसी तरह वारों या दिनों के नाम भी ग्रहों के प्रात:कालीन स्थिति के आधार पर हैं और इनका क्रम पूर्णत: वैज्ञानिक है।

भारतीय ज्‍योतिष में चिंतन और प्रयोग का बराबर महत्‍वपूर्ण स्‍थान रहा है। जयपुर और दिल्‍ली की वेधशालाएं इनकी प्रयोग धर्मिता के प्रमाण हैं,  केवल बंधे बंधाए सूत्रों पर यह नहीं चलता रहा है , अन्‍यथा आर्यभट्ट वराहमिहिर , ब्रह्मगुप्‍त का कोई स्‍थान नहीं होता। वशिष्‍ठ , लोमश , अत्रि , आर्यभट्ट एवं ब्रह्मगुप्‍त से लेकर कृष्‍णमूर्ति तक भारतीय ज्‍योतिष को नया आयाम देने की परेपरा चलती आ रही है , चाहे वह गणित के क्षेत्र में हो या फलित के क्षेत्र में। ज्‍योतिष में व्‍यास , वशिष्‍ठ , मृग , पराशर के बाद , सत्‍याचार्य और उसके बाद प्रसिद्ध वैज्ञानिक ज्‍योतिषाचार्य वाराह मिहिर हुए , जिन्‍होने इस विद्या को व्‍यवस्थित किया। 20वीं सदी में उल्‍लेखनीय स्‍वर्गीय सूर्य नारायण राव , श्री लक्ष्‍मण दास मदान , डॉ वी भी रमण , डॉ कृष्‍णमूर्ति और भगवान दास मित्‍तल रहें। डॉ रमण की अंग्रेजी की पत्रिका ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ ने देश विदेश में भारतीय ज्‍योतिष की महानता को उजागर किया है। उनके संपादकीय देश विदेश के राजनीतिक उतार चढाव के लिए काफी चर्चित रहे हैं। नवीनता के संदर्भ में श्री भगवान दास मित्‍तल का बहुत बडा योगदान रहा , जिन्‍होने राशि से अधिक महत्‍वपूर्ण लग्‍न को समझा और इनकी सारी विवेचनाएं इसी पर आधारित रही हैं। श्री कृष्‍णमूर्ति भी ज्‍योतिष को पूर्ण विज्ञान का दर्जा दिलाने में अग्रसर रहे हैं। उनका ज्‍योतिष पंचांग एवं अयनांश शत प्रतिशत शुद्ध है। इसी प्रकार पत्रिका बाबाजी राजनैतिक और व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणी , भूकम्‍प , भ्रष्‍टाचार , सनसनीखेज हत्‍याएं और दुर्घटनाओं की शत प्रतिशत भविष्‍यवाणियों के लिए नाम कमा चुकी है। इसके संपादक श्री मदान जी इस प्रकार की घटनाओं का अंदाजा ग्रहों की चाल से लगाते हैं। इसी प्रकार ‘ज्‍योतिष तंत्र विज्ञान’ , ‘तंत्र मंत्र यंत्र विज्ञान’ ‘ज्‍योतिष्‍मती’ , ज्‍योतिष धाम’ आदि पत्रिकाओं के संपादक अपनी अपनी पत्रिका के माध्‍यम से ज्‍योतिष विज्ञान का प्रचार प्रसार करते आ रहे हैं।

ज्‍योतिष के क्षेत्र में पिता से शिक्षा ग्रहण करने और पुत्री से सहयोग प्राप्‍त करने की परंपरा भी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। लीलावती ने अपने पिता से ही ज्‍योतिष का ज्ञान प्राप्‍त किया था। अपने पिता के मरणोपरांत उनकी पुत्री श्रीमती सुप्रिया जगदीश ही ‘ज्‍योतिष्‍मती’ का संपादनभार संभाल रही है। श्रीमती गायत्री देवी वासुदेवन ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ के संपादन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी ज्‍योतिष विज्ञान की विकास दशा एवं नव्‍य दिशा बुद्धि की परंपरा में प्रस्‍तुत पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: एक परिचय’ का प्रणयण गणित विषय में कुशाग्र प्रज्ञा समृद्ध लेखिका श्रीमती संगीता पुरी ने किया है। यह विद्या उन्‍हें स्‍वनाम धन्‍य तेजस्‍वी ज्‍योतिषी पिता श्री विद्या सागर महथा , ज्‍योतिष वाचस्‍पति , ज्‍योतिष रत्‍न से प्राप्‍त हुई है , जिन्‍होने लगभग पूरी आयु ज्‍योतिष के अध्‍ययन मनन और चिंतन में लगायी है। दशा पद्धति की गत्‍यात्‍मक पद्धति उनके चिंतन और अन्‍वेषण का परिणाम हैं, जिसे विरासत के रूप में उनकी पुत्री ने उनसे पूरी अर्हता के साथ ग्रहण किया है। पुस्‍तक की विषय वस्‍तु , प्रमेयों , प्रतिपत्तियों , निष्‍कर्षों और तार्किक विश्‍लेषणों से यह सहज ही विश्‍वास होता है कि इस पुस्‍तक से फलित ज्‍योतिष को एक नई और मौलिक चिंतन दिशा मिलेगी। फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति की यह पहली कृति है , जिसका श्रेय लेखिका को मिलेगा। फलित ज्‍योतिष की पिटी पिटायी परंपराओं के यांत्रिक विवेचन से हटकर वैज्ञानिक ज्‍योति‍षीय तथ्‍यों का प्रादुष विवेचन इस पुस्‍तक की विशेषता है , जो अभी तक फलित ज्‍योतिष के एकमेव आश्रय विंशोत्‍तरी पद्धति की शरणागति की अनिवार्यता को अस्‍वीकार करती है।

विंशोत्‍तरी पद्धति के स्‍थान पर ज्‍योतिष में वर्णित ग्रहों की अवस्‍था को क्रमानुसार स्‍थान पुस्‍तक की विवेच्‍य प्रणाली में दिया गया है , लेखिका की मान्‍यता है कि बाल्‍यावस्‍था में प्रभावित करनेवाला उपग्रह चंद्रमा है , भले ही जातक का जन्‍म किसी भी नक्षत्र में हुआ हो। इसी तरह वृद्धावस्‍था को प्रभावित करने वाले ग्रह बृहस्‍पति और शनि हैं। इसका कारण यह है कि फलित ज्‍योतिष में वृद्धावस्‍था का ज्ञानी ग्रह बृहस्‍पति माना गया है , उत्‍तर वृद्धावस्‍था के प्रतीक ग्रह के रूप में शनि की मान्‍यता है। इस दशा पद्धति में ग्रहों का कालक्रम क्रमश: चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो को रखा गया है। जन्‍म नक्षत्र पर इस दशाकाल की कोई आश्रिति नहीं है। इस मौलिक दशा पद्धति के जन्‍म दाता श्री विद्या सागर महथा की मान्‍यता है कि सभी ग्रहों के दशाकाल को संचालित करने का अधिकार मात्र चंद्रमा को देना सर्वथा अवैज्ञानिक है। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपनी बल स्थिति अपनी गत्‍यात्‍मकता के अनुसार संभालेंगे , यह सहज वैज्ञानिक बुद्धि से समर्थित और पुष्‍ट होता है।

इस दशा पद्धति में राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड नहीं है ,  भौतिक विज्ञान के अनुसार पदार्थ की अनुपस्थिति में शक्ति या ऊर्जा की परिकल्‍पना नहीं की जा सकती। प्रस्‍तुत दशा पद्धति में एक ओर ग्रहों के दशा काल में निश्चित कालक्रम को स्‍थान दिया गया है , तो उसी वैज्ञानिकता से ग्रहों में बलाबल की परंपरागत रीति से हटकर विचार किया गया है। इसमें चेष्‍टा बल , दिकबल , स्‍थानबल , अष्‍टकवर्ग बल आदि से भिन्‍न ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक बल को तथा ग्रहों की गमता को ग्रह बल का मुख्‍य आधार माना गया है। जो हो , यह तो सभी मानेंगे कि जिस विधि से संपूर्ण जीवन की तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणी बहुत ही आत्‍मविशवास के साथ और सही सही की जा सके , वही विधि अंतत: लोकग्राह्य होगी।

यूरेनस, नेप्‍च्‍यून तथा प्‍लूटो आदि पाश्‍चात्‍य मान्‍यता के ग्रहों की स्‍वीकृति तथा भारतीय फलित ज्‍योतिष में उसका सन्निवेश भी इस बात का प्रमाण है कि लेखिका अबतक की रूढ परंपराओं में बंधी नहीं होकर प्राच्‍य और पाश्‍चात्‍य पुरातन और अर्वाचीन दोनो की उपयोगी ज्‍योतिषीय पद्धतियों का स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया है। ‘ या नो भद्रा तत्‍वो यन्‍तु विश्‍वस्‍त:’ ( सारे विश्‍व से भद्र विचार हमारे पास आवें) के आर्ष वाक्‍य के अनुदेश के सर्वथा अनुकूल हैं। नए रास्‍ते पर चलनेवाले पहले व्‍यक्ति को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पडता है। उसके लिए सारस्‍वत स्‍वीकृति सहज नहीं होती। ऐसी ही परिस्थिति में महाकवि कालिदास ने कहा था ....
पुराणमित्‍येव न साधु सर्वं , न चापि सर्व नवमित्‍यवद्यम ।
सन्‍त: परिक्ष्‍याण्‍यतरद् भजन्‍त , मूढ: पर प्रत्‍ययनेय बुद्धि ।।

‘जो पुराना है , वह न तो सबका सब ठीक है और न जो नया है वह सभी केवल नया होने के कारण अग्राह्य है। साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके स्‍वीकार और अस्‍वीकार करते हैं , दूसरों के कहने पर तो मूढ ही राय बनाते हैं’
मेरा विश्‍वास है कि प्रस्‍तुत पुस्‍तक अपनी मौलिकता और विवेचन बल पर ज्‍योतिषीय जगत में अपने आदर का स्‍थान स्‍वयमेव बना लेगी और इसकी प्रतिभापूर्ण लेखिका एक नए हस्‍ताक्षर के रूप में सम्‍मान अर्जित करेंगी , ऐसा ही हो , यह मेरा आशीर्वचन तथा शुभांशसा दोनो है। राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के नक्षत्र शास्‍त्रीय पत्र पत्रिकाओं में लेखिका की जो रचनाएं स्‍वागत पा रही हैं , उससे मेरी इन आशाओं और विश्‍वासों को मूर्त्‍त होने की आश्‍वस्ति मिलती है।

इत्‍यलम् इतिशुभम
डॉ विश्‍वंभर नाथ पांडेय
एम ए , एल एल बी, पी एच डी
निदेशक , भारतीय संस्‍कृति एवं लोक सेवा संस्‍थान
भूतपूर्व प्राचार्य , रांची कॉलेज , रोची , झारखंड 

बुधवार, 1 मई 2013

29 अप्रैल को होने वाले विवाह के साथ अजब गजब कुछ समाचारों के लिंक ......( Astrology )

30 अप्रैल को सुबह सुबह शैलेश भारतवासी जी के फेसबुक स्‍टेटस पर मेरी नजर गई ...
क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि मातम और उत्सव इतनी जल्दी-जल्दी हों कि इंसान उनका एहसास न कर सके। गौरव शर्मा (Gaurav Sharma) के परिवार के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। 27 अप्रैल 2013 को गौरव का लग्न-महोत्सव था (झाँसी, आगरा, मथुरा आदि स्थानों का लग्न पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के तिलकोत्सव की तरह का ही एक वैवाहिक संस्कार है)। लड़की पक्ष वाले लग्न करके रात तीन बजे तक झाँसी से धौलपुर के लिए निकले। शायद वे धौलपुर पहुँच भी नहीं पाए होंगे कि लगभग सुबह के साढ़े सात बजे गौरव के पिताजी का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया। यह पहला ही दौरा था लेकिन जानलेवा साबित हुआ। 
इस घटना को लेकर मन कुछ दुखी ही था कि शाम को सुनील बडोला जी का फेसबुक स्‍टेटस भी वैसा ही देखने को मिल गया ....
मातम में बदली शादी, दूल्हे की मौत
देहरादून: अंबाला से पूरे परिवार और नाते-रिश्तेदारों के साथ सेहरा बांधकर देहरादून बरात लेकर पहुंचे दूल्हे की जयमाला के दौरान तबियत बिगड़ गई। परिजन उसे अस्पताल ले गए, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया। मृतक के परिजनों ने खाने में किसी तरह की विषाक्त चीज खिलाने की आशंका जताई है। पुलिस पीएम रिपोर्ट आने का इंतजार कर रही है। उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

30 वर्षों से ग्रहों के प्रभाव का अध्‍ययन करने के बाद यह तो स्‍पष्‍ट हुआ है कि ग्रहों का कोई योग सुखद वातावरण तैयार करता है तो कुछ कष्‍टकर , यही कारण है कि शुभ मुहूर्त्‍तों में विवाह या अन्‍य कर्मकांड करने को महत्‍व दिया जाता है। 29 अप्रैल को अक्षय तृतीया का दिन था , जिस दिन के लग्‍न को हमारे पंचांगों में बहुत ही शुभ माना गया है , फिर भी ऐसी दुर्घटनाएं क्‍यों हुई , आखि 29 अप््रैल को दिन अशुभ तो नहीं था , यह जानने के लिए मैने गूगल में '29 अप्रैल 2013' कीवर्ड के द्वारा पिछले सप्‍ताह के सभी समाचारों पर नजर डाली तो पाया कि बहुत सारे स्‍थानों में इस दिन के विवाह में कुछ न कुछ बाधाएं उपस्थित हुईं , ऐसा अन्‍य दिनों में भी होता होगा , क्‍योंकि मैने इस तरह का सर्च कभी नहीं किया था। पर यदि इसी बार इतने बडे स्‍तर पर वैवाहिक कार्यक्रम में गडबडी आई है तो यह मेरे लिए शोध का विषय है कि आखिर इस दिन ग्रहों की स्थिति में क्‍या गडबडी थी , ताकि ऐसे दिनों में आगे विवाह न किए जाने की सलाह लोगों को दी जा सके। ये देखिए 29 अप्रैल को होने वाले विवाह के साथ अजब गजब कुछ समाचारों के लिंक ......

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

अंधविश्‍वासों के आवरण में प्रच्‍छन्‍न : क्‍या है सत्‍य ?? ( Astrology )

समाज में भांति भांति के अंधविश्‍वास व्‍याप्‍त हैं , जो बुद्धिजीवी वर्ग को स्‍वीकार्य नहीं हो सकते , पर इन अंधविश्‍वासों के मध्‍य भी कुछ वैज्ञानिक सत्‍य हैं , जिनका खुलासा हमारे पिताजी श्री विद्या सागर महथा इस पुस्‍तक में कर रहे हैं , जिन्‍होने विज्ञान से स्‍नातक और हिंदी भाषा में मास्‍टर डिग्री लेने के बाद अपना सारा जीवन प्रकृति के उन रहस्‍यों को समझने में लगा दिया , जिससे पूरी दुनिया अनजान है , सालभर से मैं इस पुस्‍तक को सारगर्भित बनाने में ही जुटी थी , अब यह प्रकाशन के लिए तैयार हो चुकी है , समाज से अंधविश्‍वास दूर करने के लिए सामान्‍य लोगों के लिए पठनीय इस पुस्‍तक का प्रकाशन और जन जन तक वितरण आवश्‍यक भी है। 


समर्पण

मेरी माताजी सदैव भाग्य और भगवान पर भरोसा करती थी। मेरे पिताजी निडर और न्यायप्रिय थे। दोनों के व्यक्तित्व का संयुक्त प्रभाव मुझपर पड़ा। जहां एक ओर माताजी की अतिशय भाग्यवादिता ने मुझे परम शक्ति की यांत्रिकी को समझने को प्रेरित किया , वहीं दूसरी ओर पिताजी की न्यायप्रियता के फलस्वरुप मुझे सच और झूठ की पहचान एवं उसकी अभिव्यक्ति की शक्ति मिली। अतः मै अपनी पहली पुस्तक ‘ अंधविश्वासों के आवरण में प्रच्छकन्न् : क्या है सत्य़ ’ पूज्य माता-पिता के चरण-कमलो में सादर समर्पित करता हूं।




विषय क्रम ...

1. वार से फलित कथन अवैज्ञानिक
2. यात्राएं और सप्ताह के दिन
3. शकुन
4. मुहूर्त्त
5. हस्त रेखाएं
6. वास्तुशास्त्र
7. हस्ताक्षर विज्ञान
8. नजर का असर
9. न्यूमरोलोजी
10. प्रश्न कुंडली
11. ज्यो्तिष की सीमाएं
12. ज्यो्तिषी का विवादास्पद सामाजिक महत्व
13. राजयोग
14. कुंडली मेलापक
15. राहू और केतु
16. विंशोत्तरी पद्धति
17. ज्योतिष की त्रुटियां एवं दूर करने के उपाय
18. ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार
19. ग्रह शक्ति का रहस्य
20. हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं ?
21. गत्यात्म्क दशा पद्धति
22. ग्रहों का मानव जीवन पर प्रभाव
23. सहजन्मा के मंजिल की एकरूपता
24. क्या् बुरे ग्रहों का इलाज है ?
25. खतरे की पूर्व जानकारी से लाभ
26. घडी की तरह समय की जानकारी आवश्यलक है
27. ज्योतिष और आध्यात्म
28. ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन

... पढने के बाद प्रतिक्रिया दें .. दस उत्‍तम प्रतिक्रियाओं को पुस्‍तक में जगह दी जाएगी .....