शनिवार, 11 मई 2013

अंधविश्‍वास , आस्‍था और विज्ञान ( Astrology )

वह विश्‍वास जो तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता , हम अंधविश्‍वास कहते हैं , अंधविश्‍वास से स्‍वस्‍थ समाज का निर्माण नहीं हो सकता । कभी कभी अंधविश्‍वास समाज में व्‍यापक रूप से व्‍याप्‍त रहता है । इससे जनसमुदाय को बडा नुकसान होता है। स्‍वस्‍थ समाज के विकास क्रम में बहुत सारी बाधाएं होती हैं । अंधविश्‍वास का लाभ चंद ऐसे लोगों को मिलता है , जो बहुत ही धूर्त्‍त होते हैं । अंधविश्‍वास परिवार , समाज या राष्‍ट्र को तोडता है , आदमी से आदमी को अलग करता है। अपेक्षाकृत कम बुद्धिवाले या संकीर्ण बुद्धि वाले इससे प्रभावित होते हैं। बुद्धिजीवी के लिए यह कष्‍टकर होता है , भगवान चम्‍मच से दूध पी रहे हैं , इन्‍हें दूध पिलाओ , पूरा संसार एक ही दिन में करोडों चम्‍मच का उपयोग करते हुए भगवान को दूध पिलाया। यह अंधविश्‍वास है , भगवान निश्चित रूप से आस्‍था का विषय हैं , लेकिन वे दूध पी रहे हैं , यह अंधविश्‍वास है। अंधविश्‍वास बहुत समय तक जीवित नहीं रहता या टिकाऊ नहीं होता।

आस्‍था वह विसवास है , जिससे सदा सर्वदा हमारा मन स्‍वीकार करता है ,, लेकिन जिसे हम प्रमाणित करने में कठिनाई महसूस करते हैं , पृथ्‍वी की बडी से बडी आबादी यह स्‍वीकार करती है , कि भगवान हैं। हममें तुममें खड्ग ख्‍ंभ में भगवान हैं , उसकी अभिव्‍यक्ति के लिए इसके स्‍वरूप और चरित्र चिंत्रण में अनेकानेक कथाओं को सहारा लेते हैं। हरि अनंत हरि कथा अनंता। उनके निवास के लिए मंदिर मस्जिद , गि‍रजाघर और गुरूद्वारे का निर्माण करते हैं। हर व्‍यक्ति अपनी अपनी भावना के अनुसार उनके दर्शन करते हैं। कोई राम कोई मुहम्‍मद पैगंबर , कोई ईसा मसीह को मानते हैं। इस प्रकार जाकि रहे भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन तैसी । लेकिन भवनों के निर्माण में या उनके स्‍वरूप के निर्धारण में पूरी आबादी में एकता का अभाव है।

वैज्ञानिकों के देखने का नजरिया कुछ भिन्‍न होता है , वे संपूर्ण ब्रह्मांड, आकाशीय पिंडों , पृ;थ्‍वी , अनु परमाणु , इलेक्‍ट्रोन , प्रोट्रोन , न्‍यूट्रॉन , गॉड पार्टिकल के रूप में इसे स्‍वीकारण्‍ करते हैं। जिससे सारे विश्‍व का निर्माण हुआ , यह सर्वत्र व्‍याप्‍त है , शाष्‍वत है , अक्षुण्‍ण है , हर काल में मौजूद है । कभी नश्‍वर नहीं होता। हम सौर परिवार में रहते हैं। इसमें स्थित सारे ग्रह उपग्रह निरंतर गतिशील हैं , पृथ्‍वी में रहनेवाले हर व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली बन सकती है। जन्‍म कालीन ग्रहों की गति और स्थिति से हर व्‍यक्ति विभिन्‍न शक्तियों और स्‍वभाव से संयुक्‍त है। उसकी कार्यशैली संसाधन और गंतब्‍य भिन्‍न भिन्‍न हो सकते हैं , किंतु एक ही सृष्टि होने की वजह से एक दूसरे का पूरक होना उसका सर्वोत्‍तम उपयोग है।

सभ्‍य सुशिक्षित समाज के विकास क्रम में पहले अंधविश्‍वास , फिर आस्‍था और अंत में विज्ञान आता है। जबतक व्‍यक्ति वैज्ञानिक सोंच विचार का अध्‍ययन मनन नहीं करेगा , अंधविश्‍वास को दूर नहीं भगा सकता। आस्‍था के विषय को भी सही ढंग से प्रमाणित नहीं कर पाएगा। अनपढ गंवार वृद्ध बुढिया एक पढी लंबी रेखा के नीचे अनगिनत रेखाएं खींचकर राम लक्ष्‍मण सीता नामक आस्‍था के तीन शब्‍दों से परीक्षार्थियों का रिजल्‍ट पहले ही बताने की चेष्‍टा करती थी। भविष्‍य को समझने और समझाने की यह चेष्‍टा उसकी बुद्धि के अनुसार हो सकती है , लेकिन बुद्धिजीवी इसे कदापि स्‍वीकार नहीं करेंगे , एक ही व्‍यक्ति के लिए इसका प्रयोग अनेक बार करने से एक ही निष्‍कर्ष नहीं निकलेगा। तोते से भाग्‍य की पत्र निकालना रेलवे स्‍टेशन में मशीन से वजन कराने के समय प्राप्‍त वजन टिकट पर लिखा भविष्‍य भी विश्‍वसनीय नहीं है। सप्‍ताह के दिन और पक्ष के तिथियों के अनुसार यात्रा , बाल कटवाना या दाढी बनवाना भी अंधविश्‍वास है। पुस्‍तकों में बहुत सारी बातें लिखि गयी हैं , जो तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं। इसमें उलझकर व्‍यक्ति का समय बर्वाद होता है , इसके करने या न करने के अपराध बोध से मन विचलित होता है। हम सुख का अनुभव नहीं कर पाते और अधिकांश समय अज्ञात भय से ग्रसित होते हैं। तर्क की दृष्टि से , संभावनावाद की दृष्टि अभी तक विज्ञान नहीं बन सके हैं।

विज्ञान विश्‍व को जोडता है , हिंदू , मुस्लिम सिक्‍ख ईसाई में कोई भेद उत्‍पन्‍न नहीं करता , सभी का खून एक जैसा होता है। एक ग्रुप का खून सबके शरीर में एक जैसा काम करेंगा। अस्‍वस्‍थ होने पर सबकी दवाएं एक ही ढंग से काम करती हैं , एक ही तरह का इलाज है , सब उसी बडी शक्ति की उपज हैं। सभी के साथ ग्रह नक्षत्र एक जैसा ही काम करता है। प्रकृति के रहस्‍य को समझने के लिए निरंतर वैज्ञानिक सोंच की जरूरत है , प्रकृति में अनगिनत या अनंत रहस्‍य छिपे हुए हैं। हर सत्‍य को उजागर करने के लिए एक नई सोंच की जरूरत है। लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि एक ही वैज्ञानिक विज्ञान के हर क्षेत्र में एक ही साथ निपुणता प्रापत कर ले , हर वैज्ञानिक को एक ही साथ प्रकृति का हर रहस्‍य दिखाई दे।

अणु परमाणु , इलेक्‍ट्रोन प्रोट्रोन न्‍यूट्रोन , गॉड पार्टिकल्‍स जैसे सूक्ष्‍मातिसूक्ष्‍म तत्‍वों के गुण स्‍वभाव को समझने वाले वैज्ञानिक समुदाय को भी अजतक विशालकाय त्‍वरित तीव्रगामी ग्रहों के मानव जीवन पर पडनेवाले प्रभाव और गुण दोष को समझने में भी विलंब हो गया है। आजतक ग्रहों के प्रभाव को अंधविश्‍वास समझा जाता रहा है। जिस बडी आबादी को इसके प्रभाव के प्रति जबर्दस्‍त आस्‍था है , वे ज्‍योतिष प्रेमी यहां तक की ज्‍योतिष को समझनेवाले ज्‍योतिषी भी इसे विज्ञान सिद्ध नहीं कर पाए। इसमें अगर वैज्ञानिकों ने इसे विज्ञान नहीं माना तो इसमें उनका भी कसूर क्‍या है ?

जहां तक मेरी सोंच है , विकास क्रम में अकस्‍मात विज्ञान का आगमन नहीं होता , पृथ्‍वी के बने अरबों वर्ष हो चुके , किंतु सभ्‍यता के विकास का सबूत कुछ हजार वर्षों से ही दिखाई पड रहा है। विज्ञान का जोरदार आगमन दो तीन सौ वर्षों से ही दिखाई पड रहा है। मुख्‍यत: विगत सौ दो सौ वर्षों में ही आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ है।

संपूर्ण ब्रह्मांड विराट ऊर्जा पुंज है। यही सर्वोच्‍च सत्‍ता या भगवान है। ऊर्जा सदैव नापतौल के हिसाब से शाष्‍वत और अक्षुण्‍ण बनी रहती है , यह रूपांतरित हो सकती है , पर नष्‍ट नहीं हो सकती। पृथ्‍वी सहित इसके संपूर्ण जड चेतन इसकी उपज है। विभिन्‍न गति और स्थिति के कारण ही सारे प्राणियों का अस्त्तिव भिन्‍न भिन्‍न गुण दोषों से संयुक्‍त होता है। एक दूसरे से अलग होता हुआ प्रतीत होता है। पृथ्‍वी सौर िपरिवार का सदस्‍य है , सूर्य की परिक्रमा करने वाले हर ग्रह उपग्रह जो विभिन्‍न सापेक्षिक गतियों के कारण अपरिमित ऊर्जा उत्‍सर्जित करते हैं , उससे पृथ्‍ववी प्रभावित होती है। इसमें स्थितजड चेतन समस्‍त प्राणी प्रभावित होते हें। मनुष्‍य विभिन्‍न शक्तियों से निर्मित विश्‍व का सर्वश्रेष्‍ठ प्राणी है , इसमें सोच विचार करने की अद्भुत क्षमता होती है , अगर वह अपनी शक्तियों का सदुपयोग करे तो हिमालय से ऊंचा और प्रशांत महासागर से गहरा सोंच मानव कल्‍याण के लिए प्रस्‍तुत कर सकता है।

उल्लिखित तथ्‍यों को समझने के लिए विज्ञान विशेषकर भौतक विज्ञान को समझना बहुत जरूरी है , क्‍योंकि विज्ञान की इस शाखा में ही ऊर्जा की संपूर्ण विशेषताओं का उल्‍लेख है। आम आदमी न तो विज्ञान की परिभाषा से परिचित है और न इन्‍हें विज्ञान का अध्‍ययन करने का मोका मिलता है। ऐसी परिस्थिति में वह कैसे कह सकता है कि उसकी अभिव्‍यक्ति वैज्ञानिकता से परिपूर्ण है।

मनुष्‍य के विकास क्रम में लडकपन , जवानी और वृद्धावस्‍था सम्मिलित है। अत: भूत वर्तमान और भविष्‍य तीनों कालों का वर्गीकरण को हर कोई समझता है , भूत वर्तमान का , और वर्तमान भविष्‍य का आधार है। भूत से वर्तमान तक का रास्‍ता स्‍पष्‍टत: दिखाई पडता है , जिधर से हम आ रहे होते हैं। वर्तमान में हम सदैव चौराहे पर खडे होते हैं , जहां से सही रास्‍ते का चयन करना सर्वाधिक कठिन होता है , क्‍योंकि पृथ्‍वी में मानव सर्वधिक विकसित प्राणी है। अन्‍य जीव जंतुओं के साथ इतनी कठिन परिस्थितियां नहीं होती हैं। वर्तमान से भविष्‍य की ओर कदम रखने के लिए हजारो विकल्‍प होते हैं। अत: पग पग पर दूरदृष्टि रखने वले अनुभवी लोगों के दिशा निर्देश की जरूरत महसूस होती है। पर हर जगह सूझ बूझ , अनुभवी दूर दृष्टि रखनेवाले व्‍यक्ति नहीं होते। भविष्‍य को समझने के लिए गत्‍यात्‍मक फलित ज्‍योतिष श्रेष्‍ठतम वैज्ञानिक विधा है।

भूत वर्तमान और भविष्‍य तीनों कालों का वर्गीकरण को हर कोई समझता है , भूत वर्तमान का , और वर्तमान भविष्‍य का आधार है। भूत से वर्तमान तक का रास्‍ता स्‍पष्‍टत: दिखाई पडता है , जिधर से हम आ रहे होते हैं। वर्तमान में हम सदैव चौराहे पर खडे होते हैं , जहां से सही रास्‍ते का चयन करना सर्वाधिक कठिन होता है , क्‍योंकि वर्तमान से भविष्‍य की ओर कदम रखने के लिए हजारो विकल्‍प होते हैं। अत: पग पग पर दूरदृष्टि रखने वले अनुभवी लोगों के दिशा निर्देश की जरूरत महसूस होती है। पर हर जगह सूझ बूझ , अनुभवी दूर दृष्टि रखनेवाले व्‍यक्ति नहीं होते। भविष्‍य को समझने के लिए गत्‍यात्‍मक फलित ज्‍योतिष श्रेष्‍ठतम वैज्ञानिक विधा है।

(मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा लिखा गया )

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