शुक्रवार, 14 मार्च 2014

9 मार्च 2014 को 'अ बिलियन आइडियाज' की ओर से आयोजित एक ब्‍लॉगर्स मीट में मेरा विचार

कलकत्‍ता के पार्क स्‍ट्रीट में 'द गोल्‍डेन पार्क' होटल में पिछले रविवार यानि 9 मार्च 2014 को 'अ बिलियन आइडियाज' की ओर से आयोजित एक ब्‍लॉगर्स मीट में भाग लेने का मौका मिला , इसमें विचार विमर्श के लिए निम्‍न मुद्दे थे .....

How to retain the inclusiveness and secular fabric of the nation
How to harness the potential of youth for innovation
How to empower women to have a greater say in the household decision making
How to increase transparency in the governance at all levels.

दो पीढियों से चली आ रही महिलाओं की समस्‍याओं के समाधान का एक उपाय नजर आ रहा था , इसलिए मैं इसी पर अपने विचार प्रस्‍तुत करने गयी थी, जो इस प्रकार हैं .... 

आज से पंद्रह साल पहले तक की मध्‍यम वर्गीय परिवारों की पढी लिखी महिलाओं की कहानी यही थी कि पढे लिखे होने के बावजूद घर परिवार संभालने की जिम्‍मेदारी के कारण अपने कैरियर पर अधिक ध्‍यान नहीं दे पाती थी। इस समय तक मुश्किल से दो प्रतिशत महिलाएं अपना कैरियर बना पायी , जिन्‍हें उनके पति और ससुरालवालों ने पूरा सहयोग दिया। बाकी की 98 प्रतिशत महिलाएं परिवार को संभालने के लिए , बच्‍चों की अच्‍छी परवरिश के लिए समझौते करती रही। उस वक्‍त बीएड करने वाली या प्रतियोगिता पास कर चुकी महिलाओं को भी घर परिवार संभालने के चक्‍कर में नौकरी छोडनी पडी। हमारे परिचय की एक स्‍त्री रोग विशेषज्ञा तक हैं , जिन्‍होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्‍यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्‍योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे तबादला नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्‍चों को लेकर नौकरी संभालते हुए दूसरे शहर में रह सकती थी। सबसे बडी बात कि वे कैरियर को छोडकर भी राजी खुशी अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती रहीं। मैने खुद भी अपने परिवार और बच्‍चों को संभालने के लिए कैरियर के बारे में कभी नहीं सोंचा। पर आज की पीढी की लडकियां ऐसा समझौता नहीं कर सकती , ‘हमारा सबकुछ बर्वाद हो जाए , पर हम कैरियर को नहीं बर्वाद होने देंगे’ आज की पूरी पीढी की युवतियों की ये आवाज बन रही है और इसकी प्रेरणा उन्‍हें हम जैसी मांओं या चाचियों से ही मिल रही है , जो कल तक परिवार संभालने के कारण खुद के कैरियर पर ध्‍यान नहीं दे रही थी। समाज के लिए यह चिंतन का विषय है कि इन प्रौढ महिलाओं के चिंतन में बदलाव आने में कहीं उनका ही हाथ तो नहीं ?

नौकरी कर रही महिलाओं को दो चार साल भले ही कभी दुधमुंहे , कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्‍चे को छोडकर नौकरी को संभाल पाने में दिक्‍कत होती हो , पर बच्‍चों के स्‍कूल में एडमिशन के पश्‍चात हल्‍के रूप में और बच्‍चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं मंदिरों में , अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्‍में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्‍व विहीन अवस्‍था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं। पर विचारशील महिलाएं कोई न कोई रचनात्‍मक कार्य करना चाहती है , पर बढती उम्र के साथ कुछ बाधाएं भी आती हैं , और उनको काम में परिवार , समाज का सहयोग भी नहीं मिल पाता , तब उन्‍हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनकी प्रतिभा का कोई महत्‍व नहीं। उनकी प्रतिभा को समाज में महत्‍व दिया जाता , तो आज उनका दृष्टिकोण ऐसा नहीं होता। जाहिर है , जिस त्‍याग को आज वे भूल समझ रही हों , वैसा त्‍याग अपनी बच्चियों से नहीं करवा सकती। पर इस तरह की सोंच से आनेवाली पीढी को बहुत नुकसान है , यह बात समाज को समझनी चाहिए।

आज की पूरी पीढी की युवतियों की यह सोंच कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्‍यवस्‍था पैदा कर सकता है। पुरानी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्‍चों के प्रत्‍येक क्रियाकलापो पर ध्‍यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया , जिससे समाज मजबूत बनता है। सारी कामकाजी महिलाओं के बच्‍चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्‍चों पर ध्‍यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्‍नी मिलकर ही बच्‍चों का ध्‍यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्‍कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्‍व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्‍चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्‍क विकसित होगा। एक भैया की शादी मेरे साथ ही हुई थी , पत्‍नी अपने जॉब में तरक्‍की कर रही हैं , इसलिए संतुष्‍ट हैं , पर बच्‍चों के विकास से संतुष्‍ट नहीं , अफसोस से कहती हैं , ‘जब सबका बच्‍चा बढ रहा था , मेरा बढा नहीं , जब सबका बच्‍चा पढ रहा है , मेरा पढा नहीं।‘ हां चारित्रिक तौर पर दोनो अच्‍छे हैं पर इस प्रकार की असंतुष्टि उस समय एक दो परिवार की कहानी थी , अब यही हर परिवार की कहानी होगी। हाल फिलहाल की कहानी है , पति के मना करने के बावजूद अपने बच्‍चे के जन्‍म के दो महीने बाद ही उसकी मां नौकरी पर जाने को तैयार थी , वो मानती थी कि बच्‍चे को संभालने की जिम्‍मेदारी पिता की भी बराबर ही है। हारकर पिता को ही नौकरी छोडनी पडी , घर से ही बच्‍चे को संभालते हुए कुछ काम करने लगा , पर बच्‍चे की परवरिश सामान्‍य नहीं हो सकी। आने वाली पीढी यानि आज के बच्‍चों का विकास ढंग से नहीं होगा , उनके व्‍यक्तित्‍व का पतन होगा तो उसे भी आनेवाले समय में देश को ही झेलना होगा।

कैरियर को महत्‍व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्‍चे न पैदा करने का व्‍यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्‍चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्‍ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्‍यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्‍त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्‍चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्‍ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्‍य विषयों का सामान्‍य ज्ञान कम नहीं होता। इसलिए महिलाओं के लिए हर प्रकार की नौकरी में उम्र सीमा समाप्‍त किया जाना चाहिए । साथ ही हर क्षेत्र में उन्‍हें पर्याप्‍त आरक्षण मिलना चाहिए। उन्‍हें व्‍यवसाय के लिए बैंको से कम ब्‍याज दरों पर ऋण और अन्‍य तरह की सुविधाएं मुहैय्या करायी जानी चाहिए, ताकि घर परिवार संभालते वक्‍त भविष्‍य में कुछ आशाएं दिखती रहें। आने वाली बेहतर पीढी का ढंग से पालन पोषण करते वक्‍त महिलाओं का भविष्‍य के लिए आश्‍वस्‍त रहना बहुत आवश्‍यक है। 

अन्‍य तीनों मुददों पर मेरे विचार इस प्रकार हैं .....

  1. हमारे देश में सदैव 'विविधता में एकता' की भावना विकसित होती रही है , इसलिए मेरे विचार से देश के लोगों की जाति , धर्म या रहन सहन जो भी हो कोई अंतर नहीं पडता , बस लोगों के अंदर देश भक्ति की भावना में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए , हम अपने बच्‍चों को ऐसी शिक्षा दें कि किसी के बहकावे में आकर वे देश का नुकसान न करें। सरकार को बस इतना करना है कि वे सभी नागरिकों को समान सुविधाएं दें। नौकरी में आरक्षण देकर समाज के कमजोर पक्ष को आर्थिक सुरक्षा भले ही आवश्‍यक हो , पर देश के हित के लिए जिम्‍मेदारी से भरे सरकारी उच्‍च पदों में या पदोन्‍नति में प्रतिभा को महत्‍व दिया जाना चाहिए। 
  2. देश की आनेवाली पीढी को यानि युवाओं को प्रतिभाशाली बनाने के लिए रटंत प्रणाली की शिक्षा को समाप्‍त कर इसे व्‍यावहारिक और उपयोगी बनाने पर बल दिया जाना चाहिए , अपनी अपनी रूचि और प्रतिभा के हिसाब से सभी युवाओं को सरकार की ओर से एक समान अवसर मिलना चाहिए। दबाबपूर्ण पाठ्यक्रम युवाओं के प्रतिभा को नुकसान पहुंचाती है। 
  3. आज प्राइवेट संस्‍थानों ने संचार क्रांति का पूरा फायदा उठाया है , एक एक कर्मचारी की गतिविधियों पर उनकी पूरी निगाह रहती है , सरकार के लिए तो यह और आसान है। संचार क्रांति के इस युग में सरकारी तंत्र की जनता के मध्‍य पारदर्शिता बहुत बडी बात नहीं , बस इच्‍छा शक्ति होनी चाहिए। 

3 टिप्‍पणियां:

Khushdeep Sehgal ने कहा…

संगीता जी,

महिला सशक्तिकरण के लिए आपके विचार पूर्णत: सुसंगत और सशक्त हैं...महिलाएं अब ज़्यादा से ज़्यादा जागरूक हैं...बच्चियों को हम शिक्षा और स्किल ओरिएन्टेड कार्यों से दक्ष बनाएं तो महिला सशक्तिकरण की दिशा में यही सबसे बड़ा कदम होगा...वो सुबह अब आकर ही रहेगी...

जय हिंद...

प्रतिभा कुशवाहा ने कहा…

आप के विचार महत्वपूर्ण है ॥संगीता जी

Girish Billore ने कहा…

पूज्या संगीता ताई
प्रणाम
जहां तक दायित्व विहीन स्थिति का सवाल है बेशक महिलाएं क्या कोई भी आदर्श सीमा में नहीं रख पाता खुद को ...परंतु महिलाओं से खास तौर आदर्श स्थिति बनाए रखने की अपेक्षा ही क्यों रखी जाए.. अभिभावकों को चाहिये कि वे सदैव आत्मानुशासन की कड़ी तालीम देते रहें ताकि निर्वात में भी रक्षा वलय बरकरार रहे
बेहद प्रासंगिक आलेख
आपका आभार